वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

चौथी शक्ति का अभिनव उद्भव अर्थात नया जन्म

आज का ज्ञानप्रसाद लेख एक ऐसी शक्ति का वर्णन कर रहा है जिसे “नवयुग की अधिष्ठात्री” कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए।

तो आइए गुरुचरणों में समर्पित हो,आज के ज्ञानरूपी अमृत का पयपान करें और जीवन को सफल बनायें।  

लगभग सभी को निम्नलिखित तीन शक्तियाें की प्रभुता और महत्ता सर्वविदित है:

(1) बुद्धिबल, जिसमें विज्ञान, साहित्य और कला सम्मिलित हैं। 

(2) शासन सत्ता, जिसके अंतर्गत व्यवस्था, सुरक्षा और उससे सम्बंधित  साधन एवं अधिकारी आते हैं ।

3) धन शक्ति, जिसमें उद्योग व्यवसाय, निजी संग्रह एवं बैंक आदि को सम्मिलित किया जाता है। 

आमतौर पर देखा जाता है कि इन्हीं तीनों शक्तियों के बल पर, छोटे-बड़े, भले-बुरे सभी काम सम्पन्न हो जाते हैं। प्रगति एवं अवगति का श्रेय इन्हीं तीन शक्तियों को मिलता है। माँ सरस्वती, माँ लक्ष्मी और माँ काली के रूप में इन्हीं की पूजा भी होती है। अधिकतर लोगों की इच्छा/अभिलाषा इन्हीं शक्तियों को प्राप्त करने एवं इनसे सम्बंधित देवी देवताओं की पूजा-उपासना में ही संलग्न रहती है।

समाज में बड़प्पन और शोभायमान की यही तीन कसौटियाँ बनी हुई हैं। इनके सहारे वह सब कुछ खरीदा जाता है, जो इच्छानुसार सुविधा-साधन अर्जित करने के लिए आवश्यक प्रतीत होता है।

लेकिन यहाँ पर परम पूज्य गुरुदेव हमें एक और शक्ति, “चौथी शक्ति” के बारे में बता रहे हैं जिसको समझना ही आज के ज्ञानप्रसाद लेख का उद्देश्य है। 

इस चौथी शक्ति को गुरुदेव “प्रखर प्रतिभा” कह कर सम्बोधित कर रहे हैं। प्रखर प्रज्ञा को अंग्रेजी में “Brilliant Wisdom” (तेजस्वी बुद्धि) या “Enlightened Intellect” (जागरूक बुद्धि) कहते हैं। तेज दिमाग और दूरदर्शी विवेकशीलता “प्रखर प्रज्ञा” होने से ही उपलब्ध होते हैं। गुरुदेव कहते हैं कि नवयुग के अवतरण में अब उस चौथी शक्ति का उदय होगा जो अभी भी किसी प्रकार कहीं-कहीं जीवित तो है लेकिन  उसका वर्चस्व कहीं-कहीं एवं कभी-कभार ही दिख पड़ता है। इसी चौथी शक्ति की दुर्बलता अथवा न्यूनता के कारण ही अनेकानेक खराबियां  उग पड़ी हैं। 

हमारे पाठकों ने  जलकुम्भी (Water hyacinth) का नाम तो सुना ही होगा, यह एक प्रकार का Weed होता है जो दो सप्ताह में ही इतना फैल जाता है कि  जलाशयों को अपने प्रभाव से घेर लेता है। इसी प्रकार का एक Weed पीले फूलों की फॉर्म में हरे-भरे लॉन को खा जाता है।

“प्रखर प्रतिभा” की दुर्बलता के कारण ही आज समाज की ऐसी दशा हो रही है।    

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के  मंच से सामान्य बुद्धि की बात तो लगभग हर समय ही होती रहती है और दुर्लभ सद्बुद्धि प्राप्त करने के प्रयास भी किए जाते हैं।

सामान्य प्रतिभा तो बुद्धिमानों, क्रियाकुशलों, व्यवस्थापकों और पराक्रम परायणों में भी देखी जाती है। इस सामान्य बुद्धि के  सहारे वे प्रचुर सम्पदा कमाते हैं , यशस्वी बनते हैं  और अनुचरों से घिरे रहते हैं। आतंकवादी भी ऐसी ही सामान्य प्रतिभा सहारे सम्भव हो पाते हैं, छद्म अपराधों की एक बड़ी श्रृंखला  भी इस सामान्य प्रतिभा से सम्पन्न अनेक व्यक्तियों द्वारा अंजाम दी जाती है। ऐसे लोग अपने बल से बड़प्पन का सरंजाम जुटाते हैं जिससे तत्काल हुण्डी की तरह भुना भी  लिया जाता है। ऐसी सामान्य प्रतिभा से अच्छे वेतन पर अधिकारी स्तर का लाभदायक काम उन्हें मिल जाता है। 

यह सब काम, रुतबा, वाहवाही,प्रतिष्ठा आदि सामान्य प्रतिभा से संभव हो जाता है  लेकिन “प्रखर प्रतिभा”,सामान्य प्रतिभा से बिल्कुल अलग है।  

वर्तमान संदर्भ में  प्रखर का तात्पर्य “आदर्शवादी उत्कृष्टता” से लिया जाना चाहिए। समर्पित सन्त इसी स्तर के होते हैं। कर्तव्य क्षेत्र में वे सैनिकों जैसा अनुशासन पालन करते हैं। इस स्तर के लोगों को, देवमानव, ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी, वर्चस्वी, महामानव, युगपुरुष आदि नामों से स्मरण किया जाता है। इन उच्चस्तरीय विभूतियों की  विशेषता यही होती है कि यह लोग “उच्चस्तरीय भाव सम्वेदनाओं” के उदाहरण होते हैं।  श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा जैसे तत्त्व उन्हीं में देखे और पाए जाते हैं। 

सामान्य प्रतिभावान व्यक्ति केवल अपने ही लिए धन, यश या बड़प्पन अर्जित करते रहते हैं, जिसे जितनी सफलता मिल जाती है, वह अपने को उतना ही बड़ा मानता है। लोग भी उसी से प्रभावित होते हैं। उनसे कुछ प्राप्त करने की इच्छा से अनेक चाटुकार उनके आगे-पीछे फिरते रहते हैं। अप्रसन्न होने पर वे चाटुकारों का ही अहित भी कर देते हैं, इसलिए कितने ही चाटुकार उनका दबदबा सहते ही अमूल्य जीवन गंवा देते  हैं। मन मार कर भी, इच्छा न होने पर भी सहयोग करते हैं, चापलूसी करते हैं, फिर तो उनका करैक्टर ही ऐसा बन जाता है। स्वतंत्र होने के बाद भी उनके हाथ जुड़े ही रहते हैं,शीश झुका ही रहता है।

‘‘प्रखर प्रतिभा’’ संकीर्ण स्वार्थपरता से ऊँची उठी होती हैं। उसे मानवी गरिमा का ध्यान रहता है। उसमें आदर्शों के प्रति अनन्य निष्ठा का समावेश रहता है। लोकमंगल और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन में उसे गहरी रुचि रहती है। “प्रखर प्रतिभा” का दिव्य अनुदान एक प्रकार से दैवी अनुग्रह गिना जाता है। एक तरफ तो सामान्य लोग हैं जिन्हें लोभ-मोह के बन्धनों से क्षण भर के लिए भी छुटकारा नहीं मिलता, समय का रोना रोते रहना उनकी प्रवृति बन गयी होती है, वहीँ “प्रखर प्रतिभा” सम्पन्न लोग जन-समस्याओं पर ही विचार करते और उनके समाधान की योजना बनाते रहते हैं। उनका सारा समय लोककल्याण को ही समर्पित रहता है, फ़ोन पर भी घंटों भाव-संवेदना जैसी बाते होती हैं, समाज के तुच्छ कार्यों से  उन्हें कोई सरोकार नहीं होता। अपनेआप में भावनाएँ उभरने पर ऐसे मनुष्य बड़े से बड़ा त्याग और पुरुषार्थ कर दिखाने में तत्पर हो जाते हैं। 

आकाश बहुत विशाल  है लेकिन उसमें सीमित संख्या में ही तेजस्वी तारे चमकते दिखाई पड़ते हैं। उसी प्रकार आम  लोगों को पेट प्रजनन के अतिरिक्त और कुछ दिखता नहीं है लेकिन  जिन विभूतिओं पर दैवी अनुकम्पा की तरह “प्रखर प्रतिभा” अवतरित होती है, उनका क्रियाकलाप ऐसा बन पड़ता है, जिसका चिरकाल तक असंख्यों द्वारा अनुकरण-अभिनन्दन होता रहता है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि स्वाध्याय, सत्संग, प्रेरणा-परामर्श आदि द्वारा भी सन्मार्ग पर चलने का मार्गदर्शन मिलता है लेकिन वह सब उन्हीं के गले उतरता है जिनके अन्दर भाव-सम्वेदनाएँ पहले से ही जीवित हैं। उनके लिए थोड़ी सी प्रेरणा भी क्रान्तिकारी परिवर्तन कर देती है। सीप में जल की एक बूँद ही अमूल्य मोती पैदा कर देती है, वही बूँद रेत में गिरने पर अपना अस्तित्व ही गँवा बैठती है। यही बात आदर्शवादी परमार्थों के सम्बन्ध में भी है। कई बार तो उपदेशकों तक की करनी-कथनी में जमीन-आसमान जैसा अन्तर देखा/पाया जाता है। भावनाओं की प्रखरता रहने पर व्यक्ति व्यस्त कार्यों में से भी समय निकाल ही लेता है, मनोबल बनाए रखता है और उसमें अपनी सदाशयता का खाद-पानी देकर बढ़ाता रहता है। इस प्रकार अपने सम्पर्क में आने वालों  को भी अपने परामर्शों के साथ-गहन भाव-सम्वेदनाओं का समन्वय करके इतना प्रभावित कर लेता है कि वे इस दिशा में कुछ भी कर गुजरने में झिझकते नहीं हैं।  

गुरुदेव बता रहे हैं कि आज “प्रखर प्रतिभा” वाले व्यक्तित्वों की बड़ी आवश्यकता है। भावनाशील लोकसेवियों की, प्रखर प्रतिभाओं की जितनी बड़ी संख्या उपलब्ध हो सकेगी, उतनी ही लक्ष्यपूर्ति में सरलता और गतिशीलता रहेगी। पूरा,आधा या चौथाई जितना भी जिनसे समयदान/अंशदान बन पड़े, करना चाहिए। अगर इतना भी बना पाता है तो समझ लेना चाहिए कि नवसृजन की पुण्य प्रक्रिया में भागीदार होने का श्रेय प्राप्त  हुआ।

सूक्ष्म जगत में भी कई बार समय-समय पर ज्वार-भाटे जैसे उतार-चढ़ाव आया करते हैं। कभी स्वार्थी, लालची, अपराधी, कुकर्मी समाज में बढ़ जाते हैं। वे स्वयं तो कुछ लाभ भी उठा लेते हैं, लेकिन प्रभाव क्षेत्र के अन्य अनेकों  का सर्वनाश करते रहते हैं। इसे “आसुरी प्रवाह प्रचलन” कहा जा सकता है लेकिन जब प्रवाह बदलता है, तो उच्च आत्माओं की भी कमी नहीं रहती। एक जैसे विचार ही असंख्यों के मन में उठते हैं और उन सब की मिली-जुली शक्ति से सृजन स्तर के कार्य इतने अधिक और इतने सफल होने लगते हैं जिन्हें देखकर लोगों को आश्चर्यचकित रह जाना पड़ जाता है। 

इक्कीसवीं सदी में नई दुनिया बनाने जैसा कठिन कार्य किया जाना है। इसके लिए प्रचुर परिमाण में “प्रखर प्रतिभा” का उफान-तूफान आना है। अनेक व्यक्ति उस सन्दर्भ में कार्य करेंगे। आँधी-तूफान आने पर पत्ते, तिनके और धूलिकण भी आकाश तक जा पहुँचते हैं। दैवी प्रेरणा का अदृश्य प्रवाह इन्हीं दिनों आएगा जिसमें सृजन सैनिकों की विशालकाय सेना खड़ी दिखाई देगी और उस प्रकार के चमत्कार करेगी जैसे कि अणुबम गिराने के बाद खण्डहर बने जापान को वहाँ के निवासियों ने अन्य देशों की तुलना में पहले से भी कहीं बेहतर बना कर किया है। रूस, जर्मनी आदि ने भी कुछ ही दशाब्दियों में क्या से क्या चमत्कार कर दिखाए। उन्हें अद्भुत ही कहा जा सकता है और इतिहास में अनुपम भी।

दुर्बुद्धि ने पिछली एक शताब्दी में कितना कहर ढाया है, यह किसी से छिपा नहीं है। दो विश्व युद्ध इसी शताब्दी में हुए। प्रदूषण इतना बढ़ा  जितना कि विगत लाखों वर्षों में बढ़ नहीं पाया था। वन बीमार  हुए, रेगिस्तान बढ़े, अपराधों की बढ़ोत्तरी ने कीर्तिमान स्थापित किया, मद्य, माँस और व्यभिचार ने पिछले रिकार्ड तोड़ दिए, जनसंख्या की बढ़ोत्तरी भी अद्भुत क्रम से हुई, जन साधारण का व्यक्तिगत आचरण लगभग भ्रष्टाचार स्तर पर जा पहुँचा और भी न जाने ऐसा क्या-क्या हुआ, जिसकी चर्चा सुनकर यही कहना पड़ता है कि मनुष्य की तथाकथित वैज्ञानिक, बौद्धिक और आर्थिक प्रगति ने समस्याएँ, विपत्तियाँ और विभीषिकाएँ ही खड़ी कीं। आश्चर्य होता है कि  एक शताब्दी में ही इतना अनर्थ किस प्रकार हुआ और द्रुतगति से क्रियाशील किया जाना सम्भव हुआ।

अब रात्रि के बाद दिनमान का उदय होने जा रहा है। दूसरे स्तर का प्रवाह चलेगा। मनुष्यों में से असंख्यों में भाव सम्वेदनाओं का उभार आएगा और वे सभी सृजन की, सेवा की, उत्थान की, आदर्श की बात सोचेंगे। इसमें लोगों का एक बड़ा समुदाय उगता उभरता दृष्टिगोचर होगा। गर्मी के दिनों में घास का एक तिनका भी कहीं नहीं दिखता लेकिन वर्षा के आते ही सर्वत्र हरियाली छा जाती है। 

नए युग का दैवी प्रवाह अदृश्य वातावरण में अपनी ऊर्जा का विस्तार करेगा। फलस्वरूप जिनमें भाव सम्वेदनाओं के तत्त्व जीवित बचे होंगे, वे सभी अपनी सामर्थ्य का एक महत्त्वपूर्ण भाग नवसृजन के लिए नियोजित करते हुए दृष्टिगोचर होंगे। व्यस्तता और अभावग्रस्तता की आड़ लेकर कोई भी न आत्म प्रवंचना कर सकेगा और न सुनने वालों में से किसी को इस बात का विश्वास दिला सकेगा कि बात वस्तुतः ऐसी भी हो सकती है, जैसा कि बहकावे के रूप में समझी या कही जा रही है।

इक्कीसवीं सदी निकट है। तब तक इस अवधि में प्रखर प्रज्ञा के अनेक छोटे-बड़े उद्यान रोपे उगाए, बढ़ाए जा सकेंगे, जिन्हें नन्दन वनों के समतुल्य कहा जा सके, जिन्हें कल्पवृक्ष उद्यानों की उपमा दी जा सके।

श्रेष्ठ मनुष्यों का बाहुल्य ही सतयुग है। उसे ‘‘स्वर्ग’’ कहते हैं। नरक और कुछ भी नहीं दुर्बुद्धि का बाहुल्य और उसी का व्यापक प्रचलन है। नरक जैसी परिस्थितियाँ उसी में दृष्टिगोचर होती हैं। पतन और पराभव के अनेक अनाचार उसी के कारण उत्पन्न होते रहे हैं। समय परिवर्तन के साथ सदाशयता बढ़ेगी। नव सृजन की उमंग जन-जन के मन में उठेगी और “प्रखर प्रतिभा” का दिव्य आलोक सर्वत्र अपना चमत्कार उत्पन्न करता दिखाई देगा। 

जय गुरुदेव 


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