मनुष्य ने अपनी संकल्पशक्ति एवं ईश्वर की अनंत कृपा से अग्नि के आविष्कार से अपनी जीवन यात्रा का शुभारम्भ किया,आज वोह आकाश को छूने की क्षमता रखता है। जब कोई संतान अति शक्तिशाली हो जाती है,पिता के विचारों का विरोध करना उसकी आदत बन जाती है। स्थिति इस हद तक पंहुच जाती है कि बूढ़े पिता को वृद्ध आश्रम का मुंह देखना पड़ता है।
सृष्टि के रचियता,”ईश्वर” एवं उसकी संतान “मनुष्य ” के बीच भी ऐसा विरोध उत्पन हो चुका है मानव कुछ सुनने को राज़ी ही नहीं है। ईश्वर को पूरा विश्वास है कि जिस संकल्पशक्ति से मनुष्य गगन में छलांग लगा रहा है उसी संकल्पशक्ति से उसे उल्ट कर वापिस लाया जा सकता है, विनाश से बचाया जा सकता है,संतान चाहे कैसी भी हो, उसे बचाने के लिए पिता कुछ भी कर गुज़रेगा।
मानव और ईश्वर के बीच पनप रहे विरोध जैसा विरोध ईश्वर की किसी भी रचना में देखने को नहीं मिलेगा। इसका कारण केवल एक ही है: मानव उसकी सर्वश्रेष्ठ कलाकृति जो ठहरा,उसमें प्रतिभा कूट-कूट कर भरी है, उसका सदुपयोग, दुरूपयोग करना तो उसकी चॉइस है।
“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की चौथी पुस्तक “युग की मांग प्रतिभा परिष्कार” पर आधारित 6वें ज्ञानप्रसाद लेख का यही सन्देश है। साथिओं से करबद्ध क्षमाप्रार्थी हैं कि रोचकता एवं ज्ञान के कारण दो लेख श्रृंखला से हटकर प्रस्तुत करने पड़े थे।
*********
जब मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ कलाकृति से सम्मानित किया जाता है तो उसकी स्वयं के अस्तित्व, भावनाओं और विचारों को समझने की अद्वितीय क्षमता की बात होती है, विवेक और नैतिकता (Reason and Morality) की बात होती है। बात होती है कि मनुष्य जटिल से जटिल समस्याओं को हल कर सकता है ,मनुष्य नैतिक सिद्धांतों पर आधारित समाज का निर्माण कर सकता है, कला, साहित्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी का ऐसा निर्माण कर सकता है जो कोई अन्य प्राणी नहीं कर सकता। मनुष्य के अंदर निस्वार्थ प्रेम, सहानुभूति और करुणा की उच्चतम भावनाएँ होती हैं।
लेकिन इस उत्कृष्टता के पीछे एक बहुत बड़ी बात छिपी हुई है और वोह यह है कि क्या ऐसा आत्मचिंतन एवं सृजन ईश्वर की कृपा और सृष्टि के नियमों का पालन किए बिना संभव हो सकता है?
कदापि नहीं !!!
यदि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ कलाकृति है तो वोह रचयिता के अनुदानों के कारण ही है। एक पिता की भांति,उसकी कृपा के बिना संतान का क्या अस्तित्व हो सकता है? पिता संतान को अपना सब कुछ (संपत्ति,आदर्श, नैतिकता आदि) बिना किसी भी Second thought के दे देता है, संतान की प्रगति के लिए वोह अपना स्वयं का भविष्य भी दाव पर लगा देता है, संतान होते ही उसे अपना सब कुछ भूल जाता है। बुढ़ापे में धार-धार बहने वाली पिता की अश्रुधारा सब कुछ कह जाती है जब अपने जीवन भर की कमाई को छोड़ कर उसे वृद्ध आश्रम का मुंह देखना पड़ता है। पिता ने सब कुछ देकर संतान को सामर्थ्यवान बनाया लेकिन ह्रदय तो तब फटता है जब सामर्थ्य के कारण संतान और पिता के बीच विरोध पनपता है,संतान अपनेआप को ही सब कुछ समझने लगती है!!!!
कुछ ऐसी ही स्थिति में इस सृष्टि का रचयिता, परमपिता परमात्मा आजकल फंसा हुआ है, उसे भी उसकी संतान वृद्धाश्रम का रास्ता दिखाने पर आ पंहुची हैं लेकिन यह कोई ऐसा वैसा पिता नहीं है, वोह भलीभांति जानता है कि इस उल्टी हुई संतान को उल्ट कर कैसे सीधा करना है। परम पूज्य गुरुदेव का “21वीं सदी उज्ज्वल भविष्य” का नारा मात्र एक नारा ही नहीं है, चिल्ला-चिल्ला कर “हम बदलेंगे युग बदलेंगे” का ढोंग ही नहीं है,चिंतन की प्रक्रिया है, दोहराने की प्रक्रिया है, उल्टे हुओं को उल्ट कर सीधा करने की प्रक्रिया है। यह उसी “शक्तिशाली संकल्पशक्ति” को ठीक राह में Channelise करने की प्रक्रिया है जिसका पालन करके मानव ने अग्नि का आविष्कार किया था। ऐसी ही संकल्पशक्ति से आज का मानव गगन में छलांग लगा रहा है। अभी दो दिन पुरानी ही बात है कि Elon Musk उस Driverless, Steeringless, Butterfly Doors वाली कार का विज्ञापन करते देखे गए थे जिसमें वो कह रहे थे कि आप कार में सो जाओ और मंज़िल पर पहुंच कर जग जाओ।
यह है संकल्पशक्ति, यह है प्रगति!!! आकाश को छूने की शक्ति, प्रतिभाशालिओं की शक्ति।
इन पंक्तियों को लिखते समय लेखक को बाल्यकाल के दिन स्मरण हो आए, पिताजी को स्मरण करके वोह पल आंखों के आगे घूम गए जब सुपरहिट मूवी “जागृति” के सुप्रसिद्ध गीत की पंक्तियां गाकर उन्होंने देश के गौरव का गुणगान करते हुए हम बच्चों में आत्मविश्वास, संकल्प का बीज बोया था। “उठो छलांग मार के,आकाश को को छू लो ” वाला गीत एवं “जागृति” के सभी गीतों के रचनाकार कवि प्रदीप को भला कौन भूल सकता है?
इसी संकल्पशक्ति के संदर्भ में परम पूज्य गुरुदेव कहते हैं:
लोगों को पैसे का, रूप-सौन्दर्य का, शिक्षा का, पद का, सम्मान का मूल्य तो मालूम है, उनके लिए ललचाते हुए, सिर पर पैर रखकर दौड़ने जैसी भगदड़ मचाने का मूल्य भी मालूम है। जो लोग अपने को अर्द्ध-मूर्च्छित अर्द्ध-मृतक, आलसी, प्रमादी, निराश, हताश स्तर के कीचड़ में फँसे रहने से इनकार कर देते हैं, उनके हाथ कुछ भी नहीं लगता।
भीतर से उभरी शक्ति बाहर के हर क्षेत्र में,पग-पग पर Supremacy का प्रभाव-परिचय प्रस्तुत करती है। सभी प्रजातियाँ, सभी संरचनाएँ यह प्रमाण-परिचय देती हैं कि वे अपनी “संकल्पशक्ति” से ही उभरी हैं,लिए गए संकल्प के अनुकूल कार्य करने में समर्थ हुई हैं। संकल्पशक्ति के आधार पर ही उन्होंने अपने निर्वाह साधन जुटाए हैं। प्रकृति की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किसी “अज्ञात प्रेरणा” से बाधित होकर अपनेआप को ढाला है। यह “संकल्पशक्ति” ही है जो प्राणियों और पदार्थों में विद्यमान रहकर अपनी अद्भुत शक्ति का परिचय देती है।
सभी प्राणियों में मनुष्य सचमुच ही ईश्वर की महान्,उत्कृष्ट एवं सर्वश्रेष्ठ कलाकृति है, क्रिएशन है। कलाकृति को इंग्लिश में Art work कहते हैं। पल-पल पर इसी आर्ट वर्क के अनेकों उदाहरण देखने में मिलते रहते हैं: कभी नन्हें से बच्चे की ईश्वरीय छवि,कभी किसी सुंदर स्त्री तो कभी हृष्ट पुष्ट पुरुष को देखकर सहसा ही मुँह से निकल आता है, “जिस भी पेंटर ने इस चित्र में रंग भरे हैं, उसकी कला और ब्रश को नमन करते है।
इतिहास साक्षी है कि जब-जब जिन वर्गों ने किसी भी क्षेत्र में पराक्रम सँजोया है,उन्होंने उसी क्षेत्र में आशातीत सफलताएँ पाई हैं। कोई समय था जब मानव ने पत्थरों को रगड़ का अग्नि का अविष्कार किया था। अग्नि से लेकर पहिए के अविष्कार तक उसकी प्रथम कृति थी, जिसने अनेकानेक साधनों-वाहनों का आविष्कार आसान कर दिया। ज़रा सोच कर देखें कि जिस समय की बात हो रही है उस समय मानव के पास कैसे साधन उपलब्ध होंगें। यह मनुष्य की “संकल्पशक्ति” का ही परिणाम है कि उसने कृषि, पशुपालन,वस्त्र निर्माण,भवन निर्माण,व्यवसाय आदि के सहारे प्रगति के नए आयाम खोजे होंगे। भाषा और लिपि का अविष्कार अपने समय में अतिक्रान्तिकारी माध्यम माना गया होगा। धर्म,समाज और शासन का गठन उस समय के लोगों की भारी सफलता थी जो वानरों की तरह भयावह जीवन बिताते आदिमकाल की उपहासास्पद स्थिति में रहते थे। चलते-चलते जब वैज्ञानिक आविष्कारों से सुसज्जित दुनिया गढ़ी जाने लगी तब तो मनुष्य ने मानो प्रकृति पर विजय का नगाड़ा ही बजाना शुरू कर दिया।
अब तो स्थिति यहाँ तक पँहुच चुकी है कि मनुष्य अणु-आयुधों के जखीरे जमा करने की दौड़ में लगा हुआ है, कमज़ोरों पर अपना आधिपत्य जमाना एक अभिशाप बन चुका है, Might is right का इतना ज़ोर है कि घर-परिवार से लेकर विश्व स्तर तक इसी का बोलबाला है। ऐसी स्थिति देखकर स्रष्टा अपनी सुन्दर संरचना,हरे-भरे उद्यान के प्रति इतना चिंतित है कि उसे लग रहा है कि यह सुंदर उद्यान देखते ही देखते धूल बन कर अन्तरिक्ष में उड़ जायेगा और इस उद्यान में चहचहा रहे पक्षी,मानव, उसकी संतान हमेशा-हमेशा के लिए लुप्त ही न हो जाएँ।
इस प्रकार ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति(मनुष्य), जिसे ईश्वर ने अपना समर्थ सहायक बना कर इस धरती पर अवतरित किया था, एक दुष्ट विरोधी सिद्ध होता दिख रहा है।
सृष्टा का विरोध करने वाली मनुष्य की यह शक्ति भी किसी प्रचण्ड “संकल्पशक्ति” से ही उत्पन हुई है। यही वोह संकल्पशक्ति थी जिसके सहारे मनुष्य रंगमंच की कठपुतली की तरह जीवन भर नाचता रहा, भागदौड़ करता रहा है। पाठक भलीभांति जानते हैं कि शक्ति का सदुपयोग और दुरूपयोग कैसे विकास और विनाश लाता है, इसी मंच से अनेकों बार इस विषय पर चर्चा हुई है। “संकल्पशक्ति” की न्यूनता एवं अधिकता से ही मनुष्य पशु जैसा नीच और देवता जैसा महान् बनता है। उसके उच्चस्तरीय होने पर देव और निकृष्टता अपनाने पर दैत्य का उद्भव होता है। दैवी शक्तियों से सम्पन्न व्यक्ति ही सिद्ध पुरुष या देवमानव कहलाता है।
बुद्धिमत्ता, प्रतिभा, व्यवस्था, संरचना, परिवर्तन आदि के अनेक प्रयोग जहाँ-तहाँ होते रहते हैं और उनके प्रयोग करने वालों को ही बली, महाबली कहते हैं। यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि समस्त,कलाकौशलों, निर्माणों और सफलताओं की जन्मदात्री “संकल्पशक्ति एक प्रकार की प्राणाग्नि” ही है, जो चिंगारी से दावानल का रूप धारण करते देखी जाती है। उत्थान और पतन उसी के दो विचित्र खिलौने हैं।
स्मृति की तरह विस्मृति (भूलना) भी मनुष्य के स्वभाव में सम्मिलित है लेकिन उस दुुर्गुण का क्या किया जाए, जिसमें स्वयं के आत्मगौरव (ओजस्, तेजस् और वर्चस्) को ही भुला दिया जाए। वर्तमान समय में इसी तरह का कुछ मेस्मेरिस्म देखने को मिल रहा है, विश्व भर के बिखराव को देख कर मनुष्य घबरा कर अपनेआप को असहाय,दीन,दुर्बल,अभागा समझने लगा है। यदि वोह ठीकठाक चलता रहता तो अब तक न जाने कहाँ-से-कहाँ पहुँच गया होता।
साधन कभी भी अनायास ही नहीं जुट जाते, उनके लिए मनुष्य तो इतना प्रामाणिक और प्रखर सिद्ध करना होता है कि स्वेच्छा सहयोग बरसाने में सृष्टा को कोई आनाकानी न करनी पड़े।
गुरुदेव बता रहे हैं कि आत्मविस्मृति (स्वयं को भूल जाना) के दल-दल में से हमने “एक अद्भुत मनुष्य समुदाय” के वर्ग को प्रबल प्रतिभा का धनी बनाना है। इस प्रयास को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी है। ऐसी क्रिएशन का कारण यही है कि इन्हीं दिनों कुछ अत्याधिक महत्त्वपूर्ण कार्य किए जाने के लिए, दैवी चेतना कुछ सामर्थ्यवानों की प्रतीक्षा कर रही है। दुर्गन्धित कचरे को हटाने के लिए जुझारू प्रवृत्ति के प्रतिभावान साथी चाहिए, जो तूफान बनकर बरसें और जो ढहाया-गिराया जाना ही है उसे स्थानान्तरित करके ही रहे।
ऐसे स्तर का सृजन होना है, मानो खण्डहरों को बटोरकर उस स्थान पर नए सिरे से भव्य भवन खड़े किए जा रहे हों। इसके लिए बादलों जैसे सशक्त समुदाय की आवश्यकता है, जो तपते धरातल को अपनी वर्षा से जलमग्न कर दे। धरित्री पर हरी घास उगाकर उसे मखमली हरीतिमा से महिमा मण्डित कर दे। इन योद्धाओं के अग्रगामी बने बिना न तो दरिद्रता से लोहा लिया जा सकता है और न अस्वस्थता एवं अशिक्षा से ही पिण्ड छूटेगा।
साधनों,संस्थानों आदि की कोई कमी नहीं लेकिन दुर्भाग्य इसी बात का है कि “प्रतिभा परिष्कार” की सांगोपांग व्यवस्था कहीं पर नहीं है। कठिनाई इस मार्ग में यही एक है कि प्राण चेतना अन्त:करण के अन्तराल में से उभरती नहीं लेकिन उस गहन-गह्वर तक पहुँचने, कुरेदने, उभारने वाले उपकरणों का एक प्रकार से सर्वथा अभाव ही हो गया। इस कमी के रहते अन्य किसी क्षेत्र का विकास भले ही हो जाए लेकिन “प्रचण्ड प्रतिभा सम्पन्न” व्यक्तियों का दर्शन हो नहीं सकेगा, जो नवयुग की महती आवश्यकताओं को देखते हुए अन्याय से जूझने और सृजन को साकार बनाने में अपने अतिरिक्त पौरुष का परिचय दे सके।
इन दिनों इन्हीं महामानवों को, सुगढ़ प्रतिभावानों को ढूँढ़ निकालने की प्रक्रिया सम्पन्न होनी है।
आइए हम सब भी अपनी “संकल्पशक्ति” का परिचय देते हुए अपने पिता परम पूज्य गुरुदेव के कार्य में हाथ बंटाएं।
जय गुरुदेव
