Personality development, वर्तमान युग की बहुत बड़ी मांग बन चुकी है,कंपनियों में मैनेजर लेवल के लोगों के लिए कोर्सेज डिज़ाइन किये हुए हैं जिन्हें करना आवश्यक समझा जाता है। कॉलेज, यूनिवर्सिटीज में भी इस कोर्स का बड़ा महत्व है। इसी तरह Talent development के भी कुछ कोर्स उपलब्ध हैं जिन्हें पर्सनालिटी डेवलपमेंट के साथ ही कराया जाता है।
आज के ज्ञानप्रसाद लेख में प्रतिभा परिष्कार,प्रतिभा परिवर्धन को बहुत ही सरल भाषा में समझने का प्रयास है।
आइए 14 अगस्त 2026 की गुरुकक्षा का शुभारम्भ गुरुचरणों में श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए करें।
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वर्तमान लेख श्रृंखला में प्रतिभा शब्द की सर्जरी करके उसे अंदर बाहिर से जानने का प्रयास किया जा रहा है। सबसे पहले तो यही प्रश्न मन में उठता है कि प्रतिभा आखिर है क्या? इंग्लिश में प्रतिभा के समानांतर शब्द Talent, Genius,Gifted एवं Brilliance होते हैं। इन्हीं शब्दों को God-gifted आदि शब्दों से भी परिभाषित किया जाता है। जब हम कहते हैं कि वोह व्यक्ति बहुत ही Talented है तो सहसा काउंटर प्रश्न उठता है कि क्या वोह टैलेंट God-gifted है यां उस व्यक्ति ने कोई विशेष शिक्षा प्राप्त करके Acquire किया है।
36 वर्ष पूर्व गुरुदेव ने जब क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला की रचना की तो इस पुस्तकमाला की तीसरी पुस्तक “युग की मांग-प्रतिभा परिष्कार भाग 1” में लिख दिया था कि Talent development के लिए निर्धारित सिद्धान्तों को व्यवहार में उतारने के लिए “अवसर,समय और वातावरण” बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। यह तीनों,कभी भी,कहीं एक जगह एकत्रित नहीं मिलते। उन्हें दाने बीनने वाले की तरह झोली में भरना पड़ता है। हनुमान् जी ने “समय न होने का बहाना किया होता” तो उस श्रेय से चूक गए होते और सुग्रीव के सेवक बनकर ही जीवन व्यतीत कर देते।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार द्वारा Coin किये गए मानवीय मूल्य इसी केटेगरी में आते हैं।
जब प्रतिभा की बात हो रही है तो अगला प्रश्न तो यही उठता है कि क्या प्रतिभा जन्मजात होती है?
Mendel’s theory of Inheritance तो यही कहती है कि प्रतिभा विरासत में मिलती है। संतान के Genes माता पिता से मैच करते हैं। राज घरानों में जन्म लेने वाली संताने जन्मजात ही राजसी प्रतिभाएं लेकर आती हैं लेकिन इन जन्मजात प्रतिभाओं के दुरूपयोग से राजपाट गटर में गिरते भी देखे गए हैं। दूसरी तरफ झुग्गी झोंपड़ी में जन्मा शिशु, परिश्रम और लगन से कहाँ से कहाँ पंहुच जाता है,उससे भी कोई अपरिचित नहीं है। लेखक के मस्तिष्क में जब ऐसे संदर्भ चल रहे होते हैं तो मस्तीचक बिहार स्थित अखंड ज्योति हॉस्पिटल की बेटियों की प्रगति स्वतः ही चरितार्थ हो जाती है। आदरणीय मृतुन्जय भाई साहिब के निस्वार्थ समर्थन को और बेटियों की संकल्पशक्ति को नमन करते हैं जिन्होंने बिहार प्रदेश में एक क्रांति जैसी ला दी है। जब संकल्पशक्ति दृढ़ होती है तो भगवत्कृपा अवश्य बरसती है।
Inheritance में, बिना किसी लिखा-पढ़ी के भी माता पिता की संपत्ति संतान को मिल जाती है। यह तथ्य ईश्वर के राजकुमार के लिए भी फिट बैठता है,उसे भी ईश्वर के गुण-विशेषताएं बिना मांगे ही प्राप्त हो जाते हैं, किसी भी लीगल डॉक्यूमेंट की ज़रुरत नहीं पड़ती,इन्हीं को वरदान कहा गया है, यहाँ भी समय का बहुत बड़ा महत्व है, नक्षत्रों-पत्री-ग्रहों की दशा आदि से यही एनालिसिस तो किया जाता है। यहाँ पर भी जन्मजात प्रतिभाओं के दुरूपयोग से गटर में जाने के अनेकों उदाहरण हैं।
जो भी हो, प्रतिभा परिवर्धन (Talent development) का विषय बहुत ही महत्वपूर्ण है इसे हलके में नहीं लेना चाहिए, इसे हम सबको ठीक से समझ लेना चाहिए।
परम पूज्य गुरुदेव ने इस विषय को निम्नलिखित चार स्टेप्स में समझाया है :
1. क्षमताओं का अभिवर्धन (Enhancement of capabilities)
मनुष्य को ईश्वर अनेकों क्षमताएं देकर इस संसार में भेजते हैं, यह मनुष्य का कर्तव्य है कि वह इन क्षमताओं का सदुपयोग एवं नियोजन करता रहे। आलस्य-प्रमाद से बचकर, सदा जागरूक और स्फूर्तिवान बने रहना मनुष्य की ही ज़िम्मेवारी है। एक-एक क्षण को बहुमूल्य मानकर,प्रत्येक क्षण को योजनाबद्ध तरीके से सदुद्देश्यों में सुनियोजित रखना मनुष्य की ही ड्यूटी है।
गुरुदेव ने ऐसी मन:स्थिति को “महाजागरण” कहा है। आमतौर से लोग अर्द्ध तंद्रा (Half-sleep) की स्थिति में जिन्दगी को दर्द की तरह जीते रहते हैं। निर्वाह साधन पा लेने भर से उन्हें सन्तोष हो जाता है। वे भाव-तरंगें उठती ही नहीं, जो आज की तुलना में आने वाले कल को अधिक परिष्कृत बनाने के लिए लालायित रहती हैं ।
प्रतिभा के उपासक ऐसे व्यक्तियों से बिल्कुल अलग होते हैं। वह दलदल भरी ज़िंदगी से उबरते हैं, अपनी क्षमताओं को निखारते हैं, उसे एक मूल्यवान पूँजी की तरह सँभालते हैं एवं सदुपयोग करते हैं। जो ट्रांसफर हुआ है, Inherit हुआ है उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करते हैं।
यही है कल्पवृक्ष का उत्पादन एवं उसका उद्देश्यपूर्ण सदुपयोग क्रियान्वयन।
कौन जानता है कि कल्पवृक्ष कहीं Exist करता भी है कि नहीं ? किसने देखा है कि जो भी स्वर्गीय कल्पवृक्ष से नीचे बैठा और उसने मन चाहा सब कुछ प्राप्त कर लिया? कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन “प्रतिभा के कल्पवृक्ष” से, प्रतिभा के सदुपयोग से बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है,इसके लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।
2.मनुष्य का व्यक्तित्व:
अपने व्यक्तित्व को चुम्बकीय,आकर्षक एवं विश्वस्त स्तर का विकसित करना मनुष्यता के साथ जुड़ने वाला प्राथमिक गुण है। इसके लिए अपना रहन-सहन ऐसा बनाना पड़ता है जैसा जागरूक, जिम्मेदार और सज्जनता-सम्पन्नों का होना चाहिए। शरीर और मन की स्वच्छता, शिष्टाचार का निर्वाह और वाणी में मधुरता का गहरा पुट लगाए रहना भी आवश्यक है। इसके लिए अपनी नम्रता का परिचय देना और दूसरों को सम्मान देना आवश्यक है। उसे वही मनुष्य कर पाते हैं, जो दूसरों के गुण देखकर उनसे प्रेरणा ग्रहण करते रहते हैं, साथ ही अपनी त्रुटियों को खोजते एवं उनके निष्कासन-परिष्कार में लगे रहते हैं। ओछे व्यक्ति अपनी शेखी बघारते रहते हैं, सोशल मीडिया पर बड़ी ही नियमितता से अपनेआप के विज्ञापन छापते रहते हैं, दूसरों के दोष गिनने में बढ़ चढ़ का भाग लेते हैं,फिर एक दिन आता है कि उसी जंजाल में उनका चिन्तन, Supremacy, Influencership उड़नछू हो जाती है,ढूढ़ने पर भी कहीं मिलती नहीं है।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि प्रतिभावान व्यक्तिओं के होठों पर मन्द-मुस्कान देखी जाती है। इसी आधार पर यह जाना जा सकता है कि वे अपनेआप में सन्तुष्ट और प्रसन्न हैं। उन्होंने तो यहाँ तक भी दावा किया हुआ है कि मुस्कान के साइज से, मुस्कान की टाइप से बता देते हैं कि यह व्यक्ति कितना प्रसन्न है। ऐसे लोग दूसरों को भी प्रसन्नता देते हैं, इसीलिए तो कहा गया है, Smile is contagious, प्रसन्नता छूत की बीमारी है। खीजते-खिजाते लोगों से कौन मिलना चाहेगा, नेगेटिविटी किसको पसंद होती है ?
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार से अनेकों बार सन्देश प्रसारित हो चुका है :
संसार में वैसे ही नेगेटिविटी बहुत है,कृपया गुरुदेव के साहित्य का स्वाध्याय करके,समझ कर पाजिटिविटी फैलाने में सहयोग करें
3.सुव्यवस्था:
सुव्यवस्था जीवन की बहुत ही महत्वपूर्ण विशेषता है। अस्त-व्यस्त स्थिति में प्रचुर साधन रहते हुए भी बहुत से लोग असफल रह जाते हैं, उपहासास्पद बनते हैं। प्रतिभाएँ सदा एक जैसी नहीं रहतीं, समय के साथ-साथ उन्हें अपडेट करते रहना बहुत ही ज़रूरी है। परिवर्तन संसार का एक बहुत बड़ा शाश्वत नियम है। व्यक्ति को परिवर्तन को बिना किसी हिचकचाहट के तत्परतापूर्वक मानना चाहिए।
हमारे ज्ञानरथ परिवार के साथिओं ने,एक दूसरे की सहायता से,टेक्नोलॉजी के परिवर्तन का जिस प्रकार आलिंगन किया है,यह अपनेआप में उदाहरणीय है। इस छोटे से परिवार के अधिकतर साथी जीवन के उस पड़ाव पर हैं जहाँ जड़ता, हठवादिता के शिकंजे इस प्रकार जकड़े रखते हैं कि कुछ भी नया करने का साहस नहीं हो पाता, जैसा चलता आया है वैसा ही ठीक है,अब तो ज़िंदगी के कुछ ही पल बचे हैं। उम्र के इस पड़ाव में अधिकतर लोग सोचते हैं कि प्रगतिशीलों को सदा परिस्थितियों के अनुरूप रणनीति बनानी पड़ती है और चलते ढर्रे में आवश्यक सुधार लाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के समर्पित साथी इस तथ्य को भलीभांति समझ चुके हैं कि Age is just a number, वोह समझ चुके हैं कि जो अपने समय का, श्रम का, साधनों का, विचारों का, परिवार का सुनियोजन (सु-नियोजन,Proper planning) कर सकता है और उन्हें सही दिशा दे सकता है, उसे ही इस योग्य समझा जाता है कि वह कोई बड़ी या अतिरिक्त जिम्मेदारी को वहन कर सके। किन्हीं बढ़ी-चढ़ी महत्त्वाकांक्षाओं को सँजोने से पूर्व यह प्रमाण देना पड़ता है कि व्यक्तित्व, परिकर एवं क्रियाकलापों में किस सीमा तक व्यवस्था/बुद्धि का उपयोग किया गया और उन्हें कितना सफल-समुन्नत बनाकर दिखाया गया।
4.अग्रगमन-नेतृत्व (Advancement and leadership)
अग्रगमन का अर्थ होता है,आगे चलना, यह उत्साह, साहस और आत्मविश्वास का प्रतीक है। साधारण जन आत्महीनता से ग्रसित, झिझक, संकोच, अनिश्चय एवं साहसहीनता की मन:स्थिति में पड़े पाए जाते हैं। वे उचित/सरल कार्यों के लिए भी कदम बढ़ाने का साहस नहीं कर पाते,भेड़-बकरियों के झुण्ड की तरह चाबुक खाते चलते रहना उनकी प्रवृति बन चुकी होती है। ऐसे लोग अधिक-से-अधिक इतना ही सोच पाते हैं कि कोई आगे बढ़े तो उसके पीछे चलने लग पड़ेंगे, Initiative लेना,लीडरशिप प्रस्तुत करना उनके DNA में exist ही नहीं करता। ऐसे लोग उचित निष्कर्ष निकाल लेने पर भी उस मार्ग का अवलम्बन नहीं कर पाते। जब भी किसी स्थिति के बारे में राय पूछी जाए तो गोलमोल उत्तर देकर पल्ला झाड़ने वाले लोग केवल झंडा उठाने का काम ही कर सकते हैं।
ऐसों के बीच उन्हीं को मनस्वी माना जाता है, जो उचित के प्रति अटूट आस्था रखते हों और जो करना चाहिए उसे अन्यों का समर्थन-सहमति न मिलने पर भी अकेले ही कर दिखा पाने की क्षमता रखते हों। स्कूल टाइम की कक्षाओं में ऐसे ही Stand out बच्चे को टीचर मॉनिटर बना देते थे और सारी क्लास उसे फॉलो करती थी। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में भी Stand out प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है, ऐसी ही प्रतिभाओं ने इस परिवार के लिए एक बेमिसाल प्रथा को आज तक जीवित रखा हुआ है जिसका समानांतर उदाहरण बार-बार ढूंढने पर भी नहीं मिल रहा।
गुरुदेव ने इन एकाकी प्रयासों को दूध गरम करते ही मलाई के तैरकर ऊपर आ जाने के समकक्ष बताया है।
उत्कृष्ट प्रतिभाएँ,एक Role model, एक leader की भांति, अकेले ही आगे बढ़कर अपने अग्रगमन की क्षमता का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं, फिर सर्वत्र उनकी मनस्विता का लोहा माना जाने लगता है। दूसरे लोग भी उनका अनुकरण करते हैं। गुरुदेव ऐसी ही प्रतिभाओं को खोज रहे हैं, अब अपना स्वयं का मूल्यांकन करने का स्वर्ण अवसर है। ऐसे लोगों की प्रामाणिकता की परख होने पर सब ओर से एक-से-बढ़कर-एक भारी-भरकम जिम्मेदारियाँ उनके ऊपर आग्रहपूर्वक डाली जाने लगती हैं। वे उन्हें सहर्ष स्वीकार भी करते हैं और जो कार्य हाथ में लेते हैं, उसे सर्वांगपूर्ण ढंग से सम्पन्न कर दिखाते हैं।
रेल का इंजन अकेले चलता है, स्वयं दौड़ता है और अपने साथ भरे डिब्बों की लम्बी श्रृंखला को घसीटते हुए निर्धारित लक्ष्य की दिशा में पटरी पर दौड़ता चला जाता है। सर्वविदित है कि डिब्बों की तुलना में इंजन को अधिक महत्त्व मिलता है, उसका मूल्यांकन भी अधिक ही होता है।
तो साथिओ यहीं पर सोमवार तक के लिए मध्यांतर होता है।
जय गुरुदेव
