वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

क्या भगवान की रचना मनुष्य ने की है ?

“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” पर आधारित लेख श्रृंखला के अगले लेख को लिखने के लिए जब स्वाध्याय करना शुरू किया तो एक पॉइंट ऐसा आया जिसने हमारी आज की दिशाधारा ही बदल डाली। यह पॉइंट था, “ईश्वर को मनुष्य ने ही बनाया है।” हालाँकि इस पॉइंट में कोई विशेष बात नहीं लगती लेकिन हमारा माथा तो एकदम ठनक गया, क्या सच में भगवान को मनुष्य ने ही बनाया है? इस प्रश्न के उत्तर ढूंढने शुरू कर दिए और जो कुछ भी  मिला, पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है। 

लेख आरम्भ करने से पहले बता दें कि हर बार की तरह जब हम तीसरी मंज़िल से नीचे आये,आदरणीय नीरा जी को बताया कि  आज के लेख का शीर्षक है, “भगवान् को किसने बनाया है ?” तो उनका उत्तर था, मनुष्य ने। हमने सोचा कि यदि यह प्रश्न इतना सरल था तो हमें इसे जानने की जिज्ञासा क्यों हुई?  हमारा माथा क्यों ठनका? हमारे सूझवान साथी खुद ही तय करें, हम चलते हैं अपने गुरु के चरणों में समर्पित होकर आज के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान  करने के लिए, आइए आप भी हमारा साथ दीजिये, सहयोग कीजिये। 

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जब हम अपने आसपास खूबसूरत दुनिया को देखते हैं तो आश्चर्य होता है कि इस दुनिया को किसने बनाया होगा। बचपन से,वर्षों से सुनते आ रहे हैं कि भगवान ने इस दुनिया को बनाया है। भगवान के अस्तित्व का यह ज्ञान हमें अपने माता पिता से, दादा दादी से,पूवजों से प्राप्त हुआ लेकिन प्रश्न तो यह उठता है कि उन्हें इस बात का ज्ञान किसने दिया था, क्या उन्होंने भगवन को देखा था? यां फिर उन्होंने ने भी ऐसे ही सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास कर लिया। आज तो फिर भी तार्किक प्रश्न किये जा सकते हैं,पूर्वजों के समय में तो बस इतना ही उत्तर मिलता था, “कह दिया न, No,arguments,बड़ों से बहस नहीं करते आदि आदि।” स्वामी विवेकानंद ने तो अपने गुरुदेव से पूछ लिया था, “क्या आपने भगवान को देखा है?” गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस ने जो उत्तर दिया था सभी को मालूम है। यदि हम अपने पूवजों से यह प्रश्न करते कि आपने भगवान को देखा तो उनके पास कहाँ  कोई प्रमाण था, उन बेचारों के पास भी तो मंदिर में घंटी बजाना,पूजा-पाठ करना, उपवास वगैरह रखने,महात्माओं के उद्बोधन वगैरह सुनने ही भगवान्  के अस्तित्व के प्रमाण थे,भगवान् के अस्तित्व को कभी ही टेस्ट नहीं किया गया था केवल अटूट विश्वास ही था।  

आज अगर कोई चार वर्ष का बच्चा पूछ देता है कि भगवान कैसे दिखते  हैं तो आप पूजास्थली में भगवान् की प्रतिमा दिखा कर पल्ला नहीं छुड़ा सकते, उसे तो प्रमाण चाहिए। बच्चे को एवं स्वयं को भी संतुष्ट करने के लिए हम कल्पना करना शुरू करते हैं कि जिस भगवान ने  इस अद्भुत दुनिया को बनाया है, वह खुद कितना अद्भुत होगा व कैसा दिखता होगा। 

पौराणिक ग्रंथ इस बात को बार-बार बता चुके हैं कि  हम भगवान्  की संतान हैं तो भगवान्  हमारे जैसे ही होंगें। यही कारण है कि अनेकों प्रकार के प्राणी होने के बावजूद, हम भगवान की कल्पना मनुष्य के रूप में ही करते हैं। हाँ, भगवान् के कुछ एक रूप दूसरे  प्राणीओं के चित्र भी दिखाते  हैं।  ज्यों ज्यों हम दुनिया को और बारीकी से  देखते हैं, इस सूक्ष्म और विशाल दुनिया का शानदार और परिपूर्ण डिजाइन हमें मंत्रमुग्ध कर देता  है और हम कल्पना करने लगते हैं भगवान् सर्वोच्च और परिपूर्ण हैं। इसके साथ ही जब हम दुनिया भर में होने वाली अप्रत्याशित और असामान्य चीजों को देखते हैं, सुनते हैं और अनुभव करते हैं जिनका कोई उत्तर नहीं दिया जा सकता, जहाँ पर तर्क आदि सब असफल हो जाते हैं तो उन्हें “भगवान का चमत्कार” कह कर संतुष्ट हो जाते हैं। भगवान के अस्तित्व की चर्चा का Unexplainable अंत इन्ही शब्दों से करना पड़ जाता है कि भगवान सबसे असाधारण, अलौकिक, दिव्य विराट व्यक्ति (हम तो शक्ति ही कहेंगें) हैं जिनके बारे में कोई भी तर्क काम नहीं करता, केवल विश्वास ही करना उचित रहेगा। विज्ञान चाहे जो भी कहे, जितने भी तर्क दे भगवान के प्रति उसके पास भी कोई ठोस प्रमाण नहीं, इस कन्फ्युजन के समाधान के लिए अध्यात्म, विज्ञान से कहीं आगे है।   

जैसे-जैसे समय बीतता जाता है,अपने पूर्वजों द्वारा दी गयी भगवान् की काल्पनिक पिक्चर हमारी मान्यता में बदल जाती है जो और आगे जाकर मजबूत,दृढ़ विश्वास बन जाती है एवं उस विश्वास को ही सत्य मानते हैं। 

साधारण मनुष्य की यही स्थिति है लेकिन ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में तथ्यों,प्रमाणों को देकर ही यथासंभव समझने का प्रयास किया जाता है,अन्धविश्वास,चमत्कारों से किनारा करना ही उचित समझा जाता है।  

आज के ज्ञानप्रसाद लेख के प्रथम भाग “ईश्वर के अस्तित्व” को यहीं पर छोड़कर दूसरे भाग की और रुख करते हैं। दूसरे भाग का प्रश्न  है कि जिसने सारी सृष्टि की रचना की,इतना विराट संसार/समाज बनाया तो उस रचनाकार की रचना किसने की? भगवान को किसने बनाया? ऐसा अद्भुत व्यक्तित्व जिसे हम भगवान कहते हैं उसे किसने बनाया होगा ? कहाँ और कैसे बनाया गया होगा? यदि भगवान की रचना हुई तो जिसने भगवान की रचना की उसको  किसने बनाया, जिसने भगवान की रचना करने वाले को बनाया तो उनकी रचना किसने की?  जल्द ही, प्रश्नों की कभी न खत्म होने वाली लम्बी लिस्ट  हमारे दिमाग पर बमबारी करने लगती है।

पाठक भलीभांति जानते हैं कि इंसान भगवान की बनाई हुई अति काम्प्लेक्स लेकिन एक ऐसी परफेक्ट मशीन है जिसे बनाने के बाद भगवान ने उसे काम करने की स्वतंत्रता देते हुए  कहा, “जैसे चाहो वैसे काम करो, मैं तुम्हारे किसी काम मे दखल नहीं दूंगा।” इस स्वतंत्रता  का ऐसा दुरूपयोग हुआ कि इंसान खुद को ही “कर्ता” समझने लगा,समझने लगा कि मैं सब कुछ कर सकता हूँ । मेरे द्वारा ही सारे कार्य हो रहे है। 

लेकिन इंसान भूल जाता है कि कर्ता भगवान  ही हैं, आइए निम्नलिखित उदाहरणों से देखें की ऐसा कैसे है:

मनुष्य की प्रवृति है कि अच्छे काम करते हुए,अच्छे परिणाम उपलब्ध होने में वह स्वयं  को सर्वेसर्वा समझता है लेकिन असफल होते ही, असफलता की ठीकरा भगवान पर फोड़ देता है, तो बनाया न इंसान ने उस अदृश्य शक्ति  को भगवान्? असफल होने पर क्षमा मांगने के लिए “एक अस्तित्व” की कल्पना करते हुए उसे भगवान कहा जा सकता है। 

क्या कभी सोचा है कि सभी धर्मों में अधिकतर भगवान मनुष्य जैसे ही क्यों होते हैं? अन्य प्राणीओं की तुलना में मनुष्य के पास सोचने और समझने की शक्ति के कारण इसे ईश्वर की  “सर्वश्रेष्ट कलाकृति” कहा गया है जिसके कारण मनुष्य भगवान को अपने जैसा महसूस करता है। 

इंसान को हारते वक्त ऐसे अस्तित्व  की जरूरत होती है जिसके ऊपर वह अपनी हार का बोझ डाल सके, किसी अपने के कंधे पर सिर( हमारी पूजास्थली) रख कर रो सके, “भगवान् की यह रचना भी मनुष्य ने ही की है।” ऐसी स्थिति में भले ही भगवान् सामने आकर मदद नहीं करते, लेकिन उनकी अदृश्य शक्ति से सहारा तो मिलता ही है। बहुत बार तो असफल होकर हम एक पिता की  तरह भगवान् पर अपना गुस्सा निकालते हैं, तुम्हीं हो माता,तुम्हीं पिता हो। 

कई बार तो ऐसा प्रतीत होता है कि  मनुष्य  भगवान के हाथ की कठपुतली है। कर्म  करने के बावजूद  भगवान ने  कर्मफल की  डोर अपने हाथ में  पकड़ रखी है । जब तक चाहे वह कर्म  करवाता है, जब चाहे उस कार्य  को अधूरा छुडवा देता है। हमारी सोचने की शक्ति पर उसी का कण्ट्रोल  है। भगवान् के प्रति इस अटूट विश्वास का निर्माता भी तो मनुष्य ही है। 

एक ही परिवार मे पैदा होने वाले हर इंसान का सोचने और काम करने का तरीका अलग होता है। उसका रंग रूप और भविष्य वह खुद या परिवार निर्धारित नहीं कर सकता है। उसे बनाने वाला ईश्वर होता है। एक इंसान निरंकुश बन जाता है तो दूसरा आज्ञाकारी, अन्य Factors के इलावा इस भेद के पीछे भी तो “भगवान की शक्ति” ही काम करती है। एक परिवार मे पैदा हुआ एक इंसान एक राजा तो दूसरा गुलाम कैसे बन जाता है जबकि दोनों को एक सी सुविधा मिली होती है। एक जल्दी मर जाता है दूसरा लंबी उम्र कैसे पाता है। यह सब सोचने पर मजबूर होना पड़ता  है कि मनुष्य के हर कृत्य की लगाम उसी भगवान ने पकड़ी हुई है जिसे मनुष्य ने ही अपनी धारणा से रचा है।  जीवन का रथ उसी भगवान् से चलता है, रथ के घोड़े उसी भगवान् के निर्देश को समझते हैं, पालन करते हैं। 

कई बार लगता है भगवान अपनी Monotonous (एक जैसी)  जिंदगी से ऊब गए थे तब उसने खिलौने के रूप मे मनुष्य  को बनाया ताकि उनका  समय अच्छा बीत सके। हमें तो मनुष्य भगवान के हाथ का बनाया हुआ खिलौना ही दिखता है। जिस प्रकार  बच्चा अपने खिलौने को देखकर खुश होता है, ठीक  वैसे ही भगवान् हमारे प्रत्येक  कृत्य देखकर खुश होते हैं/दुःखी होते हैं। मनुष्य का अस्तित्व उनके ही  कारण है,वह जब चाहे बना दें/मिटा दें। इसीलिए लिए ज्ञानी लोग कहते है घमंड करना बेकार है। इंसान किसी को बना और मिटा नहीं सकता है, उसे मिटाने पर अपराधी करार दिया जाता है लेकिन भगवान् कर सकते हैं। मनुष्य के अंदर काम करने की सामर्थ्य भगवान के  कारण ही आती है । वह जब चाहें ऐसा लाचार बना दें  कि मनुष्य उंगली तक हिलाने के काबिल न रहे।

आज के ज्ञानप्रसाद लेख का समापन निम्नलिखित सन्देश से करना उचित रहेगा:

जो इंसान भगवान की शक्ति को मानते हुए ईमानदारी से प्रत्येक कर्म करता है, सही मायने में  सुखी रहता है। जो लोग अपनेआप को ही सब कुछ समझते हैं  वह दुःखी  और निराशा भरा जीवन जीते हैं। हम भगवान की सर्वश्रेष्ठ रचना हैं और भगवान को रचने में हम गर्व अनुभव करते हैं।

जय गुरुदेव 


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