वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

मनुष्य की 93% प्रतिभा प्रसुप्त ही पड़ी रहती है 

“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” परम पूज्य गुरुदेव के साहित्य का मक्खन है। आज इसी मक्खन की चौथी पुस्तक “ युग की माँग, प्रतिभा परिष्कार भाग 2” पर आधरित लेख श्रृंखला का चौथा लेख मनुष्य की उस 93% शक्ति के बारे में जानकारी दे रहा है जो सोई पड़ी रहती है।  

एक कहावत है कि ‘‘ईश्वर उनकी सहायता करते हैं , जो अपनी सहायता आप करते हैं। God helps those who help themselves’’ 

गीताकार का कथन है कि ‘‘मनुष्य स्वयं अपना शत्रु है और स्वयं ही अपना मित्र भी।’’ मित्र यां शत्रु होने उसकी इच्छा पर निर्भर करता है। यह उसी पर निर्भर करता है कि अस्त-व्यस्तता अपनाकर वह अपने को दुर्गति के गर्त में धकेले यां चुस्त-दुरुस्त रहकर प्रगति के शिखर पर निर्बाध गति से आगे बढ़ता चला जाए। 

संसार कितना भी सुखद, सुन्दर, सुविधाजनक क्यों न हो लेकिन यदि आँखें काम न करें तो वह सारा विस्तार एवं सौंदर्य निरर्थक बनकर रह जायेगा। कानों की श्रवण शक्ति चली जाए, तो प्रवचन-कर्ता, परामर्शदाता और गायक व वादक निरर्थक ही समझे जा सकते हैं। दिमाग खराब हो चले तो समझना चाहिए कि संसार का हर मनुष्य उलटी चाल चल रहा है। पेट खराब हो जाए, रक्त में विषाक्तता घुस पड़े, तो मानना चाहिए कि दुर्बलता-रुग्णता से होकर अकाल मृत्यु का भयंकर आक्रमण कभी भी होने वाला है। 

मनुष्य की प्रगति का इतिहास, सुनियोजित तन्मयता और तत्परता के आधार पर ही लिखा गया है। इनके अभाव में किसी को पूर्वजों की कमाई या सुविधाजनक परिस्थितियों का अंबार हाथ लग भी जाए,वह सारे वैभव को फुलझड़ी की तरह जलाकर क्षणभर का मनोरंजन कर लेगा और फिर सदा-सर्वदा पश्चाताप से सिर धुनता रहेगा। 

शरीर का भारी, लम्बा-तगड़ा होना एक बात है और हिम्मत का धनी होना बिलकुल दूसरी। तगड़ापन कुछ अच्छा और आश्चर्यजनक तो लगता है लेकिन उसमें  इच्छाशक्ति, संकल्पशक्ति, हिम्मत और प्राण ऊर्जा की कमी हो तो उसे कायरता के कारण चिन्तित, शंकाशील, खिन्न-उद्विग्न ही देखा जाएगा। तनिक-सी कठिनाई आ जाने पर राई को पहाड़ की तरह बड़ा बना लेने और किसी प्रकार बचने-बचाने की ही कामना बनी रहेगी। ऐसा मनुष्य समझ ही नहीं सकता कि कठिनाइयाँ कागज के बने हाथी की तरह बड़ी और डरावनी तो होती हैं लेकिन मनस्वी के प्रतिरोध की एक ठोकर भी वे सह नहीं सकतीं।

हम सब जानते हैं कि हर छोटे परमाणु में अजस्र शक्ति भरी होती है जो अनवरत, लगातार,बिना रुके व्याप्त रहती है। यदि इस शक्ति के  विस्फोट का नियोजन किया जा सके, तो प्रतीत होगा कि यही  “न कुछ”  दिखने वाले में “सब कुछ” करने की शक्ति  भरी हुई है। Invisible atom is carrying everything. मानव शरीर में ऐसे 7x 1027  परमाणु होते हैं। इस इतनी बड़ी संख्या को बहुत ही साधारण तरीके  से समझा जा सकता है कि 7 के बाद 27 ज़ीरो लगाने से जो नंबर बनता है,यह संख्या इतनी बड़ी निम्नलिखित है:

7 000,000,000,000,000,000,000,000,000 

समझने के लिए इसे और सरल करें तो यह नंबर बिलियन,ट्रिलियन से भी बड़ा ओक्टीलियन (Octillion) कहा जाताहै।                   

पाठक सोच रहे होंगें कि सच में ईश्वर ने इतनी बड़ी सम्पदा देकर हमें इस धरती पर भेजा है, जी हाँ आप बिल्कुल सही सोच रहे हैं। ज़रा अनुमान लगाएं कि  इन सात ओक्टीलियन परमाणुओं में जितनी  शक्ति समाहित है तो उसे सोच कर हम शायद चक्र खाकर गिर ही जाएँ यां इस परमाणु शक्ति से Explode ही न कर जाएँ। 

हम अपने पाठकों को कैसे  गिरने देंगें?  तभी तो हमने कुछ समय पहले एक ज्ञानप्रसाद लेख द्वारा मनुष्य में समाहित एटॉमिक शक्ति को समझने  का प्रयास  किया था। साथिओं को स्मरण हो आया होगा कि इस लेख का शीर्षक “यह एटॉमिक शक्ति नहीं आत्मिक शक्ति है” था। इस लेख का लिंक देना अपना कर्तव्य समझते हैं।    https://life2health.org/2023/03/28/%e0%a4%af%e0%a4%b9-%e0%a4%8f%e0%a4%9f%e0%a5%89%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae/

सभी पाठकों को यह समझ लेना चाहिए कि मनुष्य की सबसे बड़ी ज़रुरत इस सोई हुई शक्ति (प्रसुप्त शक्ति) के जागरण भर की है। औसत मनुष्य बहुत ही छोटी सी, नगण्य सी शक्ति(7%)  को ही जाग्रत् कर  पाता है, जिससे वह परिवार की गाड़ी किसी प्रकार धकेल सकता है , 93% तो सोई ही रहती है।

लेकिन सभी मनुष्य ऐसे ही,पेट पालन,प्रजनन आदि में ही लिप्त नहीं रहते,कुछ व्यक्तित्व ऐसे स्तर के होते हैं जिनके अन्तराल में सुनियोजित उच्चस्तर की महत्त्वाकांक्षाएँ अपना ताना-बाना बुनती रहती हैं, वे इतने बड़े कार्य सम्पन्न कर लेते हैं, जिन्हें देखकर आसपास के साथी सम्बन्धी आश्चर्यचकित रह जाते हैं । बाहरी दृष्टि से एक-जैसे दिखने वाले व्यक्तियों के बीच भी जमीन-आसमान जितना अन्तर पाया जाता है। यह अन्तर कहीं बाहर से आ धमका हुआ होता है ? नहीं। यह उस व्यक्ति की अपनी संरचना होती है, उसने स्वयं अपनेआप को ऐसे विकसित किया होता है। क्या यही है प्रतिभा का परिष्कार? जी हाँ बिल्कुल सही पकडे हैं !!! हिम्मत बढ़ाना, साहस जुटाना, पराक्रम दिखाना,अनुचित से लड़ पड़ने में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे असम्भव तो क्या कठिन भी कहा जा सके।

आये दिन सोशल मीडिया पर भांति-भांति की घटनाएं देखने को मिलती रहती हैं, किसी बेटी का बलात्कार हो रहा है, कोई बदमाश गुंडा किसी वरिष्ठ माँ का पर्स लेकर भाग रहा है तो किसी पर Bull dog झपट पड़ता है। सोशल मीडिया पर ऐसे दृश्य तो देखे ही जाते हैं,उनसे भी शर्मनाक वोह दृश्य होते हैं जहाँ सभी लोग वीडियो बनाने में व्यस्त होते हैं। किसी की भी आगे आकर बचाने की हिम्मत नहीं होती, उन्हें तो इन वीडियोस से व्यूज बटोरने होते हैं, मीडिया इन्फ्लुएंसर बनना है,धन कमाना है, क्या आज के युवा की जवानी इतनी ही  रह गयी है, क्या इन तमाशबीनों की अंतरात्मा मर चुकी है? 

यहाँ पर एक बहुत प्रासंगिक  Quotation स्मरण हो आयी है, Who will bell the cat?      

इस Quotation से संकेत मिलता है कि वीडियोग्राफी करने वाले नपुंसकों से कुछ भी आशा करना बेकार है, यह तो अंतरात्मा से उठने वाली भावना है। सही मायनों में अंतरात्मा ही तो सब कुछ करवाती है, इन नपुंसकों की आत्मा ही मर चुकी है तो क्या आशा की जाए। 

यह लोग वीडियो बनाने में ही शेर होते हैं, अँधेरे में झाड़ी को भूत समझ कर  इनके  दिल दहलने लगते हैं, रस्सी को साँप समझने पर इनकी घिग्घी बँध जाती है। राणा सांगा को लड़ाई के मैदान में 80 से अधिक घाव लगे थे लेकिन  वे बिना कुछ भी परवाह किए तब तक दोनों हाथों से तलवार चलाते रहे, जब तक उनके प्राण नहीं निकल गए। भीष्म पितामह का शरीर चुभे हुए बाँणों पर टँगा हुआ था,पीड़ा बहुत थी लेकिन उन्होंने मृत्यु  से स्पष्ट कह दिया था कि उत्तरायण सूर्य होने में अभी बहुत दिन है, तब तक मृत्यु को वापिस लौटना पड़ा था, उन्होंने  कहा था कि  जब तक इच्छित मुहूर्त न आ जाए, तब तक न आना। इच्छित मृत्यु के बारे में हमारे परम पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के संस्मरण भला किसी भी पाठक से कहाँ छिपे हैं ? देवमानव तो मृत्यु को भी निर्देश देने में समर्थ होते हैं। 

किसी ने सच ही कहा है:

जैसा पहले भी बताया है कि मनुष्य अपनी मानसिक क्षमता का केवल  7 प्रतिशत ही शरीर यात्रा के साधन जुटाने भर में आजीवन गँवाता-खपाता रहता है, 93 प्रतिशत सामर्थ्य सोई, खोई, मरी, मूर्च्छित या अविज्ञात स्थिति में ही पड़ी रहती है, इसे मनुष्य का दुर्भाग्य न कहें  तो और क्या कहें? 

गुरुदेव ऐसी स्थिति के बारे में कहते हैं:

अभागा मनुष्य यदि सम्पदाओं से  भरी तिजोरी की चाबी खो दे, दरिद्रियों की तरह दुर्गतिग्रस्त स्थिति में मारा-मारा फिरे, लोगों से सहानुभूति बटोरता फिरे, गुरु-गुरु करता फिरे तो ऐसे मनुष्य के लिए हम से भी कुछ नहीं हो पायेगा क्योंकि God helps those who help themselves, ऐसे अपाहिजों को हम दूर से ही सलाम कर देंगें। हाँ, हम मार्गदर्शन करके, आत्मनिर्माण के लिए प्रेरित कर सकते हैं, बुरी आदतों को कूड़े-करवट की तरह बुहारने में सहायता कर सकते हैं, दृष्टिकोण में मानवी गरिमा के अनुुरूप मान्यताओं का समावेश करा सकते हैं। यदि कोई मनुष्य इस संकल्प के लिए तैयार है, आत्म-निर्माण, आत्मपरिष्कार, प्रतिभा संवर्धन के लिए तैयार है तो आज से ही हमारा साहित्य पढ़िए, समझिए उस पर अमल कीजिये, हम गारंटी देते हैं कि आप स्वयं ही कहेंगें, “गुरुदेव, वनमानुष से नर-नारायण जैसा कायाकल्प उपलब्ध हो गया है।”

इन पंक्तियों को पढ़ रहे पाठकों के लिए तो ज्ञानप्रसाद लेख बहुत ही सार्थक विकल्प उपलब्ध हैं, गुरुदेव द्वारा रचा गया दिव्य साहित्य प्रैक्टिकल होने के बावजूद समझ पाना इतना सरल नहीं है क्योंकि साहित्य को केवल पढ़ना ही पर्याप्त नहीं है,उसे समझ कर गुरुदेव की आत्मा से कनेक्ट करना है, समझना है कि गुरुदेव क्या कहना चाह  रहे हैं, कहीं ऐसा तो नहीं कि गुरुदेव कह कुछ रहे हों  और हम समझ कुछ और ही रहे हों ।   

इसी प्रक्रिया को “बुद्धि का विकास” कहा जा सकता है। वैज्ञानिक लोगों ने तो दिमाग को अधिक से अधिक इस्तेमाल करने को कहा है, यह कोई अगली पीढ़ी/अगली जेनेरशन के लिए संभाल कर रखने वाली वस्तु नहीं है,धन-सम्पत्ति की भांति देने वाला  कोई बैंक बैलेंस नहीं है।   More we use it,more fertile brain becomes, Neuroplasticity  के अनुसार मनुष्य जितनी बार भी ब्रेन का प्रयोग करता है उतनी ही बार नए कनेक्शन बनते हैं, इन कनेक्शंस को Synapses कहते हैं।   

शक्ति तो  शक्ति ही है। उसे भले काम की तरह बुरे काम में भी लगाया जा सकता है। दैत्य, दानव, आततायी, आतंकवादी और अनाचारी तक इसी विशेषता के आधार पर दुष्कर्म कर बैठते हैं। मनुष्य ने अपने साहस और बुद्धि के सहारे अनेकों  कमाल दिखाए हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह मनोयोगपूर्वक अपने कार्य में लगा रहे। 

पारस को छूकर लोहा, सोना बनता है या नहीं, इसमें सन्देह भी किया जा सकता है लेकिन  यह सुनिश्चित है कि प्रतापी व्यक्ति असंख्यों को अपना अनुयायी-सहयोगी बना लेते हैं। महामानवों की जीवनगाथा बताती है कि वे अपनी प्रामाणिकता और प्रखरता के बल पर हर दिशा से प्राणशक्ति संग्रह करते हुए, न जाने कहाँ से चलकर कहाँ जा पहुँचे। केवल अपनी मोटिवेशनल प्रतिभा से ही दूसरों से  ऐसे-ऐसे कृत्य करा लेने में सफल हुए जिन्हें वे स्वयं नहीं कर पाए। ऐसी दिव्य क्षमता को अर्जित कर लेना और उससे अनेकों की अस्त-व्यस्तता को सुनियोजितता में बदल देना, भी एक सफल वरदान है। 

कई लोग तो साधनों-अभावों का ही रोना रोते रहते हैं लेकिन दूसरी तरफ ऐसे लोग भी होते हैं जो उन्हीं साधनों से सौगुना काम कर लेते हैं । रीछ-वानरों की, ग्वाल-बालों की, सत्याग्रहियों की टोलियों को निमंत्रित या गठित करने कौन कहाँ गया था। उनके पास कौन से बड़े साधन थे ? संसार में जितनी भी प्रगति दिख  पड़ती है, वे केवल  साधनों के सहारे ही खड़ी नहीं हो गईं। उनके पीछे किन्हीं सृजन शिल्पियों की मेधा ने ऐसा जादू-चमत्कार दिखाया कि ठीक समय पर उसकी योजना बन गई, ढाँचा खड़ा हो गया, उसमें प्रयुक्त होने वाले तारतम्य को बिठा दिया गया और फिर स्वप्नों को साकार बनाने में अपनेआप को पूरी तरह खपा दिया। 

इसी प्रक्रिया का नाम सफलता है। उसे वरण करने के लिए किसी दूसरे की खुशामद  करने की जरूरत नहीं पड़ती । यदि व्यक्ति अपनी बुद्धि को क्रमश: तेज करता चले, क्रमश: अधिक बड़ी जिम्मेदारियाँ कन्धों पर उठाता रहे और उन्हें पूरी करता चले, तो समझना चाहिए कि इसी विकसित प्रबन्ध शक्ति के आधार पर वह जहाँ भी जाएगा, सरताज बन कर रहेगा। 

यही सबसे बड़ी दैवी विभूति है,जो व्यक्ति को साधारण से असाधारण बनाती है।

आज के लेख का यही सन्देश है। 

जय गुरुदेव 


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