अखंड ज्योति मई 1971 के “अपनों से अपनी बात” स्तम्भ में परम पूज्य गुरुदेव ने आधुनिक युग के मानव की प्रवृति को समझते हुए कहा कि प्राचीनकाल की शारीरिक, मानसिक,भौतिक एवं तात्त्विक परिस्थितियाँ अब बदल चुकी हैं। साधना तपश्चर्या का जो क्रम भूतकाल में अपनाया जाता रहा है, वह आज की परिस्थितियों से मेल नहीं खाता। आधुनिक प्रवृति के लोगों के लिए गुरुदेव ने बहुत ही सरल शब्दों में “आत्मदेवता की साधना” का सूत्र दिया। अपने बच्चों को विश्वास दिलाते हुए उन्होंने कहा कि हमने अपनी काया और चेतना को इस योग्य बना दिया है कि इसका उपयोग प्रयोगशाला के रूप में किया जा सके। हमारे इस बार के हिमालय प्रवास में हम अपने ऊपर अनेक अध्यात्मिक प्रयोग करेंगे और उनसे प्राप्त होने वाले परिणामों को आज के भटके हुए मानवों के सम्मुख प्रस्तुत करेंगे।
कहाँ मिलेंगें ऐसे गुरु जो शिष्यों को बताने से पहले स्वयं पर प्रयोग करते हों, ऐसे गुरु को शत शत नमन करते हैं।
आज के ज्ञानप्रसाद लेख में इसी सरल सी साधना का वर्णन है जिसे लगभग हर कोई अपनी समर्था एवं इच्छाशक्ति के अनुसार कर रहा है। जो जितना अधिक गुड़ डाल रहा है उसका जीवन उतना ही मीठा हो रहा है।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की आज 30 जुलाई 2026 की गुरुकक्षा में सभी गुरुशिष्यों का स्वागत है, आइए गुरुज्ञान की दिव्य अमृतवर्षा में स्वयं का कायाकल्प कर लें।
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आज के युग के साधकों के लिए हमारा शोधकार्य- आत्मदेवता की साधना
गुरुदेव बता रहे हैं कि प्राचीनकाल की शारीरिक, मानसिक,भौतिक एवं तात्त्विक परिस्थितियाँ अब बदल चुकी हैं। साधना तपश्चर्या का जो क्रम भूतकाल में अपनाया जाता रहा है, वह आज की परिस्थितियों से मेल नहीं खाता। उस समय के प्रयोग,उनके पीछे छिपे प्रयोजन एवं साधनक्रम आज सफल नहीं हो सकते। यह प्रयोजन प्राचीनकाल की परिस्थितियों में तो उपयुक्त थे लेकिन आज उन्हें निष्फल और निरर्थक ही कहा जा सकता है।
आत्मबल बढ़ाने के लिये आत्म-साधना करनी आवश्यक है लेकिन उचित साधनों के न होने के कारण उस मार्ग के पथिकों को बहुत श्रम करने पर भी कुछ हाथ नहीं लग रहा है। ऐसी स्थिति में आवश्यक हो जाता है कि
“आज की परिस्थितियों में सफल सिद्ध हो सकने वाली साधना पद्धति को खोज निकाला जाय।”
इसके लिये वैज्ञानिक प्रयोग करने पड़ेंगे। गुरुदेव बता रहे हैं कि पिछले 60 वर्षों के व्यवस्थित जीवनक्रम ने हमारी काया और चेतना को इस योग्य बना दिया है कि इस काया को प्रयोगशाला के रूप में उपयोग किया जा सके। वर्तमान (1971) हिमालय प्रवास के दौरान हम अपने ऊपर अनेक अध्यात्मिक प्रयोग करेंगे और उनसे प्राप्त होने वाले परिणामों को आज के भटके हुए मानवों के सम्मुख प्रस्तुत करेंगे। हम दूर और अप्रत्यक्ष तो रहेंगे लेकिन हमारी रिसर्च के परिणाम माताजी के माध्यम से, अखण्ड-ज्योति की पंक्तियों द्वारा सर्वसाधारण को विदित होते रहेंगे।
गुरुदेव ने आधुनिक युग के साधकों के लिए जीवन-साधना को ही सही अर्थों में “आत्म साधना” बताया है। इस साधना के लिए गुरुदेव के अनुसार अनगढ़ व्यक्तित्व को सुगढ़ बनाना,अंतःकरण का परिष्करण करना और साधारण मानव को देवतुल्य गुणों से संपन्न कराना ही इस युग की सबसे बड़ी आध्यात्मिकता है। इस दिशा में गुरुदेव के अनुसार “व्यक्तित्व का परिष्करण” बहुत ही आवश्यक है। अपने स्वभाव, विचारों और आदतों को सुधारना व अनगढ़ को सुगढ़ बनाना, बाहरी कर्मकांडों से अधिक महत्वपूर्ण है।
“आत्मदेवता” को छोड़कर अन्य सभी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कष्टसाध्य साधनायें करनी पड़ती हैं। आज के मनुष्य के पास कहाँ इतना समय और साधन हैं कि वोह पुरातन साधनायें कर पाए। गुरुदेव इसका अति सरल विकल्प बताते हुए कहते हैं कि “आत्मदेव की सत्ता” सबके भीतर समान रूप से विराजमान है, उसे उत्कृष्ट बनाने के लिए निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है। अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को ऊँचे स्तर का बनाने के लिए आत्म विकास का आश्रय लेना पड़ता है। यही है सुनिश्चित फलदायिनी “आत्मदेव की साधना।”
गुरुदेव ने सकारात्मक ऊर्जाओं और उच्च विचारों को अपनाकर अपनी आत्मा को देवात्मा के स्तर तक उठाना ही आज के युग की सबसे बड़ी साधना माना है। इसे ही “आत्मा का Upliftment” कहा गया है।
गुरुदेव के शोधकार्य के अनुसार आधुनिक युग की साधना,एकांत की उपासना तक सीमित न रहकर लोक-कल्याण और समाज सेवा जैसी आराधना व धर्म का हिस्सा बनना है। पूजास्थली में घण्टों अकेले साधना करते रहने को गुरुदेव ने नकारा तो नहीं लेकिन आज के मानव की मनःस्थिति को ध्यान में रखते हुए, तत्काल परिणाम (Instant results) पाने वाले मानव के लिए सम्पर्क करते हुए कर्म की शक्ति पर बल दिया है।
आज तो 5G का युग है, 6G द्वार पर आन खड़ा है, हर कोई टेक्नोलॉजी का बुद्धू- खिलौना हाथ में थामे है, कुछ सेकंड्स की ही उँगलियाँ घुमाकर, गुरु का सन्देश ग्लोब के किसी भी भाग में पंहुचाया जा सकता है। हंसवृत्ति वाला आज का मानव (विशेषकर युवा) क्षीर-नीर के अंतर् को जानता है,वह जानता है कि उसे टेक्नोलॉजी को कैसे प्रयोग करना है। विकास की ऐसी उच्चतम स्थिति के ही संदर्भ में शांतिकुंज परिसर में गुरुदेव के 30 जनवरी 1977 वाले दिन दिए गए उद्बोधन की कुछ पंक्तियाँ प्रासंगिक लग रही हैं, बता रही हैं कि Instant के युग में कौन सी साधना करें ताकि Instant (तत्काल) परिणाम मिलें। इस दिव्य उद्बोधन में परम पूज्य गुरुदेव “कस्मै देवाय हविषा विधेम” की बात कर रहे हैं।
ऋग्वेद की प्रसिद्ध पंक्ति “कस्मै देवाय हविषा विधेम” में साधक पूछ रहा है कि वह किस देवता की प्रार्थना करे, किस देवता के लिए हवन करें, यज्ञ करें, प्रार्थना करें। कौन सा ऐसा देव है, जो मेरी आवश्यकताओं को पूरा कर सके,मुझे शान्ति प्रदान कर सके, मुझे ऊँचा उठाने में मदद कर सके। किस देवता को प्रणाम करूँ।
आज के मानव को रेफर करते हुए गुरुदेव पूछ रहे हैं कि हम बहुत से देवताओं का पूजन करते-करते थक गए हैं । हमने शंकर जी की पूजा की, हनुमान जी की पूजा की, गणेश जी की पूजा की लेकिन किसी ने भी हमारी कामना पूरी नहीं की । हम एक को छोड़कर दूसरे पर गए। दूसरे को छोड़कर के तीसरे पर गए। हमारे मन में प्रश्न उठा कि क्या सच में कोई ऐसा देवता है भी जो हमारी मनोकामना को पूर्ण करने में समर्थ हो सके? यां हम माता पिता,बुज़ुर्गों, पंडितों के झांसे में आकर यूँही जीवन भर भटकते रहेंगें। हमें तो ऐसा भगवान् चाहिए जो हमें निश्चित रूप में, प्रतक्ष्य फल देने में समर्थ हो सके। आज का मानव पूछ रहा है कि क्या कोई ऐसा देवता है भी जिसके बारे में यह कहा जा सके कि इसकी पूजा निरर्थक नहीं जा सकती?
ऐसी असमंजस भरी स्थिति में गुरुदेव उस देवता का नाम “आत्मदेव यानि मनुष्य की आत्मा का देव” बताते हैं। यदि मनुष्य अपनी आत्मा की,स्वयं की पूजा कर पाए, स्वयं को सँभाल पाए, अपनेआप को सुधार पाए, अपनेआप को सभ्य और सुसंस्कृत बना पाए तो हर किसी की कामना पूरी हो सकती है। हमारी यह अद्भुत देह,उसमें विराजमान देवता, जिसे हम “आत्मदेव” कहते हैं, हमारी भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के द्वार खोलने में समर्थ है। “हम बदलेंगें युग बदलेंगें” का उद्धघोष गुरुदेव की इसी शोध प्रक्रिया का रिजल्ट है।
इन पंक्तियों को पढ़ रहे पाठक स्वयं ही अपने ऊपर प्रैक्टिकल करके देख सकते हैं कि किसी भी समस्या का जन्म मनुष्य के अपने कृत्यों के कारण है कि नहीं ? यदि वोह समस्या मनुष्य की अपनी ही क्रिएट की हुई है तो समाधान भी उसी के पास है कि नहीं ?
इस विषय को समझने के लिए दैनिक जीवन से ही अनेकों उदाहरण दिए जा सकते हैं,आइये आर्थिक स्थिति का ही एक उदाहरण ले लें। धन आपके पास है नहीं लेकिन लोगों को खुश करने के लिए,वाहवाही लूटने के लिए, अमीर दिखने के लिए,कर्ज़ा लेना कहाँ की समझदारी है? इस स्थिति में अधिकतर उत्तर यही मिलेंगें, “समाज में रहना है, लोग क्या कहेंगें? लेकिन विवेकशील मनुष्य Money management करते ही,चादर देख कर पाँव फैलाने के सिद्धांत का पालन करते ही सारी आर्थिक अस्त व्यस्तता से छुटकारा पा लेता है । हैं न Instant result, यही है “आत्मदेव की साधना,आधुनिक युग की साधना” जो मंदिर में घंटी बजाने,शिवजी के पांव दबाने से बिलकुल अलग है। आज तो 5 वर्ष का शिशु भी इतना तर्कशील है कि उसे कोई भ्रमित नहीं कर सकता। आत्मदेव की साधना के बाद ही,सही-गलत का अंतर् जानने के बाद ही हम उसे Satisfy कर सकते हैं।
हम सब देख रहे हैं कि “भौतिक-विज्ञान (केमिस्ट्री,फिजिक्स आदि )” के उत्साहवर्धक प्रशिक्षण की तरह “आत्म-विज्ञान (Science of soul, Spiritual science,Science of self or Self-knowledge)” की सफल शिक्षा के द्वार भी खुल रहे हैं,अन्धविश्वास खत्म हो रहा है, आज के मानव को इस प्रक्रिया से लाभ भी मिल रहा है।
इस साधना के लिए गुरुदेव विश्व के एकमात्र “भटके हुए देवता के मंदिर” की बात करते हैं । इस कक्ष में पांच आदमकद दर्पण लगे हैं। उन पर पांच सूत्र लिखे हैं: 1. सोऽहम् (मैं वही हूं),2. शिवोऽहम् (मैं शिवरूप हूं),3. सच्चिदानन्दोऽहम् (मैं सत् चित् आनन्द रूप हूं),4. अयमात्मा ब्रह्म (यह आत्मा ही ब्रह्म है) एवं 5. तत्त्वमसि (वह तुम्हीं हो) , दर्पण के सामने खड़े होकर अपनी आत्मचेतना को जाग्रत्, सक्रिय करने की यह विशिष्ट आत्म-साधना है। सामान्य रूप से मनुष्य अपनेआप को परिस्थितियों में बंधा “एक कर्ता-भोक्ता” ही मानता है परन्तु उसके अन्दर चेतना की अन्य पर्तें भी हैं, जो द्रष्टा, निर्देशक और नियन्ता की क्षमताएं रखती हैं। शरीर के अन्दर अनेक जटिल प्रक्रियाएं चलती रहती हैं जिन्हें वैज्ञानिक बड़ी मुश्किल से थोड़ा-बहुत समझ पाते हैं। हमारी चेतना ही उन क्रियाओं का कुशल संचालन करती रहती है। पाचन से प्रजनन तक की सारी क्रियाएं अंतःचेतना द्वारा ही संचालित हैं।
अगर मनुष्य का रिसीवर ठीक हो तो ब्राडकास्टिंग स्टेशन से प्रसारित हो रहा कोई भी सन्देश पकड़ा/सुना जा सकता है। अपनी ट्युनिंग ठीक न हो, तो शक्तिशाली से शक्तिशाली प्रसारण (ट्रॉस्मिशन) का भी लाभ नहीं उठाया जा सकता। मानवी व्यक्तित्व में “अनन्त से सम्पर्क करने आदान-प्रदान करने की क्षमता है।” आत्मदेव की साधना में अपने अंदर के द्रष्टा, निर्देशक, नियन्ता को जाग्रत्-विकसित, प्रतिष्ठत किया जाता है।
इस साधना के लिए साधक को केवल दर्पण के सामने बैठना है,अपने बिम्ब को ध्यान से देखना है, अनुभव करना है कि मेरा सबसे निकट का मित्र, सच्चा हितैषी, अनन्त क्षमताओं से सम्पन्न मेरे अंदर ही विराजमान है। मेरे गुण दोष न तो इससे छिपे हैं और न यह उनकी ओर से उदासीन रहता है। इसके सहयोग से, मार्गदर्शन से कोई भी दोष हटाया एवं कोई भी गुण विकसित किया जा सकता है। इस प्रकार बोध करते हुए अपने दोषों गुणों की समीक्षा करते हुए दोषों के निष्कासन तथा गुणों के संवर्धन के सार्थक ताने-बाने बुने जा सकते हैं। दर्पण पर अंकित सूत्रों को इस साधना का आधार बनाया जा सकता है।
हमारा व्यक्तिगत विश्वास है कि इस भाव से, सरलता से की गयी “आत्म देव की साधना” तत्काल परिणाम देने में समर्थ है क्योंकि साधक बिना सोचे-समझे किसी पत्थर की पूजा नहीं कर रहा है,स्वयं की पूजा,स्वयं के परिष्कार का प्रयास कर रहा है।
इसी विषय पर गुरुदेव ने हमारे लिए मात्र 30 पन्नों की पुस्तिका “व्यक्तित्त्व परिष्कार की साधना अद्भुत और अनुपम सुयोग” लिखी है।
आज के लेख का यहीं पर मध्यांतर होता है।