आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शीर्षक बहुत ही आकर्षक है और उससे भी आकर्षक इसका कंटेंट है जहाँ हम आधुनिक रिसर्च के उदाहरणों से देखेंगें कि 21वीं सदी, जिसके 26वें वर्ष में से हम इस समय गुज़र रहे हैं, प्रतिभावानों की क्रीड़ास्थली कैसे है।
लेख का शुभारम्भ करने से पहले पाठकों को बताना अपना कर्तव्य समझते हैं कि परम वंदनीय माता जी के अवतरण के 100 वर्ष, अखंड दीप के प्राकट्य के 100 वर्ष एवं परम पूज्य गुरुदेव की साधना के 100 वर्ष को समर्पित वर्तमान लेख श्रृंखला, 36 वर्ष पूर्व (1988–90) गुरुदेव द्वारा रचित “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” पर आधारित है। 23 पुस्तिकाओं की इस पुस्तकमाला की तीसरी पुस्तक “युग की मांग-प्रतिभा परिष्कार भाग 1” के अंतिम लेख में गुरुदेव ने उस समय, वर्षों पहले 21वीं सदी को प्रतिभावानों की क्रीड़ास्थली लिख दिया था।
25 अगस्त 2026 की दिव्य गुरुकक्षा में सभी समर्पित गुरुशिष्यों का अभिवादन है, आइए गुरुकुल की आज की गुरुकक्षा में प्रवाहित हो रही अमृत ज्ञानगंगा में डुबकी मारकर कौए से हंस बनने का प्रयास करें।
*****************
गुरुदेव बता रहे हैं कि
प्रतिभा किसी पर भी आकाश से नहीं टपकती। उसे पुरुषार्थ एवं मनोबल के सहारे स्वयं ही अर्जित करना पड़ता है। अब तक के प्रतिभाशालियों के प्रगतिक्रम पर दृष्टिपात करने से एक ही प्रेरणादायक निष्कर्ष निकलता है जिसे निम्नलिखित शब्दों में अंकित किया जा सकता है :
“अपनाए गये काम में उल्लास भरी उमंगें उमड़ती रहीं, मानसिक एकाग्रता के साथ तन्मयता जुटाई गई, पुरुषार्थ को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर अवरोधों से जूझा गया तथा प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलकर अपनी प्रखरता का परिचय दिया गया।”
संसार के मनीषिओं ने अपने अनुभवों को शेयर करते हुए लिखा है कि सफलताएँ इसी आधार पर मिलती हैं। सफलता मिलने पर हौसले बुलन्द होते हैं, दुगने उत्साह से काम करने की शक्ति प्राप्त होती है। हमारे पाठक इन पंक्तियों से पूरी तरह सहमत होंगें कि जिस किसी ने भी प्रतिभा-परिष्कार के लिए साधारण सी Step by step प्रक्रिया का ईमानदारी से (जी हाँ ईमानदारी से) पालन किया,उसे जो प्रसन्नता प्राप्त हुई,वही प्रसन्नता उसके लिए ऐसी उपलब्धि बन कर आयी जिसने उसकी प्रतिभा के विकास एवं परिष्कार में बहुत बड़ा सहयोग प्रदान किया। जब ऐसे Preliminary results प्राप्त होते हैं तो मनुष्य और अधिक शिद्द्त से कार्य करता है। हमारा तो यही विश्वास है एवं Rule of thumb भी है कि परिश्रम करने वालों की ही प्रतिभा परिपक्व बनती है, इसीलिए तो कहा जाता है “सोना आग में तपने के बाद ही कुंदन बनता है, यही कुंदन ईश्वर के मुकुट पर सुशोभित होने का सम्मान प्राप्त कर पाता है”
अनवरत प्रतिभा परिष्कार के बाद ही मानवी उत्कर्ष (Human excellence) की आशा की जा सकती है। गुरुदेव हम बच्चों को आश्वस्त कर रहे हैं कि 21वीं सदी “प्रतिभावानों की क्रीड़ास्थली” होगी, एक इंटरनेशनल प्लेग्राउंड होगा जहाँ खिलाड़िओं द्वारा कुछ ऐसा कर दिखाया जाएगा जो असम्भव नहीं तो कष्टसाध्य तो हो ही सकता है। हम सब, गुरुदेव के बच्चे कष्टों से डर कर कहाँ भागने वाले हैं, हमारे गुरु ने तो हमें बीज की भांति गल कर, अपना अस्तित्व खोकर, छायादार वृक्ष बनने की शिक्षा दी है, एक ऐसा वृक्ष जिससे अनेकों को मानसिक शांति मिले। ज्ञानप्रसाद लेख इसी छायादार वृक्ष का एक प्रारूप हैं।
लेखक की जिज्ञासु नेचर ने “प्रतिभावानों की क्रीड़ास्थली” को और अधिक जानने के लिए एवं तथ्यात्मक एनालिसिस के लिए कुछ रिसर्च करनी उचित समझी। इस रिसर्च से प्राप्त हुए रिजल्ट्स पर चर्चा करना शायद अनुचित न हो।
“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” नामक दिव्य रचना जिस पर वर्तमान लेख श्रृंखला आधारित है, में परम पूज्य गुरुदेव ने आज से 36 वर्ष पूर्व (1988-1990) वोह बातें बता दी थीं जो आज 2026 में जब यह पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं, हमारे सामने घट रही हैं, तभी तो उन्हें युग दृष्टा ((युग को देखने वाले) कहा गया है।
आज के मनुष्य को केवल अपने नेत्र खोल कर दृष्टि दौड़ाने की ज़रुरत है,स्वयं ही दिख जायेगा कि ज्ञान, तकनीकी प्रगति और असीमित अवसरों के कारण 21वीं सदी प्रतिभावानों की क्रीडस्थली है कि नहीं,इस तथ्य को राजनीति से ऊपर उठकर पूर्णतया Unbiased होकर देखने की आवश्यकता है।
आधुनिक युग की प्रगति में साफ़ दिख रहा है कि Technology and Digital revolution के कारण नए और स्मार्ट उपकरण रचनाकारों को आगे बढ़ने का वोह अवसर दे रहे हैं जो पहले उपलब्ध नहीं थे। इंटरनेट उपलब्ध होने के कारण, विश्व के सिकुड़न के कारण, हुनरमंद व्यक्ति विश्व के किसी भी भाग में, कहीं भी अपनी कला दिखा सकता है। आज के युग की सबसे बड़ी उपलब्धि डेटा की पावर (Data power) है। यही आज के युग की प्रगति की सबसे बड़ी चाबी है। डेटा की तो बाढ़ ही आयी हुई है, ठीक गलत का चयन तो मनुष्य ने ही करना है। उसी डेटा से एक व्यक्ति आतंकवादी बन सकता है तो उसी से चाँद तक छलांग भी लगा सकता है।
8 ऑस्कर प्राप्त करने वाली 2008 की मूवी Slumdog millionaire भला किसको भूली होगी। सुप्रसिद्ध सीरियल “कौन बनेगा करोड़पति” पर आधारित, ब्रिटिश निर्माता की इस फिल्म की प्रसिद्धि 21वीं सदी की प्रतिभा ही थी।
विश्व भर से ऐसे अनेकों उदाहरण दिए जा सकते हैं जो गुरुदेव के शब्दों पर मोहर लगते हैं कि “नया युग आ रहा है, युग परिवर्तन हो रहा है”, हमें Unbiased होकर अपनी ज़िम्मेदारी निभानी है। ज्ञानप्रसाद लेखों का उद्देश्य तभी पूर्ण होगा जब हम इन लेखों को गुरुवाणी की तरह पढेंगें, समझेंगे, अपने को बदलेंगें एवं औरों को प्रेरित करेंगें।
आज के युग ने अनेकों नई कठिन चुनौतियों को भी जन्म दिया है जिनके समाधान के लिए चतुर, शार्प दिमागों, प्रतिभाशालिओं की बहुत बड़ी मांग है। इस मांग को पूरा करने के लिए लीक से हटकर,नए आइडिया सोचने वाले प्रतिभाशाली व्यक्तिओं के लिए अनगनित रास्ते खुले हैं। विश्व के सिकुड़न के कारण, मिलकर काम करने के नए अवसर प्राप्त हुए हैं,और नई चीजें सीखने को मिलती हैं, Multi-tasking/ Multi-training ही आज के युग की सफलता तय करती है। आज के युग में Traditional opportunities/Traditional degrees का लगभग खात्मा ही हो चुका है। अनेकों शिक्षा संस्थानों ने Jobs के लिए, शिक्षा के लिए Pre requirement भी खतम ही कर दी है। आज का युग तो उन्हीं का है जो नई प्रतिभा से अपनेआप को ट्रेन कर सकते हैं। अवसर इतने असीमित हैं कि अब शिक्षा के लिए बड़े शहर जाना जरूरी नहीं रहा, घर बैठे सब काम मुमकिन है। Innovation के कारण नए प्रयोग करने वालों और स्टार्टअप को दुनिया भर में समर्थन मिल रहा है।
तो साथिओ, विश्व को “प्रतिभावानों की क्रीड़ास्थली” कहना कोई गलत बात नहीं है, इसीलिए हमारे गुरुदेव प्रतिभावानों को वर्ल्ड कप की भांति विश्व की इस क्रीड़ास्थली में अपने हुनर दिखाने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं, देखते हैं कौन गोल्ड मैडल लेकर आता है, अपने गुरु का नाम रोशन करता है।
हवा का रुख पीठ पीछे हो तो गति में अनायास ही तेजी आ जाती है। वर्षा के दिनों में बोया गया बीज सहज ही अंकुरित होता है और उस अंकुर को पौधे के रूप में लहलहाते देर नहीं लगती। वसन्त में मादाएँ (Females) गर्भधारण के कीर्तिमान बनाती हैं। किशोरावस्था में बीतते-बीतते जोड़ा बनाने की उमंग अनायास ही उभरने लगती है। वातावरण की अनुकूलता में, उस प्रकार के प्रयास गति पकड़ते हैं और प्राय: सफल भी होते हैं।
दिव्यदर्शी अन्त: स्फुरणा(Intuition) के आधार पर यह अनुभव करते हैं कि समय के परिवर्तन की ठीक यही वेला है। नवयुग के अरुणोदय में अब अधिक विलम्ब नहीं है। जनमानस वर्तमान अनुचितता से खीझ और ऊब उठा है जो उचित नहीं है उसे वोह गवारा नहीं है, उसे अब परिवर्तन चाहिए। मनुष्य की आकुलता और आतुरता इस स्तर की हो चुकी है कि उसका पिता (ईश्वर) अपनी संतान की ऐसी दशा कैसे सहन पाए। यही कारण है कि प्रकृति भी करवट बदल रही है, युग परिवर्तन की नई दिशा अपना रही है। विधाता एक ऐसी स्थिति बनाने में कार्यरत है जिस पर चलने से ही घुटन से मुक्ति मिल सकेगी और चैन की साँस लेने का अवसर मिल सकेगा। आए दिन पूरे विश्व में जिस प्रकार के परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं, नए समीकरण बन रहे हैं उससे यही दिख रहा है कि विश्व वातावरण ने भी अपना ऐसा निश्चय बनाया है कि “अनौचित्य को उलटकर औचित्य को प्रतिष्ठित करने में अनावश्यक विलम्ब न किया जाए।” उथल-पुथल के ऐसे चिह्न प्रकट हो रहे हैं जो बताते हैं कि नियति की अवधारणा, सदाशयता की ज्ञानगंगा का अवतरण, आज की आवश्यकता के अनुरूप इन्हीं दिनों बन पड़ना सुनिश्चित है।
दुर्दान्त रावण का अन्त होना था, तो दो तपस्वी युवक ही उस विशाल परिकर को धराशायी करने में समर्थ हो गए। दुर्धर्ष हिरण्यकश्यपु हारा और प्रह्लाद का सिक्का जम गया। समय आने पर, किसी दिग्भ्रान्त करने वाले झाड़ -झंखारों के जंगल को दावानल बनकर नष्ट करने में एक चिंगारी भी पर्याप्त हो सकती है। भगवान् राम और योगेश्वर कृष्ण ने ताड़का और पूतना जैसे चुनौती देने वाले तत्वों को बचपन में ही धराशायी कर दिया था।
“महाकाल का संकल्प” यदि युग परिवर्तन का तारतम्य इन्हीं दिनों बिठा ले, तो किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 21वीं सदी प्रज्ञावतार का युग है, प्रज्ञा अर्थात विवेक और बुद्धि का युग है, प्रतिभाशालिओं का युग है, प्रतिभाशाली केवल बड़ी-बड़ी डिग्रीयां प्राप्त करने वाले ही नहीं होते। हमारे गुरुदेव, कबीर जी, सूरदास जी, तुलसीदास जी जैसे प्रतिभावान विभूतिओं के पास कौन सी उच्च यूनिवर्सिटीज की डिग्रीयां थीं।
गुरुदेव बता रहे हैं कि निकट भविष्य की कुछ सुनिश्चित सम्भावनाएँ ऐसी हैं, जिनमें हाथ डालने वाले सफल होकर ही रहेंगे। अर्जुन की तरह नियति द्वारा पहले से ही मारे गए विपक्षियों का हनन करके, उच्चस्तरीय प्रतिभाएं ही श्रेय और प्रेम का दोहरा लाभ प्राप्त करेंगे। इसी माहौल में उन्हें प्रतिभा परिवर्धन का वह लाभ भी मिल जाएगा, जिसके आधार पर मूर्द्धन्य युगशिल्पियों में उनकी गणना हो सके।
इसी प्रभावशाली सन्देश के साथ आज के ज्ञानप्रसाद लेख का कल तक के लिए मध्यांतर होता है। कल इस पुस्तक का समापन लेख प्रस्तुत किया जायेगा।
जय गुरुदेव
