आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ हमारी मातृभूमि “भारत” के लिए प्रयोग किये गए अनेकों विशेषणों से हो रहा है। जगतगुरु,विश्वगुरु,चक्रवर्ती,सोने की चिड़िया, स्वर्गादपि गरीयसी जैसे विशेषणों से हमारे (कैनेडियन होने के भावजूद) समेत प्रत्येक भारतीय को गर्व होना चाहिए। लेख का अमृतपान करने से, इन विशेषणों की सार्थकता होना सुनिश्चित है। इन्हीं विशेषणों ने अनेकों विदेशिओं को इस दिव्य भूमि को ओर न केवल आकर्षित किया बल्कि वोह यहीं के होकर रह गए।
प्रतिभा संवर्धन एवं परिष्कार में जितना प्रेरक का योगदान होता है उतना ही वातावरण का भी होता है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का दिव्य वातावरण, जहाँ सदैव मानवीय मूल्यों का सम्मान होता रहता है, वहीँ दिव्य भोजन (ज्ञानप्रसाद) एवं परस्पर सहकारिता इस परिवार के बहुमूल्य घटक हैं।
आज के लेख में मनुष्य की प्रतक्ष्य/अप्रतक्ष्य प्रतिभा को योगविद्या से बहुत ही संक्षेप में समझने का प्रयास किया गया है क्योंकि सभी जानते हैं कि इस विषय पर अति विस्तृत ज्ञान प्रकाशित हो चूका है/हो रहा है। समझ आये न आये, योगविद्या तो आधुनिक काल का फैशन बन चुका है। वर्षों पूर्व दिल्ली में किसी अति धनाढ्य व्यक्ति के घर एक रात बिताने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। भाई साहिब वर्षों से, सुबह-सुबह किसी स्पेशलिस्ट से योग की क्लासें ले रहे थे,जिज्ञासावश हमारे पूछने पर “योग का बेसिक अर्थ” बताने में असमर्थ रहे थे।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की 31 अगस्त 2026 की ज्ञानकक्षा में आप सभी का अभिनन्दन है, आइए, क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला की चौथी पुस्तक “ युग की माँग, प्रतिभा परिष्कार भाग 2” पर आधारित प्रस्तुत ज्ञान को समझ कर, अपने अंतर्मन में उतारकर स्वयं का कायाकल्प करें एवं अनेकों को प्रेरित करें।
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भारत इस समस्त धरातल के हर क्षेत्र में,अपने ढंग की अनोखी प्रतिष्ठा प्राप्त करता रहा है। उसकी महानता, समृद्धि, उदारता, विविधता, जन-जन के लिए आश्चर्य का विषय रही है। संसार उसके प्रति भावभरी श्रद्धांजलि अनेकों प्रकार से प्रस्तुत करता रहा है। ज्ञान और मार्गदर्शन का प्रकाश दे सकने की विशेषता के अनुरूप उसे “जगतगुरु, विश्वगुरु ” कहा जाता रहा है। शासन, सुव्यवस्था और प्रगति के व्यापक सरंजाम जुटा सकने की विशेषता के कारण उसके नेतृत्व को “चक्रवर्ती” की संज्ञा दी गई। यही कारण है कि उसे “सोने की चिड़िया और रत्नों की खदान” के नाम से पहचाना जाता रहा।
भले ही यहाँ के लोग औसत नागरिकों जैसा जीवनयापन ही क्यों न करते रहे हों,स्वर्ग सम्पदाओं के स्वामी भारतवर्ष की सुसम्पन्नता ही व्यावहारिक समझी जाती रही ।
भारत की अपनी सांस्कृतिक परम्पराएँ इतनी उत्कृष्ट और सशक्त रही हैं कि अनगढ़ लोग यह कल्पना तक न कर सके कि कोई अपनी निजी प्रतिभा को परिष्कृत करके, दूूसरों की तुलना में असंख्य गुना वजनदार भी बन सकता है। बात समझ में न आने से यह मानकर सन्तोष करना पड़ा कि यह लोग किसी असामान्य वर्ग के हैं। इनमें कोई “चमत्कारी देवता” प्रवेश कर गया, जो हम जैसों में नहीं हो सकता।
इस धारणा ने संसार भर के लोगों के मनों में यह मान्यता जमा दी कि “भारतभूमि पर रहने वाले सभी देवमानव हैं।” इसी धारणा का दूसरा चरण यह है कि “जहाँ देवता बसते हैं, वह स्वर्ग होता है।”
यह कसौटी भी खरी उतरती रही कि देवमानवों के सौजन्य, सहयोग और सेवासाधना में निरत होने के कारण, वैयक्तिक सम्बन्धों, नागरिक प्रचलनों और स्नेह-सौहार्द्र के आधार पर उभरते, बिखरते, आनन्द, उल्लास की भी यहाँ कमी नहीं है। तब यह मान्यता सहज ही बनती है कि “भारत की भूमि पर ही स्वर्ग का अवतरण हुआ है” और यह धरित्री ही “स्वर्गादपि गरीयसी’ है। भगवान् के जितने भी अवतार हुए हैं, वे 10 हों या 24, सभी इसी धरित्री पर जन्में हैं। आकाश में उड़ने और अदृश्य रहने वाले अजर-अमर देवताओं को पकड़ पाना तो मुश्किल था लेकिन ऋषियों, मुनियों और मनीषियों की प्रज्ञा एवं आश्चर्यजनक पुरुषार्थ परायणता, कर्तव्यनिष्ठ तत्परता को देखते हुए यह मान्यता बना ली गई कि देवता निस्सन्देह भारतभूमि पर विचरण करते हैं। उन्होंने किसी अज्ञात लोक में अवस्थित स्वर्ग धरती पर उतारकर, ठीक वैसी ही अनुकृति यहाँ तैयार कर ली है।
यह मान्यता किसने बनायी? निम्नलिखित देखिये:
संसार भर में मनुष्य समुदाय ने, भारतीय देवमानवों को कुछ भी कर सकने में समर्थ पाया और उनके नेतृत्व का भरपूर लाभ उठाया। युगनिर्माण योजना द्वारा प्रकाशित 464 पन्नों के दिव्य ग्रन्थ “समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान” में, अगणित प्रमाणों और ऐतिहासिक साक्षियों समेत यह सिद्ध किया गया है कि इस देश के निवासी, अपने निवास क्षेत्र तक ही अपनी महान् गतिविधियों को सीमित नहीं रखते रहे बल्कि उन्होंने भूमण्डल के समस्त खण्डों-उपखण्डों क्षेत्रों, देशों की अति कष्टसाध्य यात्राएँ करके इस बात का प्रबल प्रयास किया कि पिछड़ापन किसी भी क्षेत्र में अपनी जड़ें जमाए न बैठा रहे। आवश्यक उत्साह और पुरुषार्थ उभारकर उसे इस तरह खदेड़ दिया जाए, जिस प्रकार सूर्य अपने उदय होने पर अँधेरे की सत्ता को अनायास ही तिरोहित कर देता है।
जब पुरातन कष्टसाध्य यात्राओं की बात हो रही है तो आदरणीय चिन्मय जी की आजकल की यात्राओं को कैसे भूल सकते हैं। कोई पता ही नहीं होता कि सुबह शांतिकुंज में उद्बोधन दे रहे होते है और शाम को इंग्लैंड में गोष्ठी ले रहे होते हैं। साथिओ,हमें उनको करीब से देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है तो आश्चर्य होता है कि यह सब कैसे संभव हो रहा है। हम कई वर्षों में एक बार भारत की यात्रा करते हैं तो कितने दिन तो jet lag ही नहीं छोड़ता।
भारत भूमि के बारे में जानने की इच्छा रखने वालों को 464 पन्नों के इस ग्रन्थ को ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिए, समझना चाहिए, औरों को बताना चाहिए कि सही अर्थों में भारत भूमि की विशेषता क्या है। अपने साथियों को इस पुस्तक को पढ़ने के लिए आग्रह करने के पीछे एक ही धारणा है कि अगर किसी को इस पुस्तक का रेफरेंस दे दिया जाए यां उसे पुस्तक ही दे दी जाये तो इतनी बड़ी पुस्तक पढ़ने का उसके पास समय ही नहीं होगा। यदि समय निकाल कर कुछ अंश पढ़ भी लिए जाएं तो समझ आने में कठिनाई आ सकती है। गुरुदेव की किसी भी रचना को उठाकर देख लिया जाए, देखने में जितनी भी सरल दिखती है उससे कितना ही अधिक गूढ़ ज्ञान लिए बैठी है। ज्ञानप्रसाद लेखों के माध्यम से हम सब, एक दूसरे की योग्यता और अनुभव का सहारा लेकर, “अंधे को लाठी का सहारा” वाली उक्ति को सार्थक कर रहे हैं। सभी पाठक एक दूसरे की सहायता कर रहे हैं इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है, जिसके लिए हम सभी का धन्यवाद् करते हैं।
“समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान” पुस्तक की बात हो रही है तो उचित रहेगा की आदरणीय चिन्मय जी की वीडियो भी देख ली जाए जिसमें अनेकों स्लाइड्स के माध्यम से भाई साहिब भारत के अनुदानों की चर्चा कर रहे हैं। यह वीडियो शांतिकुंज में दिए गए बड़े उद्बोधन का छोटा भाग है जो उन्होंने 2018 में किंग्स्टन, कनाडा में दिया था। साढ़े तीन सौ किलोमीटर दूर होने के बावजूद, चार दिन के इस आयोजन में गुरुदेव की अनुकम्पा से हमें भी शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।
यही है भारतीय संस्कृति की महान् परम्परा, जिसे अपनाने वाले को स्वयं अपनेआप को चरित्रवान और आदर्शवादिता के लिए समर्पित तो करना ही है, सम्पर्क क्षेत्र को, क्रिया क्षेत्र को भी ऐसा सुनियोजित करना पड़ता है कि जो कुछ उसके लिए उपलब्ध है, अन्य सभी के लिए भी उपलब्ध है, उसी के सदुपयोग से कैसे असंख्य गुना लाभ उठाया जा सके।
कोलंबस ने यही यश गाथाएँ अपने देश स्पेन में जन-जन से सुन रखी थीं। वह इस सोने की खदान से कुछ पाने-बटोरने के लिए आकुल-व्याकुल होकर, एक जलयान के द्वारा खोज को निकल पड़ा। सही दिशा का ज्ञान न होने के कारण वह भारतवर्ष तो पहुँच न सका लेकिन अमेरिका के तट पर जा पहुँचा, उसने उसे ही भारत समझ लिया और वहाँ के निवासियों की लाल चमड़ी देखकर उन्हें ‘रेड इण्डियंस’ नाम दे दिया। यह घटना बताती है कि यहाँ की प्रगतिशीलता को धरती के हर कोने पर किस दृष्टि से देखा जाता था।
दूसरे यात्री भी सम्भवत: इसी टोह में लम्बी कष्टसाध्य यात्राएँ करते हुए यहाँ आ पहुँचे और जो दृश्य देखा, उसका आँखों देखा परिचय बताने के लिए सुविस्तृत ग्रन्थ लिखे। ऐसे यात्रियों में फाह्यान, ह्वेनसांग, मैकबर्नर, मार्कोपोलो आदि के नाम प्रसिद्ध हैं। ह्वेनसांग के बारे में बताया गया है कि वोह 6 वर्ष की पैदल यात्रा करके भारत आये थे। 15-16 वर्ष भारत रहने के बाद वापिस जाते हुए 657 घोड़ों पर अमूल्य ग्रन्थ और मूर्तियां ले गए थे।
यह सिलसिला लम्बी अवधि से चलता रहा है। पाल ब्रण्टन भारत में चमत्कारों को खोजने आए। उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर आश्चर्यचकित करने वाला साहित्य प्रकाशित किया है। फ्रान्स की Mirra Alfassa, श्रीमाँ, इसी उद्देश्य से भारत आईं और वे अरविन्द आश्रम की अविच्छिन्न सदस्या बनकर वहीं रह गईं। इंग्लैंड में जन्मी Annie Besant, गाँधी आश्रम की Madeleine Slade जिसे गाँधी जी ने मीराबेन का नाम दिया, ब्रिटेन में जन्मी Catherine गाँधी जी के साथ काम करते पर्यावरण स्पेशलिस्ट,सरला बेन जीवन के अन्त तक यहीं रहीं। विवेकानन्द की सहायिका के रूप में यहीं निवास करने वाली सिस्टर निवेदिता का नाम हर किसी ने सुना है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के परम मित्र, इंग्लैंड में जन्में पादरी CF Andrews की भारत के स्वाधीनता संग्राम सेवाओं को कोई कैसे भुला सकता है।
इस देश की आबादी का एनालिसिस करने पर पता चलता है कि पारसी, मुस्लिम, ईसाई आदि धर्मावलम्बी किस उत्साह के साथ यहाँ आए और वातावरण को देखते हुए सदा-सर्वदा के लिए यहीं बस गए।
कल्पवृक्ष की छाया में बैठने के बाद इस भूमि से वापस लौटने को भला किसका मन करता होगा और क्यों होगा?
इस सन्दर्भ में “योगविद्या” को महत्त्व दिया है जिसे चमत्कारों की जन्मदात्री कहा है लेकिन भ्रान्तियों, अत्युक्तियों और निहित स्वार्थों के जाल-जंजाल ने उसका स्वरूप ऐसा विचित्र बना दिया, जिसे जादूगरी-बाजीगरी के आधार पर अजूबे दिखाने और शगूफे छोड़ने की ठग विद्या के अतिरिक्त और कुछ कहा भी नहीं जा सकता है।
जिस योगविद्या के कारण भारत कभी स्वर्ग की समानता करने लगा था, वह वस्तुत: “व्यक्तित्व में सन्निहित प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष क्षमताओं का ऐसा विकास” ही था जो मानवी काया में कण-कण को प्रतिभा से सुसम्पन्न, शरीर को ओजस्वी, मन को तेजस्वी और अन्त:करण को ब्रह्मवर्चस् से अभिभूत बनाने का प्रत्यक्ष प्रमाण था। कहने का तात्पर्य यह है कि योगसाधना के लिए साधारण रहन-सहन छोड़कर चित्र-विचित्र परिधान धारण करें, यह बिलकुल भी आवश्यक नहीं है।
यदि किसी को पुरातन भारत की सशक्त महानता का आधार “अध्यात्म योग” मानने का शब्द मोह न हो, तो उसके साथ इतना और जोड़ना चाहिए की योग का भव्य भवन दो आधारों पर ईंट-चूने की नींव पर विनिर्मित हुआ था। उनमें से एक था तप और दूसरा था सुव्यवस्था बना सकने की प्रवीणता का प्रतिनिधित्व कर सकने वाले कौशल का दृष्टिकोण परिमार्जित करना। इन दोनों के लिए यदि चरम स्तर का प्रयत्न बन पड़े तो समझना चाहिए कि अध्यात्म योग का वास्तविक अर्थ समझ लिया गया। उस स्तर की प्रगति ही उन सफलताओं को प्रस्तुत करती है जिन्हें ऋद्धि-सिद्धियों के नाम से जाना जाता है। वे किसी पर आसमान से पुष्पवर्षा होने की तरह नहीं बरसती हैं।
आज के लेख में अनेकों उदाहरणों से यही प्रतीत होता है कि “अद्भुत शक्तियों का उद्भव मनुष्य के अन्तराल” से होता है। योग-तप जैसे उपचारों को प्रतिभा सम्वर्द्धन (Talent development) के लिए अपने भीतर से ही जगाया व उभारा जाता है। उसका लाभ स्वयं भी उठाया जा सकता है तथा अन्यों को भी दिया जा सकता है।
धन्यवाद्,जय गुरुदेव
