अखंड ज्योति मई 1971 में प्रकाशित “अपनों से अपनी बात” स्तम्भ इतना विस्तृत और मार्मिक है कि किसी की भी आँखों में आंसू ला सकता है।पाठक स्वयं अनुभव कर सकते हैं कि इतना भावुक,इतना प्रेम करने वाला गुरु,मार्गदर्शक कहाँ मिल पायेगा। आज का ज्ञानप्रसाद लेख अपने बच्चों के प्रति स्नेह एवं अपने गुरु के प्रति समर्पण का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का कोई भी सहयोगी बिना किसी शंका के अपने गुरुदेव पर विश्वास कर सकता है। हम तो यही कहेंगें कि गुरुदेव ने जो-जो बातें दादागुरु के प्रति समर्पण में व्यक्त की हैं वोह सारी की सारी हम पर भी फिट बैठती हैं, यह कोई अंधविश्वास नहीं है, निष्ठा और समर्पण है। यदि इस स्तर तक हम अपनी पात्रता विकसित कर लेते हैं तो विश्वास कीजिये उनसे कभी भी कुछ मांगने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी, पिता से संतान कुछ मांगती थोड़े है, उसे तो सबकी ज़रूरतों का ज्ञान होता है।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की आज 31 जुलाई 2026 की गुरुकक्षा में सभी गुरुशिष्यों का स्वागत है, आइए गुरुज्ञान की दिव्य अमृतवर्षा में स्वयं का कायाकल्प कर लें।
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गुरुदेव बता रहे हैं:
इस शोधकार्य के उत्तरदायित्व को अपने कंधे पर लेकर जाते हुए हमें इन वियोग की दर्द भरी घड़ियों में भी संतोष एवं गर्व का अनुभव हो रहा है।
अपना विशाल परिवार जिसे हम अत्यधिक प्यार करते हैं, चर्म चक्षुओं के सामने से विलग हो रहा है, एक दुर्बल-मन मानव प्राणी की तरह हमें इसका बहुत दुःख है। वियोग की कसक बार-बार बेचैन कर देती है। जब यह सोचते हैं कि शुरू में आन्तरिक अभिव्यक्ति प्रकट न करते हुए भी जिन स्वजनों को हम प्राणप्रिय मानते हैं उन्हें देखना भविष्य में हमारे लिये कभी सम्भव न होगा। उनके साथ हँसने-बोलने, अपनी कहने, उनकी सुनने का अवसर न मिलेगा, तो जी बहुत टूटता है, आँखें सजल हो जाती हैं और जी बहुत उदास हो जाता है ।
प्राणप्रियों के विछोह और महाप्रयाण के समय मनुष्य की कैसी व्यथा हो सकती है इसका पिछला अनुभव तो हमें स्मरण नहीं है लेकिन अब उसका अनुभव हो रहा है तो लगता है हमारे जैसे कोमल अंतरंग वाला व्यक्ति इस दर्द और कसक को कितनी कठिनाई से सहन कर पाता होगा । इन दिनों स्वयं को सम्भालते तो बहुत हैं, बाहर से हँसने और निश्चिन्त दिखने के बहाने भी बहुत बनाते हैं लेकिन वह बनावट भी ठीक तरह बन नहीं पाती । जरा से गहरे प्रसंग आ जाते हैं तो दर्द उभर पड़ता है और आँखों में से बेबसी टपक पड़ती है। अपने को उपहासास्पद न बनने देने के लिए हमें इन दिनों जो बनावट बनानी पड़ रही है उसे सम्भालना भी एक मुसीबत बन गया है । पुत्र शोक में ग्रस्त डरपोक वेश्या को राजसभा में नाचने के लिये जिस तरह नाटक करना पड़ता है, उसी तरह इस वर्ष अनेक सम्मेलनों, यज्ञों, आयोजनों, परामर्शों में सम्मिलित रहते हुए हमें करना पड़ रहा है । एक वर्ष से यह व्यथा और भी अधिक उभरी है । इसकी अन्तिम परीक्षा 17-20 जून वाले विदाई समारोह में होने वाली है। उस अवसर पर कहना तो बहुत कुछ है लेकिन रुँधा हुआ गला न जाने कुछ कहने भी देगा या नहीं। यह आशंका इन दिनों बुरी तरह मन पर सवार है। जो भी हो इतने दिन निकल गए, वह समय भी पार हो जाएगा। हमारी आन्तरिक इच्छा इस अंतिम अवसर पर अपने प्राणप्रिय स्वजनों को एक बार फिर से जी भर कर देख लेने की है; सो हमने पत्रिका की पंक्तियों में निमन्त्रण छाप देने के अतिरिक्त आत्मिक-अप्रत्यक्ष रूप से भी आह्वान-प्रेरित किया है ।
हमें आशा है कि हमारे सभी घनिष्ठ परिजन इस अवसर पर प्रस्तुत होंगे । हमारे प्रगाढ़ आमंत्रण को ठुकराना किसी बहुत ही कठोर व्यक्ति के बस की बात हो सकती है अन्यथा जीवन में अमिट स्मृति की तरह छाये रहने वाले इस अनुपम सुअवसर को छोड़ सकना किसी भी स्वजन के लिये सम्भव न होगा । इसी मान्यता के आधार पर सम्मेलन की तैयारी कर रहे हैं।
17-20 जून वाले अन्तिम मिलन से हमारा मन कुछ हलका हो जायेगा। चार दिन का समय तो कम ही है लेकिन उसमें भी हम अपनी वैखरी, मध्यमा, परा और पश्यंती वाणियों को प्रयोग करके स्वजनों से इतना कुछ कह सुन लेंगे जितना चिरकाल के सान्निध्य में भी कदाचित सम्भव नहीं हो पाता ।
20 जून 1971 को हम चले जायेंगे। शांतिकुंज में माताजी के लिए व्यवस्था बनाकर,10 दिन बाद हम अपने गंतव्य स्थान को प्रयाण कर देंगे । जून का यह प्रत्यक्ष मिलन तो समाप्त हो जायेगा लेकिन परोक्ष रूप से हमारा हर घनिष्ठ परिजन यह अनुभव करेगा कि हम छाया की तरह उसके साथ चल रहे हैं और प्राणवायु की तरह उसके अंतरंग का मृदुल एवं समर्थ स्पर्श अनुभव कर रहे हैं।
भाव भरे अन्तःकरणों का मूल्य हमारी दृष्टि से किसी भी रत्नराशि से अधिक है । उनके प्रति हमारा सम्मान,सद्भाव और ममत्व यथावत् ही नहीं बना रहेगा बल्कि और भी अधिक बढ़ता रहेगा । हमें विश्वास है इतनी सघन आत्मीयता, प्रतिक्रियारहित नहीं हो सकती। इस प्रतिक्रिया के प्रभाव से परिजनों को भी हमारे प्रति वैसा ही स्नेह सद्भाव बनाये रहने को विवश होना पड़ेगा। हम किसी भी आत्मीय को भूलने वाले नहीं हैं, सो हमें भी भुला सकना किसी के लिए आसान न होगा। नियति ने प्रत्यक्ष का संपर्क तोड़ दिया तो क्या हुआ, अप्रत्यक्ष संबंधों की मृदुल सरसता का अनुभव करने से किसी को कोई नहीं रोक सकता । इस स्नेह सूत्र में तो हम अपने परिवार के साथ आगे भी चिरकाल तक घनिष्ठता के साथ बँधे रहेंगे एवं किसी के लिये कुछ कर सकना, दे सकना सम्भव हुआ तो उसके लिए प्रयत्न करते ही रहेंगे ।
प्रेरणाओं को क्रियान्वित करने की विवशता परिजनों को भी प्रेरित करती रहेगी, इसलिए हम लोगों के बीच आदान-प्रदान का क्रम टूटने वाला नहीं है । अप्रत्यक्ष समीपता आज की ही जितनी बल्कि अगले दिनों में उससे भी अधिक उपयोगी बनी रहेगी।
हमारे भावी कार्यक्रमों में यह तीन ही प्रयोजन मुख्य हैं:
(1) नवनिर्माण के लिए महानुभावों का सृजन,
(2) आत्मबल-सम्पन्न बनने की युग साधना की शोध
(3) परिजनों का मृदुल एवं समर्थ स्नेह-सहयोग
समय, स्थान, कार्य-पद्धति आदि के बारे में हमें जानने की इच्छा भी नहीं हुई । जाना भी नहीं क्योंकि हमारा समर्थ मार्गदर्शक हमारी उतनी चिन्ता-व्यवस्था करता है जितनी हम स्वयं भी नहीं कर सकते । ऐसे मार्गदर्शक को पाकर भी यदि हम पूछताछ, उखाड़-पछाड़ करते हैं, तो यह एक प्रकार से अपनी अश्रद्धा ही होगी। जिसके हाथों अपना वर्तमान और भविष्य बेच दिया हो, जिसके चरणों पर अपना तन, मन, धन सर्वस्व अर्पण कर दिया हो, उसकी इच्छा और प्रसन्नता में अपने अस्तित्व को घुला कर ही समर्पण योग की साधना पूरी होनी है, ऐसा हमारा विश्वास है। अपने मार्गदर्शक से हमारा न तो कोई अनुरोध है,न आग्रह, न इनकार, न संशोधन क्योंकि छाया तो काया के पीछे ही चलती है चाहे मार्ग सरल हो यां ऊबड़ – खाबड़। वर्षों से हम छाया की भांति ही चलते आये हैं और सदैव चलते ही रहेंगें। जब अपना धर्म केवल आदेश का पालन ही रह गया हो तो फिर मीनमेख की बात ही कहाँ उठने वाली है। हमारे गुरुदेव जहाँ रखेंगें,रह लेंगें,जो करायेंगें कर लेंगें क्योंकि हमारे सभी कार्यों के पीछे उन्हीं की इच्छा है। हम तो पोली बाँसुरी भर हैं। इसमें से क्या राग निकले, कब क्या स्वर लहरे, यह उसी का काम है। जिस गुरु के अधरों से अपने को सटाकर हम धन्य हो गये हैं वह इस पोली बाँसुरी में से क्या स्वर निकालता है, इसे सुनने वाले स्वयं समय-समय पर सुनते रहेंगे ।
इन पंक्तियों के लेखक को यह तो मालूम था कि पोली बांसुरी का अर्थ खोखली बांसुरी होता है लेकिन थोड़ा और जानने की जिज्ञासा से मिला ज्ञान साथिओं के समक्ष प्रस्तुत करना हमारा परम सौभाग्य है:
बांसुरी भीतर से पूरी तरह खाली (पोली) होती है और उसमें कोई गांठ नहीं होती। यह इस बात का प्रतीक है कि साधक को अपने भीतर के राग-द्वेष और अहंकार की गांठों को समाप्त कर खुद को प्रभु या गुरु के प्रति समर्पित कर देना चाहिए।
बांसुरी भीतर से खाली होती है,तभी उस पर वादक (या प्रभु) अपनी मर्जी के सुर बजा सकता है। इसी प्रकार, मनुष्य जब अपनी इच्छाएं छोड़कर खुद को शून्य कर लेता है, खाली कर लेता है तभी परमात्मा का संगीत प्रकट होता है।
हमारी भावी कार्य-पद्धति एवं स्थिति की भावी रूपरेखा का परिचय इतना ही हमें मालूम है, सो बता दिया ।
इतना कह कर गुरुदेव, वंदनीय माता जी के बारे में कहते हैं कि रिश्ते में तो वोह हमारी धर्मपत्नी लगती हैं लेकिन अन्य सभी की तरह हमें भी माता की भाँति ही दुलारती रही हैं । उनमें मातृत्व की इतनी उदात्त गरिमा भरी पड़ी है कि अपने वर्तमान परिवार को भरपूर स्नेह दे सके। हमने बाकी जिम्मेदारिओं के साथ ही यह भार भी उनके कन्धों पर डाल दिया है कि हमारा अभाव किसी आत्मीयजन को खटकने न पायें, स्नेह के अभाव में कोई पौधा सूखने कुम्हलाने न पाये। पिता की मृत्यु पर माँ, मेहनत मजदूरी करके भी बच्चों को पाल लेती है लेकिन माँ के न रहने पर पिता के लिये वह भार कितना कठिन हो जाता है, हम सब जानते हैं । हमारा न रहना परिजनों को कुछ ही समय तो अखरेगा ही लेकिन बाद में माताजी का प्यार और प्रकाश सुरक्षा प्रदान करता रहेगा।
इसके आगे का,अंतिम भाग सोमवार को प्रस्तुत करने की योजना है।उसके बाद फिर से “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” का अमृतपान आरम्भ होने वाला है।
कल शनिवार है और इस दिन हम सभी लोग मूवी देखने जाते हैं लेकिन कहीं मूवी के लालच में यूट्यूब पर आ रही समस्याओं पर चर्चा न भूल जाएँ।
धन्यवाद्,जय गुरुदेव
