वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

क्या इस संसार में सबको सब कुछ मिल जाता है?

“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” परम पूज्य गुरुदेव के साहित्य का मक्खन है, स्वाध्याय द्वारा इसी मक्खन को समझकर, चिंतन करके, अन्य स्रोतों से ज्ञान शामिल करके,सरल करके वर्तमान ज्ञानप्रसाद लेख प्रस्तुत किये जा रहे हैं, हमारे साथी इन लेखों को पढ़कर, कमेंट और काउंटर कमेंट से हमारा उत्साहवर्धन कर रहे हैं जिसके लिए हम सभी का ह्रदय से आभार व्यक्त करते हैं। 

कल प्रस्तुत किया गया ज्ञानप्रसाद लेख “क्या भगवान की रचना मनुष्य ने की है ?” सरल होने के साथ-साथ इतना रोचक साबित हुआ कि कुछ एक साथिओं द्वारा व्यक्त किये गए भाव कल के स्पेशल सेगमेंट का हिस्सा बनने का गौरव प्राप्त कर रहे हैं। हो सकता है किसी ने इन उत्कृष्ट कमैंट्स को इग्नोर कर दिया हो, उनके लिए इन उच्चकोटि के कमेंट पढ़ने का एक और अवसर है। सभी साथिओं का ह्रदय से धन्यवाद्। 

आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ इस तथ्य से होता है कि शायद ही कोई ऐसा मनुष्य हो जिसने बड़ा होने की इच्छा न जताई हो, चाहे समर्था हो न हो, छलांग लगाने में क्या हर्ज़ है, डींग मारने में किसी का क्या जाता है ? स्पेस टूरिज्म के सपने देखना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन जेब में पैसे भी तो होने चाहिए। आज का लेख ऐसे ही साधारण से उदाहरणों से मनुष्य की असीमित शक्ति के नियोजन, मानवीय मूल्यों आदि को समझने का प्रयास कर रहा है। 

लेख का महत्वपूर्ण भाग Amoeba, Single-celled organism, एक ही-कोष के प्राणी को समर्पित है जिससे सृष्टि की रचना एवं उसके नियमों को समझने का प्रयास है। यह भाग कुछ एक Scientific terms को लिए हुए है लेकिन हमें विश्वास है कि हमारे पाठक कोई ऐसे वैसे नहीं हैं, जो Bioelectricity जैसे जटिल विषय को समझ सकते हैं उनके लिए यह कुछ भी नहीं है। 

आइए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा का शुभारम्भ करें जहाँ आपका अभिनंदन है। 

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संसार के सुविस्तृत इतिहास का एनालिसिस करने पर  एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि लालसा, वासना और आकांक्षाओं से पीड़ित तो अनेकानेक लोग रहते चले आए हैं लेकिन उनमें से सफल थोड़े-से ही हुए। शायद ही कोई ऐसा हो जिसने बड़ा,अमीर, शक्तिशाली आदि बनने की लालसा न की हो, प्रयास भी सभी ने किए ,तिकड़मबाजी भी चलाई लेकिन क्या सभी सफल हो पाए? नहीं न!!!  

गुरुदेव बताते हैं कि इस असफलता का कारण यह है कि मूल्य चुकाने के लिए जेब में कुछ होना भी तो चाहिए। जेब में फूटी कौड़ी भी न होने के कारण,भरी-पूरी, सजी-धजी दुकान होने के बावजूद अनेकों को  निराश होकर वापस लौटना पड़ा। संसार के बाज़ार में तो एक-से-एक बड़ा आकर्षण उपलब्ध है लेकिन मूल्य चुकाने की क्षमता भी तो होनी चाहिए। क्षमता के अभाव में भटकने, थकने और निराशा के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगने वाला नहीं होता। आहें भरने से केवल Frustration ही हाथ लगती है।

दूसरी ओर वोह लोग हैं जो कुछ ही देर में लाखों का माल खरीद-बेचकर मुनाफे से थैली भर लेते हैं।

भाग्योदय,वरदान,अनुग्रह, उदारता अथवा अनुकम्पा के नाम पर बहुत कुछ पाने की इच्छा तो अनेकों करते है लेकिन यह सब मिलकर भी ओस कणों से अधिक और कुछ नहीं बन पाता। मोती तो कठिन परिश्रम से, कड़कती धूप में गलने वाले पसीने से ही  टपकते हैं। शक्तिशाली हाथ ही दौलत खोदते हैं।

हमारे पाठक सोच रहे होंगें कि हम किस दुनिया में रह रहे हैं, यह सब कहने और प्रचार करने की बाते है। लेकिन ऐसा नहीं है,आज के लेख में Unicellular Organisms का उदाहरण  दिया गया है जिनके ऊपर भी वही नियम लागू होते हैं जो ट्रिलियन लिए चल रहे मनुष्य पर होते हैं ,  

प्रगति के लिए साहस और विश्वास  से कम में गुजारा है ही  नहीं। मनुष्य चाहे कितना ही सामान,संपत्ति क्यों न  इक्कठी कर ले, लेकिन इक्कठी की हुई संपत्ति को सुव्यवस्थित और सुनियोजित किए बिना उसे उखड़ने  और पलायन करने से कोई नहीं रोक सकता। तभी तो बार-बार समझाया जाता रहा है कि शक्ति की महिमा/महत्ता तो बहुत है लेकिन वह ठहरती केवल उसी के पास है, जो उसके “सुसंचालन की विद्या” से परिचित है।

संसार में प्रतिभा के एक से बढ़कर एक चमत्कार हुए। पनामा और स्वेज की नहरें, पीसा की झुकी मीनार, चीन की दीवार, मिस्र के पिरामिड, आगरा का ताजमहल, जैसे महान् निर्माणों को देखकर आश्चर्य तो बहुत होता है लेकिन इन चमत्कारों के पीछे कितनों की कल्पना ने योजना बनाकर प्रत्यक्ष ढाँचा खड़ा करने में कितनी कुशलता और एकाग्रता खपाई है,उसे याद रखना बहुत ज़रूरी है। 

मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति अवश्य है, हम सभी जानते हैं,सहमत भी हैं लेकिन इस वर्चस्व (Supremacy) का सार यही है कि वह जहाँ भी चमकता है,आकाश की बिजली की तरह कड़कता है और अपनी क्षमता से आसपास के सभी लोगों को अवगत कराता है। मनुष्य में यह क्षमता कहाँ से आती है? 

उपरोक्त उदाहरण जहां मनुष्य की संकल्पशक्ति, सुनियोजितता को सार्थक करते हैं वहीं इस बात पर भी मोहर लगाते हैं कि सृष्टि के विकास में भी यही विधान काम करता है।

प्राणी विकास (Evolution) के विज्ञानी कहते हैं कि सृष्टि के आरम्भ में मात्र अमीबा स्तर के एककोशीय प्राणी ( Single celled animal) उत्पन्न हुए लेकिन उस एककोशीय प्राणी में  “प्रचण्ड इच्छाशक्ति, संकल्पशक्ति” विद्यमान थी। वही हलचल बनी और “मनोबलयुक्त क्रियाशीलता” के बल पर उचित स्तर के काय कलेवर बनते चले गए। अंग-प्रत्यंग उगे, स्वभाव,अभ्यास बने और उन्हें अपने-अपने निर्वाह साधन जुटाने के अवसर मिलते चले गए। यह सारा कार्य रातों-रात,चुटकी बजाते ही घटित नहीं हुआ। Evolution का इतिहास बताता है कि Single-celled अमीबा से Trillion-celled मनुष्य बनने  में लगभग 3.5 से 4 अरब वर्ष का समय लगा। 

हमारे पाठक इवोल्यूशन की इस लंबी यात्रा से अनुमान लगा सकते हैं कि विधाता ने मनुष्य नामी सर्वश्रेष्ठ कलाकृति को रचने में कितनी रूचि  और Skill का प्रयोग किया है, क्या हमें इस दुर्लभ मानव शरीर को प्राप्त करने में गर्व नहीं करना चाहिए?

विज्ञान और सोशल साइंस पर दृष्टि दौडाएं तो मनुष्यों और दूसरे प्राणीओं में इतनी समानता मिलती है कि क्या कह जाए। विकास के दौरान इन Unicellular organisms को जब शिकारियों (predators) का खतरा बढ़ा या भोजन की कमी हुई, तो ये अकेले Cell  अपनी सुरक्षा के लिए समूहों या कॉलोनियों (Colonies) में रहने लगीं। मनुष्य भी तो अपनी सुरक्षा के लिए अपने ही  वंश यां अपने जैसों के साथ ही रहना पसंद करता है। प्रयोगशालाओं में भी देखा गया है कि जब Unicellular जीवों पर शिकारी का दबाव डाला जाता है तो वे जीवित रहने के लिए आपस में चिपककर Multicellular बन जाते हैं। छुई मुई का फूल इस डर से कि मैं मुरझा जाऊंगा, ऊँगली दिखाते ही इक्क्ठा हो जाता है। 

जब Cell समूहों  में रहने लगे तो सबने मिलकर सारा काम एक ही Cell द्वारा करने के बजाय अपने-अपने  काम बांट लिए। कॉलोनी के बाहरी Cell बॉउंड्री पर रहकर,एक पहरेदार की भांति सुरक्षा का काम करने लगे।  कुछ अंदरूनी Cell  भोजन पचाने और ऊर्जा बनाने में एक्सपर्ट हो गए। कुछ Cells ने केवल प्रजनन का काम संभाला ताकि  नई पीढ़ी का जन्म हो सके।
यही विभाजन आगे चलकर मानव शरीर के अलग-अलग अंगों ( हृदय, मस्तिष्क, लिवर) के बनने का आधार बना।

अब एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है, Communication का प्रश्न। अलग-अलग Cells के बीच संपर्क कैसे स्थापित हो, एक-दूसरे  की भाव संवेदना का ज्ञान कैसे हो। इस “कम्युनिकेशन नेटवर्क” के लिए Cells ने रासायनिक संकेतों (Chemical signals) का विकास किया। इसके अलावा, एक ऐसी बाहरी बॉउंड्री  विकसित हुई, जिसने Cells  को बिखरने से रोका और उन्हें एक ठोस शरीर (Human Body)  का आकार दिया। हम सबको पढ़ाए जाने वाले  Union is strength पाठ का शायद आधार यह Cells ही हों।  

वैज्ञानिकों का मानना है कि करोड़ों साल पहले पृथ्वी के वायुमंडल में ऑक्सीजन का लैवल   तेजी से बढ़ा। ऑक्सीजन मिलने से Cells  को बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा  बनाने का मौका मिला। इसी भारी ऊर्जा की बदौलत जीव आकार में बड़े और अधिक जटिल (Complex) होते चले गए । 

Human evolution में सबसे बड़ा वैज्ञानिक “चमत्कार” Gene regulation के विकास का है। हाई स्कूल लैवल  का विज्ञान बताता है मानवी शरीर के हर एक Cell में एक जैसा  डीएनए (DNA) होता है, लेकिन फिर भी एक दूसरे का काम करने में असमर्थ होता है।  आंख के Cell को इतना ही ज्ञान है कि उसे देखना है, पेट के Cell इतना ही ज्ञान है कि उसे एसिड बनाना है, पचाना है। कोई भी  Cell एक दूसरे का  Substitute नहीं है।  यह ऑन-ऑफ (ON/OFF) स्विचिंग सिस्टम ही है जो माता के गर्भ में  पल रहे भ्रूण  को ट्रिलियन Cells  वाले एक सम्पूर्ण,सर्वसमर्थ इंसान में बदल देता है।

संक्षेप में कहें, तो अमीबा जैसे शुरूआती Cells  का आपस में सहयोग करना, स्वार्थ छोड़कर पूरे शरीर के भले के लिए काम करना (Cooperation), और समय के साथ पर्यावरण के अनुसार खुद को ढालना ही वह वैज्ञानिक चमत्कार है जिसने हमें आज इस रूप में खड़ा किया है। 

जिन मानवीय मूल्यों का ढिंढोरा बार-बार इस मंच से पीटा जाता  रहा है, यदि  उनका पालन न हो तो क्या होगा समझा जा सकता है। सहकारिता, सहयोगिता, शिष्टाचार, नियमितता, सम्मान, निरंतरता,श्रद्धा आदि में से किसी भी मानवीय मूल्य को निकाल दिया जाये,उसका पालन न किया जाए भगवान की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति को Collapse होने में एक सेकंड भी नहीं लगेगा। 

आज के ज्ञानप्रसाद लेख का समापन एक बार फिर से परिवार द्वारा रचित  मानवीय मूल्यों के सम्मान एवं पालन की याचना  के साथ किया जा रहा है। कहीं ऐसा न हो कि ट्रिलियन सैल्स  की तन्मयता देखकर हमारी ऑंखें शर्म से न झुक जाएँ। 

जय गुरुदेव     


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