23 पुस्तकों के दिव्य संग्रह “क्रांतिधर्मी साहित्य” की चौथी पुस्तक “युग की माँग, प्रतिभा परिष्कार भाग 2” पर आधारित आज का ज्ञानप्रसाद लेख बता रहा है कि ईश्वर द्वारा प्रदान की गयी प्रतिभा का नियोजन करना मनुष्य की अपनी ही ज़िम्मेदारी है। इस मंच से आत्मसमीक्षा, आत्मसुधार,आत्मकल्याण और आत्मविकास जैसे शब्दों की बार-बार चर्चा की गयी है, आज के लेख में इन शब्दों को प्रतिभा की प्लानिंग के सन्दर्भ में देखा जा रहा है।
आइए आज के दिव्य ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करें
***************************
अभावग्रस्तों को कठिनाइयों का सामना करना पड़े तो बात समझ में आती है लेकिन आश्चर्य तब होता है जब पर्याप्त साधन होने के बावजूद, जानकारी के अभाव में लोग हैरान फिरते पाए जाते हैं।
कहते हैं कि किसी अनाड़ी ने अपने पिता के छोड़े हीरे को काँच समझ कर अनाड़ी के हाथों बेच दिया और खुद जीवन भर दरिद्र बना रहा। कस्तूरी हिरन की नाभि में रहती है लेकिन वह सुगन्ध की तलाश में निरन्तर दौड़-धूप करता रहता है और भागते भागते,थककर प्राण गँवा देता है। अक्सर लोग रेत को पानी समझकर भटकने वाले मृग की मृगतृष्णा का उदाहरण दिया करते हैं। “All that glitters is not gold, सब चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती”, वाली कहानी तो बचपन से पढ़ते आ रहे हैं लेकिन समझ अभी तक नहीं आई। कहानी तो वह भी प्रसिद्ध है कि सिंह का बच्चा भेड़ों के समूह में मिलने पर अपने को ही भेड़ समझने लगा था। बाद में जब उसे “आत्मबोध Self-knowledge” कराया गया, तो वहाँ से हटकर सिंह के समूह में चला गया।
इस प्रकार की घटनाएँ रियल जानकारी न होने के कारण ही होती हैं।
आत्मसमीक्षा,आत्मसुधार,आत्मकल्याण आत्मविकास जैसे शब्दों पर इस मंच से न जाने कितने ही लेख प्रकाशित हो चुके हैं, चर्चा हो चुकी है लेकिन इन्हें बार-बार समझना, अलग-अलग परिपेक्ष्य में समझना कोई अनुचित नहीं है। मनुष्य एक भटका हुआ देवता है, इस भटकाव में वह एक-दो दिन नहीं, सारा जीवन ही गँवा देता है। अपने आस पास देखने पर यही समझ आता है कि मनुष्य भांति-भांति की,छोटी-छोटी, तुच्छ सी उलझनें, कठिनाइयाँ, समस्याएँ, चिन्ताएँ, व्यवस्थाएँ सिर पर लादे फिर रहा है और उनके समाधान के लिए जहाँ-तहां मुँह मारता रहता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि कई बार किसी को छोटी-मोटी सहायता हाथ लग भी जाती है लेकिन जब पूरा जगत् ही उलझनों में फँसा हो तो प्रश्न तो यही उठता है कि
कौन, किसकी, कब तक, कितनी सहायता कर सकता है? खासकर तब जब हर किसी को अपनी-अपनी समस्याओं में ही इतना उलझे रहना पड़ता है कि दूसरों की सहायता करने जैसी न तो स्थिति रह जाती है और न ही वैसी अभिरुचि या फुरसत ही होती है।
यह भी देखा गया है कि मनुष्य को अपने दुर्गुण,अपनी कमज़ोरियाँ तो दिखती नहीं हैं और इन्हीं कमज़ोरियों से उत्पन्न हुई स्थिति का समाधान लोगों से पूछ रहा है, ऐसे लोगों से पूछ रहा है जो खुद ऐसी ही समस्याओं में फंसे हुए हैं। आत्मनिरीक्षण की बात यहीं पर आती है। Unbiased Self-analysis से अपनी स्थिति को स्वयं ही समझ कर स्थिति पर काबू पाया जा सकता है। अपनी स्वयं की परिस्थितिओं के कारण Divorce तक की स्थिति आन पंहुची है और आप समाधान ढूंढ रहे हैं Counsellor से, एक ऐसे अनजान से जो आपकी ही प्रश्नोत्तरी से समाधान बताता है।
यह बात सच है कि कोई भी परफेक्ट नहीं होता, दोषरहित नहीं होता लेकिन अपने दुर्गुणों को स्वीकार कर पाना बहुत बड़ी हिम्मत का काम है, स्वीकार कर लेने से कोई किसी की नाक नहीं कट जाएगी। अधिकतर लोगों को तो नाक कटने की ही बड़ी चिंता रहती है। ऐसे लोग सोचते हैं कि हमारे सर्वज्ञानी, सर्वगुण-सम्पन्न होने पर आँच नहीं आनी चाहिए। सभी लोग ज्वाइंट प्रोजेक्ट पर एक टीम की तरह काम करते हैं लेकिन काम बिगड़ने पर उसका लांछन अपने ऊपर न लगने देने वाला सस्ता नुस्खा सभी के हाथ लगता है कि दोष किसी दूसरे पर थोप दिया जाए। ऐसा करने में सामने वाले किसी को दोषी ठहराने पर तो झंझट खड़ा होने का डर रहता है, इसलिए हननकर्ता किसी ऐसे निरीह को ढूँढ़ लेते हैं जो सामने आकर प्रतिवाद करने में समर्थ न हो। ऐसी दशा में आरोपी को अपनी मान्यता और भी अधिक सुनिश्चित होने का मत बना रहने में कुछ कठिनाई नहीं होती। एक ओर तो दूसरों पर लांछन लगाने की प्रवृत्ति जमी रहती है और दूसरी ओर “आत्मसमीक्षा” न कर पाने की प्रवृत्ति मनुष्यों को भ्रमित किए रहती है।
अधिकांश लोग एक दुष्कल्पना से ग्रसित पाए जाते हैं कि उनकी अपनी सामर्थ्य कुछ भी नहीं है, ईश्वर द्वारा दी गयी प्रतिभा को बढ़ाने के लिए वोह कुछ भी नहीं कर सकते । उन्होंने एक धारणा बना ली है कि उत्कर्ष से सुयोग मिलना अपने हाथ में है ही नहीं । जितना प्रयत्न किया जा चुका है उससे अधिक और कुछ करने का अवसर ही कहाँ था। इसी प्रकार की बातें सोचकर आत्मसमीक्षा, आत्मसुधार,आत्मकल्याण और आत्मविकास का अवसर ही गँवा दिया जाता है। उपाय न सूझ पड़ने पर कुड़कुड़ाने,खीजने, झल्लाने,उद्विग्न रहने और चिन्तातुर रहने के अतिरिक्त कुछ बन भी नहीं पड़ता। दुष्कल्पनाओं के आधार पर अपने को तनावग्रस्त बना लेना तो और भी अधिक सरल व सम्भव हो जाता है। ऐसा लोग करते भी रहते हैं। Victim card खेलना इसी को तो कहते हैं, भाई साहिब हमारे सामने आत्मसमीक्षा, आत्मसुधार जैसे असूलों वाले शब्द मत किया करो, हमारे दिल को कुछ होता है।
इस तरह के “बहानेबाज दिल के मरीज़ों” के लिए महामारी शब्द प्रयोग करें तो कोई अत्युक्ति नहीं मानी जा सकती। ऐसे बहानेबाज़ों को समझाने की ज़रुरत है कि भैया तुम ऐसे ही कमज़ोर बने बैठे हो, तुमने स्वयं को पहचाना ही कब है ? मनुष्य की अन्तर्निहित शक्तियाँ इतनी अधिक हैं कि यदि उन्हें प्रसुप्ति (सोई हुई अवस्था) से जाग्रत एवं क्रियाशील बनाया जा सके, तो हर कोई “बेचारा” समझा जाने वाला व्यक्ति अपने को असामान्य सिद्ध करके दिखा सकता है। कल वाले लेख में बताया गया था कि ईश्वर द्वारा प्रदान की गयी असीमित शक्तिओं में से केवल 7% ही प्रयोग में आती हैं, 93% तो प्रसुप्त अवस्था में ही रहती हैं। यह कोई रहस्यवाद (Mysticism,Rocket science ) नहीं है,न कुछ ऐसा है जिसे असामान्य ठहराया जा सके, न ही ऐसा है जिस पर विश्वास न किया जा सके। पुरातन इतिहास के पृष्ठ पलटने पर, इतिहास की गतिविधियों पर ज़रा गम्भीरतापूर्वक दृष्टि डालने पर ऐसे असंख्यों उदाहरण आँखों देखे और कानों सुने जा सकते हैं जिनमें आत्मविश्वास और प्रचण्ड साहस के बलबूते प्रगति की दिशा में चलने का सूझबूझ के साथ प्रयत्न किया गया और वे क्रमश: अधिक उपयुक्त अवसर पाते चले गए। अन्तत: इतनी ऊँचाई पार कर गए जिसे देख कर आश्चर्य/भ्र्म होता है कि यह कोई दैवी वरदान यां चमत्कार तो नहीं है।
साथिओ,यही है सही चमत्कार, दैवी वरदान जिसका आधार मनुष्य का परिश्रम और पुरुषार्थ ही है। यही कारण है कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से सदैव God helps those who help themselves के सिद्धांत का प्रचार किया जाता है और गुरुदेव के गुणगान करके,खुशामद करके चमत्कार को नकारा जाता है। शर्त रख कर पूजा पत्री, घंटी बजाना,एक माला, 10 माला जैसे करतब अनेकों करते देखे जा सकते हैं, यह उनकी अपनी श्रद्धा है, आस्था है। किसी की आस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाना इस मंच की प्रथा नहीं है
पाठक देखते हैं कि पृथ्वी जहाँ-की-तहाँ स्थिर खड़ी दिखती है लेकिन जानते हैं कि वह अपनी धुरी (Axis) पर लट्टू की तरह घूमती रहती है और सूर्य की परिक्रमा के लिए तीर की तरह सनसनाती हुई दौड़ती है। मनुष्य के सम्बन्ध मे भी यही बात है। ईश्वर ने उसकी जीवनचर्या एवं प्रगति के लिए अथाह सम्भावनाएँ कूट-कूटकर भरी हुई हैं। कमी केवल इस बात की है कि इस रियलिटी को समझने और उस पर विश्वास करने के लिए साधारण मनुष्य का विवेक जगा ही नहीं। उसने अपने ऊपर दीनता और हीनता की इतनी मोटी परतें जमाई हुई हैं कि उसे वही जो दिख रहा है, अपना वास्तविक स्वरूप प्रतीत होता है।
इस विचारधारा को औसत मनुष्य हृदयंगम भी करता रहा है और यह मान बैठता है कि उसकी हस्ती नगण्य है, उससे कोई बड़ा काम हो ही नहीं सकता। इसलिए समझदारी इसी में है कि जैसे भी दिन गुजर रहे हैं,उन्हें ऐसे ही सन्तोषपूर्वक काट दिया जाए। संकटों को सह लिया जाए, रोते-रोते ही ज़िंदगी गुज़ार दी जाए। ऐसी मनःस्थिति वाले मनुष्यों की क्षमताएँ और भी गहरे गर्त में चली जाती हैं। उन्हें उभारने, उठाने का जब भीतर या बाहर से कोई प्रयत्न ही नहीं होता, तो आगे बढ़ने, ऊँचे उठने की सम्भावना ही कैसे बने? सार्थक दिशा में कुछ ठोस प्रयत्न करने का प्रयास ही कैसे चले? जब उमंगें ही मर गईं तो फिर अग्रगमन का अवसर छप्पर फाड़कर आकाश से आँगन में क्यों कर आ गिरेगा ?
ऐसे लोगों के लिए “चलते-फिरते मृतक” जैसा विशेषण प्रयोग करना शायद ही किसी पाठक को अनुचित प्रतीत हो।
संसार में पैसे की चमक-दमक बहुत जगह देखी जा सकती है और उसके आधार पर जो खरीदा जा सकता है, उसकी सज-धज भी अपनी चमक-दमक दिखाती, आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करती देखी जा सकती है। किन्हीं-किन्हीं को रूप−लावण्य भी मनमोहक दिख पड़ता है। कलाकार, व्यवसायी, गुणी भी कई देखे जाते हैं लेकिन ऐसे कम ही दिख पड़ते हैं जिन्होंने अपने साहस और पौरुष के सहारे, अवरोधों से टकराते हुए प्रगति का पथ प्रशस्त किया हो, जिन्होंने गिरों को उठाया, उठों को चलाया, चलतों को दौड़ाया और दौड़तों को उछाला हो। अपनी राह तो सभी चल लेते हैं लेकिन सराहना उनकी ही होती है जो अपनी नाव पर अनेकों को बिठाकर पार लगा सकें।
कैसा दुर्भाग्य है कि असीमित प्रचण्ड सामर्थ्य होते हुए भी उसका सदुपयोग कर सकना तो दूर, पहचानना तक नहीं बन पड़ता। इसे आत्मविस्मृति कहते हैं। आत्मविस्मृति (स्वयं को भूल जाना) ही वह अभिशाप है जिसे लोग स्वयं अपनाते हैं और सारा जीवन कन्धे पर लादकर चलते हैं। प्रतिभा का अभाव भी इसी को ही कहते हैं। यही वोह अभाव है जो कभी-कभी मोटे-ताज़े पहलवानों को भी अंदर से खोखला देखकर आश्चर्य रूप से व्यक्त किया जाता है। शारीरिक बल का प्रदर्शन तो भेड़ें और भैंसें भी आपस में टक्कर मारकर दिखा सकती हैं। यह रियल बलिष्ठता का प्रमाण नहीं है। गहराई तक जाना हो तो देखना पड़ेगा कि मन की कौन-सी दिशाधारा उस बल का प्रयोग कर रही है। गुण्डे, आतंकवादी, आततायी, अनाचारी अपनी अकड़ दिखाते और रौब जमाते देखे जाते हैं। दूसरों पर धाक जमाना और उन्हें डर दिखाकर उचित-अनुचित करा लेना यही उनका-व्यवसाय रहता है। ऐसे लोगों की शारीरिक बलिष्ठता कैसे सराही जा सकेगी? यही बात बुद्धिबल, धनबल आदि के सम्बन्ध में है। कला का दुरुपयोग भी कम नहीं हुआ है। शृंगारिकता, विलासिता, अनैतिकता जैसी पशु प्रवृत्तियों को भड़काने में संगीत, चित्रकला, साहित्य आदि का भी कम सहारा नहीं लिया गया है। ऐसी दशा में उस कला को किस प्रकार सराहा जाए, जो आकर्षित/प्रभावित तो अनेकों को करती है,पूरी कीमत बटोर लेने में भी सफल रहती है लेकिन यदि उसके अन्य परिणामों को देखा जाए तो यही कहना पड़ता है कि ऐसे प्रख्यात कलाकार यदि अविख्यात/अनजान लोगों की तरह साधारण स्थिति में रह रहे होते तो कहीं अच्छे थे।
यह देखना ही पर्याप्त नहीं है कि क्या उपलब्धि हाथ लगी, जाँचा यह भी जाना चाहिए कि मनुष्य का परिश्रम,लोकहित के लिए किस प्रकार और कितना बन बड़ा। यदि इसकी कसौटी को छोड़ दिया जाए तो सर्प-बिच्छुओं की शरीर संरचना ही प्रशंसा की पात्र बनेंगी। चीते और भेड़िये भी दूसरों की तुलना में अधिक बलिष्ठ होने के कारण प्रतिष्ठा पाने के अधिकारी समझे जाएँगे। तब उनकी मार से डरने और बचने की कोई आवश्यकता न रहेगी। सराहनीय बल/कौशल वही है जिसका उपयोग सदुद्देश्य के लिए बन पड़े।
पाठक समझ रहे होंगें कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार इन्हीं सिद्धांतों का पालन करते हुए,समर्पित साथिओं की एक छोटी सी दुनिया बसाए हुए है, एक ऐसी दुनिया जिसे गुरुदेव चला रहे हैं।
जय गुरुदेव
