वर्तमान लेख श्रृंखला, 36 वर्ष पूर्व (1989–90) गुरुदेव द्वारा रचित “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” पर आधारित है। इस पुस्तकमाला की तीसरी पुस्तक “युग की मांग-प्रतिभा परिष्कार भाग 1” में गुरुदेव ने उस समय, वर्षों पहले लिख दिया था कि हम “संधिकाल” से गुज़र रहे हैं। इस संधिकाल में दो शताब्दियों का मिलन हो रहा है। 20वीं सदी का समापन हो रहा है और 21वीं शताब्दी का जन्म हो चुका है। हमारे पाठक जानते हैं कि हम 21वीं शताब्दी के 26वें वर्ष में गुज़र रहे हैं।
आज इस दिव्य लेख श्रृंखला का 6वां लेख प्रस्तुत किया गया है जिसमें संक्षेप में “सतयुग की वापसी” का आधार बताया गया है। “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की पांचवीं पुस्तक का शीर्षक भी यही है,आशा करते हैं कि आने वाले दिनों में इस विषय को विस्तार से जानने का सौभाग्य प्राप्त होगा।
18 अगस्त 2026 की दिव्य गुरुकक्षा में सभी समर्पित गुरुशिष्यों का अभिवादन है, आइए गुरुकुल की आज की गुरुकक्षा में प्रवाहित हो रही अमृत ज्ञानगंगा में डुबकी मारकर कौए से हंस बनने का प्रयास करें।
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अभी-अभी हम सब भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस को मनाए हैं,स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी करने वाले स्वतंत्रता सेनानी कहलाये जाते हैं। सरकार ऐसे यशस्विओं को ताम्रपत्र, पेंशन और आवागमन के मुफ्त पास देकर सम्मानित करती है। स्वतंत्रता सैनानिओं में जो वरिष्ठ और विशिष्ट होते हैं, वे देश का शासन सूत्र संचालन करने वाले मूर्द्धन्य बनते हैं। ऐसी विभूतिओं के नाम पर न जाने कितने ही स्मारक बन जाते हैं जिन्हें सदिओं तक स्मरण किया जाता रहता है। ऐसे प्रतिभाशाली व्यक्तित्व इतिहास के पन्नों में सदा-सदा के लिए विराजमान हो जाते हैं जिनकी यशोगाथा पढ़कर लोग भाव-विभोर होने के साथ-साथ प्रेरणा भी लेते हैं।
यह उनकी प्रचण्ड प्रतिभा का प्रतिफल मात्र है।
यदि यह लोग संकीर्ण स्वार्थ परायणों की भांति अपने मतलब से ही मतलब रखते,तो तुच्छ से सुख-साधनों से ही मन बहला पाते, “प्रकाश स्तम्भ (Lighthouse) बनने का सौभाग्य कहाँ मिल पाता ? ऐसे लोग जो समय एवं अन्य साधनों के प्रति कंजूसी बरतते रहे, जब उन्होंने स्वयं की तुलना अग्रगामियों के साथ की तो उनके मुख से सहसा ही निकल आया:
रामनाम कड़वा लगे, मीठे लागे दाम। दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम॥
संतान के लिए अपार दौलत इक्क्ठी की, करोड़ों की सम्पत्ति बैंक में पड़ी रही यां बच्चों ने ऐशपरस्ती में बर्बाद कर दी। ऐसे व्यक्ति अपनी मूर्खता पर पश्चाताप ही करते रहते हैं लेकिन बीता हुआ समय कब वापिस आया है? तब बहुचर्चित गीत “गुज़रा हुआ ज़माना आता नहीं दोबारा” ही गुनगुनाना पड़ता है।
प्रतिभाशाली दिव्य आत्माओं की महान् उपलब्धियाँ स्मरण करके हर विचारशील का अन्त:करण उमगता है कि यदि उन्हें ऐसा ही श्रेय मिल सका होता तो कितना अच्छा होता। उस अवसर को गँवाकर वे जिस ललक-लिप्सा की पूर्ति का दिवा-स्वप्न देखते रहते हैं, उसे कौन साकार कर पाता है? मरते दम तक तृष्णा ही बनी रहती है कि यह होता तो ऐसा होता, इसी बहानेबाज़ी में जीवनलीला समाप्त हो जाती है,स्वयं को पहचानने की, ईश्वर द्वारा प्रदान की गयी शक्तिओं के पहचान ही नहीं हो पाती। शेखचिल्लियों का समुदाय कुबेर जैसा धनाढ्य और इन्द्र जैसा प्रतापी बनने के सपने देखता है लेकिन उसे मात्र इतना ही प्रतीत होता है कि कोल्हू के बैल की तरह पिसते हुए समय बीतता गया। श्मशान के भूत-पलीत की तरह डरते और डराते रहने के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगा।
भाग्यवान तो वही रहे जिन्होंने आदर्शों के साथ रिश्ता जोड़ा, महानता का मार्ग अपनाया और ऐसा कुछ कर दिखाया, जिसका अनुकरण करते हुए असंख्य लोगों को गौरव-गरिमा का लक्ष्य प्रदान करने वाला ऊर्जा भरा प्रकाश उपलब्ध होता रहा ।
गुरुदेव बता रहे हैं कि मनुष्य आज ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ मूर्खता और बुद्धिमत्ता के चयन के लिए सही निर्णय करने का अवसर है। वैसा अवसर सुयोग भी इन्हीं दिनों है, जिसका लाभ भगीरथ और अर्जुन ने अपनी प्रतिभा के बदले खरीदा था।
भगवान् के वरदान अनायास ही किसी को कहाँ मिलते हैं?
देवता भी कुपात्रों और असमर्थों पर कृपा कहाँ करते हैं। पात्रता की गहराई रहने पर ही वर्षा का पानी विशाल जलाशय के रूप में लहराता है।
यह युगसन्धि का प्रभात पर्व ऐसा है, जिसमें महाकाल को प्राणवान प्रतिभाओं की असाधारण आवश्यकता पड़ रही है। दैवी प्रयोजन महामानवों के माध्यम से ही क्रियान्वित होते हैं। अदृश्य शक्तियाँ तो उनमें केवल प्रेरणा ही भरती हैं, पात्रता और प्रतिभा तो स्वयं मनुष्यों की ही होती है। मनुष्य की यह स्वतंत्र चॉइस है कि वह उन अदृश्य शक्तियों के आमंत्रण को अपनाए या ठुकराए। यहाँ पर सुप्रसिद्ध मुहावरा रेफर करना उचित लगता है:Fortune knocks at least once at everyone’s door लेकिन उस सौभाग्यशाली दस्तक को कोई-कोई ही समझ पाता है। मनुष्य तथाकथित व्यस्तता के भ्रम में उस दिव्य आमंत्रण को नकार देता है और जीवन भर हाथ मलता रहता है।
गुरुदेव हम सबको अपने दिव्य साहित्य के माध्यम से इसी भ्रम से निकलने के लिए कह रहे हैं, प्रेरित कर रहे हैं कि आप सब में प्रतिभा है,बुद्धि है,पात्रता विकसित हुई पड़ी है, भगवान के खेत में योगदान देकर केवल श्रेय ही लेना है।
भगवान कृष्ण ने अर्जुन को कहा था:
‘‘दुष्ट कौरव तो पहले से ही मरे पड़े हैं। मैंने उनका पहले ही तेजहरण (उनकी शक्ति का हरण) कर लिया है। तुझे तो धर्मयुद्ध में निरत होकर मात्र श्रेय धारण करना है।’’
युग की विकृतियों का शमन तो होना ही है। नवसृजन का ऐसा महायज्ञ जाज्वल्यमान होना है, जिससे आगामी लम्बे समय तक सुख-शान्ति और प्रगति का वातावरण बना रहे, एकता और समता को मान्यता मिले, ध्वंस का स्थान सृजन ग्रहण करे और चेतना तथा भौतिक शक्तियों का नियोजन मात्र सत्प्रयोजनों के निमित्त होता रहे। तुम्हें इस महान योजना “युगनिर्माण योजना” का हिस्सा बनना है, इसी उज्ज्वल भविष्य को “सतयुग की वापसी” नाम दिया गया है।
यहाँ पर यह बताना आवश्यक हो जाता है कि परम पूज्य गुरुदेव जिस “सतयुग की वापसी” की बात कर रहे हैं, सही मायनों में है क्या? कहीं ऐसा तो नहीं कि पाठक पौराणिक युग के सतयुग की धारणा बनाए बैठे हैं?
गुरुदेव के अनुसार सतयुग की वापसी का अर्थ बाहरी समय या काल का चक्र बदलना नहीं, बल्कि इंसानों की सोच, चरित्र और व्यवहार में उच्च स्तर की उत्कृष्टता लाना है। उनके मुख्य संदेश “हम बदलेंगे, युग बदलेगा” से ही मनुष्य अपने श्रेष्ठ कर्मों से इस धरती पर फिर से सतयुग ला सकता है। समाज की बाहरी व्यवस्था तब तक नहीं सुधर सकती जब तक इंसान की सोच और मानसिकता में बदलाव न आए। इंसान के भीतर से अहंकार, लालच और नफरत खत्म होकर प्रेम, सहयोग और ईमानदारी का उदय होना ही सतयुग का आना है। भगवान और समय केवल एक के भरोसे बैठने के बजाय हर व्यक्ति को खुद में सुधार लाने के लिए कहते हैं। समाज के उत्थान के लिए सभी को इस दिशा में कार्य करना होगा। युग परिवर्तन कोई जादुई चमत्कार नहीं, बल्कि इंसान की आंतरिक चेतना का विकास है जो बुरे वक्त (कलियुग) की बुराइयों को खत्म कर देगी।
अनीति की असुरता का दमन, देवताओं की सामूहिक शक्ति, संघशक्ति माँ दुर्गा के अवतरण से सम्भव हुआ था। लगभग उसी पुरातन प्रक्रिया का प्रत्यावर्तन नये सिरे से, नये रूप में इन दिनों सम्पन्न होने जा रहा है। युगपरिवर्तन के इस प्रवाह में सम्मिलित होने वाले सामान्य पत्तों की तरह हलके होते हुए भी सरिता की धाराओं पर सवार होकर बिना कुछ विशेष प्रयास के ही महानता के महासमुद्र में जा मिलने में सफल हो सकेंगे।
अपने काम से, किसी से कुछ पाने के लिए कहीं जाना एक बात है लेकिन किसी समर्थ सत्ता द्वारा अपने सहायक के रूप में बुलाए जाने पर वहाँ पहुँचना बिल्कुल ही अलग बात है । पहली स्थिति में एक पक्ष की दीनता और दूसरे पक्ष की स्वाभाविक उपेक्षा भर रहती है लेकिन दूसरी स्थिति में आमंत्रित अतिथि को स्टेशन पर रिसीव करना, माला पहनाना एक अद्भुत सम्मान समझा जाता है। ऐसी विभूति के वार्तालाप को भी प्रमुखता दी जाती है और ऐसा आधार खड़ा किया जाता है कि आमंत्रित व्यक्ति में निमंत्रण का उद्देश्य समझने और उसमें सहभागी बनने की प्रतिक्रिया उत्पन्न हो। महाकाल द्वारा प्रज्ञा-परिजनों के भेजे गए आमंत्रण को इसी रूप में देखा-समझा जाना चाहिए। आदरणीय चिन्मय जी जब हमारे पास पहली बार रेडियो स्टेशन में आये थे तो जब हमने सम्मानपूर्वक फूलों का गुलदस्ता भेंट किया था तो उन्होंने सम्मानपूर्वक स्वीकार करते हुए कहा था, “त्रिखा जी हम तो अपने घर ही आये हैं।” हमारे साथिओं ने यह वीडियो अवश्य देखी होगी।
महाकाल ने अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए प्राणवानों के सामने गिड़गिड़ाने का उपक्रम नहीं किया है बल्कि सुनिश्चित सम्भावनाओं में,प्रतिभाशालिओं को भागीदार बनकर अजस्र सौभाग्य प्रदान करने के लिए चुना है। इस तरह बरसने वाले वरदान को नकारना, अवमानना करना किन्हीं अदूरदर्शी हतभागियों से ही बन पड़ेगा। लोभ-मोह के बन्धन तो अनादि और अनन्त हैं। उनके कुचक्र में फँसने और बँधे रहने के लिए हीन स्तर के प्राणी भी स्वतंत्र हैं लेकिन यदि मनुष्य अपने गरिमा भरे भविष्य को उसी तुच्छता पर आधारित करने का हठ करे, तो उसे समझदारों की पंक्ति में कैसे बिठाया जा सकेगा? यह एक बहुत ही सोचनीय प्रश्न है जिसे सार्थक करने के लिए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार कुछ भी करने को तैयार है, कुछ भी !!!! चाहे हमें कुछ भी करना पड़े, हम अपने कमांडर इन चीफ के आर्डर की अवहेलना नहीं कर सकते, ऐसा करने की स्थिति में कोर्ट मार्शल सुनिश्चित है- क्या हम उसके लिए तैयार हैं ?
सरकार मोर्चे पर सैनिकों को लड़ने भेजती है तो उनके लिए आवश्यक अस्त्रों, उपकरणों, वाहनों की, भोजन-आच्छादन की व्यवस्था भी करती है और उनके घर-परिवार के सदस्यों के निर्वाह हेतु वेतन भी प्रदान करती है।
युगसृजन के लिए संकल्पित होने वालों को आवश्यक प्रतिभा से लेकर उपयुक्त परिस्थितियाँ उपलब्ध न हों, ऐसा हो ही नहीं सकता। नवसृजन की सम्भावना तो पूरी होने ही वाली है, क्योंकि उसके न बन पड़ने पर ‘महाप्रलय’ ही शेष रह जाती है, जो कि स्रष्टा को अभी स्वीकार नहीं।
ऐसा किस आधार पर कहा जा रहा है ?
व्यक्ति और समाज अब इस कदर गुँथ गए हैं कि दोनों का पारस्परिक तालमेल पानी और मछली जैसा अविच्छिन्न हो गया है। कोई निजी उन्नति से, निजी सुविधा सम्पादन भर से सुखी नहीं रह सकता। अग्नि और महामारी किसी एक घर तक सीमित नहीं रहती। गुंडागर्दी एक जगह पनपेगी तो समूचे विश्व में विग्रह खड़ा करने का निमित्त कारण बनेगी। One world कांसेप्ट से दुनिया एक हो चुकी है,टेक्नोलॉजी ने विश्व को जितना छोटा बना दिया है उससे हम सभी अवगत है। जनमानस के गिरे हुए स्तर को उभारना प्रकारान्तर से अपनी और अपने परिकर की सुरक्षा करना,एक सामूहिक प्रयास है। सामूहिक जीवन ही मनुष्य की नियति है। इन दिनों सामूहिकता और भी अनिवार्य हो गई है। अपने मतलब से मतलब रखने की नीति अपनाने वाले यह नहीं समझते कि समुन्नत समाज के यूनिट ही वास्तव में सुखी रह सकते हैं। मनुष्य चाहे जितनी भी नुक्लिअर परिवार की सराहना करता रहे, है तो उसी विश्व्यापी समूह का एक छोटा सा यूनिट।
प्रतिभा के Continuous improvement के लिए उच्चस्तरीय वातावरण में एक साथ रहना, उत्कृष्ट सोचना और आदर्शवादी क्रियाकलापों में निरत रहना बहुत ही ज़रूरी है। यूनिट्स में रहते हुए भी निजी सुधार सामूहिकता के बिना संभव नहीं हो सकता। सद्गुणों का बाहुल्य एवं Continuous practice ही व्यक्ति को इस योग्य बनाता है कि वह दूसरों का सम्मान एवं सहयोग अर्जित कर सके। इसी सफलता के आधार पर किसी की प्रतिभा और गरिमा का वास्तविक मूल्यांकन हो सकता है। इसीलिए तो कहा जाता है Respect earn करनी पड़ती है,फ्री में नहीं मिलती, हमारा सौभाग्य है कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के प्रत्येक सदस्य ने ऐसे ही Respect earn की है, मानवीय मूल्यों का सम्मान किया है।
आज के लेख का समापन गुरुदेव के निम्नलिखित सन्देश से हो रहा है:
संकीर्ण स्वार्थपरता की पूर्ति में ही अपनी समूची क्षमताएँ न खपा दी जाएँ, इसमें जितना लाभ दिखाई पड़ता है उसकी तुलना में घाटा अधिक है। व्यापक स्तर का सार्वजनीन स्वार्थ ही परमार्थ है। परमार्थ परायण व्यक्ति निज का हितसाधन तो निश्चित रूप से करते ही हैं, साथ ही चन्दन वृक्ष की तरह अपने ऊपर लिपटे सांपों को भी गरिमा प्रदान करते हैं। विज्ञान इस तथ्य को भी नकारते हुए कहता है कि चन्दन के वृक्ष पर सर्पों का लिपटना चंदन की सुगंध के कारण नहीं बल्कि ठंडक के कारण होता है। सेवा-साधना ही Talent enhancement का प्राथमिक lesson है जिसे पढ़े बिना काम नहीं चलता। उच्चस्तरीय सेवासाधना में दो ही तत्त्व प्रमुख हैं: एक सत्प्रवृत्ति संवर्धन, दूसरा दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन। इन दो प्रयासों को अपनाने के लिए अपने समय और साधनों का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहने का महत्त्व समझा जाना चाहिए।
जय गुरुदेव
