29 जुलाई 2026, गुरुपूर्णिमा के दिन आरम्भ हुए इस लघु ज्ञानप्रसाद लेख श्रृंखला का आज चौथा एवं समापन लेख गुरुचरणों में समर्पित हैं। अखंड ज्योति के मई 1971 अंक में प्रकाशित 6 पन्नों में समाहित एक लेख का प्रकट होना मात्र संयोग तो नहीं हो सकता, साक्षात् गुरु आदेश कहें तो शायद गलत न हो।
क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला की दूसरी पुस्तक “इक्क्सवीं सदी बनाम उज्जवल भविष्य” पर आधरित 10 ज्ञानप्रसाद लेखों का समापन हुआ तो अगले दिन गुरुपूर्णिमा का पावन पर्व था। इस अवसर पर गुरु के आदेश के आगे नतमस्तक होना अपना धर्म ही है।
आज का ज्ञानप्रसाद लेख 1971 के समय की कार्यप्रणाली का संक्षेप में वर्णन कर रहा है, आज के समय के विस्तार को देखते हुए अनुमान लगाया जा सकता है कि गायत्री परिवार कहाँ से कहाँ पंहुच चुका है। इस विस्तार का सम्पूर्ण श्रेय हमारी गुरुसत्ता एवं परिजनों के निस्वार्थ समर्पण को ही जाता है।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की 3 अगस्त 2026 की गुरुकक्षा में सभी गुरुशिष्यों का सादर स्वागत है,आइए इस दुर्लभ ज्ञानगंगा में डुबकी लगाकर जीवन सफल बनायें।
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गुरुदेव बता रहे हैं:
“युगनिर्माण आन्दोलन” का संचालन माताजी स्वयं करेंगी। “अखण्डज्योति और युग निर्माण” हिन्दी पत्रिकाओं को जिस तरह हम संभालते थे उसी प्रकार वे भी सम्भालेगी। इस कार्य के लिये उन्हें कुछ सहायकों की जरूरत पड़ेगी सो हमने व्यवस्था जमा ली है। अभियान का दिशा निर्धारण माताजी करती रहेंगी। उन्हें हमारी तरह अधिक बातें करना नहीं आता लेकिन आत्मिक गुणों की दृष्टि से वे हमसे कुछ आगे ही हैं पीछे नहीं। परिवार को प्यार और प्रकाश देने की जिम्मेदारी उन पर छोड़ कर हम पूरी तरह से निश्चिंत है। हमें रत्ती भर भी भय नहीं है कि हमारे पीछे से आन्दोलन या संगठन लड़खड़ा जायगा। सच तो यह है कि हमने कुछ किया ही नहीं।
एक दिव्य शक्ति ही बाजीगर की तरह हमें कठपुतली की तरह नचाती रही और उसी की उंगलियों में बँधे धागे के सहारे उछल कूद करते रहे। लोग जिसे हमारा कर्तृत्व पुरुषार्थ समझते हैं, उसकी असलियत हम ही जानते हैं। दिव्य सत्ता निमित्त बनाकर हमसे काम करवा रही है। लोग तो व्यर्थ ही हमें श्रेय देकर लज्जित करते रहते हैं। जिस शक्ति के सहारे यह प्रबल प्रयास अब तक चलता रहा है आगे भी वही उसे चलायेगी। माताजी माध्यम रहें तो भी उनके पीछे वही समर्थ सत्ता रहेगी जो हमारे पीछे है। आन्दोलन घटने की आशंका होती तो काम बढ़ने और उसके वर्ग विभाजित करने की जरूरत ही क्यों पड़ती। हर किसी को यह परिपूर्ण विश्वास रखना चाहिये कि अगले दिनों अभियान की गति और अधिक बढ़ेगी।
माताजी 20 जून के बाद, सप्त ऋषियों की तपस्थली, जहाँ गंगा की सात धारायें प्रवाहित हुई हैं, “शांतिकुंज” नामक छोटे से आश्रम में निवास करेंगी। जिस प्रकार हमने 24 लाख के 24 महापुरश्चरण सम्पन्न किये थे, उसी प्रकार वे भी करेंगी। अखण्ड घृत-दीप मथुरा से उन्हीं के पास चला जायगा। आश्रम में फल और शाक उगाने की व्यवस्था बना दी गई है। एक गाय रहेगी जिसका घी दीपक में और छाछ दूसरों के लिये प्रयुक्त होती रहेगी। सम्पादन, पत्र व्यवहार आदि में सहयोग देने के लिये एक दो व्यक्ति उनके पास रहेंगे। आगन्तुकों को 24 घंटे से अधिक उनके पास ठहरने पर प्रतिबन्ध रहेगा। अपनी तपश्चर्या की उपलब्धियों से वे लोगों के दुख-कष्ट निवारण के उसी क्रम को जारी रखेंगी जिसे हम जीवन भर निबाहते रहे हैं। मनुष्य के पास धन, बल, बुद्धि, प्रतिभा आदि की जो भी विभूति हो उसका न्यूनतम भाग अपने लिये रखकर शेष को अपने से पिछड़े हुओं की सेवा सहायता में लगाना चाहिये। जीवन भर यही मानवीय धर्म हमने निबाहा। हमारे पास जो कुछ भौतिक था, वह समाज को देते रहे। तपश्चर्या की कमाई हुई उसे भी अपने लिए, स्वर्ग मुक्ति, सिद्धि आदि के लिये नहीं रखा बल्कि पीड़ितों की व्यथा निवारण और पिछड़े हुओं की उन्नति के लिए रत्ती-रत्ती खर्च करते रहे। सो स्वभावतः अनेक व्यक्ति हमसे अब भी वैसी ही आशा रखेंगे, हमारे चले जाने पर स्वयं को असहाय समझेंगे। अपने इस “बाल परिवार” की साज-सम्भाल करने के लिए हम माताजी को छोड़े जाते हैं। वे अपनी तपश्चर्या इसी प्रयोजन में लगाती, खर्च करती हुई हमारी परम्परा को जीवित रखे रहेंगी ।
गायत्री तपोभूमि से आन्दोलनात्मक, प्रकाशात्मक, संगठनात्मक, सृजनात्मक एवं संघर्षात्मक कार्यक्रम चलेगा। वहाँ कार्यकर्त्ताओं की एक बहुत अच्छी टीम इकट्ठी हो गई है जो निस्वार्थ भाव से लोकमंगल एवं जन-कल्याण के प्रयोजन को पूरा करने में त्याग और बलिदान की भावना से निरत है। यह टीम ऐसी है जिसके कन्धों पर हम तपोभूमि में चल रही गतिविधियों तथा क्षेत्र में विस्तृत आन्दोलन का उत्तरदायित्व संतोषपूर्वक छोड़ सकते हैं। अभी लगभग एक दर्जन कर्मठ कार्यकर्ता तपोभूमि में रह रहे हैं, आगे और भी नये आने वाले हैं। देशव्यापी कार्य को देखते हुए कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ने ही वाली है। इस टीम में अहंकार या लोलुपता पैदा न होने पाये, इसके लिए कड़े नियम बना दिये गये हैं। मनाही कर दी गयी है कि कोई भी कार्यकर्ता गुरु बनने, पैर पुजाने, व्यक्तिगत रूप में दान-दक्षिणा लेने का प्रयास न करे। अलग-अलग संस्थाएँ बनाने, किसी क्षेत्र का अलग संगठन करके, उसके अलग महन्त बन बैठने और केन्द्र को कमजोर करने तथा उसके साथ प्रतिद्वंद्विता उभारने की भी अपने किसी भी अनुयायी उत्तराधिकारी को रोके जा रहे है। यश, लालच और
व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ग्रस्त व्यक्ति ही अक्सर उपद्रव खड़े करते हैं, जिससे सेवा का आदर्श भूलकर व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत अहंता बढ़ाने लगता है।
सार्वजनिक जीवन का यही अभिशाप है और इसी चट्टान से टकराकर अनेक महत्वपूर्ण संगठन टूटे हैं, टूट रहे हैं।
इसलिए हमने देश भर में फैले हमारे उत्तराधिकारियों को, खासतौर से गायत्री तपोभूमि के निवासियों को ऐसे कुकृत्य न करने का आग्रह और अनुरोधपूर्वक रोक दिया है। कार्यक्रमों को चलाते रहने के लिए हम एक टीम गायत्री तपोभूमि में छोड़े जा रहे हैं जो किसी से पैर छुआने के लिए सहमत न होगी बल्कि दूसरों के पैर छूकर अपनी नम्रता का परिचय देगी।
गायत्री तपोभूमि की कार्यकर्ता टीम का नेतृत्त्व करने के लिए हमने श्री लीलापत शर्मा को नियुक्त कर दिया है। तपोभूमि की व्यवस्था, शाखाओं संगठनों तथा क्षेत्रीय कार्यक्रमों को वे ही संभालेंगे। उन्हें हमारा प्रतिनिधि माना जाय। यह फैसला हमने बहुत सोच समझ कर किया है। हमें आशा है कि उन्हें सर्वत्र बड़े भाई की तरह, हमारे संगठनात्मक उत्तराधिकारी की तरह ही स्वीकार किया जायगा और व्यवस्थात्मक अनुशासन रखा जायगा।
गुरुदेव बता रहे हैं कि अभी ज्ञानयज्ञ का प्रथम चरण ही चल रहा है। इस आधार पर प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने और कार्यकर्ता सहयोगी उत्पन्न करने का आरम्भिक प्रयोजन पूरा किया जा रहा है। थोड़ी मजबूती आते ही दूसरे रचनात्मक और संघर्षात्मक कार्य हाथ में लिये जाएंगें। अगले वर्ष 240 युगनिर्माण सम्मेलन किये जाने हैं जिनके साथ 9 कुण्डी छोटे गायत्री यज्ञ भी जुड़े रहेंगे। इनका मुख्य प्रयोजन शाखा के साधनों को अधिक विस्तृत और प्रभावी बनाना है। इसकी एक विस्तृत रूपरेखा बना ली गई है। इन सम्मेलनों को सफल बनाने के लिए मथुरा से संगीत मंडलियाँ तथा प्रकाश चित्र,यन्त्र (स्लाइडर प्रोजेक्ट) भेजे जाते रहेंगें। कुछ जीपें भी खरीदी जा रही हैं।
हम आशा और विश्वास लेकर तथा सर्वसाधारण को आश्वासन देकर जा रहे हैं कि अगले दिनों नवनिर्माण का पुण्य प्रयास घटेगा नहीं बढ़ेगा ही। गायत्री तपोभूमि स्थित युगनिर्माण योजना का केंद्र हमारी जलाई मशाल को भविष्य में हमसे भी अच्छी तरह जलाये रखने में समर्थ होगा। इस ईश्वरीय प्रयोजन के पीछे भगवान का, हमारे गुरुदेव का, हमारा एवं उत्तराधिकारियों का भाव भरा प्रचण्ड बल है जो इसे गिरने या घटने न देगा। अभियान गतिशील होगा और विश्वमानव के भविष्य को उज्ज्वल बनाने में ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत करेगा।
माताजी,लीलापत जी, हमारे मार्गदर्शक एवं हम (गुरुदेव) चारों के नेतृत्व में एकजुट होकर गायत्री तपोभूमि की टीम के कार्य विभाजन की चर्चा की जा चुकी है। अब पांचवां उत्तरदायित्व परिजनों का ही रह जाता है। सभी को एक घण्टा समय और दस पैसा रोज ज्ञानयज्ञ के लिए देने की बात भूलनी नहीं चाहिए, इसे हमारे द्वारा सौंपा हुआ एक अति पवित्र उत्तरदायित्व समझना होगा। दस पैसा वाली धनराशि केवल घर में झोला पुस्तकालय रखने के लिए ही खर्च की जानी है। हम ऐसी व्यवस्था बनाकर जा रहे हैं कि जनमानस को प्रेरणा देने वाला अति उत्कृष्ट साहित्य भविष्य में भी तपोभूमि से प्रकाशित होता रहे। हम इतना अधिक हस्तलिखित साहित्य छोड़े जा रहे हैं जो लगातार 10 वर्ष तक छपता रहे तब कहीं पूरा हो पायेगा। यह प्रस्तुत साहित्य से कहीं अधिक ऊँचे स्तर का होगा, इसलिए उसे परिजनों के घरों में रहना ही चाहिये और उसे संपर्क क्षेत्र में पढ़ाने के लिये, सुनाने के लिए-समय लगाया जाना ही चाहिए। यह प्रक्रिया ठीक से चलती रही तो अपना ज्ञानयज्ञ अखण्ड बना रहेगा और उसकी चिंगारियां आज के व्यापक अनाचार को, अन्धकार को मिटाने के लिए समर्थ परिवर्तन प्रस्तुत कर सकने में सफल होगी। इस प्रयास में कहीं किसी की कमी नहीं आने देनी चाहिए।
हमने सारा जीवन, समय एवं वैभव लोकमंगल के लिए समर्पित करके परिजनों के सामने एक पुण्य परम्परा प्रस्तुत की है। जो परिजन हमसे प्यार करते हैं, उन्हें कम से कम इतना तो करते ही रहना चाहिये। एक घण्टा समय और दस पैसा ज्ञानयज्ञ के लिए नियमित रूप से देते रहने का जो छोटा-सा त्याग, बलिदान अनिवार्य रूप से निबाहते रहने के लिए कहा गया है, उसे निष्ठापूर्वक निबाहते रहें। जो इतना निबाह लेगा उसी से यह आशा की जायगी कि कुछ और बढ़े-चढ़े कदम उठाकर सृजनात्मक और संघर्षात्मक भावी प्रक्रिया में कुछ कहने लायक योगदान दे सके।
नवनिर्माण प्रयोजन की कर्मठता के लिए उपरोक्त अनिवार्य शर्त जो पूरा कर सकेंगे उन्हें आरम्भिक कसौटी पर कसा जाने पर खरा माना जायगा और उन उत्तरदायित्वों को सौंपा जायगा जो महामानवों के हाथों ही सम्पन्न किये जा सकने सम्भव हैं।
हम तो जा ही रहे हैं लेकिन अपने अतिरिक्त अन्य तीन घनिष्ठ सहयोगियों की टीम (माताजी, लीलापत शर्मा जी एवं नित्य अनुदान करने वाले आप जैसे समर्पित परिजन) ही पूरी देखभाल और साज-सँभाल करेंगें। ईश्वर द्वारा सौंपे गए अपने उत्तरदायित्व को इन तीन साथियों में बाँटते हुए हम यह आशा लेकर जा रहे है कि वे सभी अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी तथा तत्परता के साथ वहन करेंगे। इन तीन वर्गों के अलावा भी हमारे अनेक स्नेही स्वजन (इन पंक्तियों को पढ़ रहे, ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के शिष्य) रह जाते हैं, उन्हें भी प्यार और प्रकाश देने में हम कंजूसी नहीं बरतेंगे। हम तो अपना स्थूल शरीर ही लेकर जा रहे है लेकिन हमारा सूक्ष्म अस्तित्व अब की अपेक्षा अनेक गुना प्रखर हो जाने के कारण सम्बद्ध लोगों को अपने समीप बहुत कुछ कहने और देने के लिए उपस्थित ही अनुभव होता रहेगा।
धन्यवाद्,जय गुरुदेव
