वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

ईश्वर का राजकुमार इतना भटका हुआ क्यों है?

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से मनुष्य को अनेकों बार ईश्वर का राजकुमार, वरद पुत्र अर्थात वरदान लेकर जन्मा पुत्र, असीमित प्रतिभाओं और सम्पदाओं से लैस ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना जैसे विशेषण प्रयोग करके गौरवान्वित किया जाता रहा है लेकिन इतनी समृद्धि होने के बावजूद भी अपने आस पास जिसे भी देखो दुःखी, भटका हुआ,असंतुष्ट, शिकायतों का पुलिंदा लिए ही दिखता है। जिस ईश्वर ने मनुष्य को इस धरती पर सर्वश्रेष्ठ बनाकर अवतरित किया,मनुष्य उसी को अपना सबसे बड़ा शत्रु ठहरा रहा है क्योंकि मनुष्य खुद तो कभी कोई गलती कर ही नहीं सकता,सर्वगुण सम्पन्न जो ठहरा!!! 

23 छोटी-छोटी पुस्तकों की “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की चौथी पुस्तक “युग की मांग प्रतिभा परिष्कार भाग 2” पर आधारित आज का ज्ञानप्रसाद कुछ ऐसा मार्गदर्शन प्रदान कर रहा है जिसके अमृतपान से कुछ तो भटकाव दूर होना ही चाहिए, यदि ऐसा हो जाता है तो ज्ञानप्रसाद लेखों की सबसे बड़ी सफलता समझी जाएगी। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा में सभी समर्पित गुरुशिष्यों का स्वागत है, आइए एक-एक शब्द का अमृतपान करें अपने जीवन को सफल बनाएं। 

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मनुष्य अन्य जीवधारियों से बिलकुल ही भिन्न है। उसकी शारीरिक संरचना इतनी अद्भुत है कि वह कला-कौशल के क्षेत्र में न जाने क्या-क्या चमत्कार दिखा सकता है। उसका बुद्धि संस्थान इतना अद्भुत है कि सुविधा-साधनों की बात ही क्या, वह उसके बलबूते वैज्ञानिक के रूप में प्रकृति का रहस्योद्घाटन और प्राणि-जगत का भाग्य निर्माता होने तक का दावा कर रहा है। मनुष्य ने विद्या बुद्धि से सम्बन्धित अनेकानेक तत्त्वदर्शन विनिर्मित किए हैं। शासन और समाज की संरचना मनुष्य की ही सूझबूझ का प्रतिफल है। साहित्य का अक्षय भण्डार उसी का सृजा हुआ है। अभी-अभी प्रकाशित लेख में ही देखा था कि मनुष्य ने ही देवी-देवताओं की रचना  की है। कहने को तो यह भी कहा जाता है कि ईश्वर ने भले ही सृष्टि को बनाया हो लेकिन ईश्वर जिस भी रूप में आज लोकमानस में स्थान पा सके हैं,वह मनुष्य की ही प्रतिष्ठापना है, कल्पना है ।

शास्त्रकार कहते हैं कि मनुष्य से श्रेष्ठ इस संसार में कुछ और  है ही नहीं । बात बहुत हद तक सही भी मालूम पड़ती है क्योंकि अवतारों से लेकर महामानवों तक का इतिहास एक ही बात बताता है कि यदि मनुष्य अपनी क्षमताओं को समझ सके, उन्हें विकसित कर सके तो वह उस स्तर को तक पहुँच सकता है जिसका प्रतिपादन, वेदान्त दर्शन की “सोऽहम्,

शिवोऽहम्, सच्चिदानन्दोऽहम्, अयमात्मा ब्रह्म, तत्त्वमसि” आदि उक्तियों के माध्यम से, उसे ईश्वर सिद्ध करता है। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के अधिकतर पाठक युगतीर्थ शांतिकुंज में स्थित विश्व के एकमात्र “भटका हुआ मंदिर” से भलीभांति परिचित हैं। इस मंदिर में किसी भगवान् आदि की प्रतिमा नहीं है,केवल पांच लाइफ साइज दर्पण हैं जिनके नीचे उपरोक्त पांच शब्द अंकित किये गए है। साधकों को दर्पणों के समक्ष खड़े होकर स्वयं को पह्चानने के लिए प्रेरित किया जाता है। परम पूज्य गुरुदेव द्वारा इस मंदिर को बनवाना और इन दर्पणों के समक्ष खड़े होकर चिंतन करने का उद्देश्य यही था कि मनुष्य को समझ आ जाए कि 

मनुष्य को ईश्वर का राजकुमार/प्रतिनिधि होने का दावा तो अनेकों मूर्द्धन्यों ने बार-बार किया है। ऐसी भी मान्यता है कि अनादिकाल से पृथ्वी ऊबड़-खाबड़ खाई-खड्डों से भरी हुई अनगढ़ जीव-जन्तुओं की क्रीड़ास्थली रही होगी। उसे आज की स्थिति में लाने और “स्वर्गादपि गरीयसी” अर्थात स्वर्ग से भी महान और श्रेष्ठ  बनाने में मनुष्य की कलाकारिता की ही भूमिका प्रधान रही है। वनमानुष की आदिम स्थिति से ऊपर उठकर मनुष्य ने अपनेआप  को क्या-से-क्या बना लिया,इसे देखकर हैरत में रह जाना स्वाभाविक है। प्रकृति की रहस्यमयी शक्तियाँ को ट्रांसफर कर लेने से लेकर अन्तरिक्ष पर साम्राज्य स्थापित करने तक शक्ति उसी मानव की संकल्पशक्ति है जो कभी अग्नि के आविष्कार के लिए मारा-मारा भटक रहा था। 

मनुष्य की महिमा गाते हुए तो यहाँ तक कह दिया गया है कि वोह सचमुच ऐसी शक्ति लिए हुए है जिससे ब्रह्माण्ड में महान् से महानतम् हुआ जा सकता है। अणु से विभु की फिलोसॉफी इसी तथ्य को प्रमाणित करती है कि जिस अणु को देखने के लिए एक शक्तिशाली माइक्रोस्कोप की आवश्यकता पड़ती है,उसका विस्तार 37 ट्रिलियन सैल्स के विराट शरीर जैसा हो जाता है। भगवान की ही तरह, इस प्रक्रिया को “मनुष्य का  विराट दर्शन” कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। 

इस भटकन का उत्तर यही मिलता है कि मनुष्य अपने बारे इस हद तक Misinformed है कि उसे अपनी क्षमताओं का ज्ञान ही नहीं है। भटक रहे मनुष्य पर कस्तूरी कुंडल में बसे- – –  वाली बात फिट बैठती है। भटकाव ने मनुष्य को इतनी  बुरी तरह से जकड़ा हुआ है कि वह अपने अस्तित्व,महत्त्व एवं स्तर के सम्बन्ध में इतना भृमित हो गया है कि भटकाव की चरम सीमा तक जा पंहुचा जा चुका है। यदि शांतिकुंज में जाकर,भटका हुआ देवता के मंदिर में लगे दर्पणों में अपने बाल और मेकअप ही ठीक करना है,देख कर खुश होना है तो आत्मज्ञान कैसे होगा, गुरुदेव का उद्देश्य सफल कैसे होगा? प्रयास करना चाहिए कि  यदि वहां पर अंकित पांच शब्द की समझ नहीं आ रही तो किसी से पूछ लिया जाए, समझ लिया जाए,नोट कर लिया जाए। .मात्र सैर करके वापिस आ जाना,कुछ ज्ञानार्जन न करना तीर्थसेवन तो न हुआ। शांतिकुंज के चप्पेचप्पे पर गुरुदेव का वास है,यहाँ की भूमि प्रतिदिन करोड़ों गायत्री मन्त्रों की दिव्यता लिए हुए है लेकिन साधक की  अपनी भी तो कुछ इच्छा होनी चाहिए।   

भटकाव के बारे में गुरुदेव बताते हैं कि इसका पहला सोपान वहाँ से आरम्भ होता है, जहाँ मनुष्य अपनी, सत्ता, महिमा, गरिमा और क्षमता के सम्बन्ध में लगभग पूरी तरह विस्मृति की खुमारी में चला जाता है, स्वयं को भूल ही जाता है। अपनी शक्ल/सूरत/नेचर आदि की भिन्नता को तो देखता है लेकिन  यह नहीं सोच पाता कि वह चेतना की दृष्टि से पशुस्तर के प्राणियों से अति विशिष्ट है। पशुस्तर के प्राणी तो केवल पेट भरने और Reproduction के तमाशे का रसास्वादन करने के लिए जीवित रहते हैं। उनके लिए जीवन का एक ही फंडा है, Eat,drink and be merry, खाओ, पियो, सैर सपाटा करो, बच्चे पैदा करो, By hook or by crook उन्हें बड़ी-बड़ी  पदवियाँ दिलाओ,आदि आदि। ऐसे लोगों को न तो मर्यादाओं के प्रति श्रद्धा होती है और न ही वर्जनाओं से बचने की आस्था। स्वच्छन्दता और क्षमता रहने की स्थिति में उन्हें मर्यादा पालन में कोई उत्साह नहीं रहता। आवश्यकता और मनमरजी ही उनकी प्रेरणा के स्रोत होते हैं। ऐसी भावना और धारणा के मनुष्यों को नर-पशु से अधिक कुछ और कहा भी नहीं जा सकता है। जिन्होंने  लोभ, मोह और अहंकार की लिप्सा-लालसा को ही अपना लक्ष्य मान लिया है, वे उचित-अनुचित का अन्तर कहाँ कर पायेंगें ? ऐसे मनुष्यों से संकीर्ण स्वार्थपरता के भव-बन्धनों से छुटकारा पा सकना कैसे बन पड़ेगा? जिन मनुष्यों को  सम्पन्नता की तृष्णा और बड़े कहलाने की महत्त्वाकांक्षाएँ जकड़े रहती हैं,उनके लिए विचारशीलता के विशाल,स्वतंत्र गगन में  पंख फैलाना कैसे सम्भव हो सकता है ? महत्वाकांक्षाओं ने तो उनके  पंख जकड़े हुए हैं, उनकी उड़ान को बांधा हुआ है। ऐसे लोग अपने ही Fools paradise में विचर रहे होते हैं, Ivory tower बना रहे होते हैं, झूठे हवाई किले बनाकर मूर्खों को प्रभावित कर रहे होते हैं। 

ऐसे लोग  साधनों और क्षमताओं की दृष्टि से जैसे भी दिखें, आदर्शों की उमंगें उन्हें प्रभावित ही नहीं कर पातीं। उत्कृष्टता की गरिमा अपनाने के लिए उमंगें उठती ही नहीं। पुण्य और परमार्थ का प्रसंग तो एक प्रकार से छूट ही जाता है। स्रष्टा ने मानवी उत्कृष्टता के देवोपम स्तर का सृजन जिस विशेष उद्देश्य से किया था उसका तो उसे ज्ञान ही नहीं है। सृष्टा के उद्देश्य को नकारने के उपरान्त ऐसे व्यक्ति घटिया कीड़े-मकोड़ों  जैसी गई−गुजरी श्रेणी में ही गिने जाने योग्य रह जाते हैं, भले ही वह पदाधिकारी, पदवीधारी, सम्पन्न, कुशल एवं विभूतिवान् ही क्यों न समझे जाते हों ।  यह सुविधाएँ मात्र शारीरिक विलासिता, सज्जा अथवा इठलाने भर के काम आती हैं। अन्त:चेतना को भौतिक बहुलता से न तो सन्तोष होता है और न उल्लास मिलता है, जिसके आधार पर वह अपने को गौरवान्वित अनुभव कर सके। भौतिकता से भी कभी किसी को संतोष मिला है ? यह तो मृगतृष्णा है,एक ऐसी तृष्णा जिससे बुझाते-बुझाते जीवन बुझ जाता है, तृष्णा फिर भी तृष्णा ही रहती है।  

धर्मचर्चा तो कई लोग करते और सुनते रहते हैं लेकिन होता सब कुछ खोखला ही है। लोग पूजा-पाठ के कर्मकाण्डों, तीर्थ-पर्यटनों, भजन-प्रदर्शन की विडम्बनाओं से मन बहलाते और अपने को धर्मध्वजी मानते देखे गए हैं लेकिन  बात वस्तुत: वैसी है नहीं। कर्मकाण्डों का एकमात्र मंतव्य यह है कि चिन्तन और व्यवहार में अधिकाधिक शालीनता का समावेश किया जाए। जिन्हें धर्म में वस्तुत: कुछ रुचि है, उन्हें देवोपम स्तर का जीवनयापन करते देखा जाना चाहिए। उनके अन्तरंग और बहिरंग (जी हाँ अंदर और बाहिर दोनों से) दोनों ही प्रामाणिकता एवं प्रखरता से भरे होने चाहिए। अनौचित्य को अपनाकर भी लोग सुविधा-साधनों का संग्रह और चारण-चाटुकारों के माध्यम से मिल सकने वाली प्रशंसा बटोर लेते हैं लेकिन  उनमें न तो गहराई होती है न स्थिरता। धुएँ से बने बादल कितने ही घने क्यों न हों, हवा के एक झोंके में जिधर-तिधर बिखर जाते हैं। छलावा पानी के बुलबुले  की तरह कुछ ही क्षणों में अपना अस्तित्व गँवा बैठता है।

गुरुदेव बता रहे हैं कि जन्म के साथ ही मनुष्य कुछ प्रतिभाएं लेकर अवतरित होता है,इन प्रतिभाओं का परिष्कार (Refinement of Talent) ही तपश्चर्या है,प्रतिभा ही तेजस्विता है। कुछ भी प्राप्त करने के लिए तप तो करना ही पड़ेगा। 

गुरुदेव का आग्रह है कि बहुत हो गया, अब तो लोभ,मोह,भौतिक संग्रह की कड़ियों को तोड़कर स्वतंत्र हो जा, स्वयं को पहचान ले। 

साथिओ, इसी दिव्य सन्देश के साथ  आज के ज्ञानप्रसाद लेख का मध्यांतर होता है,कल यहीं से आगे की यात्रा का शुभारम्भ करेंगें। 

जय गुरुदेव   


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