वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

इक्क्सवीं सदी का धर्म “समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी” का चार चरण वाला युगधर्म ही होगा। 

आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शीर्षक देखकर कर प्रश्न कर सकता है कि ऐसा कौन सा व्यक्ति है जिसे “समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी” जैसे शब्दों का ज्ञान नहीं है। इन शब्दों का किताबी ज्ञान तो अनेकों को होगा, प्रचार भी खूब हो रहा है, लेकिन यदि सब कुछ समझ में आ रहा है तो फिर विश्व में त्राहि-त्राहि,मारकाट क्यों मची पड़ी है? गुरुदेव तो बड़ी ही स्प्ष्टता और ज़ोर से 21वीं सदी को उज्जवल भविष्य घोषित कर चुके हैं, उनके पास कौन सी जादू छड़ी है जिससे अगले 75 वर्षों में सतयुग का अवतरण होने वाला है। 

“क्रांतिधर्मी साहित्य” के अंतर्गत रचा गया दिव्य साहित्य गुरुदेव के समस्त साहित्य का मक्खन है,जिसने उसे पढ़ लिया, समझ लिया समझो वही गुरुदेव का सच्चा शिष्य है,उसी की नाव किनारे पर लग गयी। 

आज के ज्ञानप्रसाद लेख में इन्हीं चार शब्दों को आज के परिपेक्ष्य में समझने का प्रयास है, आइए आज के इस दिव्य अमृतपान का शुभारम्भ, पूर्ण श्रद्धा एवं निष्ठा के साथ  गुरुचरणों में समर्पित होकर करें। 

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इक्कीसवीं सदी में सर्वसाधारण के जीवन में चार अनुबन्धों का सघन समावेश होगा। 

(1) समझदारी (2) ईमानदारी (3) जिम्मेदारी (4) बहादुरी। 

इन चारों आदर्शों को चार वेदों का सार तत्त्व समझा जा सकता है। धर्म के यही चार चरण रहेंगे। अभिनव समाज और परिष्कृत वातावरण की संरचना इन्हीं आदर्शों को अपनाते हुए की जाएगी। 

नवयुग का नीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र भी इन्हीं चार तथ्यों पर आधारित होगा। इन्हीं की अवहेलना से अनेक दुर्भावनाएँ और दुष्प्रवृत्तियाँ पनपी हैं। उनका निराकरण समाधान भी इन्हीं चारों के पुनः प्रतिष्ठापन (उलटे हुओं को उलट का सीधा करना) से सम्भव होगा।

आइए रोज़मर्रा जीवन में प्रयोग हो रहे इन चार शब्दों को गुरुवर की दृष्टि से समझने का प्रयास करें। 

तुरन्त का लाभ (Instant gain) देखकर, उस पर बेहिसाब टूट पड़ना, उसके साथ जुड़े हुए भविष्य के दुष्परिणामों को न समझ पाना ही नासमझी है। यह नासमझी ही अनेक समस्याओं,कठिनाइयों,विपत्तियों और विभीषिकाओं का मूलभूत कारण है। यदि आने वाले दिनों में समझदारी से अपने कृत्यों के परिणामों को ध्यान में रखा जा सके तो किसी को भी,कोई भी कठिनाई का सामना न करना पड़ेगा। मात्र इतना सा ही करने पर अन्धकार से प्रकाश की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है। 

मछलियाँ आटे के लालच से जाल में फँसती और प्राण गँवाती हैं। मक्खियां बिना सोचे समझे चाशनी की कढ़ाई पर टूट पड़ती हैं,उनका जो हाल होता है,हम सब जानते हैं।

असंयमी, अनाचारी, दुर्व्यसनी तत्काल का लाभ (Instant gain)  देखते हुए भूल जाते हैं कि आने वाले दिनों में कौन से दुष्परिणामों का सामना करना पड़ेगा। ऐसे  लोग अक्सर कहते पाए गए हैं,”कोई न देख लेंगें, सब ठीक हो जायेगा!!!”

आज के मानव में नासमझी ही सबसे बड़ी महामारी बनकर छाई हुई है। इसी नासमझी से भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण  का जन्म  हुआ है । मन:स्थिति ही परिस्थितियों को जन्म देती हैं। 

गुरुदेव ने मनुष्य को “भटका हुआ देवता” केवल कहा ही नहीं, उसके लिए,युगतीर्थ शांतिकुंज में विश्व का एकमात्र मंदिर भी बना दिया। करोड़ों साधक इस मंदिर के दर्शन का चुके हैं  कितनों ने वहां  अंकित संदेशों को  आत्मसात किया, सोचने का विषय है। बचपन से पढ़ते आ रहे हैं कि मनुष्य स्वयं ही अपने भाग्य का निर्माता है लेकिन जीवन समाप्त हो जाता है,यह स्लोगन केवल सुनने-सुनाने के लिए रह जाता है।

गुरुदेव हम सभी को समझा रहे हैं कि यदि समझदारी से सभी विचारशील व्यक्ति अपना दृष्टिकोण,पुरुषार्थ एक ही बिंदु पर केन्द्रित कर लें तो मंझधार में हिचकोले खा रही नाव को पार कराने में कोई अड़चन आड़े नहीं आएगी। 

बचपन से ईमानदारी का पाठ पढ़ते और पढ़ाते आ रहे हैं लेकिन करनी और कथनी में बहुत बड़ा अंतर् है।हम नहीं चाहते कि कोई हमें ठगे, पीड़ा पहुँचाए, निष्ठुरता बरते,असभ्यता बरते- यह सब हम चाहते हैं। क्या दूसरों के लिए भी हम ऐसा ही सोचते हैं कि न किसी को ठगें, न किसी को पीड़ा पंहुचाएं? मंदिरों,गुरुद्वारों,मस्जिदों गिरजों में नियमितता से नाक रगड़ना ईमानदारी नहीं है। ईमानदारी को समझने के लिए किसी बड़े ग्रन्थ को पढ़ने या सन्त विद्वान् से क्लास लेने की आवश्यकता नहीं है। यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है। ईमानदारी का “सबसे सुयोग्य और शक्तिशाली न्यायाधीश मनुष्य की आत्मा” ही है। मनुष्य को अपने से बार-बार पूछते रहना चाहिए,स्वयं को जांचते रहना चाहिए कि न्याय का सिद्धान्त कितनी Percentage  में अपनाया जा रहा है। सोने की भांति मनुष्य साधना  की अग्नि में जितना अधिक तपेगा,उतना ही उसका व्यक्तित्व निखरेगा और समाज के सम्मान का हकदार होगा।   

जब मनुष्य स्वयं को ईमानदारी के कुछ स्तर पर पंहुचा समझे तो उसे दूसरों के कुच्रक से बचने के लिए भी प्रयास करना चाहिए। अनीति पर उतारू लोगों को समझाने के प्रयास भी करने चाहिएं। 

यह कार्य है तो अति कठिन लेकिन प्रयास करना ही मनुष्यता की विशेषता है, आज के समय में कौन किसी की सुनता है? Live for yourself का सिद्धांत बहुत ही प्रचलित हो चुका है,इसी उलटे हुए को उलट कर ही तो सीधा करना है। 

स्वतंत्र, स्वच्छन्द, स्वेच्छाचारी घूमना मनुष्य की प्रवृति है लेकिन सच में  वह अनेक उत्तरदायित्वों से बँधा है, उस पर अनेक अनुशासन लागू होते हैं। आहार-विहार की मर्यादाओं का पालन, मन को सन्तुलित और प्रमुदित बनाए रखने के लिए सद्भावनाओं का अवधारण, आर्थिक कठिनाई न बढ़ने देने के लिए औसत नागरिक स्तर जैसा निर्वाह पालन,परिवार के सदस्यों को सुयोग्य, स्वावलम्बी, सुसंस्कृत बनाने के लिए अनवरत प्रयास जैसे अनेकों अनुबन्धों का ठीक तरह से पालन करने पर ही कोई मनुष्य सुखी समुन्नत रह सकता है। जो लोग इन जिम्मेदारियों की अवहेलना करते हैं, वे अनाचरण में फँसते हैं और अनेक प्रकार के त्रास सहते हैं।

निजी जीवन से एक कदम आगे, सामाजिक क्षेत्र में उच्चस्तरीय भूमिका निभाने का महत्त्वपूर्ण कदम बढ़ाना मानवी गरिमा की परिधि में आता है। ‘वसुधैव कुुटुम्बकम्’ की मान्यता आदर्शवादिता में गिनी जाती है। दु:खों को बँटा लेना और सुखों को बाँट देना, हिल-मिलकर रहना और सुख-सुविधाओं का मिल बाँट कर उपयोग करना ऐसी रीति-नीतियाँ हैं, जिन्हें अपनाने वाला अपनेआप ही श्रेयाधिकारी बनता है और अनेकों  को अनुकरण के लिए प्रेरित करता है।

ईश्वर  ने अपने युवराज के रूप में मनुष्य को सृजा और सृष्टि को सुव्यवस्थित, समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने का उत्तरदायित्व सौंपा। उसे पूरा करने में निरत रहकर ही वह जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। इसी आधार पर मनुष्य देवमानव स्तर को भी प्राप्त कर सकता है। ईश्वर द्वारा प्रदान की गयी विभूतियों से लदे होने के बावजूद  यदि कोई लोभ, मोह और अहंकार के कुचक्र में फँसकर दुर्लभ सुयोग को व्यर्थ ही गँवा दे तो इससे बड़ी कोई भूल नहीं होगी। परिवार-समाज-विश्व के साथ समन्वय स्थापित करना ही मनुष्य की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है। अपने चारों ओर पनप रहा विनाश मनुष्य की गैर जिम्मेदारी का ही प्रतिफल है। 

किसी को हरा कर गिरा देने को बहादुरी कहा जाता है।  बलिष्ठ, दुर्बल व्यक्ति पर हावी होकर, अपने को योग्य और शूरवीर सिद्ध करना कोई बहादुरी नहीं है। व्याघ्र जंगली जानवर  खरगोशों को दबोचते रहते हैं। बड़ी मछली छोटी मछली को निगलती रहती हैं। बाज़ जिन्दगी भर पक्षियों के अण्डे-बच्चे खाता रहता है, उसे कोई शूरवीर कहाँ कहता है? डाकू, हत्यारे, कसाई नित्य मारधाड़ मचाए रहते हैं, कितनों का प्राण हरण करते हैं, उन्हें बहादुर होने का श्रेय कहाँ, कब किसने दिया है? हाँ आतंकवादी अवश्य कह सकते हैं। 

बहादुरी की  प्राचीनतम और अर्वाचीन परिभाषा एक ही है : ऐसे पराक्रम कृत्य कर देना जिससे मनुष्य की महानता स्वयं ही उभर उठती हो। ऐसा करने में मनुष्य की  समाज में छवि निखरती है। गुरुदेव बता रहे हैं कि ऐसा पुरुषार्थ करने का उचित समय यही है। सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन और दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन की जितनी  आवश्यकता आज के समय में है उतनी इससे पहले कभी नहीं रही। इस दोहरे मोर्चे पर जो जितना जुझारू हो सके, समझना चाहिए कि उसने युगधर्म समझा और समय की पुकार सुनकर अगली पंक्ति में बढ़ आया।

दुष्कर्मों में निरत असंख्य लोग देखे जाते हैं, अन्धविश्वासों और अनाचारों की भी  कमी नहीं है। पानी ढलाव की ओर बहता है,उसी तरह निकृष्टता अपनाने में हर किसी के पूर्व संचित कुसंस्कार कुमार्ग की ओर धकेलते हैं। प्रवाह प्रचलन भी ऐसा है जिसमें दुष्प्रवृत्तियाँ ही भरी पड़ी हैं। बुरे कुसंग का, अवांछनीय वातावरण का दुष्प्रभाव भी कम शक्तिशाली नहीं होता। इन सबका समन्वय मिलकर साधारण स्तर के लोगों को पेट प्रजनन तक सीमित रहने और घटिया जीवन जीने के लिए ही बाधित करता रहता है। 

जो मनुष्य राह  में अटके इन रोड़ों  का सामना करते हुए स्वयं को उच्चस्तरीय आदर्शवादिता अपनाने के लिए तत्पर कर सके,उसे समझना चाहिए कि वह  सच्चे अर्थों में शूरवीर हैं।

दुष्टजनों की विशेषता है कि वह फटाफट ही गिरोह बना लेते हैं लेकिन सज्जन लोग अपने काम से काम रखते हैं। समाज से कटे होने के कारण उनकी यही एक कमजोरी अन्य सभी गुणों और सामर्थ्यों को बेकार कर देती है। 

बुद्ध के धर्म चक्र प्रवर्तन और गाँधी के सत्याग्रह आन्दोलनों में सम्मिलित होने वालों की तरह सज्जनों का समुदाय इक्क्ठा कर लेना बहादुरी का ही काम है। बहादुरी हनुमान, अंगद जैसों की ही सराही जाती है लेकिन महामानव अपनी उत्कृष्टता और परमार्थ परायणता के आधार पर ऐसे कृत्य कर दिखाते हैं मानो उन्हें किसी दैवी शक्ति के सहारे उतने बड़े चमत्कार कर दिखाने का अवसर मिला हो। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में इस तरह के अनेकों चमत्कार होते देखे गए हैं। यह क्या कम बहादुरी और चमत्कार है कि विश्व के कोने-कोने से,बिना कोई जान पहचान के,अनेकों साथी इस परिवार से जुड़े हुए हैं, बिना कहे ही निस्वार्थ गुरुकार्य कर रहे हैं। ऐसा इसलिए है कि जुड़े हुए सभी परिजनों का निस्वार्थ एक ही उद्देश्य है- स्वयं का परिष्कार।

गुरुदेव सन्देश दे रहे हैं कि आने वाले समय में “समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी” के चार चरणों की परिधि में उत्कृष्टता के समस्त सिद्धान्तों का समावेश हो जाएगा। इतने छोटे से धर्मशास्त्र से ही युग समस्याओं का समाधान हो सकना सम्भव हो जाएगा। प्रत्येक विचारशील व्यक्ति को आत्मनिरीक्षण की साधना में किसी न किसी रूप में सम्मिलित होना पड़ेगा। देखना, जाँचना होगा कि उपरोक्त चारों मान्यताओं ने अन्त:करण में कितनी गहराई तक प्रवेश किया और उन्हें कार्यरूप में परिणित करने के लिए कितना प्रयास करना पड़ा। 

जय गुरुदेव 


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