आज 29 जुलाई 2026,बुधवार का वोह पावन दिन है जिसे हम सब गुरुपूर्णिमा, व्यासपूर्णिमा कह कर मना रहे हैं। शायद ही कोई ऐसा साथी होगा जिसे इस दिन के महत्व का ज्ञान न होगा, लेकिन हमारे लिए यह दिन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब परम पूज्य गुरुदेव स्वयं आकर अखंड ज्योति मई 1971 में प्रकाशित हुए “अपनों से अपनी बात” स्तम्भ में समाहित ज्ञान को ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के साथिओं के साथ चर्चा करने का निर्देश दे जाते हैं। यह अंक उस समय प्रकाशित हुआ था जब गुरुदेव हिमालय जाने की तैयारी कर रहे थे और अपने बच्चों से बिछुड़ने के दर्द को सहन करने का प्रयास कर रहे थे।
“अपनों से अपनी बात” के जिस कंटेंट की यहाँ बात हो रही है कोई ऐसा वैसा स्तम्भ नहीं था !!! 6 पन्नों में समाहित, 4535 शब्दों के विशाल अद्भुत ज्ञान को समझने के लिए न जाने हमने कितनी ही बार पढ़ा,बार-बार एक ही प्रश्न उठा कि दुर्गम हिमालय में इस स्तर की तप साधना का उद्देश्य क्या था,यह बालबुद्धि इतना ही समझ पायी कि इस तपश्चर्या के पीछे “एक शोधकार्य” था, “एक रिसर्च प्रोजेक्ट” था। जिसे आज के युग के साधकों को लाभान्वित कराना था। जितनी बार पढ़ा, हर बार एक अद्भुत सी वाइब्रेशन का अनुभव हुआ। इस वाइब्रेशन से यदि हम अपने साथिओं के ह्रदय के तारों को झंकृत कर पाए तो गुरुपूर्णिमा का यह पावन पर्व सफल होता दिखेगा,ऐसा हमारा विश्वास है। सभी जानते हैं कि गुरु का स्थान तो भगवान् से भी ऊपर है, आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ गुरुवंदना से किया जाए तो इससे बड़ी बात क्या हो सकती है।
आइए आज की गुरुकक्षा का शुभारम्भ करें।
****************
गुरुदेव बता रहे हैं:
यह अंक पाठकों के हाथों तक पहुँचने के बाद, हमारे अज्ञातवास चले जाने के केवल चार-पाँच सप्ताह ही बाकि रह जायेंगे। इसके बाद हम एक ही लेख “अपनों से अपनी बात” स्तम्भ के अंतर्गत अपनी कलम से और लिख सकेंगे। इसके बाद चिरकाल के लिये हमारी लेखनी एक प्रकार से विश्राम ही ले लेगी। ऐसी भी कोई बात नहीं है, भगवान् शंकर की जटाओं में से प्रवाहित होने वाली गंगा की तरह भविष्य में भी नवचेतना का प्रवाह गतिशील रहेगा। आप सबकी माता जी,माता भगवती देवी शर्मा जी, हमारे और आप परिजनों के बीच एक सेतु का कार्य करेंगी। अब भी हम केवल एक माध्यम मात्र ही हैं। वर्षों से जन जागरण के लिए हम जिस प्रकाश को अग्रसर करते रहे हैं, वह वस्तुतः हमारा था नहीं। पुराणों के संदर्भ में कहा जाता है कि उन्हें व्यासजी ने बोला और गणेश जी ने लिखा था। यह कहना तो कठिन है कि इस कथन में कितना तथ्य है,सत्य है लेकिन हमारे सम्बन्ध में यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि एक अति उच्चकोटि की देवसत्ता ही न केवल हमारा मार्गदर्शन करती रही बल्कि उंगली पकड़ कर छोटे बच्चे को चलाने वाली माता की तरह, कलम पकड़ कर, लिखना सिखाने वाले अध्यापक की तरह, वह सब कराती रही है। हमने जो कुछ भी किया है, हमारे द्वारा जो कुछ भी लिखा गया है, सब हमारी मार्गदर्शक सत्ता का ही किया धरा है। आगे भी यही क्रम जारी रहने वाला है।
हमारे पाठकों को डर है कि जिस “ज्ञान-गंगा के स्नान” की शीतलता और स्फुरणा से वोह अब तक लाभान्वित होते रहे हैं,हमारी हिमालय यात्रा के कारण उन्हें उस ज्ञानगंगा के स्नान से वंचित रहना पड़ेगा। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकायें इसी प्रकार निकलती रहेंगी। हमारे मार्गदर्शक का, हमारा प्रकाश, माताजी के माध्यम से सर्वसाधारण को प्रेरणा देने के लिए भविष्य में भी उपलब्ध रहेगा। फर्क सिर्फ इतना ही होगा कि जो प्रक्रिया अब तक स्थूल में चलती रही है वह एक प्रकार से बन्द हो जायगी। जो शक्ति हमारे हाथों से आजतक काम कराती रही है, वही अब माताजी तथा उनके सहायक (जिनमें चिरंजीव बलराम सिंह परिहार प्रमुख हैं) इस मशाल को प्रज्वलित रखेंगे। पाठकों को जो “बौद्धिक भोजन” मिलता रहा है, उससे कम स्तर का नहीं ऊंचे ही स्तर का पोषण सिंचन मिलता रहेगा। पिछले दिनों में हमने स्वयं ही इतना अधिक लिखकर रख दिया है जिसके प्रकाशन की व्यवस्था बनाने का अभी अवसर ही नहीं आया, उसे छापने में हमारे उत्तराधिकारियों को अभी 10 और वर्ष लग सकते हैं। इन सबके के बावजूद, हमारे बच्चों को यह समझ लेना चाहिए कि हमारी लेखन प्रक्रिया का यह अन्तिम चरण है। अखंड ज्योति के इस मई अंक के बाद हम केवल जून का अंक ही चालू कलम से लिख पायेंगें। जून वाला “अपनों से अपनी बात” का स्तम्भ हमारे हाथ से लिखा अन्तिम अंक होगा। इसके बाद माताजी इस प्रकरण को जारी रखेंगी।
इन पंक्तियों के लेखक ने जून 1971 वाले अंक का स्वाध्याय किया है,उस अंक में से भी जो कुछ कनेक्टेड मिलेगा शामिल करने को वचनबद्ध हैं।
गुरुदेव बता रहे हैं कि जिस कार्य को हम अब तक अकेले करते रहे उसका स्वरूप और विस्तार अब अनेकों गुना हो गया है। इसलिए उसके भार, उत्तरदायित्व एवं कर्तृत्व का भी विभाजन किया जा रहा है। इंग्लिश में इस प्रक्रिया को Decentralisation कहते हैं।
हमारी तपश्चर्या का उद्देश्य:
हम स्वयं ही ऐसी शक्ति का उपार्जन करेंगे जो सजग और सामर्थ्यवान आत्माओं में नवनिर्माण की दिशा में चलने योग्य कसक, उमंग एवं हिम्मत उत्पन्न कर सकें। कुसंस्कारी और ओछे स्तर के लोग पेट और प्रजनन के लिए जियें, वासना तृष्णा के लिए बहुमूल्य मानव-जीवन नष्ट करें तो उनकी उपेक्षा की जा सकती है लेकिन ऐसे लोग जिन्हें धर्म, अध्यात्म, परमार्थ और कर्तव्य का ज्ञान है, वे भी लोभ, मोह और कायरता के बंधनों में बँध कर युग-पुकार की वाणी को अनसुनी करते रहें, युग परिवर्तन के महाभारत में गाण्डीव पटककर कायर बने बैठे रहें तो हमारे लिए यह अति असहनीय होगा।
अगले 29 वर्ष (1971-2000) एवं युगसंधि के 12 (1989-2000) वर्ष विश्व के इतिहास में एक अभूतपूर्व परिवर्तन प्रस्तुत करने वाले आ रहे हैं। मानवीय भविष्य को विनाश के गर्त से निकाल कर उज्ज्वल बनाने का अति नाजुक कार्य सामने खड़ा है। इस वेला में हर जागृत एवं उत्कृष्ट आत्मा की लोभ, मोह की जंजीरें काटकर असुरता की लंका ढाने और संस्कृति की सीता वापिस लाने के लिए रीछ-वानरों की भूमिका सम्पादित करनी पड़ेगी। जिस मूर्छना के कारण वे बहुत सोचते हुए भी कुछ कर नहीं पा रहे हैं उस अवसाद को दूर करने और उन्हें कर्मक्षेत्र में उतारने के लिए एक विशिष्ट अनुदान की जरूरत पड़ेगी। अर्जुन को, हनुमान को जो अनुदान मिला था वही इस युग के उन महामानवों को देना होगा जो सोई हुई समर्थता के कारण कुछ कर नहीं पा रहे हैं। हमें ऐसी प्रतिभाओं की समर्थता को जागृत करते हुए, उन्हें नींद से जगाना है,सोये हुओं को जगाना है,जगे हुओं को उठा कर चलाना है और चलते हुओं को दौड़ाना है।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से गुरुज्ञान की धधकती ज्वाला से अपने प्राणों से भी प्रिय साथिओं के ह्रदय में एक चिंगारी फेंक कर ज्ञान का ऐसा प्रकाश फैलाना है जिसे देखकर आसपास के सभी लोग आश्चर्यचकित हो जाएँ। इस संकल्प के लिए हमें चाहे जो कुछ भी करना पड़े, चाहे कुछ भी सुनना पड़े, हम पीछे हटने वाले नहीं हैं क्योंकि पीछे की ओर तो कायर मुँह मोड़ते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि उलटे हुओं को उलट कर सीधा करना कोई सरल कार्य नहीं है।
परम पूज्य गुरुदेव अपने ही जीवन की बात बताते हुए कह रहे हैं कि अपने बच्चों को जिस अनुदान को देने की हम चर्चा कर रहे हैं, हमें स्वयं ऐसा ही अनुदान 15 वर्ष की आयु में मिला था। हमारे गुरु हमारे घर आये थे, अनुदान देकर हमसे संकल्प ले गए थे। हमने उन संकल्पों के फलस्वरूप अपने जीवन को पेट और प्रजनन तक सीमित न रखकर, साहसपूर्वक कुछ ऐसी महत्वपूर्ण कार्यपद्धति अपनाई जो अपने लिए ही नहीं असंख्य अन्यों के लिए भी श्रेयस्कर सिद्ध हुई। हमारी इच्छा है कि जो सौभाग्य हमने पाया वही अपने असंख्यों बच्चों को भी दे दें ।
गुरुदेव के इसी सन्देश को दृढ़ता से इस मंच से प्रसारित किया जाता रहा है कि जो कुछ हमें मिला है,उससे हमारे ह्रदय में बसे साथी क्यों वंचित रह जाएँ।
गुरुदेव के अनुदानों (जिनमें दिव्य ज्ञानप्रसाद लेख भी शामिल हैं) से अगले दिनों ऐसे कर्मठ लोकसेवी उत्पन्न होंगे जो त्याग और बलिदान के अस्त्र-शस्त्र लेकर नवनिर्माण के महान अभियान का नेतृत्व कर सकने की ऐतिहासिक एवं अनुकरणीय भूमिका प्रस्तुत कर सकेंगें। गुरुदेव की उग्र तपश्चर्या का मूल प्रयोजन संस्कारवान आत्माओं को महामानवों के रूप में परिणत हो सकने योग्य सामर्थ्य प्रदान करना है।
गुरुदेव कह रहे हैं:
हमारा सुनिश्चित विश्वास है कि जो कार्य पिछले सेवा काल में हम प्रत्यक्ष रहकर न कर सके, उसे अगले दिनों परोक्ष रूप में रहकर कर सकेंगे। हमने 24 वर्ष की तपश्चर्या की, इस तपश्चर्या ने विगत 20 वर्षों के सेवाकाल में इतना कुछ कर दिखाया, जिसे अनुपम और अद्भुत कहना अत्युक्ति न होगी। अगले दिनों, हिमालय तपश्चर्या के कारण हमारे क्रियाकलाप प्रत्यक्ष न दिखेंगें और उनका श्रेय हमें न मिलेगा लेकिन इससे क्या होता है, तथ्य तो तथ्य ही रहेगा। इन दिनों सच्चे और कर्मठ लोकनिर्माताओं का भारी अभाव है जिनमें विश्वमानव के भविष्य निर्माण का साहस एवं उत्सर्ग उमड़ पड़ रहा हो ऐसे कर्मवीर कहीं दिखाई नहीं पड़ते। सार्वजनिक क्षेत्र में धन, पद और यश के लोभी सिंह की खाल ओढ़े डरपोक गीदड़ ही विचरण कर रहें हैं। सच्ची लगन के थोड़े से भी कर्मवीर क्षेत्र में रहे होते तो विश्व का कायाकल्प हो सकना कठिन न रह जाता।
इसी अभाव की पूर्ति करने के लिए हम अपने भीतर प्रचण्ड दावानल उत्पन्न करेंगे जिसकी ऊष्मा से जंगल के जंगल जलते दिखाई पड़ें और लोकनिर्माण के लिए जिन साहसी सैनिकों का आज अभाव दिख रहा है उसकी कमी पूरी की जा सके। हम जिस अग्नि में अगले दिनों तपेंगे उसकी गर्मी असंख्य जागृत आत्मायें अनुभव करेगी और लोभ मोह की कृपणता छोड़कर आज के एकमात्र ईश्वरीय निर्देश-भावनात्मक नवनिर्माण के, युग परिवर्तन के महान अभियान में अपना ऐतिहासिक योगदान करेगी।
अगले दिनों बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति की त्रिवेणी किस तरह उद्भूत होती है उसे लोग आश्चर्य भरी आँखों से देखेंगे। भावी महाभारत का संचालन करने के लिए कितने कर्मनिष्ठ महामानव अपनी वर्तमान मूर्छना को छोड़कर आगे आते हैं, इस चमत्कार को अगले ही दिनों प्रत्यक्ष देखने के लिए सहज ही हर किसी को प्रतीक्षा करनी चाहिए। लोकसेवियों की एक ऐसी उत्कृष्ट चतुरंगिणी खड़ी कर देना जो असम्भव को संभव बना दे, नरक को स्वर्ग में परिणत कर दे, हमारे ज्वलन्त जीवन क्रम का अन्तिम चमत्कार होगा।
अब तक के जिन छुटपुट कामों को देखकर लोग हमें सिद्ध पुरुष कहने लगे हैं, उन्हें अगले दिनों परोक्ष कर्तृत्त्व का लेखा-जोखा यदि समझ आ जाए तो वे इससे भी आगे बढ़कर न जाने कौन-कौन से अलंकार प्रदान कर देंगे। निश्चित रूप से हमारी भावी परोक्ष साधना विश्वमानव के सम्मुख ऐसा अनुदान प्रस्तुत करेगी जो उसके भाग्य और भविष्य की दिशा ही मोड़ दे। राजा सगर के पूर्वज भागीरथ ने राजा के 60000 पुत्रों को नरक की आग में जलने से बचाने के लिए गंगा का अवतरण किया था। भागीरथ की ही तरह हमें भी ज्वलंत मानवीय समस्याओं का सृजनात्मक और ध्वंसात्मक हल प्रस्तुत करने के लिए बहुत कुछ करना है। संसार के मानवों में मची त्राहि-त्राहि की अग्नि को बुझा सकने वाली ज्ञानगंगा का अवतरण करने के लिये हमें भी उन्हीं पदचिह्नों का अनुगमन करना है जिन पर भागीरथ ने प्रयाण किया था।
हमारी भावी तपश्चर्या का मूल प्रयोजन यही है।
यहीं पर होता है आज के लेख का मध्यांतर