वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

क्या  मानव शरीर सच में एक Vehicle है ?

“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की चौथी पुस्तक,“युग की मांग-प्रतिभा परिष्कार भाग 2 ” के  प्रथम ज्ञानप्रसाद लेख का अमृतपान करने के लिए सभी गुरुशिष्यों का अभिवादन है। 

गुरुदेव बता रहे हैं: 

गाड़ी  का ढाँचा लोहे का बना होता है। उसके पहियों में रबड़, सीटों पर रेक्सीन, खिड़कियों में काँच आदि लगे होते हैं लेकिन गाड़ी का दौड़ना,मुड़ना,रिवर्स करना आदि उस अग्नि पर, इलेक्ट्रिकल एनर्जी पर निर्भर करता है जो पेट्रोल के जलने से बनती है। वैज्ञानिक लोग  जलने की इस प्रक्रिया को Combustion कहते हैं। Technicalities को यहीं छोड़ते हुए इतना ही कहकर आगे बढ़ना उचित होगा कि यदि भोजन मानवी शरीर का Fuel है तो पेट्रोल गाड़ी का Fuel है, सभी जानते हैं।

पेट्रोल के Combustion के लिए, स्पार्क पैदा करना होता है,उसके लिए स्पार्क प्लग  की जरूरत होती, स्पार्क पैदा करने के लिए बैटरी की जरूरत होती है। इन  तीनों में से किसी एक में भी प्रॉब्लम आ जाए तो समझना लेना चाहिए कि गाड़ी की ड्राइविंग संभव नहीं है। 

मानवी शरीर की संरचना भी मोटर जैसी ही है। देखने में वह हाड़-माँस, रक्त, त्वचा आदि का बना दिखता  है लेकिन  उसकी सभी बाहरी और भीतरी हलचलें “प्राण विद्युत, प्राण ऊर्जा, Life electricity, Life energy पर निर्भर रहती हैं।

2025 में इसी मंच से  “प्राणाग्नि” विषय पर एक विस्तृत लेख श्रृंखला प्रकाशित हुई थी जिसका आधार परम पूज्य गुरुदेव की 43 पन्नों की रचना “प्राणाग्नि के जखीरे” था। 

इंसानी शरीर को एक वाहन के तौर पर देखा भी जाता है,तभी तो इसे Vehicle of life भी कहा गया है जो जीवन की यात्रा में चेतना, आत्मा या रूह को आगे ले जाता है। शरीर को एक वाहन मानने के लिए इसे ड्राइवर और गाड़ी की दृष्टि से भी देखा जा सकता है।  कई आध्यात्मिक और दार्शनिक परंपराओं में मानव शरीर की तुलना एक गाड़ी  या रथ से की जाती है। इस नज़रिए से, भौतिक शरीर एक मशीन की तरह है और आत्मा या आंतरिक स्वरूप उस ड्राइवर की तरह है जो उचित रास्ते पर गाड़ी चलाता है। शरीर एक ऐसे साधन के तौर पर काम करता है जिससे मानव  भावनाएँ महसूस कर सकता है। अगर हम अपने  शरीर को एक टेम्पररी निवास मान लें तो शायद अनेकों समस्याओं का निवारण हो सकता है। जिस प्रकार गाड़ी की मेंटेनेंस ज़रूरी है ठीक उसी तरह शरीररूपी वाहन की भी निरंतर एवं नियमित सर्विसिंग ज़रूरी है। बाहरी सर्विसिंग में नहाना-धोना,सफाई रखना, स्वास्थ्य का ध्यान रखना आदि आते हैं। इसकी देखभाल तो अधिकतर लोग करते ही हैं लेकिन आंतरिक देखभाल करना बाहरी देखभाल से भी  अधिक महत्वपूर्ण है। आत्मिक सर्विसिंग से ही तो व्यक्तित्व और प्रतिभा का परिष्कार होता है। मनुष्य के अंदर व्याप्त अथाह प्राणशक्ति ही प्रतिभा का रिफ्लेक्शन है। 

प्राण के निकलते ही अच्छा-खासा, मोटा-तगड़ा शरीर भी देखते-देखते निर्जीव हो जाता है। धड़कन बन्द हो जाने पर मृत्यु हो जाती है और कुछ समय पहले तक जो शरीर प्रबल पुरुषार्थ दिखा रहा था, उसे जलाने या दबाने की आवश्यकता जल्दी  की जाने लगती है। शरीर की अन्त्येष्टि न की जाए तो थोड़े ही समय में वह अपनेआप ही सड़ने और नष्ट होने का प्रोसेस शुरू कर देता  है। Decomposition तो एक केमिकल प्रोसेस है यदि हम Preserve नहीं करते,उसे तो घटना ही है 

गिद्ध,चील जैसे पक्षी जो जीवित व्यक्ति से सर्वथा दूर रहते थे, वे सड़ते हुए शरीर की गन्ध पाते ही दूर-दूर से दौड़ पड़ते हैं और लाश को तेजी से उदरस्थ कर जाते हैं।

देखने में तो शरीर में दिखने वाले  हाथ,पैर.कान,आँखें  आदि काम करते दिखाई पड़ते हैं लेकिन सही अर्थों में जीवन एक “आन्तरिक ऊर्जा Internal energy” जो अदृश्य है,उस पर निर्भर रहता है। मानव शरीर में व्याप्त इस अदृश्य ऊर्जा को जीवनी शक्ति, चेतना, प्राण इलेक्ट्रिसिटी  आदि नामों से जाना जाता  है। यही एनर्जी मानव जीवन की संचालिका और विभिन्न हलचलों की अधिष्ठात्री है। स्वास्थ्य सन्तुलन और पुरुषार्थ पराक्रम इसी पर निर्भर रहते हैं। वह बढ़ी-चढ़ी हो तो व्यक्ति एक-से-एक बढ़कर पराक्रम दिखा पाता है लेकिन  यदि उसमें दुर्बलता, न्यूनता अथवा विकृति बढ़ने लगे तो शारीरिक ही नहीं, मानसिक रोग भी व्यक्ति को देखते ही देखते धर दबोचते हैं।

चिकित्सक, रोग निवारण या दुर्बलता शमन के लिए अपने-अपने ढंग से निदान और उपचार करते हैं। वैद्य वात, पित्त, कफ को असन्तुलन का कारण बताते हैं। हकीम उसको आदी, बादी, खादी प्रकृति के नाम से पुकारते हैं। होम्योपैथी में विष-से-विष का निवारण करते हैं। बायोकेमिस्ट्री वाले तरह-तरह के टेस्ट कराने पर विश्वास करते हैं। अमुक लवणों की कमी को प्रधान कारण मानते हैं। क्रोमोपैथी में रंगों का असन्तुलन मूल कारण है। एलोपैथी वाले विषाणुओं का आक्रमण बताते हैं। 

इलाज सभी करते हैं लेकिन  कुछ दिन चमत्कार दिखाने के उपरान्त सभी उपचार निरर्थक हो जाते हैं। मरीज एक से दूसरे चिकित्सक का दरवाजा खटखटाते-खटखटाते  मौत के दिन पूरे करता है। Researcher एक स्वर से बताते हैं कि रोगों की किस्में, नये रोगियों की संख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है कि चिकित्सा क्षेत्र के अधिष्ठाता हतप्रभ हैं और अपनी पराजय को स्वीकार करने की अपेक्षा सशक्त विषाणुओं के तूफानी आक्रमण, मौसम परिवर्तन, रोगी के असंयम आदि के ऊपर दोष मढ़कर अपनी असफलता पर पर्दा  डालने की प्रवंचना रचते रहते हैं। लेकिन “सच्चाई अपनी जगह पर अड़ी रहकर पूछती है कि जब मेडिकल साइंस इतनी विकसित हो चुकी है, तरह-तरह की तकनीकी  प्रगति ने क्या कुछ नहीं उपलब्ध,तो सर्वसाधारण को “आरोग्य रक्षा का आश्वासन” क्यों नहीं मिलता?

परम पूज्य गुरुदेव इस असमंजस के निवारण के लिए तनिक गहराई में उतरने की निम्नलिखित सलाह देते हैं:

खोजों का अन्तिम निष्कर्ष आज या कल एक ही निकलने वाला है कि मनुष्य की जीवनी शक्ति बेतरह घट रही है एवं यह घटी हुई स्थिति ही तरह-तरह की  व्याधियों को आमंत्रित कर रही है। इसी घटी  हुई स्थिति को डॉक्टर लोग Low Immunity कहते हैं। 

यह स्थिति सच में बहुत ही दयनीय है। रोगी को अपराधी न कहा जाए, तो कम-से-कम अभागा तो कहा ही जाएगा। 

इन पंक्तियों का लेखक तो मनुष्य को ही अपराधी कहेगा, उसी ने तो अपराध किया है। उसी ने तो जीवन के वास्तविक लाभ को नकारा है,अपनेआप को भगवान से भी ऊपर माना है, भगवान ने उसे संसार में, एक किराये के घर में रहने के लिए भेजा था, उसने किराया तो दिया नहीं ऊपर से मालिक ही बन बैठा। प्रगतिशीलता किस चिड़िया का नाम है उसका तो कभी चिंतन ही नहीं किया। बाहरी ठाठ-बाठ, पद-प्रतिष्ठा को ही प्रगति मनाता रहा। 

गुरुदेव कहते हैं कि मनुष्य की “भीतरी जीवनी शक्ति की दुर्बलता” को रुग्णता का प्रमुख कारण ठहराया जाए तो अनुचित नहीं होगा। आरोग्य की दृष्टि से लोग दिन-ब-दिन दुर्बल बनते जाते हैं। अस्वस्थता आज की सबसे बड़ी समस्या है। उसके कारण पुरुषार्थ, प्रगति करने के सत्परिणाम उपलब्ध कर सकना कठिन पड़ता है। जो स्वयं दूसरों की सहायता चाहता है,वह प्रगति कैसे करेगा, प्रतिभाशाली कैसे बनेगा। 

यह सत्य कोई समझे या न समझे, पर जीवट की कमी एक ऐसी विडम्बना है, कि जिसके कारण मनुष्य जीवित रहते हुए भी, एक प्रकार से पूर्ण मृतक नहीं तो अर्द्ध मृतक जैसा तो निश्चित रूप से बनकर ही रहता है। शरीर देखने में सही होते हुए भी निर्जीव-निस्तेज; मस्तिष्क शिक्षित होते हुए भी कठिनाइयों से उबर पाने में असमर्थ और प्रगति की इच्छा-चेष्टा करते हुए भी असफल रहता है। 

इसके पीछे एक ही व्यवधान काम करता है कि उस ऊर्जा का अनुपात एवं स्तर घटा हुआ रहता है, जो प्रसन्नता, प्रफुल्लता, समर्थता और सफलता की जन्मदात्री है। शरीर की कमजोरी, बीमारी, निराशा, उद्विग्नता के प्रत्यक्ष कारण जो भी हों लेकिन  वास्तविकता यह है कि जीवट घट जाने की ही यह समस्त परिणतियाँ हैं। जब तक मूल कारण को समझा और उसका निराकरण न किया जाएगा, तब तक शरीर क्षेत्र की दुर्बलता से लेकर मानसिक खिन्नता, विपन्नता तक से छुटकारा पा सकना सम्भव न हो सकेगा। थोड़ी देर के लिए उन्हें झुठलाकर मन बहला लिया जाए तो यह दूसरी बात है।

मनुष्य जीवन केवल शरीर और मन तक ही सीमित नहीं है, उसमें पग-पग पर अवरोधों से जूझना भी पड़ता है और अपने ढंग से अपनी प्रगति के लिए रास्ता खुद ही बनाना पड़ता है। इसके लिए अभीष्ट शक्ति-सामर्थ्य न हो तो कुछ करते-धरते बन ही नहीं पड़ता। किंकर्तव्यविमूढ़-हतप्रभ की तरह ज्यों-का-त्यों खड़ा रह जाना पड़ता है। साँस तो लुहार की धौंकनी भी लेती रहती है। अनाज खाने और आटा नीचे निकाल देने का ढर्रा तो चक्की भी घुमाती है। कोल्हू का बैल भी किसी प्रकार पिलने और पेलने में लगा रहता है। भूत-पलीत मरघट में रहकर, एकाकी डरने-डराने का जाल-जंजाल बुनते रहते हैं लेकिन  यह सब “मनुष्य जैसे असाधारण शक्ति-सम्पन्न सृष्टि का मुकुटमणि” कहलाने वालों को शोभा नहीं देता। उसे कुछ ऐसा करना चाहिए जिसके साथ उठने और उठाने की, बढ़ने और बढ़ाने की प्रक्रिया जुड़ी हुई हो, जिसे अनुकरणीय और अभिनन्दनीय होने का सुयोग, सौभाग्य और सम्मान मिल सके लेकिन  ऐसी प्रगतिशीलता किसी भी क्षेत्र में तभी मिल सकती है, जब “आन्तरिक ऊर्जा” साथ दे, ज़िंदादिली  की परिणति ओजस्, तेजस और वर्चस् तीनों में हो और उनके विकसित होने की व्यवस्था बन पड़े।

शरीर, मस्तिष्क और अन्त:करण,मानवीय सत्ता के तीन पक्ष हैं। इन्हीं को स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर कहते हैं। इनमें काम करने वाले जीवट को ही प्राणाग्नि,बायो इलेक्ट्रीसिटी, जीवनी शक्ति, विद्युत् चेतना आदि नामों से जाना जाता है। उनका सामान्य सन्तुलन आरोग्य के नाम से जाना जाता है। इसे सही स्थिति में रखे रखना ही स्वास्थ्य रक्षा, समर्थता, बलिष्ठता आदि नामों से जाना जाता है। आन्तरिक स्तर पर उसका सुनियोजन ही प्रतिभा के रूप में प्रकट होता है। इसे गिरा देना, सँभाले रखना या प्रखर बनाना, पूर्णतया मनुष्य के अपने हाथ में है। यह प्रक्रिया किसी बाहरी सहायता पर निर्भर नहीं होती। भाग्य, आनुवांशिकी, शाप या वरदान इसमें हस्तक्षेप नहीं कर पाते। पिछला कर्म आज के भाग्य के रूप में सुख-दु:ख भर दे सकता है। 

आरोग्य का उद्गम यही है। नस-नाड़ियों, माँसपेशियों, जीव कोषों में इसी का प्रभाव काम करता देखा जाता है। रोग निरोधक शक्ति यही है। इसी को टॉनिक के समतुल्य बलवर्धक स्थिति में देखा जाता है। मस्तिष्क में बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, क्षमता इसी के चमत्कार हैं। वरिष्ठों, साहसियों, वैज्ञानिकों, कलाकारों एवं विशिष्टजनों में इसी शक्ति को काम करते देखा जा सकता है। अन्त:करण में भाव-सम्वेदनाओं के रूप में भी इसी को देखा जाता है। करुणा, सहिष्णुता और आदर्शवादी सराहनीय कृत्यों में इसी की गरिमा का परिचय मिलता है। 

यदि शरीर में इन तीनों की  मात्रा कम  हो, तो समझना चाहिए कि व्यक्ति आए दिन बीमार पड़ेगा, अशक्तता से घिरा हुआ अनुभव करता और कराहता रहेगा। मस्तिष्क में इसका अनुपात कम हो तो उसे अस्त-व्यस्त, अनगढ़, असभ्य, अर्द्ध-विक्षिप्त हलके स्तर का समझा जाएगा। औंधे-सीधे स्वभाव के कारण वह गलतियों, गलतफहमियों का शिकार रहेगा। ऐसा कुछ करते-कहते देखा जाएगा, जो सभ्यजनों को शोभा नहीं देता। अन्त:करण की दृष्टि से हेय स्तर वाले निष्ठुर, निर्मम, नीरस, स्वार्थी और पतित स्तर के आचरण करते और उपहास,अपमान सहते दिखाई देते हैं। जिनमें यह प्राण सम्पदा जितनी कम है, उन्हें उसी अनुपात में दीन-हीन, पिछड़ा, दरिद्री एवं अभावग्रस्त माना जाता है।

इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि मनुष्य केवल  प्रत्यक्ष कलेवर को ही देखता है, उसके पीछे काम करने वाली अदृश्य सामर्थ्य का न तो मूल्यांकन कर पाता है  और न महत्त्व समझता है।  माँसपेशियों की पुष्टाई देखी जाती है लेकिन यह भुला दिया जाता है कि जीवनी-शक्ति के बिना कुछ भी संभव नहीं है।  बिजली ही अनेक उपकरणों को चलाती और जलाती है। बिजली की धारा न बह रही हो तो बल्ब, पंखे, हीटर, कूलर आदि कितने ही सुन्दर या महँगे क्यों न हों, वे अपना काम ठीक प्रकार से नहीं कर सकते।

जय गुरुदेव 


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