“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” 23 पुस्तकों का एक ऐसा अद्भुत साहित्य है जिसे पूज्यवर ने स्वयं अपने जीवन भर के “साहित्य का मक्खन” कहा है। उन्होंने कहा है कि मेरे द्वारा रचित विशाल साहित्य न भी पढ़ो तो कोई बात नहीं है लेकिन इस मक्खन को कभी भी मिस न करना।
गुरुदेव के निर्देश एवं हमारी बेटी संजना के सुझाव का पालन करते हुए क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला की तीसरी पुस्तक “युग की मांग-प्रतिभा परिष्कार भाग 1” का समापन ज्ञानप्रसाद लेख प्रस्तुत है। कल से चौथी पुस्तक का शुभारम्भ करने की योजना है।
प्रस्तुत ज्ञानप्रसाद लेख में शालीनता को प्रतिभा के साथ जोड़कर समझने का प्रयास किया गया है। कबीर जी का प्रसिद्ध दोहा “बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥” शालीनता के भाव को ही तो चरितार्थ कर रहा है। फलदार वृक्ष की डालियाँ स्वतः ही झुक जाती हैं।
26 अगस्त 2026 की दिव्य गुरुकक्षा में सभी समर्पित गुरुशिष्यों का अभिवादन है, आइए गुरुकुल की आज की गुरुकक्षा में प्रवाहित हो रही अमृत ज्ञानगंगा में डुबकी मारकर कौए से हंस बनने का प्रयास करें।
*******************
गुरुदेव बता रहे हैं कि जिस प्रकार प्रकृति परम्परा का अनुसार शीत ऋतु में मक्खी-मच्छरों का अन्त हो जाता है,आने वाले दिनों में समाज में व्याप्त प्रचलित दुष्प्रवृत्तियों में से अधिकांश अपनी मौत ही मर जायेंगीं। अन्धविश्वास, मूढमान्यताएँ, रूढ़ियाँ, अन्धविश्वास आदि सभी भोर होते ही उल्लू-चमगादड़ों की तरह अपने-अपने घोंसलों में जा घुसेंगें । पदार्थ के पीछे भागने वाले, संग्रही एवं बढ़-चढ़ कर खर्चा करके पड़ोसिओं,रिश्तेदारों के आगे अपनी वाहवाही कमाने वाले, शीशे में अपनी शक्ल देख कर स्वयं ही खुश होते रहने वालों का,आने वाले दिनों में कोई आधार नहीं रहेगा। संग्रही, आलसी और लालची जैसों को कोई भाग्यवान न कहेगा और न ही समझेगा।
आने वाले समय में एक और भी बड़ी बात यह होगी कि चिरकाल से उपेक्षित नारी वर्ग न केवल अपनी गरिमा को उपलब्ध करेगा बल्कि उसे नेतृत्व करने का गौरव भी प्राप्त होगा। इतना ही नहीं 21वीं सदी की नारी पुरुषों को मार्गदर्शन भी प्रदान करेगी। इन पंक्तियों को पढ़ रहे पाठक स्वयं ही देख सकते हैं कि मात्र आरंभिक 26 वर्षों में ही नारी शक्ति कहाँ से कहाँ पंहुच गयी है। गुरुदेव का उद्घोष “जाग गयी भाई जाग गयी,नारी शक्ति जाग गयी” लेख के संदर्भ में कितना सार्थक दिख रहा है, पाठक स्वयं ही अनुभव कर रहे होंगें। हमारे “ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार” में भी बहिनें भाईओं से कहाँ कम हैं ?
36 वर्ष पूर्व परम पूज्य गुरुदेव द्वारा लिखे शब्दों को पढ़ते हुए हम कैसे न कहें कि वोह सच में युगदृष्टा थे/हैं ?
21वीं सदी में पिछड़े हुए ग्राम उभरेंगे और ऐसी सभी सुविधाओं से सम्पन्न होंगे, जिनके लिए ग्रामवासिओं को शहरों की ओर भागना पड़ता है। समता और एकता के मार्ग में अड़े हुए अवरोध एक-एक करके स्वयं हटेंगे जायेंगें एवं औचित्य के विकसित होने का मार्ग साफ करते जाएँगे। वैभव को पीछे छोड़ते हुए और उस वर्चस्व को सम्मान मिलेगा जो आदर्शों के लिए उत्सर्ग करने का साहस सँजोता है। पिछले दिनों पाखण्ड का अंधकार कितना ही गहरा क्यों न रहा हो, आने वाले दिनों में लम्बे समय तक उसके पैर जमाए रहने की कोई सम्भावना नहीं है।
गुरुदेव द्वारा बताई जा रही इन सभी बातों पर विश्वास करते हुए जो व्यक्ति नवीन परिस्थितियों के अनुरूप अपनी गतिविधियों में परिवर्तन करेंगे,अपनी प्रतिभा के परिष्कार का साहस करेंगें, स्वयं को अपडेट और अपग्रेड करते रहेंगें, वे हर दृष्टि से फायदे में ही रहेंगे। आज का दृष्टिकोण जिसे घाटा बताता है, उपहासास्पद बताता है आने वाले दिनों में वैसी स्थिति न रहेगी। लोग वास्तविकता को अनुभव करेंगे और समय रहते अपनी भ्रान्तियों और भ्रमों को बदल लेंगे।
आने वाला समय ऐसा होगा जिसमें जीवन्त और जाग्रत लोगों को युगचेतना अनुप्राणित किए बिना रह नहीं सकती। लोग कोल्हू के बैल जैसा ढर्रे का जीवन जीते रहने से ऊब जाएंगें और उनकी चेतना अन्तराल में ऐसी हलचलों का समुद्र मन्थन उठ खड़ा होगा जो उनसे कुछ ऐसा करवा लेगा जो समय को बदलने के लिए अभीष्ट एवं आवश्यक होता है। साँप नियत समय पर त्वचा (केंचुली) बदलता है। अब ठीक यही समय है कि प्राणवान, प्रज्ञावान अपनी केंचुल बदल डालें। अपनी समग्र क्षमता सँजोकर दृष्टिकोण में ऐसा परिवर्तन करें, जिससे भावी क्रियाकलापों में ऐसे तत्त्वों का समावेश हो, जिन्हें अनुकरणीय,अभिनन्दनीय माना जा सके। अन्तराल में उत्कृष्ट उमंगें और क्रियाकलापों का,आदतों का,नये सिरे से ऐसा निर्धारण करें, जो युगशिल्पियों के लिए प्रेरणाप्रद बन सके। आदर्शों को महत्त्व दें। यह न सोचें कि तथाकथित सगे सम्बन्धी, दोस्त, पडोसी आदि क्या परामर्श देते हैं। प्रह्लाद, विभीषण, भरत, मीरा आदि को कुटुम्बियों का नहीं, आदर्शों का अनुशासन अपनाना पड़ा था।
“उच्चस्तरीय साहस के प्रकटीकरण का यही केन्द्र बिन्दु है कि जीवन को श्रेय साधना से ओतप्रोत करके दिखाया जाए।”
यह प्रयोजन संयम और अनुशासन अपनाए जाने की आशा करता है। प्रचलन तो ढलान की ओर लुढ़कने का है। पानी नीचे की ओर बहता है, ऊपर से नीचे गिरता है। पानी को टंकी में ऊपर चढ़ाने के लिए मोटर की (शक्ति/पावर की) ज़रुरत पड़ती है। उत्कृष्टता की ऊँचाई तक उछलने के लिए भी शूरवीरों को शक्तिशाली होकर साहस दिखाना पड़ता है। इस अभिनय को अभी टाल दिया गया तो सम्भव है कि ऐसा अवसर फिर जीवन में आए ही नहीं। टंकी में पानी जमा न हुआ तो संभव है घर वाले दिनचर्या के अनेकों कार्य न कर पाएं।
बादल जब घटाटोप बनकर उमड़ते-गरजते हैं तो किसानों के मन आशा-उत्साह से भरकर उछलने लगते हैं। इन्द्र वज्र सौ-सौ बार झुककर उनकी सलामी देता है। अँधेरा आकाश प्रकाश से भर जाता है और मोर नाचते एवं पपीहे कूकते हैं। हरीतिमा उनकी प्रतीक्षा में मखमली चादर ओढ़े मुस्कराती पड़ी रहती है। यह मनुहार मेघों की ही क्यों होती है? खोजने पर पता चलता है कि वे संचित जलराशि समेट, अपनेआप को अति विनम्र बनाकर उसे धरती पर बिखेर देते हैं। इस लेख में ऐसी ही विनम्रता, शालीनता की आशा की जा रही है।
पिछले लेखों में पाठकों ने प्रतिभा परिवर्धन के अनेकों उपाय देखे। इन उपायों को आतंकवादी-अनाचारी जैसे लोग भी अपनाते रहे ताकि प्रेत पिशाचों की तरह अनेकों को भयभीत कर देते लेकिन स्थिरता और सराहना उन्हीं प्रतिभावानों के साथ जुड़ी रहती है, जो शालीनता अपनाते हैं और आदर्शों के प्रति अपने वैभव को उत्सर्ग करने में चूकते नहीं। ऐसे लोग शबरी, गिलहरी, केवट स्तर के ही क्यों न हों, अपने को अजर-अमर बना लेते हैं और अनुकरण करने के लिए अनेकों को आकर्षित करते हैं। उनकी मैगनेटिक विलक्षणता न जाने क्या-क्या, कहाँ-कहाँ से बटोर लाती है और बीज को वटवृक्ष बनाकर खड़ा कर देती है।
प्रतिभा परिष्कार का अजस्र लाभ उठाने के लिए इन दिनों स्वर्ण सुयोग आया है। युगसन्धि की वेला में,जीवंत प्राणवानों की आवश्यकता अनुभव की गई है। अवांछनीयताओं से ऐसे ही पराक्रमी जूझते हैं और हनुमान, अंगद जैसे अनगढ़ होते हुए भी लंका को धराशायी बनाने के एवं रामराज्य का सतयुगी वातावरण बनाने के दोनों मोरचों पर अपनी समर्थ क्षमता का परिचय देते हैं। ऐसी परीक्षा की घड़ियाँ बार-बार नहीं आती। जो समय को पहचानते और बिना अवसर चूके अपने साहस का परिचय देते हैं, उन्हें “प्रतिभा का धनी” बनने में किसी अतिरिक्त अनुष्ठान करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। संयम और साहस का मिलन ही वरिष्ठता तक पहुँचा देता है। पुण्य और परमार्थ का यही एकमात्र राजमार्ग है जिसे अपनाने पर हर किसी को वरिष्ठता का लक्ष्य मिल सकता है। आत्मसाधना और लोकसाधना दोनों एक ही लक्ष्य के दो पहलू हैं। जब एक को सही रीति से अपनाया जाएगा तो दूसरा स्वयं ही उसके साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ जाएगा।
लक्ष्य और उपक्रम निर्धारित कर लेने के उपरान्त यह निर्णय करना अति सरल पड़ता है कि कौन अपनी मन:स्थिति और परिस्थिति के अनुसार, सम्पर्क सर्किल की आवश्यकताओं को देखते हुए, किन क्रियाकलापों में हाथ डाले और प्रगति का एक-एक चरण उठाते हुए, अन्तत: बड़े-से-बड़े स्तर का क्या कुछ कर गुजरे। यहाँ यह ध्यान रखने योग्य है कि व्यक्ति अपने “प्रभामण्डल सम्पन्न क्षेत्र (अपने परिवार)” के साथ जुड़कर ही पूर्ण बनता है। अकेला चना तो कभी भी भाड़ फोड़ सकने में समर्थ नहीं होता। अपने जैसे विचारों वाले (Like minded) अनेक घनिष्ठों को साथ लेकर और सहयोगपूर्वक बड़े कदम उठाना ही वह रीति-नीति है, जिसके सहारे अपनी और साथियों की प्रतिभा को साथ-साथ चार चाँद लगते हैं।
उपरोक्त पंक्तियाँ ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के एक-एक सदस्य पर पूरी तरह से दिखाई दे रही हैं जिसके लिए वोह बधाई के पात्र हैं /
सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय परब्रह्म, परमात्मा प्रतिभाओं का पुँज है। उसके साथ सम्बन्ध जोड़ने पर संकीर्ण स्वार्थपरता में तो कटौती करनी पड़ती है लेकिन साथ ही यह भी सत्य है कि अग्नि के साथ सम्बन्ध जोड़ने वाला ईंधन का ढेर, ज्योतिर्मय ज्वाल माल की तरह दमकने लगता है। उत्कृष्टता के साथ जुड़ने वालों में से किसी को भी यह नहीं कहना पड़ता कि उसे प्रतिभा परिकर के भाण्डागार में से किसी प्रकार की कुछ कम उपलब्धि हस्तगत हुई।
दिशा निर्धारित कर लेने पर मार्गदर्शक तो पग-पग पर मिल जाते हैं। कोई न भी मिले तो अपनी ही अन्तरात्मा उस आवश्यकता की पूर्ति कर देती हो। प्रतिभा का धनी न कभी हारता है और न अभावग्रस्त रहने की शिकायत करता है। उसे किसी पर दोषारोपण करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती कि उसे अमुक ने सहयोग नहीं दिया, मुझे साधन नहीं मिले, सगे सम्बन्धिओं ने रोड़े अटकाए। यह कोरी बहानेबाज़ी है क्योंकि शालीनता और प्रगतिशीलता ही तो प्रतिभा की आधारशिला है।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मानवीय मूल्यों एवं उपरोक्त शिक्षा से आज के लेख का समापन होता है।
जय गुरुदेव
