वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परिवर्तन प्रक्रिया का सार-संक्षेप 

उन्नीसवीं शताब्दी(1801-1900) से आरम्भ होकर बीसवीं(1901-2000) सदी के अन्तिम चरण तक, 200 वर्षों में  कालचक्र अत्यन्त तीव्रगति से घूमा है। जितना भला-बुरा पिछले हजारों वर्षों में नहीं बन पड़ा, वह इस 200 वर्ष की अवधि में हो चला है। 

इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित है:

—प्रगति के नाम पर असाधारण महत्त्व के आविष्कार, बुद्धि तीक्ष्णता के पक्षधर प्रतिपादन, शिक्षा, चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में नए निर्धारण, विशालकाय कल-कारखाने इन्हीं दिनों लगे हैं। युद्ध सामग्री का उत्पादन एक नया व्यवसाय बनकर उभरा है, अन्तरिक्ष को खोज डालना इसी समय की उपलब्धि है, अनेक राज्य क्रान्तियाँ हुई हैं। भारत समेत अनेक देशों को प्राप्त हुई स्वतंत्रता आदि अनेक उपलब्धियों की गणना इसी  क्रम में हो सकती है।

—बीसवीं सदी में बुद्धि,ज्ञान, समझ  के नाम पर भी ऐसा कम नहीं हुआ जिसे खेदजनक न कहा जा सके। दो विश्व युद्ध (1914-1918 और 1939-1945) इन्हीं दिनों  हुए, जापान पर अणुबम भी इन्हीं दिनों (1945) में  गिराए गए। छोटे-छोटे लगभग 100 युद्ध इसी बीच लड़े गए। नशाबाजी चरम सीमा तक पहुँची, व्यभिचार(Adultery) पाप न रहकर एक सामान्य लोकाचार जैसा बन गया, जिससे पारिवारिक संबंधों  को भारी चोट पहुँची। जनसंख्या असाधारण रूप से बढ़ी, असंयम और अनाचार एक फैशन सा  बन गया। प्रकृति प्रकोपों ने कीर्तिमान बनाया, कुरीतियों और मूढ़ मान्यताओं ने सभ्य और असभ्य सभी को एक ही चाबुक  से हाँका।

—अनौचित्य (Improper behaviour) को रोकने और विकास उपक्रमों को बढ़ाने के लिए भी कुछ होता रहा लेकिन वह विशिष्ट प्रगति करने और बुद्धिमत्ता  पर इम्प्रॉपर  का अंकुश लगाने में कुछ-कुछ ही सफल हुआ। राष्ट्रसंघ से लेकर सरकारों के विकास कार्य और संस्थाओं के सुधार क्रम इतने सफल न हो सके जिसे कालचक्र की गतिशीलता पर सन्तुलन बिठा पाने का श्रेय मिल सके। कुल मिलाकर बीसवीं सदी (1901 से 2000 के वर्ष) घाटे की रही, उसमें बना कम, बिगड़ा ज्यादा। इस सम्भावना को भविष्यवक्ता और दूरदर्शी पहले से ही  बताते और चेतावनी देते रहे थे। ईसाई मान्यता वाला Seven time, इस्लाम मान्यता की चौदहवीं सदी, 18 पुराणों में से एक, “भविष्य पुराण” में कलयुग के संकेत आदि को मिलाकर देखा जाए तो प्रतीत होता है कि विभीषिकाओं की आशंका अपनी विकरालता दिखाती ही रही।

—कालचक्र का क्रम ऐसा है कि इसने तो अपना चक्र पूरा करना ही है। बीसवीं सदी में हुई क्षति की पूर्ति इक्कीसवीं सदी में होगी। इसमें विकास उभरेगा और विनाश की खाई पटती जाएगी। 

अनेकों दिव्यदर्शियों, आँकलनकर्ताओं तथा पश्चिमी प्रतिभाओं ने भी एक स्वर से इस तथ्य का समर्थन किया है। हमें आशा करनी चाहिए कि अगली शताब्दी नया माहौल लेकर आएगी।

—रात्रि की विदाई और प्रभात के आगमन को “मध्यांतर सन्धिवेला” कहा जाता है। ऊषाकाल, ब्रह्ममुहूर्त जैसे नाम ऐसे मध्यांतर काल के समय को ही दिए जाते हैं। युगसन्धि के सम्बन्ध में मान्यता है कि वह बीसवीं सदी के अन्तिम 12 वर्षों में ही होनी है। सन् 1989 से 2000 तक के 12 वर्ष इसी स्तर के माने जा रहे हैं। इसकी तुलना सर्दी और गर्मी के बीच आने वाले वसन्त से अथवा गर्मी और सर्दी के मध्यवर्ती वर्षाकाल से की जा सकती है। इस अवधि में गलाई और ढलाई की दोनों परस्पर विरोधी दिखने वाली क्रिया-प्रक्रिया चलती दिखाई देगी। अवाँछनीयता के उन्मूलन वाला उत्साह उभरेगा और नवसृजन के भव्य प्रवाह का आगमन दिख  पड़ेगा।

—सन्धिकाल का महत्त्व असाधारण माना गया है। गाड़ी के दो पहियों को चलाने में मध्यवर्ती धुरी (Axle) की ही प्रमुख भूमिका होती है। भोर होते ही घर-घर में बुहारी लगती है और पकाने के लिए चूल्हा गरम किया जाता है। ऐसे  ही प्रयोग युगसन्धि के मध्यांतर  में नए सिरे से, नए उत्साह से कार्यान्वित होते दिख  पड़ेंगे।

—इन मोर्चों पर एक साथ लड़ने के लिए “प्रखर प्रतिभाएँ” सृजनशिल्पी के रूप में उभरेंगी और ऐसे पराक्रम प्रस्तुत करेंगी जिन्हें असाधारण की संज्ञा मिलेगी। हर काम मध्य गति से तो सदा-सर्वदा चलता ही रहता है लेकिन  विशेष समय में विशेष रूप से सुहावना होता है। अरुणोदयकाल में चिड़ियों को फुदकते, कलियों को खिलते, मन्दिरों में शंख बजते, ध्यान होते एवं हर क्षेत्र में नए सिरे से नई हलचल को उभरते देखा जाता है। प्राणवान कर्मयोगी, उग्र सिद्धि के इन दिनों में अपने में नई उमंगें उभरती देखेंगे। वे संघर्ष एवं सृजन के दोनों कार्यों में अपने पुरुषार्थ का, हनुमान एवं अंगद जैसा परिचय देंगे। उन्हीं ने  लंका दमन, रामराज्य के सतयुग सृजन में अपने को पूरी तरह खपाया था। इन भावनाओं से अनुप्राणित असंख्यों को देखा जा सकेगा, रीछ-वानर गिद्ध, गिलहरी, केवट, शबरी जैसे अल्पशक्ति वालों की भी भूमिका देखने योग्य होगी। ऑनलाइन ज्ञानरथ ज्ञानरथ गायत्री परिवार में ऐसी अनेकों अल्पशक्ति की प्रखर प्रतिभाएँ ऐतिहासिक भूमिका सम्पन्न कर रही हैं । युगसन्धि के 12 वर्षों में यह उत्साह उभरता-उछलता दिखाई दे रहा था । स्वार्थों में कटौती और परमार्थ अपनाने के लिए हर प्राणवान में दौड़ देखी  गयी 

भविष्यवाणिओं  के अनुसार शुभ के आगमन और अशुभ के पलायन के चिह्न युगसन्धि के दिनों में ही अंकुरित हुए दिखे । इक्कीसवीं सदी में नवयुग का वट वृक्ष बढ़ता एवं  परिपक्व होता जाएगा और कुछ ही वर्षों में इतना प्रौढ़ हो जाएगा कि भूतकाल से तुलना करने वाले उस ख्याति को एक स्वर से “नवयुग” कह सकेंगें। 

—नवयुग समुद्र मन्थन जैसा होगा, उसमें समय की आवश्यकता के अनुरूप 14  रत्न निकलेंगे। विज्ञान का दैत्य और अध्यात्म का देव दोनों ही पक्ष मिलकर समुद्र मन्थन की भूमिका सम्पन्न करेंगे। प्रकृति मन्दराचल पर्वत जैसी मथनी का काम करेगी, मानवी उत्साह वासुकि नाग  जैसी भूमिका सम्पन्न करेगा। दिव्य प्रेरणा का अदृश्य सहयोग कूर्मावतार (कच्छप अवतार) की तरह इन सब का भार अपनी पीठ पर धारण किए हुए होगा।

—राजशक्ति, बुद्धिशक्ति, धनशक्ति की महिमा के महत्त्व से सभी परिचित हैं। नवयुग का अवतरण करने में चौथी शक्ति ‘‘प्रखर प्रतिभा’’ उभरेगी। इसे भाव सम्वेदनाओं से भरी पूरी आदर्शवादी उमंग भी कह सकते हैं, यह सभी सुसंस्कारी नर-नारियों को अनुप्राणित करेंगी जो ‘हम बदलेंगे, युग बदलेगा’ का आदर्श प्रस्तुत कर रहे होंगे।

—मानव धर्म के रूप में समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को यूनिवर्सल मान्यता मिलेगी, इसका तत्त्वदर्शन नवयुग का धर्मशास्त्र बनेगा और व्यवहार में उतरेगा।

—परिवर्तन का प्रवाह युद्धोन्माद को शान्त करेगा, शान्ति और सहयोग का वातावरण बनेगा। इन दिनों भी ईरान, ईराक, कम्पूचिया, नामीबिया, अंगोला, पनामा, निकारागुआ आदि क्षेत्रों में आपसी संबंधों में ठण्डक आई है। 

—जनशक्ति अपनी प्रगति की आवश्यकताओं को अपने बलबूते पर  सम्भव बनाएगी। अनुदानों, अनुग्रहों की अपेक्षा न करके समयदान एवं अंशदान के सहारे इतने साधन जुटा लेगी जिनके सहारे आलराउंड  प्रगति के लिए जिन आधारों को खड़ा किया जाना है उन्हें बिना किसी कठिनाई के जुटाया और बढ़ाया जा सके।

—सूर्य शक्ति को ऊर्जा के लिए प्रयुक्त करना, इक्कीसवीं सदी की प्रधान उपलब्धि होगी। रेगिस्तान उपजाऊ भूमि में बदले जा सकेंगे, भारत का थार,राजस्थान क्षेत्र, इजराइल,UAE आदि के अनेकों रेगिस्तान उपजाऊ भूमि के लिए जाने जाते हैं। 

—समझदारी बढ़ने के साथ जनसंख्या कण्ट्रोल का लॉजिक  सबकी समझ में आ जाएगा और अमर्यादित प्रजनन समाप्त हो जाएगा। आधी जनसंख्या नारी के रूप में उपेक्षित, पिछड़ी और गई गुजरी स्थिति में इन दिनों पड़ी है। अगली शताब्दी में नर और नारी एक समान बनकर रहेंगे जिससे जनशक्ति दुगनी  हो जाएगी।

—एकता और समता का लॉजिक  समझा जाएगा। सम्प्रदाय, क्षेत्र, भाषा, जाति आदि के नाम पर चल रही विषमता घटती और मिटती जाएगी, एक धर्म (मानव धर्म) एक जाति(मानव जाति) एवं एक भाषा (मानव भाषा) जैसी मान्यताएँ दिन-दिन प्रबल होती जाएँगी।

—साहित्य, संगीत और कला के अधिष्ठाता, भावना और विचारणा को परिष्कृत करने की योजना बनाएँगे और उसे पूरी करेंगे। सबसे बड़ी बात होगी, मनुष्य का चिन्तन, चरित्र और व्यवहार बदलेगा। उसमें मानवी गरिमा के प्रति आस्था का समावेश होगा। मर्यादाओं और वर्जनाओं का सभी ध्यान रखेंगे। व्यक्तिवादी संकीर्ण स्वार्थपरता के प्रचलन के प्रति आक्रोश उभरेगा और उसके स्थान पर समाज निष्ठा एवं परमार्थ परायणता श्रेय सम्पादित करेंगे।

—भावी सम्भावनाओं में से यहाँ कुछ का ही उल्लेख है, स्थानीय परिस्थितियों और प्रथाओं के अनुरूप सब में अभीष्ट परिवर्तन चल पड़ेगा। 

इसका उत्तर एक ही है कि जागृत मनुष्यों में से अधिकांश की महत्त्वाकांक्षाएँ इसी दिशा में मुड़ेंगी, वे युग परिवर्तन जैसे महान सुयोग में अपनी भूमिका अग्रगामी रखेंगें  और युग सृजेता के रूप में अपनी अनुकरणीय, अभिनन्दनीय ऐतिहासिक भूमिका निभायेंगें ।

—सेवा और सृजन की उमंगें तूफानी गति से उभरेंगी, इसलिए सुधार परिवर्तन के आयोजन स्थानीय परिस्थितियों, आवश्यकताओं एवं साधनों के अनुरूप ही होंगे। ऐसे देवमानवों का बाहुल्य होगा जो एक जीवन्त सृजन संस्था के रूप में सोचने और करने में कटिबद्ध हुए दिख पड़ेंगे।

—नवयुग की सम्भावनाओं,युग परिवर्तन की सत्यता को  केवल कल्पना समझने वाले,उपहास उड़ाने वाले अनेकों मिलेंगें लेकिन अधिकतर लोग युगपरिवर्तन प्रक्रिया में सहयोग देंगें। फिज़ूल की बातें करने वाले, निष्क्रिय रहने वाले, समय के अभाव का रोना रोने वाले, युगनिर्माण कार्य में रोड़े अटकाने वाले, दुराग्रहियों की भी कमी न रहेगी लेकिन अंत में सृजन की ही जीत होगी क्योंकि सृष्टि का यही एकमात्र नियम है, विनाश के बाद सृजन। प्रकाश का ही अभिनन्दन होगा और सतयुग की वापसी की सुखद सम्भावनाएँ अगले दिनों साकार होकर रहेंगी। 

इस असम्भव को सम्भव कर दिखाने वाले अग्रगामी अपनी “प्रखर प्रतिभा” का किस प्रकार, किस सीमा तक परिचय देते हैं, कैसे उलटे हुए मानवों को उलट कर सीधा कर पायेंगें, इसी को नवयुग की अद्भुत उपलब्धि के रूप में देखा, समझा और आँका जा रहा है,आँका जाएगा। 

परम पूज्य गुरुदेव ने इस सारांश का समापन निम्नलिखित शब्दों से किया है: 

“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” को स्वयं समझ कर,अनेकों को समझाने में ही सही युगपरिवर्तन प्रक्रिया में सहयोग है। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवारजनों को इस पुनीत अवसर में श्रेय लेने का सौभाग्य मिल पाना कोई साधारण बात नहीं है, ऐसे स्वर्ण अवसर बार-बार नहीं मिलते, देखना कहीं कोई और बाज़ी न  मार जाए और हम हाथ  मलते रह जाएँ। 

धन्यवाद,जय गुरुदेव   


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