वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना के विश्व्यापी सामूहिक एवं व्यक्तिगत प्रमाण 

अखंड ज्योति जुलाई 1997, गुरुसत्ता के पाँच सूक्ष्मशरीर – वीरभद्र जो हम सबकी रक्षा में जुटे हुए हैं

आज के ज्ञानप्रसाद लेख में हमारे साथी देखेंगें कि गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना की शक्ति ने विश्व भर में क्या-क्या कुछ करवा डाला। अवश्य ही गुरुदेव की तरह अनेकों दिव्य आत्माएं विश्व को बचाने में प्रयासरत है, यदि ऐसा न होता तो विश्व का सर्वनाश हो गया होता। कुकर्म करने वालों की कमी तो  नहीं है लेकिन अध्यात्म की शक्ति के समक्ष कहाँ कोई टिक पाया है, यह एक Tried-tested and certified(TTC ) तथ्य है जिसे नकारने वाले सदा घाटे में ही रहेंगें। 

आइये बिना किसी शंका के,पूर्ण विश्वास के साथ अपने गुरु के चरणों में समर्पित होकर,आज की गुरुकक्षा में वितरित हो रहे अमृत से अपने जीवन का कायाकल्प करें। 

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परम पूज्य गुरुदेव की चौथी हिमालय यात्रा सूक्ष्मशरीर से सम्पन्न हुई थी इस यात्रा में पूज्यवर को मार्गदर्शक गुरुसत्ता से निर्देश मिला था कि क्या करना है, कैसे करना है। हिमालयवासी गुरुसत्ता ने उन्हें अपनी परावाणी से सब समझा दिया था। पाँचों शरीर को जो पाँच काम करने थे वे इस प्रकार थे:

(1) वायुमण्डल का संशोधन, (2) वातावरण का परिष्कार, (3) नवयुग का नवनिर्माण, (4) महाविनाश का निरस्त्रीकरण-समापन तथा (5) देवमानवों का उत्पादन-अभिवर्द्धन

पूज्य गुरुदेव ने सूक्ष्मीकरण के गुप्तविज्ञान को और स्पष्ट करते हुए अपनी उस अवधि में प्रकाशित अखण्ड-ज्योति के मार्गदर्शन में लिखा है कि 

“इस प्रक्रिया में अपनी प्राणऊर्जा को इतना प्रचण्ड किया जाता है कि उससे अपने ही अन्तराल में सन्निहित पाँच कोष इतने गरम हो सकें कि हर कोई कोष एक स्वतंत्र इकाई के रूप में एक अलग ही सत्ता को  विनिर्मित हो सके।” 

1984 से 1987 की इस तीन वर्ष की साधना के बाद ही मिशन के “विराट पंचकोशी शरीर” में ऐसा मोड़ आया कि वह विराट रूप लेता चला गया। न जाने कितने व्यक्तियों को अपनी ध्यान साधना में, स्वप्नों में, रोजमर्रा के जीवन में अनुभूतियों के रूप में ऐसा मार्गदर्शन मिलता चला गया जिसका विवरण संकलित करने लगें तो  एक विशाल ग्रन्थ का निर्माण किया जा सकता है।  

विश्व के कुण्डलिनी जागरण (जिसका विवरण बाद में जनवरी 1987 की अखण्ड ज्योति में प्रकाशित हुआ) तथा पाँच वीरभद्रों के उत्पादन के रूप में तीन वर्षीय सावित्री साधना  की अंतिम परिणति हुई। उनकी यह “सावित्री साधना” आत्मिक चेतना और सविता चेतना के बीच तारतम्य स्थापित करने का मूलभूत आधार बनी।  तीन वर्षीय साधना में  राष्ट्रव्यापी  108 कुण्डीय यज्ञों के साथ राष्ट्रीय एकता सम्मेलन तथा फिर विराट दीपयज्ञ योजनों का सम्पन्न करने के रूप में समष्टि में “इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य” के गगनभेदी उद्घोषों के रूप में चलती रही। 

यह ध्यान देने योग्य है कि दीपयज्ञों के माध्यम से विचारक्रान्ति अभियान को आगे बढ़ाते चलना, संस्कार सम्पन्न होते चलना एवं इन्हीं के द्वारा 1989 में प्रारम्भ हुए 12 वर्षीय युगसन्धि महापुरश्चरण की प्रथम व द्वितीय पूर्णाहुतियाँ सम्पन्न होना यह पूज्यवर की अंतिम महत्वपूर्ण घोषणाएँ थीं।

जो परिजन मिशन की प्रगति का इतिहास जानते हैं, उन्हें मालूम है कि गुरुदेव की साधना-अवधि में जितना कार्य सम्पन्न हुआ वोह पिछली एक सहस्राब्दी में भी पूरी विश्ववसुधा पर सम्पन्न नहीं हुआ। 

यह अवधि मिशन की ही नहीं, “सारे विश्व की स्वर्णयुग वाली” अवधि कही जा सकती है जिनमें कुछ एक के ही नाम दिए जा सकते हैं।  

पाठकों ने कम्युनिज्म का अंत,विश्व की दोनों शक्तियों के बीच शीतयुद्ध का अंत,सोवियत संघ का विघटन,दोनों जर्मनी का एकीकरण, बर्लिन दीवार का ढह जाना,दक्षिण में रंगभेद का अंत और नेल्सन मंडेला का प्रथम बार अश्वेत राष्ट्रपति बनना, 150 वर्षों से भी अधिक समय तक हांगकांग से ब्रिटेन के अधिपत्य का अंत होना, 20वीं सदी के अंतिम वर्षों की कुछ घटनाएं हैं जिनसे इन पंक्तियों के पाठक अवश्य ही परिचित होंगें।    

धर्मतंत्र का प्रगतिशील विज्ञान-सम्मत स्वरूप कैसे लोगों के विचारों में परिवर्तन लाकर उन्हें सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित कर रहा है, दुष्टता के पथ पर चलने वाले कैसे भयभीत होते देखे जा रहे हैं, यह सारा पराक्रम यदि पाँच सूक्ष्म शरीरों का माना जाए तो इसे कोई अतिश्योक्ति नहीं माना जाना चाहिए।

गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना में दो तरह के प्रभाव देखे जा सकते हैं, एक समष्टिगत (सामूहिक) जो सारे संसार के लिए था और दूसरा व्यष्टिगत (व्यक्तिगत) जो परिजनों की अनुभूतियों के रूप में था। संसार में हुए बदलाव को कुछ ही पंक्तियों में उपरोक्त लिख दिया है क्योंकि इसका विस्तृत वर्णन जहाँ असंभव तो है वहीँ  शंकाग्रस्तियों को समझाना कहाँ सरल है। इसलिए उचित रहेगा कि उन्हीं वर्षों में घटित कुछ व्यक्तिगत संस्मरण वर्णित किये जाएँ। शांतिकुंज की वेबसाइट, यूट्यूब चैनल आदि पर आश्चर्यजनक,अविश्वसनीय किन्तु सत्य के टाइटल के अंतर्गत कितने ही संस्मरण प्रकाशित हो चुके हैं।   

अनेकों परिजनों ने अनुभव किया है कि अनेकानेक प्रतिकूलताएँ होते हुए भी गुरुदेव की सावित्री साधना की फलश्रुति के रूप में उन्हें सदैव सही मार्गदर्शन मिलता रहा है, अनपेक्षित सहयोग मिला है एवं आत्मबल संवर्द्धन के रूप में ऐसी पूँजी मिली है जिसने चारों  तरफ मानो एक सुरक्षा कवच प्रदान कर दिया हो। बहुत से प्राणवान परिजन पूज्यवर की सूक्ष्मीकरण अवधि में ही उनके सूक्ष्मशरीर से प्रेरणा पाकर उनके दर्शन कर सतत् यही कहती रही कि “युगधर्म की पुकार अनसुनी नहीं करनी है।” 

व्यक्तिगत स्तर पर कइयों को सावित्री साधना के दौरान ऐसी अनुभूतियाँ हुईं जिन्हें 1984-85 की अखण्ड-ज्योति के विभिन्न अंकों में प्रकाशित किया गया था। यहाँ उस समय के कुछ संस्मरण दे रहे हैं, जो प्रज्ञावतार की उस दिव्यसत्ता की मात्र एक झलक देते हैं, जो सतत् हम सभी परिजनों के आस-पास है हमारे योगक्षेमं का वहन करने को तत्पर है।

1. उन दिनों पंजाब में उग्रवाद अपनी चरमावस्था में था, श्री श्यामलाल धरणी सपत्नीक अमृतसर रहा करते थे। उन्हीं दिनों 10 से 20 जून के सत्र में वे शाँतिकुँज आए थे, तब पूज्यवर ने पति-पत्नी को नियमित अंशदान भेजने, झोला पुस्तकालय चलाते रहने का संकल्प दिलाकर कलावा बाँधा था और कहा था कि तुम हमारा कार्य करते रहना, हम तुम्हारा काम करेंगे। तुम्हारी सतत् रक्षा हम करते रहेंगे। जिन दिनों चारों ओर उग्रवदिओं का राज था कोई बाहर नहीं निकलता था, दोनों पति-पत्नी ने कर्फ्यू खुलने की अवधि के दौरान साहित्य बाँटते रहने का संकल्प मन में लिया था। कर्फ्यू की अवधि समाप्त होते ही वे घर आ जाते। एक दिन की बात है कि श्यामलालजी की पत्नी कमला को पता नहीं था कि पुनः गोलियाँ चलने से बाहर सब कुछ निर्जन है एवं वे किसी मुसीबत में पड़ सकती हैं। मिलिटरी के सैनिकों ने रोक लिया व कहा कि झोला खोलकर दिखाओ। हमें पढ़ना है। हमारे एक साथी को आपने परसों दी थी, उसको तो जैसे जीवन जीने का नया रास्ता मिल गया है। मिलिटरी वालों ने अपनी गाड़ी में उन्हें घर तक छोड़ दिया व बार-बार प्रणाम किया। 

इतना ही होता तो कम ही माना जाता लेकिन आश्चर्य तो तब हुआ जब एक दिन उग्रवादियों के दल ने उन्हें घेर लिया। फिर झोला पुस्तकालय से पुस्तकें निकलीं। न जाने किस  प्रेरणा के वशीभूत उन्हें संगीनों के साये में लेकर सुरक्षित घर छोड़ कर चले गए।

“एक सुरक्षा कवच झोला पुस्तकालय” मानो पूज्यवर की वाणी के रूप में उनके साथ चल रहा था। वे गुरु का काम कर रहे थे और  गुरु उनका काम कर रहे थे। उपरोक्त घटना के ठीक चार दिन बाद परम वन्दनीय माताजी का पत्र मिला कि “बच्चों तुम उतना ही काम करो जितना आसानी से कर सकते हो।  अपनी जान जोखिम में डालकर हमारा ध्यान अपनी तरफ मत खींचो। हमको और भी बड़े-बड़े काम करने हैं।” 

2. नजीबाबाद की कुमारी कुमुद सिंह बुलन्दशहर अश्वमेध यज्ञ के लिए  तैयारी कर रही थीं। उनकी दादीजी जो  स्वयं गायत्री की उपासक हैं, घर में सफाई कर रही थीं  कि उन्हें एक सर्प ने काट लिया। माँ के अभाव में कुमुद को दादी ने ही पाला था। पाँच फुट लम्बे जहरीले साँप को मरा देख सभी ने कहा कि अब कुछ ही क्षण इनके जीवन के बाकी हैं।  गायत्री मंत्र जप रही कुमुद को वन्दनीय माताजी के दर्शन हुए कि जो गायत्री मंत्र से व हम से जुड़ा है, उस घर कभी सर्पदंश से मृत्यु नहीं हो सकती। मुँह से लगातार मंत्र चलता रहा। बिना किसी चिकित्सा के उनकी दादीजी बच गयीं। उन्होंने  बुलन्दशहर अश्वमेध यज्ञ में भाग लिया। 

ओनीडा टेलीविजन कारखाने की सीनियर इंजीनियर श्रीमती रश्मि सिन्हा ने 19 जून 1991 को शाँतिकुँज आकर स्वयं एक घटना सुनाई, जिससे पता चलता है कि भक्तवत्सल गुरुसत्ता अपने शिष्यों का कितना ध्यान रखती है। दो वर्ष पूर्व MRI द्वारा की गयी जाँच में सिरदर्द का कारण ब्रेन ट्यूमर होना बताया गया। अपने श्वसुर के माध्यम से चिकित्सा हेतु अमेरिका जाने से पूर्व वे शाँतिकुँज पहली बार आयीं। माँ का आश्वासन मिला कि सब कुछ ठीक होगा। डॉ॰ कुमार जिन्होंने अमेरिका जाने का परामर्श दिया था अब परीक्षण करने पर कुछ गोलियाँ देकर बोले कि अभी ले लें, दो-तीन सप्ताह में अमेरिका से लौटकर फिर चेकअप करेंगे। जैसे ही डॉ॰ कुमार, लौटे उन्होंने पुनः चेकअप किया, पुनः MRI  टेस्ट किया, ग्रोथ में 50 प्रतिशत से अधिक कमी देखकर चिकित्सक हतप्रभ थे। जिस बीमारी को हम असाध्य मानते हैं वोह बिलकुल ठीक हो गयीं। अब वे एक कर्मठ कार्यकर्ता के रूप में कार्यक्षेत्र में लगी हुई है।

3.ब्रह्मवर्चस् में कार्यरत डॉ॰ अमल कुमार दत्ता के बड़े पुत्र अरविन्द व उनकी पत्नी ममता न्यूजर्सी में रहते हैं। पूज्यवर व माताजी का बाल्यकाल से ही बहुत स्नेह पाया है एवं  उन्हीं के आशीर्वाद से विदेश जाने का अवसर मिला। शांतिकुंज से आयी टोली को एयरपोर्ट छोड़कर लौट रहे थे कि न जाने कैसे कार का संतुलन बिगड़ गया। 6 लेन वाले हाईवे पर एक ही नहीं अनेकों पलटियाँ खाकर गाड़ी कोने में जा गिरी। लगभग चकनाचूर हो गयी लेकिन अरविन्द व ममता को खरोंच तक नहीं आयी थी। एंबुलेंस की टीम भी हैरान  थी कि वह इस घटना को कैसे सत्य मान ले। नाममात्र की पट्टी करके पैरामेडिक स्टाफ  घर छोड़कर चला गया । अगले दिन इंस्युरेन्स  कम्पनी ने आकर सारी कार्यवाही कर दी। कोई आरोप न लगकर कार की खराबी को कारण मानकर सारी राशि भी मिल गयी। आश्चर्य यह कि अगले ही दिन परम वन्दनीय माताजी ने फोन से हालचाल पूछ लिया जबकि यह घटना अमेरिका के अपने परिजनों को भी ज्ञात नहीं थी।

साथिओ, इस प्रकार की घटनाएं इतनी अधिक हैं कि सबका वर्णन संभव नहीं है  लेकिन पाठकगण देख रहे हैं  कि विश्व का नक्शा किस तेजी से बदल रहा है, रक्तरंजित घटनाक्रम भी बढ़ रहे है लेकिन वे सभी लोग जो महाकाल की चेतना के प्रवाह से जुड़े रहेंगे, सदैव सुरक्षित रहेंगें। 

हम सभी साथी सौभाग्यशाली हैं कि हमें ऐसी गुरुसत्ता मिली, जिसे सुदूर विराट रूप में बैठे हुए भी हम सब की एवं सारी विश्ववसुधा के कल्याण की चिन्ता है। 

धन्यवाद् जय गुरुदेव 


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