वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

कहीं अगले दिनों महाविनाश तो नहीं घटने वाला? 

आज का ज्ञानप्रसाद लेख इतना सरल और प्रेरणादायक है कि शायद ही कोई पाठक यह न कह उठे,“गुरुदेव हम तैयार हैं,बताइए क्या करना है?” गुरुदेव एक  Fully-trained  गोताखोर की तरह प्राणवानों को खारे समुद्र में से मणिमुक्तकों की तरह ढूँढ़ निकालने में लगे हुए हैं।

आइए, 11 अगस्त 2026 की गुरुकक्षा में स्वयं को समर्पित कर,एक समर्पित शिष्य का उदाहरण प्रस्तुत करें। 

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गुरुदेव बता रहे हैं:

बड़े कामों को बड़े शक्ति केन्द्र ही सम्पन्न कर सकते हैं। दलदल में फँसे हाथी को बलवान हाथी ही खींचकर पार करते हैं। पटरी से उतरे इंजन को समर्थ क्रेन ही उठाकर यथास्थान रखती हैं। उफनते समुद्र में से नाव चला पाना साहसी नाविकों से ही बन पड़ता है। समाज और संसार की बड़ी समस्याओं को हल करने के लिए ऐसे ही “वरिष्ठ प्रतिभावानों” की आवश्यकता पड़ती है। पुल, बाँध, महल, किले जैसे निर्माणों में “एक्सपर्ट  इंजीनियरों” की आवश्यकता पड़ती है। पेचीदा गुत्थियों को सुलझाने के लिए “मेधावियों (तीव्र बुद्धि वाले)” की सहायता लेनी पड़ती है। 

पिछले लेख में चार प्रकार की प्रतिभाओं की चर्चा की गयी थी एवं यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया था कि  प्रतिभाएँ ऐसी सम्पदाएँ हैं, जिनसे न केवल प्रतिभाशाली खुद ही भरपूर श्रेय अर्जित करते हैं बल्कि अपने क्षेत्र/समुदाय और देश की अति विकट दिखने  वाली उलझनों को भी सुलझाने में सफल होते हैं। इसी कारण भावनावश इन प्रतिभाशाली लोगों को “देवदूत” कहते हैं। देवदूत अर्थात देवताओं के दूत को इंग्लिश में Angel कहते हैं, इन्हें ही फ़रिश्ता भी कहा जाता है।  

आड़े समय में ऐसी ही उच्चस्तरीय प्रतिभाओं की आवश्यकता होती है। उन्हीं को खोजा,उभारा और खरादा जाता है। हरिद्वार स्थित युगतीर्थ शांतिकुंज में ऐसे ही महामानव गढ़े जा रहे हैं, तभी तो परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी, जो गायत्री परिवार के संस्थापक हैं,ने शांतिकुंज को “महामानव गढ़ने की टकसाल” कहा है।  

विश्व के इतिहास में ऐसे ही महामानवों की यशगाथा स्वर्णिम अक्षरों में लिखी मिलती है। संसार के अनेक सौभाग्यों और सुन्दरताओं में अधिक मूर्द्धन्य (श्रेष्ठ,प्रतितिष्ठित) व्यक्तित्व ही सबसे अधिक चमकते हैं। वे अपनी यशगाथा से असंख्यों का, अनन्तकाल तक मार्गदर्शन करते रहते हैं। आध्यात्मिक भाषा में, स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि के नाम से जिन महान व्यक्तिओं का वर्णन किया जाता है, उन्हें महामनीषी  ही कहा जाता है। ऐसे व्यक्तित्वों की कही बात को सर्वसम्मति से न केवल मान ही लिया जाता बल्कि बार-बार Quote करके  उसकी विश्वसनीयता पर मोहर भी लगाई जाती है। ऐसे व्यक्तित्वों से इतिहास भरा पड़ा है जिनके कथन बार-बार दैनिक जीवन में Quote किये जाते हैं। 

यह तो बात हुई देवदूतों की, लेकिन दूसरी तरफ वोह लोग बैठे हैं जो केवल पूजा-पाठ, माला जपने, अनुष्ठान करने को ही सब कुछ माने बैठे हैं, इन्हीं कृत्यों के सहारे सब कुछ मिलने की आशा करते हैं। धर्मिक कृत्यों,कर्मकांडों आदि का पालन करना कोई बुरी बात नहीं है,यही तो हमारे जीवन का आधार हैं लेकिन समस्या तो तब आती है जब बिना सोचे समझे,बिना किसी लॉजिक के,भेड़चाल की भांति इसलिए फॉलो किया जा रहा है कि सब कर रहे हैं, वर्षों से ऐसा ही होता आया है !!! अगर हम,बिना सोचे समझे,ऐसी ही प्रवृति बनाए रखेंगें  तो हममें और “हीन वर्ग” व्यक्तित्व में क्या अंतर् रहा जाएगा। हम कोई भेड़ों का झुण्ड तो है नहीं कि बिना सोचे समझे जैसा कोई कहता है, फॉलो किये जाए। 

अधिकतर लोगों की यही सबसे बड़ी कमज़ोरी होती हैं। इसको कैसे दूर किया जाए? गुरुदेव द्वारा रचित साहित्य को बार-बार पढ़ कर समझा जाये,चर्चा की जाये,Doubts क्लियर किये जाएँ, OGGP  के मंच पर कमैंट्स-काउंटर कमैंट्स की प्रक्रिया का लाभ उठाया जाये।     

इसी संदर्भ में कहना उचित हो जाता है कि मनस्वी, तेजस्वी और ओजस्वी मनुष्य सदैव “कर्मयोग की साधना” में निरत रहते हैं, जो उनके “व्यक्तित्व” को प्रामाणिक और “कर्तृत्त्व” को ऊर्जा का उद्गम स्रोत सिद्ध कर सके। कर्म की थ्योरी से भला कौन अपरिचित है? पीले कपड़ों के पीछे छिपा व्यक्तित्व ही सही अर्थों में साधक की पहचान है, यह पहचान तो सात पर्दों में से भी बाहिर निकल ही आती है। व्यक्तित्व की ही भांति कर्तृत्त्व भी सब कुछ स्वयं ही बोल देता है। करैक्टर सर्टिफिकेट देते समय बॉस चाहे जितने बड़े-बड़े विशेषण लगा कर झूठी प्रशंसा कर दे,सही अर्थों में मनुष्य का मूल्यांकन तो इंटरव्यू में ही होता है। मनुष्य का उठना, बैठना,बात करना, शिष्टाचार,अनुशासन जैसे कर्तृत्त्व तो पर्सनल इंटरव्यू (वोह चाहे फ़ोन से ही क्यों न हों) से ही आंके जाते है। इतनी प्रगति के बावजूद पर्सनल इंटरव्यू का कोई भी Replacement नहीं मिल सका है।  

वर्तमान समय विश्व इतिहास में अद्भुत एवं अभूतपूर्व स्तर का है। इसमें एक ओर महाविनाश का प्रलयंकर तूफान अपनी प्रचण्डता का परिचय दे रहा है तो दूसरी ओर सतयुगी नवनिर्माण की उमंगें उछल रही हैं। “विनाश और विकास एक-दूसरे के शत्रु हैं”, फिर भी उनका एक ही समय में अपनी-अपनी दिशा में चल सकना सम्भव है। इन दिनों एक ओर घोर अंधकार का साम्राज्य है तो दूसरी ओर नवयुग का सूर्य भी उदीयमान होता दिख रहा है। इन दोनों के समन्वय को देखते हुए ही इस समय को “युगसन्धि (दो युगों की संधि वेला) का समय” माना गया है। प्रखर-प्राणवान व्यक्तित्वों के लिए ऐसे समय को ही अग्नि-परीक्षा कहा गया है, कर्म की थ्योरी का पालन करते हुए हम सबको अपनी-अपनी यथासंभव सही भूमिका निभाने का प्रयास करना चाहिए। हर किसी साथी की परिस्थिति अलग है, कोई भी Generalized सुझाव देना असम्भव तो है लेकिन इसी मंच से बार-बार प्रसारित हुए सन्देश को एक बार फिर से दोहराने में कोई हर्ज़ नहीं है: 

भगवान का कारावास में जन्म होना क्या अनुकूल था? कहां राज्याभिषेक की बात हो रही थी कि 14 वर्ष के लिए वन-वन भटकना पड़ा, क्या यह समय अनुकूल था? 

विनाश और विकास दोनों एक दूसरे के शत्रु होने के बावजूद साथ-साथ चलते हैं। आधुनिक युग के विकास को देखकर तो पौराणिक विश्वकर्मा भी शर्म से अपनी आँखे झुका लें ।

टेक्नोलॉजी की प्रगति ने हम सबको  जिस स्तर का जीवन प्रदान करा दिया है, जिन सुविधाओं को मनुष्य की झोली में डाल दिया है उनके बारे में सोचना भी काल्पनिक ही दिखता है। काल्पनिक कहाँ है? सब कुछ तो प्रतक्ष्य,अपनी आँखों से सामने हो रहा है। पिछले कुछ ही वर्षों में Productivity, विज्ञान आदि के फील्ड में जो विकास हुआ है उसके आगे तो कोई भी नतमस्तक हुए बिना  नहीं रह सकता लेकिन जैसा ऊपर कहा गया है विकास और विनाश एक दूसरे  के शत्रु होते हुए भी साथ-साथ चलते हैं। इस प्रगति ने Robots आदि के कारण,ऑटोमेशन के कारण,Job-shortage, layoffs आदि से इंसानों की मनःस्थिति पर जो प्रभाव डाला है किसी से छिपा नहीं है। टेक्नोलॉजी के विकास से ही फेक न्यूज़ और डीपफेक आदि का जन्म हुआ है, टेक्नोलॉजी ने ही  साइबर हमलों एवं अति आधुनिक हथियारों को जन्म दिया है। 

त्रेता युग में एक ओर रावण का आसुरी आतंक छाया हुआ था तो दूसरी ओर रामराज्य वाले सतयुग की वापसी अपने प्रयास,पुरुषार्थ का परिचय देने के लिए मचल रही थी। इस विचित्रता को देखकर सामान्यजन भयभीत थे। भगवान राम के साथ लड़ने के लिए उन दिनों के एक भी राजा की शासकीय सेनाएँ आगे बढ़कर नहीं आईं। फिर भी हनुमान्, अंगद के नेतृत्व में रीछ-वानरों की मण्डली जान हथेली पर रख कर आगे आई और समुद्र-सेतु बाँधने, पर्वत उखाड़ने, लंका का विध्वंस करने में समर्थ हुई। भगवान् ने उनके सहयोग की भाव भरे शब्दों में भूरि-भूरि प्रशंसा की। इस सहायक समुदाय में गिद्ध, गिलहरी, केवट, शबरी जैसे कम सामर्थ्यवानों का सराहने योग्य सहयोग भी  सम्मिलित रहा। 

महाभारत के समय भी ऐसी ही स्थिति थी। एक ओर कौरवों की विशाल संख्या वाली सुशिक्षित और समर्थ सेना थी तो दूसरी ओर पाण्डवों का छोटा सा अशक्त समुदाय। फिर भी युद्ध लड़ा गया। भगवान ने सारथी की भूमिका निबाही और अर्जुन ने गाण्डीव से तीर चलाए। जीत शक्ति की नहीं, सत्य की, नीति की, धर्म ही हुई। इन उदाहरणों में गोवर्धन उठाने वाले ग्वाल-बालों का सहयोग भी सम्मिलित है। 

संसार के हर कोने से, हर समय में ऐसे चमत्कारी घटनाक्रम प्रकट होते रहे हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि सत्य की शक्ति अजेय है। उच्चस्तरीय प्रतिभाएँ उसे गंगावतरण काल के जैसे प्रयोजन में और परशुराम जैसे ध्वंस प्रयोजनों में प्रयुक्त करती रही हैं। 

महत्त्व घटनाक्रमों और साधनों का नहीं रहा, साधन तब भी बहुत थे, साधन आज भी असीमित हैं, लेकिन एक बात तो सत्य है कि हर बार मूर्द्धन्य प्रतिभाओं ने ही महान समस्याओं का हल निकालने में प्रमुख भूमिका निबाही है।

यह केवल मन बहलाने वाली ऐतिहासिक कहानियां नहीं हैं,टीवी सीरियल बना कर मनोरंजन के साधन नहीं हैं,इनके पीछे जिस दिव्य सत्ता का रोल है उसे तो कोई-कोई ही समझ पाता है। इसे समझने के लिए अटूट विश्वास की आवश्यकता होती है।

यहाँ पर तो हम अपने गुरु पर विश्वास करने की ही प्रार्थना कर रहे हैं, इतने सरल गुरु को समझना ज़रा भी कठिन नहीं है।

चाणक्य ने चन्द्रगुप्त की प्रतिभा को पहचाना,उसे अपनी सामर्थ्य का बोध कराया और एक नगण्य सा व्यक्ति असामान्य कार्य कर दिखा पाने में समर्थ हुआ। गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस ही जान पाए कि नरेंद्र नाम के युवक में विवेकानन्द जैसी प्रतिभा छिपी है एवं अपनी शक्ति का अंश देकर वे विश्व को एक महामानव दे गए। 

इन दिनों भी व्यक्तिगत समस्याओं का शिकंजा कम कसा हुआ नहीं है। आर्थिक, सामाजिक, मानसिक क्षेत्रों में छाई हुई विभीषिकाएँ,हम सबको चैन से जी सकने का अवसर कहाँ  दे रही हैं। संसार के सामने कितनी ही चुनौतियाँ हैं। बढ़ती हुई गरीबी, बेकारी, बीमारी, प्रदूषण, जनसंख्या वृद्धि, युद्धोन्माद का बढ़ता दबाव, अन्तरिक्ष क्षेत्र में धूमकेतु की तरह अपनी विकरालता का परिचय दे रहा है। हिमप्रलय, जलप्रलय, दुर्भिक्ष, भूकम्पों आदि के माध्यम से प्रकृति अपने प्रकोप का परिचय दे रही है जिसे आज के मनुष्य ने बार-बार देखा, भुगता है। मनुष्य की बौद्धिक भ्रष्टता और व्यवहारिक दुष्टता से,विधाता भी कोई  कम अप्रसन्न नहीं है। भविष्यवक्ता इन दिनों की विनाश विभीषिका की सम्भावना की जानकारी, अनेक स्तरों पर देते आ रहे हैं। परिस्थितियां देख कर तो सहसा ही प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि “कहीं अगले दिनों महाविनाश तो नहीं घटित होने जा रहा है?”दूसरी तरफ वोह पक्ष भी दिख रहा है जिसमें “इक्कीसवीं सदी बनाम उज्जवल भविष्य” का उद्घोष दिया जा रहा है,जिसे “सतयुग की वापसी” कहा जा सके। इन दोनों ही प्रयोजनों में आवश्यक “मानवीय भूमिका का समावेश” होना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। 

इस कार्य को मूर्द्धन्य प्रतिभाएँ ही सम्पन्न कर सकेंगी। भगवान् तो हमेशा से ही “धर्म का संरक्षण और अधर्म के विनाश” का कार्य करते आ रहे हैं लेकिन इस ईश्वरीय सत्ता का कार्य तो शरीरधारी महामानव ही करते हैं। आज ऐसे ही महमानवों की खोज है, हो सकता है वोह हमारे आसपास ही हों और हम उन्हें पहचान न पा रहे हों। नियति व्याकुल होकर उन्ही को ढूंढ रही है। दीन-हीन और पेट-प्रजनन के दलदल में डूबे असंख्य प्रजाजन सर्वत्र बिखरे पड़े हैं लेकिन वे तो अपने भार से ही दबे हैं, अपनी ही लाश ढो रहे हैं। 

युग परिवर्तन जैसे “सृजन और ध्वंस के महान प्रयोजन की पूर्ति” के लिए प्राणवानों की आवश्यकता है। हमारे गुरुदेव जैसे Fully-trained  गोताखोर ऐसे ही प्राणवानों को इस खारे समुद्र में से मणिमुक्तकों की तरह ढूँढ़ निकालने में लगे हुए हैं।

जय गुरुदेव 


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