वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

उच्चस्तरीय प्रतिभाएं कहाँ से आएंगीं ?

परम वंदनीय माता जी के अवतरण के 100 वर्ष, अखंड दीप के प्राकट्य के 100 वर्ष  एवं परम पूज्य गुरुदेव की साधना के 100 वर्ष को समर्पित वर्तमान लेख श्रृंखला, 36 वर्ष पूर्व (1988–90) गुरुदेव द्वारा रचित “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” पर आधारित है। 23 पुस्तिकाओं की इस पुस्तकमाला की तीसरी पुस्तक “युग की मांग-प्रतिभा परिष्कार भाग 1” में गुरुदेव ने उस समय, वर्षों पहले लिख दिया था कि हम “संधिकाल” से गुज़र रहे हैं। इस संधिकाल में दो शताब्दियों का मिलन हो रहा है। 20वीं सदी का समापन हो रहा है और 21वीं शताब्दी का जन्म हो चुका है। हमारे पाठक जानते हैं कि हम 21वीं शताब्दी के 26वें वर्ष में गुज़र रहे हैं। युगदृष्टा ने 36 वर्ष पूर्व ही आज की परिस्थितिओं के देख लिया था। 

आज के लेख की ओपनिंग पंक्तियाँ एक तरफ तोपों,डायनामाइट, क्रेन,बुलडोज़रों,फायर ब्रिगेड जैसे साधनों की बात कर रही हैं तो दूसरी तरफ अति शक्तिशाली गजराज, वानर राज हनुमान, उच्चस्तरीय प्रतिभा के धनी इंजीनियरों की बात कर रही हैं। साधनों के अम्भार लगे हुए हैं, प्रतिभाओं की बाढ़ आई हुई है, केवल ज्ञान-आधरित विषयों पर ही Bulk में डाटा प्रकाशित हो रहा है, फिर भी इतना अन्धकार क्यों है ? सतयुग की वापसी कैसे होगी? गुरुदेव जिस सतयुग की बात कर रहे हैं वह कैसा होगा? यदि सब कुछ उपलब्ध है फिर कमी किस बात की है? इन प्रश्नों के  सही उत्तर तो सोमवार को ही मिल पाएंगे लेकिन आज के लेख को समझे बिना,उन उत्तरों को समझना उचित नहीं होगा।     

21  अगस्त 2026 की दिव्य गुरुकक्षा में सभी समर्पित गुरुशिष्यों का अभिवादन है, आइए गुरुकुल की आज की गुरुकक्षा में प्रवाहित हो रही अमृत ज्ञानगंगा में डुबकी मारकर कौए से हंस बनने का प्रयास करें। 

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मजबूत किलों को ध्वस्त  करने के लिए अष्टधातु की “तोपों” की गोलाबारी ही काम आती है। पहाड़ों को समतल बनाने के लिए “डायनामाइट” की सुरंगों का प्रयोग करना पड़ता है। रेल के डिब्बे पटरी से उतर जाने पर उन्हें उठाने के लिए बड़ी ताकत वाली “क्रेन” ही अभीष्ट उद्देश्य पूरा कर सकती है। 

ऐसे बड़े कामों के लिए छिटपुट साधनों का उपयोग तो निरर्थक ही होता है।

तलवार का वार सहने के लिए “गैंडे की खाल” वाली ढाल चाहिए। सहस्रों टन भार लाद ले जाने वाले “जलयान” जो काम करते हैं, वह छोटी डोंगियों से नहीं लिया जा सकता। भयंकर अग्निकाण्ड से निपटने के लिए, बड़े आकार वाले “फायर ब्रिगेड” चाहिए। उबड़-खाबड़ क्षेत्रों को समतल बनाने के लिए “बुलडोजरों” से कम में काम नहीं चलता। दलदल में फँसे हाथी को उससे भी बड़े आकार वाला गजराज ही खींचकर किनारे पर लगाता है। नये नगरों और बड़े बाँधों के नक्शे, सूझ-बूझ वाले वरिष्ठ इंजीनियर ही बनाकर देते हैं।

बड़े कामों का दायित्व उठाने और उन्हें करने की जिम्मेदारी “असाधारण क्षमता” सम्पन्नों को ही सौंपी जाती है। यों महत्त्व तो टट्टुओं और बकरों का भी है लेकिन  उनकी पीठ पर हाथी वाली अंबारी नहीं रखी जा सकती।100 खरगोश मिलकर भी एक चीते से दौड़ में आगे नहीं निकल सकते। 

बड़े कामों के लिए बड़ों की तलाश करनी पड़ती है।

इन दिनों बड़ी उथल-पुथल होने जा रही है। शताब्दियों से संचित सड़ाँध भरे कचरे को हटाया और ठिकाने लगाया जाना है। कँटीली झाड़ियों वाले जंगल के स्थान पर सुरम्य उद्यान खड़े करना सहज काम नहीं है। धूल भरे, लावे जैसे जलते रेगिस्तान को भी लोगों ने लहलहाती हरियाली से सुरम्य बनाया है लेकिन  इसके लिए “पैनी सूझ-बूझ” का परिचय देने और विपुल साधन जुटाने की आवश्यकता पड़ती है। समुद्र को छलांगने और संजीवनी बूटी वाला पर्वत उखाड़कर लाने का चमत्कार “हनुमान्” ही प्रस्तुत कर सके थे। हर वानर ऐसा दुस्साहस कर दिखाने की हिम्मत नहीं कर सकता। असुरता का व्यापक साम्राज्य ध्वस्त करने और उसके स्थान पर सतयुगी रामराज्य का वातावरण बनाने के लिए बड़ों की बड़ी योजना और उपयुक्त साधन जुटाने की क्षमता ही उद्देश्य पूरा कर सकी थी। समुद्र सोखने की चुनौती अगस्त्य ही स्वीकार कर सकते थे।

ऐसी आशा साधारण जन से नहीं की जा सकती। इन दिनों अनौचित्य की बाढ़ को रोकने और दलदल को मधुवन बनाने जैसी समय की चुनौती सामने है। 

इसी संदर्भ में गुरुदेव का बहुचर्चित स्लोगन फिर से दोहराने की आवश्यकता है। चारों तरफ दिख रहे विनाश के प्रवाह को केवल रोकना ही नहीं है बल्कि इस उलटी  हुई स्थिति को उलटकर सीधा करना है। वैसे तो मनुष्य ही असम्भव को सम्भव कर दिखाते रहे हैं लेकिन  उसके लिए “तत्पर और संकल्पित” होना ही पर्याप्त नहीं है, अपनेआप  को क्षमता-सम्पन्न सिद्ध करके दिखाना एक “दोहरे  पराक्रम” का काम है। 

युग परिवर्तन की इस विषम वेला में ऐसा ही कुछ बन पड़ने की आवश्यकता है। एक युग की समाप्ति और दुसरे का  शुभारम्भ अन्धकार से भरी तमिस्रा का स्वर्णिम आभा वाले सूर्योदय के साथ जुड़ने जैसा है। सन्धिकाल जैसा स्वर्ण अवसर कभी-कभी ही आता है। इसकी प्रतीक्षा युग-युगान्तरों तक करनी पड़ती है ।

इन दिनों ऐसा ही कुछ होने जा रहा है।

हर तरफ विभीषिकाओं का घटाटोप गर्जन-तर्जन करता देखा जा सकता है। जो चल रहा है, उससे विपत्तियों का संकेत ही मिलता है। दुर्बुद्धि ने चरम सीमा तक पहुँचकर ऐसी सम्भावना प्रस्तुत कर दी है, जिसे बुरे किस्म की दुर्गति ही कह सकते हैं। जिस प्रकार की स्थिति 2026 में (जब यह पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं)  चल रही है ऐसे प्रवाह को और अधिक उत्तेजित कर देना बहुत सरल है लेकिन  इस स्थिति को  उलटकर सृजन की दिशा में योजनाबद्ध रूप से नियोजित कर सकना एक ऐसा कार्य है जिसकी आशा “विश्वकर्माओं” से ही की जा सकती है। 

दसों दिशाओं से ऐसे ही प्रतिभाशाली व्यक्तित्वों के लिए पुकार उठ रही है। उन्हीं को खोज निकालने या नये सिरे से ढालने के लिए समय मचल रहा है। 

गुरुदेव ने युगतीर्थ शांतिकुंज की स्थापना ऐसे ही महामानवों की ढलाई के लिए की है, यह एक ऐसी फैक्ट्री है जहाँ महामानव न केवल गढ़े जाते हैं बल्कि पॉलिश करके परिष्कृत भी किये जाते हैं।   

यह कार्य लेखनी,वाणी एवं प्रचार माध्यमों से भी एक सीमा तक ही हो सकता है, वोह भी बड़ी मन्दगति से, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि लोकचिन्तन में गहराई तक घुसी हुई भ्रष्टता से कैसे निपटा जाए और उसके फलस्वरूप जो दुराचरण का सिलसिला चल पड़ा है, उसके उद्गम को बन्द कैसे किया जाय। इन दिनों  धूर्तता इस कदर बढ़ी हुई है कि वह कानूनी दण्ड व्यवस्था (सुप्रीम कोर्ट) से लेकर धर्मसंस्थानों की नीति मर्यादा को भी अँगूठा दिखाती है। सदाशयता का जोर-शोर से समर्थन करने वाले ही जब नये-नये मुखौटे बदलकर कृत्य-कुकृत्य करने की दुरभिसन्धियाँ रचते रहे हैं, तो उन्हें किस प्रकार समझाया जाए। सोए हुओं को जाग पड़ने की आवश्यकता कौन समझाए? जगे हुओं  को कोई क्या कहे? 

प्रचार माध्यम अब अपनी विश्वसनीयता खोते चले जा रहे हैं।  इसके दो कारण हैं,पहला यह कि उपदेश देने वाला  ही कथन के ठीक विपरीत आचरण करे तो उसे क्या कह कर एवं  किस प्रकार समझाया जाए? उसकी बात पर कोई क्यों और एवं किस आधार पर, कितना विश्वास करे? दूसरा टेक्नोलॉजी, विशेषकर AI ने ज्ञानप्रसार पर ऐसा कब्ज़ा कर लिया है कि Lightning speed से वीडियोस बन रही है,कहीं  से भी  कोई भी पुस्तक उठाई, मात्र मिनटों में AI की सहायता से ऑडियो/वीडियो बनाई, अपलोड की और अपना काम पूरा हो गया। पाठक सुन कर हैरान हो जायेंगें कि Bulk में ऑडियो/वीडियो बनकर, यूट्यूब पर अपलोड हो रही हैं,Information की बाढ़ आयी हुई है। Quality को छोड़ Quantity की ओर सभी दौड़ लगाए हुए हैं।  

नए सिरे से ऐसी प्रतिभाएँ उभरें, जो अपना निज का आदर्श ( जी हां, निज का) प्रस्तुत करते हुए सिद्ध करें कि सही मार्ग पर चलना न तो घाटे का सौदा है, न असम्भव और न ही अव्यवहारिक। उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करना ही एकमात्र ऐसा उपाय है जो इस भागमभाग, मारधाड़ की दुनिया में अभी भी शेष है। उत्कृष्टता ही ऐसा आधार है जिसे अपनाने के लिए लोगों को सहमत एवं प्रोत्साहित किया जा सकता है। 

चोर, जुआरी, व्यभिचारी, नशेबाज, अनाचारी जब अपनी कथनी और करनी में एकता दिखाकर अपनी जुंडली बना कर रोज़ शाम को किसी Pub में इक्क्ठे होते हैं, खिच-खिच करते हुए जमघट इक्क्ठा करते हैं, अनेकों को अपने साथ चलने के लिए सहमत कर सकते हैं तो आदर्शों का अनुकरण करने वालों का एक ग्रुप तैयार करना कैसे कठिन हो सकता है। पाठक भलीभांति परिचित हैं कि शराबी मण्डली नए साथिओं को पहले फ्री का लालच देकर, फ्री में पिलाकर ही अपने साथ जोड़ते हैं,एक बार जुड़ गया तो उसके बाद उसे ही लूटते हैं क्योंकि तब तक वोह पियक्कड़ बना चुका होता है। 

ज्ञानप्रसाद लेख भी अनेकों को पियक्कड़ बना चुके हैं, ऐसे पियक्कड़ कि अब इनके बिना रहना संभव ही नहीं है। पियक्कड़ का ही एक उदाहरण कुछ दिन पूर्व तब प्रमाणित हुआ जब हम अपनी मूर्खता के कारण यूट्यूब पर ज्ञानप्रसाद लेख पोस्ट करना ही भूल गए थे। गुरुप्रसाद की श्रद्धा  में लिप्त कुछ साथियों ने जिन्हें  प्रसाद की तृष्णा सता रही थी एकदम मैसेज करके हमारी गलती का अहसास कराया था।

साथिओं से क्षमा याचना करते हैं कि ज्ञानरथ परिवार के साथिओं के लिए पियक्क्ड़ जैसा शब्द प्रयोग कर रहे हैं लेकिन गुरुभक्ति में लीन होने के लिए मदहोश तो होना ही पड़ेगा। 

प्राचीन काल से चली आ रही ऋषि परंपरा जिसका पालन करने वाले आधुनिक युग के ऋषि,हमारे गुरुदेव ने उच्च आदर्शों के अनुरूप स्वयं को बनाने-ढालने के कष्टसाध्य कृत्य किए। इसी को  तपश्चर्या कहा जाता है। वशिष्ठ हों या विश्वामित्र, चरक हों या याज्ञवल्क्य, सभी ने समय के अनुरूप भांति भांति की नयी शोधें की, उन्हें स्वयं पर टेस्ट करके उनकी प्रामाणिकता सिद्ध की और इसी आधार पर सारे समाज को लाभान्वित किया। महात्मा बुद्ध इसी आधार पर अवतार कहे गए, गाँधी इसी प्रक्रिया की कसौटी पर कसे जाने के बाद  राष्ट्रपिता का सम्मान पा सके। हमारे गुरु ने भी स्वयं को तपाकर,एक लैबोरेट्री की तरह अपने शरीर पर प्रयोग करके सिद्ध कर दिया कि जो वोह कर सकते हैं हर कोई  क्यों नहीं कर सकता । Repeat and reproducibility विज्ञान का बहुत बड़ा सिद्धांत है। यदि किसी वैज्ञानिक की शोध विश्व के किसी भी भाग में उसकी ही तरह प्रयोग करने पर रिपीट नहीं की जा सकती, उसके रिजल्ट Reproduce  नहीं किए जा सकते तो उस वैज्ञानिक की शोध असफल समझी जाएगी। ऐसे वैज्ञानिक की शोध को चैलेंज करने के लिए अनेकों वैज्ञानिक उठ खड़े होंगे। 

गुरुदेव की रिसर्च के बारे में कहा जा सकता है कि कोई भी, कहीं भी रिपीट कर सकता है लेकिन प्रश्न केवल एक ही उठता है कि क्या हम में से किसी के पास भी इतना सामर्थ्य है कि उनके शरीर जैसी लैबोरेट्री सेटअप कर सके?

इस उच्चस्तरीय प्रश्न को सोमवार तक के लिए यहीं छोड़ते हुए आज के ज्ञानप्रसाद लेख का समापन करने की आज्ञा चाहते हैं। 

धन्यवाद्, जय गुरुदेव 


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