Every human is loaded with immense potential,प्रत्येक मनुष्य असीमित क्षमताओं से ओतप्रोत है,उसे तो ज्ञान ही नहीं है कि ईश्वर ने उसे क्या कुछ देकर इस धरती पर अवतरित किया है।
आज का लेख उन्हीं प्रसुप्त प्रतिभाओं को जागृत करने का सरल सा मार्ग प्रदान कर रहा है, बता रहा है कि वैभव,पराक्रम,विभूतियाँ आदि ईश्वर से मांगी तो जाती हैं लेकिन क्या उनके स्रोत “अंतराल की प्राणाग्नि” को जाग्रत करने का भी प्रयास किया जाता है।
23 पुस्तकों की दिव्य पुस्तकमाला “क्रांतिधर्मी साहित्य” की चौथी पुस्तक “युग की मांग प्रतिभा परिष्कार भाग 2” का अध्ययन करते हुए जिस ऊर्जा का संचार हो रहा है उसके वर्णन के लिए शब्दों का अकाल ही पड़ गया है। आज इस पुस्तक पर आधारित दूसरा लेख प्रस्तुत किया गया है।
हमारे सभी समर्पित,नियमित गुरुशिष्यों का 28 अगस्त 2026 की गुरुकक्षा में अभिवादन हैं। गुरुचरणों में समर्पित होकर इस गुरुज्ञान का अमृतपान करना कोई ऐसा वैसा सौभाग्य नहीं है, आइए इस ज्ञान को समझ कर, अपने अंतर्मन में उतारकर स्वयं का कायाकल्प करें एवं अनेकों को प्रेरित करें।
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भारत का एक पुरातन विज्ञान है जिसे “चेतना विज्ञान” कहा गया है। योगसाधना, तपश्चर्या आदि इसी विज्ञान के अंतर्गत पढ़ाए जाते हैं। उसके फलस्वरूप उपलब्ध हो सकने वाली ऋद्धि-सिद्धियों से पौराणिक ग्रंथों का पन्ना-पन्ना भरा हुआ है।
यह योगाभ्यास आखिर है क्या? इसकी गहराई तक उतरने वाले जानते हैं कि तितीक्षाओं के साथ जुड़ी हुई कर्मकाण्डों की प्रत्यक्ष फलश्रुति प्रतीत होते हुए भी, योगाभ्यास मनोबल को उभारने और “प्रसुप्त प्राणाग्नि” को प्रज्वलित करने की प्रक्रिया है। देवशक्तियों का केन्द्रबिन्दु वही है। जड़ों के द्वारा खींचा गया धरती का रस ही तने को मजबूत करता है, पल्लवों को हरियाली और वृक्षों को सुविस्तृत छायादार बनाकर उन्हें फल-फूलों से लाद देता है। उसी जीवट के आधार पर वे आँधी-तूफानों से लड़ते, अपनी जगह अकड़ कर चिरकाल तक खड़े रहते हैं। सिद्धजन अभीष्ट प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँचते हैं। महापुरुषों की सफलताएँ आलसी मनुष्यों को धिक्कारती और विजयश्री वरण कर सकने की शिक्षा प्रत्यक्ष प्रमाण बनकर देती हैं। उनसे उत्साहित होकर कभी-कभी तो अधमरे मनुष्य भी देवमानवों जैसे पुरुषार्थ करके दिखाने लगते हैं।
इन सब उपलब्धियों के लिए प्रेरक का बहुत बड़ा योगदान, एक ऐसा व्यक्ति, कोई शक्ति जो सोए हुए को जगा दे, जगे हुए को उठाकर चला दे। ज्ञानप्रसाद लेख ऐसी ही शक्ति से ओतप्रोत हैं।
आज के युग में तो शरीर ही आराध्य देव बना हुआ है। उसके बलिष्ठ और मजबूत बनाने में मनुष्य की तीन-चौथाई क्षमता का नियोजन होता रहता है। इतने पर भी सज्जा, उपकरण, बहुमूल्य आहार, औषधियों के पिटारे कुछ काम नहीं आते। गरीबों की अपेक्षा में अमीर लोग अधिक दुर्बल, बीमार और अल्पजीवी पाए जाते हैं। चिकित्सा के व्यवसायी अपने परिवार समेत स्वयं तक बीमारियों के शिकार बने रहते और तथाकथित आहार विज्ञान से लेकर औषधि विडम्बना को प्रत्यक्ष न सही, मन-ही-मन तो कोसते ही रहते हैं।
इन दिनों मनुष्य को व्यक्तिगत वैभव, स्वास्थ्य और यश के अतिरिक्त और किसी की कामना दिख ही नहीं पड़ती। इसके लिए जो कुछ उचित और अनुचित बन पड़ता है, उसे कमाने में औसत आदमी दिन-रात जुटा रहता है। कुछ मिलता भी है, तो कुमार्ग के रास्ते देखते-देखते न जाने कहाँ उड़ जाता है। क्या आज के मनुष्य के पास पैसे की कमी है, वैभव की कमी है ? बिलकुल नहीं। उसे चाहिए कि आलू-प्याज़ की महंगाई की फिज़ूल की चर्चा के बजाए किसी सार्थक दिशा में समय का सदुपयोग करे। करोड़ कमाने वाले को भी महंगाई की चर्चा बहुत भाति है, उससे पूछा जाए, मंहगाई कब नहीं थी ? क्या 50 वर्ष पूर्व नहीं थी? मंहगाई को नियोजित करने के लिए खर्चा कम करने की बात कोई करे तो उसका गला ही पकड़ने को आतुर रहते हैं
इस घोर असमंजस की वेला में हर किसी को यह समझना एवं औरों को समझाना चाहिए कि अगणित वैभवों का उद्गम वह “प्राणाग्नि केन्द्र” है, जिसको उभारना हमारा परम पुरुषार्थ और ईश्वर का एकमात्र अनुग्रह कहा जा रहा है।
आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि वैभव और प्रतिभा न केवल स्थिर रहे बल्कि दिन-ब-दिन बढ़ता रहे क्योंकि इसी के फलने-फूलने से एक विशालकाय वटवृक्ष की सम्भावना है।
वैभव, पराक्रम,विभूतियाँ कहाँ से आती हैं ? कौन है जो ऐसे अनुदान प्रदान करता है? इन सबको प्राप्त करने के लिए भगवान् का ही नाम लिया जा सकता है, उसी से प्रार्थना की जाती है।
“भगवान् का निकटतम और सुनिश्चित स्थान एक ही है: मनुष्य के अन्तराल में विद्यमान प्राणाग्नि।”
जिस किसी ने भी इस प्राणाग्नि को जान लिया,उभार लिया उसे वह सब कुछ मिल सकता है जिसकी उसे कामना है। जिस मनुष्य ने उस प्राणाग्नि को धारण कर सकने की पात्रता अर्जित कर ली उसका तो कायाकल्प ही समझो । मेघमाला द्वारा समय-समय पर बरसने वाली अजस्र जलधारा का जल उन्हीं जलाशयों में एकत्र होता है जो उसके संचय के लिए समुचित गहराई और पात्रता अर्जित कर सकने में समर्थ हो सकें। आकांक्षा ऋद्धि-सिद्धियों की हो या स्वर्ग/मुक्ति की, इन्हें प्राप्त करने के लिए उस प्राणाग्नि को प्रज्वलित किया जाना अनिवार्य है, जो दैवी शक्तियों का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करती है।
आइए ज़रा समझने का प्रयास करें कि जो कुछ लिखा जा रहा है उसमें कितनी सच्चाई है
घटना सन् 1981 की है। इंग्लैंड की पैट्रिक मेरी नामक एक महिला के सीने में कैंसर हुआ। पता तब चला, जब डाक्टरों ने जाँच पड़ताल के उपरान्त यह बताया कि उसका कैंसर सीने से बढ़कर सारी काया में फैल चुका है। वह अधिक से अधिक छ: महीने ही जीवित रह सकेगी। महिला चिन्तित हुई। उसने पूछा: क्या इसका उपचार नहीं हो सकता? डॉक्टरों ने सीधा सा उत्तर दिया कि जाँच-पड़ताल कुछ महीने पहले हो सकी होती, समय रहते इलाज हुआ होता तो आपके प्राण बच सकते थे । पहले जाँच-पड़ताल क्यों नहीं हो सकी? इसका कारण एक ही था कि इंग्लैण्ड में उस समय Cat Scanning वाली केवल एक ही मशीन थी, जिस पर जाँच कराने के लिए अपनी बारी के लिए मरीजों को लम्बी प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। महिला ने विचार किया कि जब मात्र छ: महीने ही जीना है, तो इस समय का श्रेष्ठतम उपयोग क्यों न कर लिया जाए। सोचते-सोचते वह इस निष्कर्ष पर पहुँची कि मेरी हैसियत तो ऐसी नहीं है कि ऐसी अनेकों मशीनें देश में लगा सकूँ लेकिन इतना तो हो सकता है कि यदि पूरी शक्ति इसी कार्य में झोंक दी जाए, तो एक के स्थान पर दो तो हो ही जाएँ और आधे रोगियों के प्राण तो बच ही जाएँगें । उन दिनों ऐसी एक मशीन प्राय: तीन करोड़ रुपयों में बनती थी।
पैट्रिक ने योजना बनाई, देश के टेलीविजन पर अपनी स्थिति, दुर्दशा और सम्भावना प्रसारित की और साथ ही यह भी कहा कि यदि तीन करोड़ रुपयों का प्रबन्ध हो जाए, तो कुछ ही दिनों में दूसरी मशीन लग सकती है। उस प्रसारण को सुनकर बहुत से उदारचेता प्रभावित हुए और उन्होंने अपनी श्रद्धानुसार राशि भेजनी शुरू कर दी। महिला का हौसला बढ़ा और उसने इसी का सरंजाम जुटाने में अपना सारा समय और मनोयोग लगा लिया। फलत: नियत अवधि में दूसरी मशीन बननी चालू होने के लिए स्थानीय जाँचकर्ताओं की सारी व्यवस्था जुट गई। पैट्रिक की तत्परता और तन्मयता ऐसी रही कि उसे अपनी बीमारी की चिन्ता ही न रही और उसे भूल सी गयी। कुछ देर बाद साथियों के याद दिलाए जाने पर वह डॉक्टरों के पास फिर अपनी जाँच-पड़ताल कराने गई। डॉक्टरों ने उसका सारा शरीर जाँच डाला लेकिन उसमें कैंसर का कोई नाम-निशान ही न था। वह हर दृष्टि से भली-चंगी थी। इस आश्चर्यजनक कायाकल्प का कारण खोजने के लिए विभिन्न स्तर के विशेषज्ञों की समिति बिठाई गयी। लम्बे अन्वेषण के बाद एक ही प्रतिवेदन प्रस्तुत किया कि
यदि मनुष्य अपना मनोबल मौत, बुढ़ापा, बीमारी आदि को भुलाकर “उच्चस्तरीय परमार्थ” में लगा दे, तो उनके स्थान पर स्वस्थता सम्पन्न करने वाली सामर्थ्य उभर सकती है।
इस समय इस ज्ञानप्रसाद लेख को पढ़ रहे पाठक अवश्य ही गर्व अनुभव कर रहे होंगें कि वोह भी तो परमार्थ हित में समयदान कर रहे हैं
पैट्रिक की घटना एक उदाहरण है, जिसके आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि “रोग निरोधक शक्ति” जितनी औषधियों में, शल्य क्रियाओं और चिकित्सकों के कौशल में समाहित है, उससे अनेक गुना सामर्थ्य व्यक्ति के अपने “मनोबल” में सन्निहित है, बशर्ते कि उसे उभारा जा सके।
इन पंक्तियों को लिखते समय जिज्ञासा उठी कि देखा जाए कि मनोबल और आत्मबल में क्या अंतर है।
आइए पहले इस अंतर् का ही निपटारा कर ही लें :
मनोबल जिसे इंग्लिश में Morale कहते हैं बाहरी परिस्थितियों से सम्बंधित है। यह बाहरी उत्साह और सहयोग पर निर्भर करता है, जबकि आत्मबल (Inner strength, Self-power) पूरी तरह आंतरिक, आत्मा की शक्ति और दृढ़ संकल्प पर आधारित होता है। मनोबल के लिए “ज़ोर लगाके हईशा” वाला उदाहरण दिया जा सकता है। किसी कठिन कार्य को करने या लक्ष्य को पाने के लिए मन में परिवार, मित्रों, समाज या अनुकूल परिस्थितियों जैसे बाहरी कारणों से मिलने वाली सहायता इसी श्रेणी में आती है। आत्मबल,व्यक्ति की अपनी अंतरात्मा और संकल्पशक्ति की वह अचल शक्ति है जो विपरीत से विपरीत परिस्थिति में भी अडिग रहती है। इसका स्रोत पूरी तरह से आंतरिक होता है, जो साधना, आत्मज्ञान और नैतिक मूल्यों से उत्पन्न होता है। यह स्थायी और अटूट होता है; बाहरी हालात चाहे कितने भी खराब क्यों न हों, आत्मबल कभी कम नहीं होता। आत्मबल का आधार शुद्ध, सकारात्मक और उच्च आदर्श ही हैं।
प्रसुप्त शक्तियों को जाग्रत करने की कथाओं से हमारा इतिहास भरा पड़ा है। हनुमान, सुग्रीव के एक साधारण कर्मचारी थे। उनके सामने सीता की वापसी वाले सन्दर्भ में समुद्र पार करने का प्रश्न आया। वे अपनी सीमित शक्ति को देखते हुए वैसा कर सकने में अपने को असमर्थ पा रहे थे लेकिन जब जामवन्त ने उन्हें प्रोत्साहित किया और “प्रसुप्त शक्तियों” के जाग्रत होने पर कुछ भी कर सकने का स्मरण दिलाया, तभी वे असम्भव को सम्भव कर दिखाने के लिए तत्पर हो गए।
चाणक्य एक साधारण ब्राह्मण मात्र था लेकिन उसने अपमान के प्रतिशोध में नन्द वंश की ईंट-से-ईंट बजा दी। एक मोर्चा पूरा हुआ तो भी वह चैन से न बैठा और निश्चय किया कि भारत पर आए दिन होते रहने वाले आक्रमण को वहाँ से उखाड़ फेंकना है, जहाँ उनकी जड़ें बार-बार हरी होतीं और अपने चमत्कार दिखाती हैं। उसने अपनी दिव्यदृष्टि से चन्द्रगुप्त को चुना और इस बात के लिए तैयार किया कि वह निरन्तर युद्धरत रहकर आक्रान्ताओं के आतंकवाद को जड़ मूल से उखाड़ फेंके। चन्द्रगुप्त अचकचा रहा था और इस प्रयास में आने वाली असंख्य कठिनाइयों को विस्तारपूर्वक सुना और गिना रहा था। सुनने के बाद चाणक्य ने व्यंग्योक्ति कसते हुए भवें तानकर कहा, ‘‘तुम दासी पुत्र हो, अपनी सहज भीरुता और जड़ता की अभिव्यक्ति कर रहे हो। तुम्हें समझना चाहिए कि मैं चाणक्य हूँ। चाणक्य जो सोचता है, वह क्रियान्वित भी होता है और इतना ही नहीं, वह फलित होकर भी रहता है, तुम बकवास मत करो। जो कहा जा रहा है, उसे निमित्त बन कर करो और गाँठ बाँध लो कि चाणक्य निरर्थक योजनाएँ नहीं बनाता। ’’ चन्द्रगुप्त नतमस्तक हो गया। उसने अक्षरश: अनुशासन पाला और वह कर दिखाया, जिसे पूर्ववर्ती असम्भव मानकर चुप बैठे रहते और मन-ही-मन कुड़कुड़ाते रहते थे।
भारत का हिन्द केसरी उपाधि वाला चन्दगीराम अध्यापक की नौकरी करने के दिनों तक तपेदिक का मरीज था और उसकी छूत न लग जाने के भय से हर कोई दूर रहता था लेकिन जब उसने साहसपूर्वक अपना मानसिक कायाकल्प कर डाला, आदतों को पूरी तरह उलट दिया तो “प्रकृति देवी” ने उस पर अजस्र वरदान बरसाया और हिन्दुस्तान का जाना-माना पहलवान बना दिया।
आशा करते हैं कि इन प्रेरणादायक समापन पंक्तियों ने पाठकों के अंतःकरण की प्राणाग्नि को अवश्य जागृत किया होगा।
जय गुरुदेव
