23 उत्कृष्ट पुस्तिकाओं का अद्भुत संग्रह जिसे गुरुदेव ने आज से लगभग 36 वर्ष पूर्व “क्रांतिधर्मी सहित्य पुस्तकमाला” टाइटल से रच कर हम सब पर जो उपकार किया है उसे शब्दों में वर्णन लगभग असंभव है। गुरुदेव ने इस पुस्तकमाला को अपने सारे साहित्य का मक्खन कहा है,उसी मक्खन की तीसरी रचना “युग की मांग-प्रतिभा परिष्कार भाग 1” पर आधारित ज्ञानप्रसाद लेख श्रृंखला का शुभारम्भ दो दिन पूर्व हुआ था। आज उस लेख श्रृंखला का तीसरा लेख प्रस्तुत किया गया है। पहले लेख में चार प्रकार की प्रतिभाओं (हीन जन,प्रजाजन,प्रतिभावान एवं देवमानवों) का संक्षिप्त सा वर्णन था। इन चार वर्गों में से किस पर विश्वास किया जाए कि किसके बलबूते युगनिर्माण सम्भव हो पायेगा, ऐसी प्रतिभाएं आकाश से तो अवतरित नहीं होंगी, हम और आप में से ही उनकी खोज की जाएगी, पात्रता के आधार पर जिसकी जितनी समर्था होगी उसे उतना एवं उसी तरह का कार्य सौंप दिया जायेगा। आज के लेख में अनेकों उदाहरणों के साथ दिव्य प्रतिभाओं की खोज प्रक्रिया का वर्णन है। अवश्य ही परम पूज्य गुरुदेव युगसेना के कमांडर इन चीफ होंगें, आदरणीय चिन्मय जी जैसे उत्कृष्ट प्रतिभावान व्यक्तित्व अग्रिम पंक्ति में होंगें एवं हम जैसे अनेकों साथी रीछ,वानर,गिलहरी,गिद्ध सहयोग देने के लिए यथासंभव उपस्थित रहेंगें, झंडा उठाने के लिए भी तो कुछ लोग चाहिए, मशाल को भी तो थामना है। इस विश्व्यापी अभियान में किसी का कार्य भी छोटा यां बड़ा नहीं होगा, यह एक सामूहिक सहयोग है।
आइए इन्हीं ओपनिंग पंक्तियों से ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की 12 अगस्त 2026 की गुरुकक्षा का शुभारम्भ करें।
**************
गुरुदेव कह रहे हैं कि दूध में मक्खन घुला होता है, लेकिन उसे अलग निकालने के लिए उबालने, मथने जैसी कई प्रक्रियाएं करनी होती हैं। इन दिनों प्राणवान प्रतिभाओं की अतिशय आवश्यकता पड़ रही है जो इस समुद्र मन्थन जैसे युगसन्धि पर्व में अपनी कम से कम निम्नलिखित महती भूमिका तो निभा ही सकें:
-अनिष्ट के अनर्थ से मानवीय गरिमा को नष्ट होने से बचा सकें। -उज्ज्वल भविष्य की संरचना में एक ऐसा प्रचण्ड पुरुषार्थ प्रदर्शित कर सकें जैसा गंगा अवतरण में मनस्वी भगीरथ द्वारा किया गया था।
उत्कृष्ट प्रतिभाओं की खोज करना बहुत ही बड़ा एवं कठिन कार्य है,कहाँ से मिलेंगी ऐसी प्रतिभाएं एवं कैसे होगा उनका मूल्यांकन?।
माँ सीता को रावण के चंगुल से छुड़ाने के लिए वानर समुदाय विशेष खोज में निकला था। समुद्र-मन्थन भी ऐसी ही खोज का एक इतिहास है। गहरे समुद्र में उतरकर ही मणि-मुक्तक खोजे जाते हैं। कोयले की खदानों में से खोजने वाले कार्यकर्ता ही हीरे ढूँढ़ निकालते हैं। धातुओं की खदान इसी प्रकार धरती को खोद-खोदकर ढूँढी जाती है। दिव्य औषधियों को सघन वन प्रदेशों में खोजना पड़ता है। वैज्ञानिक लोग प्रकृति के रहस्यों की खोज करने का काम करते हैं।
हाड़-माँस की काया में से देवत्व को जागृत करने के लिए गहरी साधना की जाती है । यह साधना अपने में एक अलग प्रकार की खोज है। यही कारण है कि इन दिनों “महाप्राणों” की भारी खोज हो रही है, इन महाप्राणों के बिना, युगसन्धि का महाप्रयोजन कदापि पूरा नहीं हो सकेगा।
आइए देखें गुरुदेव किन विभूतिओं को महाप्राण कह रहे हैं :
महाप्राण’ एक ऐसा ओजस्वी, प्रभावशाली और उच्च चेतना संपन्न व्यक्तित्व है जिसके भीतर असीम मानसिक, शारीरिक और आत्मिक ऊर्जा (प्राण शक्ति) का प्रवाह होता है। ऐसा व्यक्ति साधारण सीमाओं से ऊपर उठकर अपने असाधारण विचारों, दृढ़ संकल्प और महान कार्यों से समाज को नई दिशा और प्रेरणा देता है।
प्राण-चेतना से भरपूर यह व्यक्तित्व खुद एक “डायनेमो” की तरह ऊर्जा पैदा करता है और दूसरों को भी प्रफुल्लित रखता है। यह व्यक्तित्व कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी न घबराने वाला ऐसा अटूट आत्मविश्वास लिए होता है जिसके संपर्क में आने मात्र से दूसरों के जीवन में सकारात्मकता और उत्साह का संचार होता है। स्वार्थ से ऊपर उठकर संपूर्ण मानवता या समाज के हित में कार्य करना उसकी विशेषता होती है।
आज का व्यक्ति तो अपनी ही व्यक्तिगत समस्याओं में उलझा हुआ है उससे कैसे कोई आशा की जा सके? लेकिन महामानव एवं महाप्राण इन्हीं उलझे हुओं में से खोज निकालने का कार्य हमें करना है। जिस प्रकार सामयिक एवं क्षेत्रीय समस्याओं का निराकरण वातावरण बदले बिना सम्भव नहीं हो सकता उसी प्रकार परिजनों के वातावरण में बदलाव लाना होगा। Globalisation के कारण कोई भी समस्या आज व्यक्तिगत न रह कर सामूहिक एवं विश्वव्यापी हो गई है। उनका निराकरण व्यक्ति को कुछ ले-देकर नहीं हो सकता। चेचक की फुंसियों पर पट्टी कहाँ बाँधते हैं? स्थायी उपचार तो रक्त-शोधन (Blood purification) की प्रक्रिया से ही बन पड़ता है। अब तो ऐसा लग रहा है कि रक्त-शोधन भी शायद ही काम करे, Blood Transfusion ही एकमात्र विकल्प रह गया है, पूरा रक्त ही निकाल कर बदलने की ज़रूरत है।
मनुष्य के चिन्तन और प्रचलन में इतनी अधिक विकृतियों का समावेश हो गया है कि उन्हें लॉजिक एवं विवेक से बिल्कुल ही प्रतिकूल माना जा रहा है। समझाया तो उसे जा सकता है जिसकी समझने की इच्छा हो। अस्वस्थता, उद्विग्नता, आक्रामकता, निष्ठुरता, स्वार्थान्धता, संकीर्णता, उद्दण्डता का बड़ों और छोटों में अपने-अपने ढंग का बाहुल्य है। ऐसा लगता है कि मानवीय मर्यादाओं के पालन को नकार ही दिया गया है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से समय-समय पर मानवीय मूल्य प्रसारित करके उनका पालन करने के लिए निवेदन किया जाता हैं।
मानवता को नकारने के कारण ही आज के व्यक्ति को अनेकानेक संकटों और समाज को विचित्र समस्याओं का सामना करना पड़ता है। सब कुछ होते हुए भी न कोई सुखी दिखता है, न सन्तुष्ट, हर कोई भांति-भांति की शिकायतें ही करता दिखता है। Complaint करना एक रिवाज़ सा बन गया है। सर्वशक्तिमान मालिक का धन्यवाद करने वाले बहुत ही कम दिखते हैं। हर कोई आतंक और आशंका से डरा हुआ, दुःखी जैसा दिखता है।
तो फिर क्या है विकल्प,इस स्थिति का कैसे होगा समाधान?
इस कठिन कार्य को सम्पन्न करने के लिए “विशिष्टता-युक्त प्रतिभाएँ” चाहिए। बड़े युद्धों को जीतना वरिष्ठ सेनानायकों द्वारा अपनाई गई रणनीति और सूझ-बूझ के सहारे ही सम्भव हो पाता है। यही बात बड़े सृजनों के सम्बन्ध में भी लागू होती है। ताजमहल जैसी इमारत बनाने,चीन की दीवार खड़ी करने, हावड़ा ब्रिज जैसे बड़े निर्माण के लिए महापुरुषार्थों के लिए वरिष्ठ लोगों की, वस्तुस्थिति के साथ तालमेल बिठाकर चलने वाली नीति ही सफल होती है। उनके लिए आवश्यक साधन एवं सहयोग जुटाना भी कोई खेल नहीं होता। बड़ी प्रतिभाएँ ही बड़ी योजनाएँ बनाती हैं, वे ही उतने भारी-भरकम दायित्व उठाती हैं। इस लेख को पढ़ रहे छोटे साथी तो, गिलहरी की तरह, समर्थन भर ही दे सकते हैं। उनमें तो सफलता पर हर्ष और असफलता पर विषाद प्रकट करने भर की क्षमता ही होती है।
इन दिनों दो कार्य प्रमुख हैं:
-विपन्नता(दुःख, चिंता, निर्धनता जैसी स्थिति) से जूझना और उसे निरस्त करना
-नवसृजन की ऐसी आधारशिला रखना, जिससे अगले ही दिनों सम्पन्नता, बुद्धिमत्ता, कुशलता और समर्थता का सुहावना माहौल बन पड़े। इक्कीसवीं सदी को दूरदर्शी लोग सर्वतोमुखी (All round progress) प्रगति की सम्भावनाओं से भरी-पूरी मानते हैं। इस अवधि में सतयुग की वापसी पर विश्वास करते हैं।
निम्नलिखित पंक्तियों में समाधान होता दिख रहा है?
इन्हीं दिनों समर्थ प्रतिभाओं का सृजन, उन्नयन और प्रखरीकरण तेजी से हो रहा है। हो सकता है इस सृजन में किसी अदृश्य शक्ति, ऐसी शक्ति का जो समय-समय पर आड़े समय में बिगड़ता सन्तुलन सँभालने के लिए एवं अपने वर्चस्व का प्रकटीकरण करती रही है, हाथ हो। देखने में तो अविश्वसनीय लगता है लेकिन तेजस्वी प्रतिभाएँ ही भौतिक समृद्धि बढ़ाने, प्रगति का वातावरण उत्पन्न करने और अन्धकार भरे वर्तमान को उज्ज्वल भविष्य में बदलने का श्रेय सम्पादित करती रही हैं। ऐसी तेजस्वी प्रतिभाओं को ही किसी देश, समाज एवं युग की वास्तविक शक्ति एवं सम्पदा माना जाता है। बातें तो बहुत ही बड़ी-बड़ी एवं अविश्वसनीय प्रतीत हो रही हैं लेकिन सत्य यही है कि ऐसी प्रतिभाएँ, उदीयमान वातावरण में ही उगती और फलित होती हैं। इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि वर्षाऋतु में हरियाली और वसन्त में प्राकृतिक सौंदर्य का प्राकट्य होता है। विशिष्ट प्रतिभाएँ अनायास ही नहीं बरस पड़ती, न ही वे मशरूम की भांति वर्षाऋतु में स्वयं ही उग पड़ती हैं। ऐसी प्रतिभाओं को प्रयत्नपूर्वक खोजा, उभारा और खरादा जाता है। इसके लिए आवश्यक एवं उपयुक्त वातावरण बनाया जाता है।
इन दिनों कुछ ऐसा ही चल रहा है। असन्तुलन को सन्तुलन में बदलने के लिए महाकाल की कोई बड़ी योजना बन रही है। उसे मूर्त रूप देने के लिए दो छोटे से किन्तु अति महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम सामने आए हैं।
-पहला, आदर्शवादी सहायकों में उमंगों को उभारना और एक सूत्र में बांधना। साथ ही कुछ नियमित एवं सृजनात्मक गतिविधियों को प्रारम्भ करना, जो सद्विचारों को सद्कार्यों में परिणत कर सकने की भूमिका बना सकें।
– दूसरा,अनीति के खिलाफ मोर्चा खड़ा करना, इस मोर्चे को एक प्रयास से आरम्भ करके विशाल, विकराल बनाना। एक चिंगारी दावानल बनती हुई अनेकों ने देखी होगी। नन्हें से बीज से ही विशाल वृक्ष बनता है। ध्वंस एवं सृजन दोनों का यही उपक्रम है,एक कदम शालीनता के सृजन का एवं दूसरा अनीति के दमन का। सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के दो मोर्चों पर, दोधारी तलवार से, दो स्तर की रीति-नीति अपनाना। यही है वह अग्रगमन, जिस पर हम सब कदमताल करते हुए,आगे बढ़ते हुए, अपने गुरुदेव के साथ, कमांडर इन चीफ़ के हर निर्देश का पालन करने को वचनबद्ध हों। ऐसा करके ही धरती पर स्वर्ग का अवतरण सम्भव हो सकता है। गुरुदेव का जो कोई भी सैनिक, उनका निर्देश नहीं मानेगा, उसका कोर्ट मार्शल सुनिश्चित है।
उज्ज्वल भविष्य की सर्वतोमुखी प्रगति (All round progress) एवं चिरस्थायी शान्ति (Everlasting peace) के लक्ष्य तक हम जैसों का सहयोग ही बहुत बड़ा योगदान है, जो हम सब इन लेखों के माध्यम से कर रहे हैं, यही है सही अर्थों में विचार क्रांति, गुरुदेव को जानना, गुरुदेव को समझना एवं “उनकी” सुनना। गुरुदेव “को” सुनने वाले तो अनेकों होंगे लेकिन उन “की” सुनने वाले कोई-कोई ही होगा ।
विचार क्रांति के महाजागरण से ही सोई हुई प्रतिभाओं की मूर्च्छना हटेगी। वे अँगड़ाई लेते हुए लम्बी मूर्च्छना से पीछा छुड़ाती और दिनमान की ऊर्जा प्रेरणा से कार्य क्षेत्र में अपने पौरुष का परिचय देती दृष्टिगोचर होंगी। इस भवितव्यता को हम सब इन्हीं आँखों से अपने ही सामने मूर्तिमान होते हुए देखेंगे।
प्रयत्न करके खदानों से हीरे खोज तो लिए जाते हैं लेकिन उन्हें चमकदार, बहुमूल्य और हार में शोभायमान स्थान पाने के लिए खरादना अनिवार्य होता है। धातुएँ अनेक बार के अग्नि संस्कार से ही संजीवनी जैसे रसायनों के रूप में परिणत होती हैं। पहलवान अखाड़े में लम्बा अभ्यास करने के उपरान्त ही दंगल में विजयश्री वरण करते हैं। शिल्पी और कलाकार अपने विषय में प्रवीण-पारंगत बनने के लिए लम्बे समय तक अभ्यासरत रहते हैं। प्रतिभाओं का प्रशिक्षण और परिवर्धन, आदर्शवादी गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भूमिका निभाने के उपरान्त ही सम्भव हो पाता है।
इन सभी उदाहरणों के अनुरूप जहाँ प्रतिभाओं को खोजा जा रहा है, वहीं उनकी प्रखरता निखारने के लिए ऐसे कार्यों में जुटाया भी जा रहा है, जिनके कारण उनका ओजस्, तेजस् और वर्चस् स्वयं ही अपनी किरणें बिखेर दे।
विश्वामित्र ने दशरथ पुत्रों को, युगसृजन प्रयोजन के लिए, उपयुक्त समय पर उनकी तेजस्विता उभारने के लिए यज्ञ की रक्षा करने और असुरों से जूझने का काम सौंपा था। हनुमान्, अर्जुन आदि ने ऐसी ही अग्नि परीक्षाओं से गुजरते हुए असाधारण गौरव पाया था। इनमें से किसी पर भी महानता आकाश से नहीं बरसी है। पराक्रम से जी चुराने वाले तो कृपणों-प्रमादियों की तरह, मात्र हाथ ही मलते रहते हैं।
इन दिनों जन्मान्तरों से संचित सुसंस्कारों वाली प्रतिभाएँ खोज निकाली गई हैं। उन्हें युगचेतना के साथ जोड़ा गया है। इन्हें “नवसृजन साहित्य के माध्यम” से पुष्प वाटिका में मधुमक्खियों की तरह, दिव्य सुगन्ध ने आमंत्रित किया है और उसी परिकर में छत्ता बनाकर रहने के लिए सहमत कराया है। प्रज्ञा परिवार को इसी रूप में देखा, समझा और आँका जा सकता है। युगसृजन का लक्ष्य लेकर अवतरित हुई दिव्य आत्माओं के समुदाय को ही प्रज्ञा परिजन कहा जा सकता है। वे अन्तरात्मा को अमृत पिलाने वाले, युगसाहित्य का रसास्वादन करते रहे हैं, मिशन की पत्रिकाएँ नियमित रूप से पढ़ते रहे हैं। युगचेतना की भावभरी प्रेरणाओं का यथासम्भव अनुसरण भी करते रहे हैं। उनके अब तक के योगदान को, परमार्थ पुरुषार्थ को, मुक्त कण्ठ से सराहा जा सकता है लेकिन बड़े प्रयोजनों के लिए इतना ही तो पर्याप्त नहीं है। समय की बढ़ती माँग को देखते हुए, बड़े कदम भी तो उठाने पड़ेंगे। बच्चे का छोटा सा पुरुषार्थ भी अभिभावकों द्वारा भली-भाँति सराहा जाता है लेकिन युवा होने पर बचपन की पुनरावृत्तियाँ करने भर से भला कोई यशस्वी बन पाया है ?
गुरुदेव, यहाँ पर परिजनों के पिछले दिनों के योगदान के मूल्यांकन को घटा नहीं रहे हैं लेकिन यह कह रहे हैं कि इतने भर से बात नहीं बन पाएगी। जितना पिछले दिनों हो चुका है, महाकाल की अभिनव चुनौती स्वीकार करने के लिए उतने पर ही सन्तोष नहीं किया जा सकता। यह लम्बा संग्राम है, निष्ठावान परिजनों के जीवन भर चलते रहने वाला संग्राम।
36 वर्ष पूर्व जब गुरुदेव ने इस दुर्लभ साहित्य, जिसे गुरुदेव ने अपने जीवन का मक्खन कहा है, लिखा था:
इक्कीसवीं सदी आरम्भ होने में अभी 10 वर्ष का समय शेष है। इस युगसन्धि वेला में तो हम सबको, उस स्तर की तप साधना में संलग्न रहना है, जिसे भगीरथ ने अपनाया और धरती पर स्वर्गस्थ गंगा का अवतरण सम्भव कर दिखाया था। महामानवों के जीवन में कहीं कोई विराम नहीं होता। वे निरन्तर अनवरत गति से, शरीर छूटने तक चलते ही जाते हैं। इतने पर भी लक्ष्य पूरा न होने पर जन्म-जन्मान्तरों तक उसी प्रयास में निरत रहने का संकल्प संजोए रहते हैं। इसी परम्परा का निर्वाह हमारे गायत्री परिवार के परिजनों को भी करना है। हमारे परिजनों को अपनी प्रतिभा निखारनी है, निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र में ऐसी उपलब्धियाँ कमानी हैं जिन्हें प्रेरणाप्रद, अनुकरणीय, अभिनन्दनीय एवं अविस्मरणीय कहा जा सके। अपने परिवार की प्रतिभाओं को उपेक्षित स्तर की नहीं रहना है। इनकी गणना उन लोगों में नहीं होनी चाहिए, जिन्हें Parasite कहा जाता है,जो दूसरों पर ही निर्भर रहते हैं।
आज के ज्ञानप्रसाद लेख का समापन गुरुदेव की निम्नलिखित प्रेरणाप्रद पंक्तियों से हो रहा है :
कमल का पुष्प, सामान्य तालाब में उगने पर भी अपनी पहचान अलग बनाता है और दूर से देखने वाले के मन पर भी अपनी प्रफुल्लता की प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है । हमारे बच्चों का स्वरूप एवं स्तर ऐसा ही होना चाहिए।
जय गुरुदेव
