वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

युगसृजन के लिए प्रतिभाओं को प्रेरित करता एक लेख

कहने को तो हमारे गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी केवल पांचवीं कक्षा तक ही स्कूली शिक्षा प्राप्त किये थे लेकिन उनके द्वारा रचित विशाल साहित्य देखकर आँखें खुली की खुली रह जाती हैं। 

प्रतिभा जैसे विषय पर (जिससे लगभग सभी पाठक परिचित हैं) एक नहीं दो पुस्तकें लिख कर गुरुदेव ने जो उपकार किया है उसे शब्दों में वर्णित करना असम्भव है। वर्तमान लेख श्रृंखला में जिस प्रकार  “प्रतिभा” शब्द का चीड़फाड़ हो रहा है, विचार  उठता है कि कभी समय मिलने पर 15 मानवीय मूल्यों की भी सर्जरी की जाए। “प्रतिभा” की ही तरह यह 15 शब्द भी देखने में बहुत ही साधारण दिखते  हैं, यदि प्रतिभा शब्द इतना सरल होता तो  गुरुदेव दो पुस्तकें क्यों लिखते, We should not take anything for granted कि हमें पता है। “समझदारी,ईमानदारी,ज़िम्मेदारी,बहादुरी” वाले लेख के बारे में किस प्रकार के कमेंट पोस्ट हुए थे सभी ने देखे थे। 

जो भी हो हमारी कहाँ चलने वाली है चलेगी तो गुरुवर की, होगा वही जो वोह चाहेंगें। 

गुरुकुल की 17 अगस्त 2026 की,सप्ताह की प्रथम गुरुकक्षा में आप सभी का स्वागत है, आइए गुरुचरणों में नतमस्तक होकर आज के ज्ञानप्रसाद लेख का अमृतपान करें, दुर्लभ मनुष्य जीवन का सदुपयोग करें। 

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वर्तमान लेख श्रृंखला, 36 वर्ष पूर्व (1989–90) गुरुदेव द्वारा रचित “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” पर आधारित है। इस पुस्तकमाला की तीसरी पुस्तक “युग की मांग-प्रतिभा परिष्कार भाग 1” में गुरुदेव ने उस समय, वर्षों पहले लिख दिया था कि हम “संधिकाल” से गुज़र रहे हैं। इस संधिकाल में दो शताब्दियों का मिलन हो रहा है। 20वीं सदी का समापन हो रहा है और 21वीं शताब्दी का जन्म हो चुका है। हमारे पाठक जानते हैं कि हम 21वीं शताब्दी के 26वें वर्ष में गुज़र रहे हैं।

गुरुदेव कहते हैं कि युगसन्धि का यह समय एक ऐसा अवसर, ऐसा सौभाग्य लेकर आया है जिसे कोई भी मिस नहीं करना चाहेगा । गुरुदेव इस समय को आपत्तिकाल कहकर हमें बता रहे हैं कि ऐसे समय में लोग निजी कामों को, व्यवसाय आदि को छोड़कर दुर्घटना से निपटने के लिए दौड़ पड़ते हैं। अग्निकाण्ड, भूकम्प, दुर्भिक्ष, महामारी, दुर्घटना जैसे अवसरों पर हर कोई एकजुट होकर बचाव कार्यों के लिए उमड़ पड़ता है, कोई लंगर लगाता है तो कोई मेडिकल राहत प्रदान करके पुण्य का भागीदार बनता है।यही वोह समय होता है जब उदार सेवाभावना की परीक्षा होती है। भावनाशील लोग कभी भी,ऐसे किसी भी अवसर को मिस नहीं करते। इस संसार में हर तरह के इंसान बसते हैं। जब हम सौभाग्यशाली, भावनाशील प्राणियों की बात कर रहे  हैं तो उपेक्षा करने वालों की, भाग खड़े होने वालों की, लूटने वालों की बात को कैसे छोड़ दें। भावनाशीलों का हर जगह सम्मान होता है, उन्हें पुरस्कारों से सुशोभित किया जाता है और भाग खड़े होने वाले तिरष्कृत होते हैं।

सेवा साधना में जुट जाने  वाले सदा,सर्वदा के लिए लोगों के मन पर अपनी प्रामाणिक महानता की गहरी छाप छोड़ते हैं, जो कालान्तर में उन्हें अनेक माध्यमों से महत्त्वपूर्ण वरिष्ठता प्रदान कराती है।

हम अपने गुरु को इतना सम्मान क्यों देते हैं? हम उनके लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को आतुर क्यों रहते हैं?

ऐसा केवल इसलिए है कि उन्होंने अपनेआप को गला कर, एक रोल मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कुछ ऐसे सिद्धांत प्रस्तुत किए जिनका यथासंभव पालन  करना हम सब बच्चों का परम कर्तव्य है। हमारा सौभाग्य है कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का एक-एक सदस्य गुरुचरणों में समर्पित है।

इतिहास साक्षी है कि आपत्तिकाल में राजपूत परिवारों में कम से कम एक सदस्य का सेना में भरती होना अनिवार्य हुआ करता था। सिख धर्म में भी संकट की  वेला में हर परिवार  में से एक सदस्य को “सिख सेना” का सदस्य बनने के लिए प्रोत्साहित किया था। 

गुरुदेव ने 36 वर्ष पहले लिख दिया था:

आज की वेला कुछ कम संकट की नहीं है। नवसृजन (New Creation) में संलग्न होने के लिए हर परिवार से एक प्रतिभा को आगे आना चाहिए और भारतभूमि की सतयुगी गरिमा को जीवन्त रखने का श्रेय लेना चाहिए। 21वीं  सदी में सतयुग की वापसी वाली सम्भावनाएँ सुस्पष्ट हैं। कुछ एक संकेत पहले से ही प्रकट हो रहे हैं। ऐसे व्यक्तित्व उभर रहे हैं, जो लोक निर्वाह में कटौती करके अपनी भाव-सम्वेदनाएँ, आकांक्षाएँ एवं गतिविधियों को सृजन प्रयोजनों में समर्पित कर रहे हैं, जिससे उनका समर्पण, अन्धकार में जलती मशाल की भूमिका निभाते हुए सबकी आँखों में चमक पैदा कर सके।

स्वर्ग-मुक्ति, दिव्य-दर्शन आदि के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है और निराश भी रहना पड़ सकता है लेकिन  सत्प्रयोजनों के लिए प्रस्तुत किया गया “आदर्शवादी साहस” मनुष्य के व्यक्तित्व  को ऐसा प्रामाणिक, प्रखर एवं प्रतिभावान बनाता है, जिसके उपार्जन को दैवी सम्पदा के रूप में आँका जा सकता है। इस प्रयास से एक ऐसा व्यक्तित्व बन पड़ता है  जिस पर भौतिक सम्पदाओं, सुविधाओं को न्योछावर करना कोई मुश्किल नहीं है । 

जब कभी भी प्रतिभाओं का प्रयोग लॉजिकल  दिशा में हुआ है, वहाँ उन्हें हर प्रकार से सम्मानित-पुरस्कृत किया गया है। अच्छे नंबर लाने वाले छात्र पुरस्कार जीतते हैं और स्कालरशिप  के अधिकारी बनते हैं। सैनिकों में विशिष्टता प्रदर्शित करने वाले वीरता पदक पाते हैं। प्रतिभा के आधार पर ही अधिकारियों की प्रमोशन होती है। 

युगसृजन बहुत बड़ा काम है। उसका सम्बन्ध किसी व्यक्ति, क्षेत्र, देश से नहीं बल्कि  विश्वव्यापी समस्त मानव जाति के चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में ओवरऑल  परिवर्तन करने से है। पतन की ओर गिराने वाली  प्रवृत्तियाँ तो आँधी-तूफान की तरह गति पकड़ लेती हैं लेकिन  उन्हें रोकना और तदुपरान्त उत्कृष्टता की दिशा में वापिस लाना “असाधारण दुस्साहस भरा प्रयत्न” है। कैंसर के मरीज को रोगमुक्त करना और नीरोग होने पर उसे पहलवान स्तर का समर्थ बनाना “एक प्रकार का  चमत्कारी कायाकल्प” है। 

प्रतिभाएँ  केवल दुस्साहस करने पर ही उतरती हैं, खास कर तब जब  उद्देश्य  केवल सृजनात्मक हों। कटे हुए अंगों के घाव भरना, उन्हें जोड़कर पूर्व स्थिति में लाना कठिन  सर्जरी का ही काम है। गुरुदेव, बार-बार  ऐसी ही सृजनात्मक सर्जरी से उलटे हुओं को उलट कर सीधा करने की बात करते आ रहे हैं। पिछले कुछ ही वर्षों में अनेकों उलटे हुए सीधे हो चुके हैं और आगे भी बड़ी तीव्र गति से सीधे होते जायेंगे। मनुष्य की प्रवृति है कि उसे केवल नकरात्मकता ही दिखती है एवं  फिज़ूल की Beat about the bush में ही मज़ा आता है, ऐसी चर्चाएं चाहे घंटों करवा ली जाएँ, इसीलिए तो समय की कमी रहती है।   

गुरुदेव हमसे कह रहे हैं: 

युग की समस्याओं को सुलझाने के लिए, अनौचित्य (Illogical)  को निरस्त करने और सृजन का अभिनव उद्यान खड़ा करने के लिए ऐसे व्यक्ति चाहिए जो परावलम्बन (Dependence)  की हीनता से, स्वार्थपरता की संकीर्णता से ऊँचे उठकर अपने को परिष्कृत करने के साथ-साथ वातावरण को संस्कार-सम्पन्न बना सकने की पीड़ा से अन्त:करण को भाव-सम्वेदनाओं से ओत-प्रोत कर सकें।

आत्मबल बढ़ाने के लिए उपासना को ही सब कुछ माना जाता है और उसी के सहारे मनोकामनाओं की पूर्ति से लेकर स्वर्ग-मुक्ति तक, देवताओं और भगवानों से अपनी मान्यताओं के अनुरूप छवि बनाकर दर्शन देने की आशा  की जाती है। कितने ही लोग ऋद्धि-सिद्धियों की आशा भी लगाए बैठे हैं, मंदिर में 5 रूपये का प्रसाद चढ़ा कर 5 करोड़ की मांग करने वाले, सौदेबाज़ी करने वालों की कोई कमी नहीं है। ऐसे लोगों की समर्था चमत्कार देखने और चमत्कार दिखाने तक ही सीमित रहती है लेकिन ऐसा होता नहीं है। 

यदि आत्मबल जागा  तो उसका प्रतक्ष्य दर्शन “आदर्शवादी प्रतिभा” में ही होगा। ऐसी ही प्रतिभा में ध्वंस से निपटने और सृजन को चरितार्थ कर दिखाने की सामर्थ्य होती है। सही अर्थों में यही है दिव्य वरदान, दिव्य चमत्कार। इसी को सिद्ध पुरुषों का अनुदान भी कह सकते हैं। भगवान की खोज एवं रिसर्च ऐसी ही प्रतिभाओं को ढूंढ निकालती है। कहीं दूर जाने की ज़रुरत नहीं है, हमारे गुरुदेव को, हिमालयवासी दादागुरु सर्वेश्वरानन्द जी ने इसी तरह ढूंढ निकाला था और उन्हें ढूंढते-ढूंढते आंवलखेड़ा की पूजास्थली में प्रकट हुए थे। साथिओ यह कोई हज़ारों  वर्ष पुरानी पौराणिक कथा नहीं है, मात्र 100 वर्ष पुरानी  ही बात है। 1926 की वसंत वेला में यह चमत्कार हुआ था जिसे हम सब 2026 में शताब्दी वर्ष के रूप में मना रहे हैं।   

परशुराम,दधीचि,अर्जुन,शिवाजी,हरिश्चंद्र आदि की कथाओं से इतिहास भरा पड़ा है। इन कथाओं में अस्त्र-शस्त्रों का उल्लेख अवश्य आता है लेकिन वोह समर्थता (आत्मबल) सबसे बड़ी है जिसे प्राप्त होने पर व्यक्ति लाठियों या ढेलों से भी अनीति को परास्त कर सकता  है। 

चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को कोई बड़ा  खजाना खोदकर नहीं थमाया था बल्कि  ऐसा संकल्पबल उपलब्ध कराया था जिसके सहारे वे आक्रमणकारियों का मुँह तोड़ जवाब देकर चक्रवर्ती कहला सके थे। समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी के हौंसले इतने बुलन्द किए थे कि वे अजेय समझे जाने वाले शासन को नाकों चने चबवाते रहे। रामानन्द ने,कबीर को स्वर्ण खान कहीं नहीं सौंपी थी बल्कि वह प्रतिभा प्रदान की थी जिसके कारण कुलीनता और विद्वत्ता के अभाव में भी अपने समय के प्रचण्ड प्रवर्तक के रूप में प्रख्यात हुए। 

गुरुदेव ऐसे लोगों की भी बात  कर रहे हैं जिन्होंने वैभव बढ़ाने, सुविधा भोगने, औलाद के लिए भरे खजाने छोड़कर मरने जैसी सफलताएँ अर्जित कीं। ऐसे लोगों ने भी  महापुरुषों से कम श्रम नहीं किया होगा लेकिन संकीर्ण स्वार्थपरता की परिधि से ऊँचे न उठने के कारण सुरदुर्लभ मनुष्य जीवन को यूं ही गंवा दिया। इसके  विपरीत महर्षि कर्वे, हीरालाल शास्त्री, बाबासाहब आमटे, महामना मालवीय जी, भामाशाह, स्वामी श्रद्धानन्द, अहिल्या बाई, सुभाषचन्द्र बोस,स्वामी विवेकानन्द जैसी विभूतियों को हर दिन प्रथम  स्मरणीय समझा जाता है। यह वोह प्रतिभाएं हैं  जिन्होंने स्वयं तो रोटी-कपड़े पर ही निर्वाह किया लेकिन अपने समूचे वर्चस को परमार्थ प्रयोजनों के लिए न्योछावर कर दिया। संसार के हर भाग में,हर समय में प्रतिभाएँ उजागर होती रही  हैं। धनाढ्यों, शासनाध्यक्षों, कलाकारों, व्यवसायियों, वैज्ञानिकों और मनीषियों को अपने-अपने ढंग से काम करते हुए देखा जा सकता है। उन्हें जो भी उत्तरदायित्व मिला, उसे उनकी प्रखरता और प्रचण्डता ने आश्चर्यजनक सफलता के साथ सम्पन्न किया है। इन वर्गों को युगचेतना अछूता नहीं छोड़ेगी, उन्हें झकझोरने और समय के अनुरूप बदलने के लिए बाधित करेगी। अब तक वे भले ही स्वार्थपरता और प्रमाद को प्रोत्साहित करते रहे हों लेकिन  आगे उन्हें अपनी क्षमता को मोड़ना-मरोड़ना और सृजन प्रयोजनों के लिए नियोजित करना ही होगा।

यहाँ हम सबको, स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि इस चर्चा में हम कहाँ पर खड़े हैं ? गुरुदेव की दिव्य लेखनी हमें उत्तेजित करते हुए कमेंट न लिखवा दे, ऐसा हो ही नहीं सकता। वर्षों से ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से इसी शक्ति का प्राकट्य हो रहा है।  

तूफानों, भूकम्पों, विस्फोटों, आन्दोलनों का उद्गम कहीं भी क्यों न रहा हो, जब वे गति पकड़ते हैं, तो व्यापक बनते चले जाते हैं। राजक्रान्तियों का सिलसिला इसी प्रकार चला था और असंख्यों राजमुकुट अनायास ही धराशायी होते चले गए। 

आज के ज्ञानप्रसाद लेख का समापन निम्नलिखित सन्देश से हो रहा है:

सृजन की अपनी लहर है। कभी सतयुग में ऐसा ही प्रभावोत्पादक मानसून उठा होगा, उसने धरती पर मखमली फर्श बिछाते हुए स्वर्ग जैसा वातावरण विनिर्मित कर दिया होगा।

रात्रि की अँधेरा सदा नहीं रहता, प्रकाश को भी प्रकट होने का अवसर मिलता है। तब छोटे पक्षी ही नहीं, गजराज भी अपनी चिंघाड़ और वनराज अपनी दहाड़ से दिशाओं को गुंजित करते दिखाई देते हैं। ऐसा ही सुयोग इन दिनों आ रहा है, यह आशा सबको रखनी चाहिए।

जय गुरुदेव 


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