वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

उच्चस्तरीय प्रतिभाएं हमारे आस-पास ही हैं

शुक्रवार वाले लेख में “उच्चस्तरीय प्रतिभाएं कहाँ से आएंगीं ?” पर चर्चा हुई थी, आज चर्चा का विषय है  “उच्चस्तरीय प्रतिभाएं हमारे आस-पास ही हैं”, प्रत्येक पाठक को अपना मूल्यांकन करके समझ जाना चाहिए कि  “हम किसी से कम नहीं।” ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार एक ऐसा मंच है जहाँ असम्भव तो सम्भव करने का जादुई खेल खेला जा रहा है।  

24 अगस्त 2026 की दिव्य गुरुकक्षा के लिए ज्ञानप्रसाद लेकर हम हाज़िर हो चुके हैं, सभी समर्पित गुरुशिष्यों का अभिवादन है, आइए गुरुकुल की आज की गुरुकक्षा में प्रवाहित हो रही अमृत ज्ञानगंगा में डुबकी मारकर कौए से हंस बनने का प्रयास करें। 

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उच्चस्तरीय प्रतिभाओं के बारे में परम पूज्य गुरुदेव कह रहे हैं :  

प्रतिभाओं को दोहरे मोर्चे पर लड़ने का अभ्यास करना चाहिए। पहला मोर्चा “दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन” का और दूसरा मोर्चा “सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन” का है। पहले मोर्चे के अंतर्गत ऐसी सभी घिसी-पिटी प्रथाओं को उखाड़ फेंकने के लिए आमंत्रण देना है जिसके कारण समाज आगे बढ़ने में असफल हो रहा है। यदि 2026 में इन पंक्तिओं के लिखते समय,जब मानव आधुनिकतम सुविधाओं और साधनों से लैस इतना कुछ लिए बैठा है, असफल होने का कोई भी कारण दिखना नहीं चाहिए। दूसरे  मोर्चे का अनुसार जब पुरानी मान्यताओं के उखाड़ कर, भूमि समतल बन जाएगी तो उसमें नए बीज बोने होंगें, उन्हें अंकुरित करना होगा,खाद-पानी देना होगा, हम सबको प्रयासरत होकर उच्चस्तरीय प्रतिभाओं का सहयोग करना होगा, तब कहीं जाकर गुरुदेव का सपना पूरा होगा।        

गुरुदेव बता रहे हैं कि प्रतिभाएं तो हमारे आस-पास ही हैं,आवश्यकता है उनकी एनर्जी को Channelise करने की, Activate करने की, सही दिशा में लगाने की।

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का प्रत्येक साथी गुरुदेव के इसी मार्गदर्शन का पालन करता हुआ आगे बढ़े जा रहा है,सहयोग और सहकारिता का एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहा है, मानवीय मूल्यों का (जो समाज से लुप्त हुए जा रहे हैं) अनवरत पालन किये जा रहा है, प्रत्येक साथी अपनेआप को एक Role model प्रस्तुत करने की सार्थक दौड़ में लगा हुआ है,सभी का ह्रदय से धन्यवाद् करना हमारा परम कर्तव्य है।  

यदि किसी भी प्रयास का शुभारम्भ अपने निज के जीवनक्रम से करके, Role  model बनकर परिवार में प्रचलित किया जा सकता है तो पड़ोसी, स्वजन-सम्बन्धी, परिचित एवं घनिष्ठ, सभी लोग प्रभावित हो सकते हैं,हमारी बात सुन सकते हैं और शायद अनुकरण करते हुए हमारे साथ जुड़ भी सकते हैं । ऐसा इसलिए कहना उचित लगता है कि हमारी बात सुनने से पहले हमारे प्रभाव क्षेत्र के लोग हमारा मूल्यांकन तो करेंगें ही, करना भी चाहिए। बाज़ार से हम कोई चीज़ तभी खरीदते हैं जब हम पूरी तरह ठोक-बजा कर, परख कर  तस्सली कर लेते हैं। प्रतिभा चाहे कितनी  भी उच्चस्तरीय क्यों न हो,प्रभावशाली बनाने के लिए अनेकों हथकंडे अपनाने पड़ते हैं। साथिओ यही तो है “तप की असली परिभाषा”, वृक्ष बनने के लिए बीज को गलना ही पड़ता है। हमारी  पर्सनेलिटी में,वर्षों से ऐसी अनेक आदतें  घुसी हो सकती हैं, जो दिखती तो नहीं हैं लेकिन लकड़ी में लगे घुन की तरह हमें निरन्तर खोखला किये जा रही हैं। प्रतिभा परिष्कार की दिशा में सबसे पहला कदम घुन की तरह खा रही इन दुष्प्रवृतिओं को जड़ से उखाड़ना होगा,वर्षों से जमी कालिख से निपटने की मोर्चाबंदी आरम्भ करनी होगी। 

गुरुवर हमें सचेत करते हुए हमारी सबसे बुरी किन्तु सर्वाधिक प्रचलित आदत से अवगत करा रहे हैं। यह आदत है “आलस्य।” चोरी अनेक तरह की होती है लेकिन स्वयं को एवं  अपने सगे-सम्बन्धियों को सबसे अधिक हानि पहुँचाने वाली है आदत “कामचोरी” ही है। आलसी मनुष्यों को लगता है  कि वोह Eat,drink and be merry के सिद्धांत का पालन करते हुए, आराम से रह रहे हैं, ऐश कर रहे हैं लेकिन सच बात तो यह है कि इस ऐब  के कारण मनुष्य दिन-ब-दिन अनुपयोगी, अनगढ़, अयोग्य, अक्षम, अशक्त होता जाता है। प्रगति की समस्त सम्भावनाएँ आलसी व्यक्ति को दूर से ही नमस्कार करके उलटे पैरों लौट जाती हैं।

यह समझा जाना चाहिए कि परिश्रमी मनुष्य के पसीने की हर बूँद बहुमूल्य होती है, मोती होती है। लम्बी जीवनयात्रा का एक-एक क्षण,एक बहुमूल्य पुष्पमाला की भांति होता है, एक ऐसी पुष्पमाला जिसमें एक-एक पुष्प बड़ी ही सोच समझ कर पिरोया होता है, ऐसी ही पुष्पमाला अपनी सुगंध बिखेरने में समर्थ हो पाती है। समुन्नत वे रहे हैं जिन्होंने समय का मूल्य समझा और उसकी हर एक इकाई का श्रेष्ठतम एवं क्रमबद्ध व्यस्त उपयोग करने का तारतम्य बिठाया। जो आलस्य-प्रमाद में समय गँवाते रहते हैं, धीमी गति और ढीले तारतम्य से समय काटते रहते हैं, वे किसी प्रकार अपनी मौत के दिन ही पूरे भर कर पाते हैं। बड़ी खीज होती जब ऐसे लोगों से “क्या हालचाल है ?” पूछने पर उत्तर मिलता है “बस समय काट रहे हैं।” अरे भैया, मनुष्य जीवन बहुमूल्य है,अनेकों योनियों (सांप,बिच्छू तक की) की यात्रा करके ही अति दुर्लभ मनुष्य जन्म पाने का  सौभाग्य प्राप्त हुआ है।   

आलसी लोगों के लिए “प्रतिभा परिष्कार” की बात ही कहाँ से आएगी उन्होंने तो प्रतिभा का विकास ही नहीं किया। PhD की डिग्री प्राप्त करने के लिए वषों प्रतीक्षा करनी पड़ती है, प्राइमरी से हाई स्कूल,फिर कॉलेज,फिर यूनिवर्सिटी और न जाने क्या कुछ। गुरुदेव कहते हैं कि आलस्य जैसी दुर्घटना अपने साथ यां अपने किसी प्रिय पात्र के जीवन में घटने न पाए, इसका विशेष  सतर्कतापूर्वक ध्यान रखे जाने की आवश्यकता है। 

लम्बे समय के भारी और कठिन काम करने वालों को बीच-बीच में थोड़ा सुस्ताने की आवश्यकता अवश्य पड़ती है लेकिन  उसकी पूर्ति थोड़ी देर के लिए काम या मन बदलने भर से पूरी हो जाती है। 

गुरुदेव मनुष्य के लिए भी कहते हैं कि काम और विश्राम के बीच एक संतुलित तालमेल बिठाया जाना चाहिए क्योंकि Excess of everything is bad- जिस प्रकार आलस्य विनाशकारी है, अति व्यस्तता भी लाभकारी नहीं है। 

अपने दायित्व की क्रमबद्ध व्यवस्था बना लेना इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति की दूरदर्शिता, विवेकशीलता और कार्यकुशलता उच्चस्तर की है। कारखानों-दफ्तरों में, कंपनी का संचालन और विकास, मैनेजरों की योग्यता पर निर्भर रहता है। शासन में, प्राँतों के संरक्षक गवर्नर माने जाते है। अँग्रेजी शासन के जमाने में भारत के प्रधान व्यवस्थापक को गवर्नर जनरल कहते थे। वह पद सबसे ऊँचा माना जाता था। सुपरिंटेंडेण्ट शब्द भी प्राय: इसी अर्थ का बोधक है।

महत्त्वपूर्ण सफलताएँ जब भी, जहाँ भी, जिन्हें भी मिली हैं, उनमें व्यवस्था तंत्र की प्रमुख भूमिका रही है। सेनापतियों का कौशल उनकी रणनीति के आधार पर आँका जाता है। योजनाबद्ध उपक्रम बनाकर ही विशालकाय निर्माण कार्य बन पड़ते हैं। श्रम को, श्रमिकों को, साधनों को पर्याप्त मात्रा में जुटा लेने पर भी इस बात की गारण्टी नहीं होती कि जिस स्तर की जितनी सफलता अभीष्ट थी, वह मिल ही जाएगी। किसी कार्य की सफलता/असफलता  इस बात पर टिकी रहती है कि उपलब्ध साधनों का किस प्रकार श्रेष्ठतम उपयोग करते बन पड़ा। सफलता/असफलता जैसा परिणाम  इस बात पर निर्भर रहता है कि लिए गए प्रोजेक्ट के अनुकूल और प्रतिकूल पक्ष की, हर हलचल और समस्या को कितनी गम्भीरता और यथार्थता के साथ आँका गया। प्रतिकूलताओं से  निपटने का किस प्रकार जुगाड़ बिठाया गया।  सफलता इस तरह की प्लानिंग वाले तेजस्वियों का ही  वरण करती है,वही श्रेय के अधिकारी बनते हैं। जो लोग केवल अपना ही काम किसी  तरह रोते-धोते पूरा करते हैं उन्हें मज़दूर भर ही कहा जा सकता है। ऐसे लोगों को व्यवस्थापक का श्रेय तो मिल ही नहीं पाता। परिपूर्ण दिलचस्पी, एकाग्र मनोयोग, समुचित उत्साह और आगे बढ़ने का अदम्य साहस मिलकर ही ऐसी स्थिति विनिर्मित करते हैं, जिसमें बड़े काम सध सकें; भले ही प्रयत्नकर्ता साधारण साधनों, साधारण योग्यताओं वाला ही क्यों न हो। इस प्रवृति के लोग परिस्थितियों की प्रतिकूलता से भयभीत नहीं होते। उन्हें अनुकूल बनाने में अपनी समग्र क्षमता को दाँव पर लगा देते हैं। ऐसे ही लोग नेतृत्व कर सकने के अधिकारी होते हैं। यों ऊँची कुरसी पर बैठने और पदवी पाने के लिए तो नर-वानर भी लालायित रहते हैं। आजकल तो Job description में पहले ही लिखा होता है “ Should be able to adjust in difficult situations” 

निजी जीवन में प्रतिभा परिष्कार का शुभारम्भ आलस्य और प्रमाद से निपटने को वरीयता देेकर करना चाहिए। छोटे काम सहायकों से कराते हुए बड़े,कठिन और वजनदार कार्यों का दायित्व अपने कन्धों पर ओढ़ना चाहिए। हलके काम तलाश करने और किसी प्रकार मौज-मस्ती  में समय काटने की आदत मनुष्य को आजीवन अनगढ़ ही बनाए रखती है। जो लोग अपने हिस्से के काम के साथ-साथ समूचे सम्बद्ध क्षेत्र के हर पक्ष के उतार-चढ़ावों का ध्यान रखते हैं और सम्बद्ध व्यक्तियों को उसमें सुधार के आवश्यक परामर्श प्रस्ताव के रूप में नम्रतापूर्वक देते रहते हैं उन्हीं को “सूत्र संचालक” समझा जाता है। ऐसे लोग अहंकारी और आग्रही नहीं होते,आदेश भी नहीं देते, केवल अपने प्रस्ताव इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं जिनमें  अपने अहंकार की, विशेषज्ञ होने की गन्ध न आती हो और दूसरों पर आक्षेप या दोषारोपण भी न लदता हो। 

अपने ही काम में व्यस्त मनुष्य को “कोल्हू का बैल” भी तो कह सकते हैं, वह भी तो अपने नियत काम में लगा रहता है। विशेषता तो उस मनुष्य की है जो सम्बद्ध परिकर के हर पक्ष पर ध्यान रखता है। सम्भावनाओं की कल्पना करता है और शतरंज की गोटियों की तरह सतर्कतापूर्वक बाजी जीतने वाली चाल चलता रहता है। व्यवस्थापक ऐसे ही लोग बन पाते हैं जो  न केवल अपने काम की बल्कि समूचे सम्बद्ध का सुनियोजन कर सकने की क्षमता सिद्ध करते हुए, ऊँची श्रेणी का दायित्व सौंपे जाने का श्रेय उपलब्ध करते हैं। 

व्यावहारिक क्षेत्र का धर्मात्मा ऐसे ही लोगों को कहना चाहिए। अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य आदि दार्शनिक-नैतिक सद्गुण तो प्रथम कक्षा में उत्तीर्ण होने के उपरान्त ही सफलतापूर्वक संचित किए जा सकते हैं। मनुष्य जीवन का शुभारम्भ तो निजी जीवन में उत्साह भरी व्यस्तता अपनाने से ही होता है। परिवार क्षेत्र में प्रतिभाशालियों द्वारा, व्यवस्था सम्बन्धी प्रयोग करना सरल पड़ता है। परिवार के सदस्यों से निरन्तर सम्पर्क रहता है, उनके साथ आत्मीयता भरा बन्धन भी रहता है, इसलिए अनुशासन पालने के लिए उन्हें अनुरोध एवं आग्रह के आधार पर अधिक अच्छी तरह सुनियोजित किया जा सकता है। इसी अभ्यास को जब व्यवसाय या समाज क्षेत्र में प्रयुक्त किया जाता है, तो उन्हें बड़े क्षेत्र की बड़ी सफलता का श्रेय भी अधिक मिलता है और व्यक्तित्व में प्रतिभा परिवर्धन का लाभ भी अनवरत रूप से मिलता चला जाता है।

आशा करते हैं कि पाठकों को “उच्चस्तरीय प्रतिभाएं कहाँ से आएंगीं ?” प्रश्न का उत्तर मिल गया होगा। 

जय गुरुदेव 


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