आज का लेख तथ्यों के साथ,ऐतिहासिक प्रमाण दे रहा है कि विनाश और सृजन की प्रक्रिया पौराणिक काल से चली आ रही है। यदि ज्ञानप्रसाद लेख जनसाधारण की मनस्थिति को ठीक राह में चलाने में सफल हो पाएं तो बहुत बड़ी उपलब्धि समझी जानी चाहिए, Misguide करने में,अन्धविश्वास फैलाने में,अंधी गुरुभक्ति का प्रचार करने में क्या कुछ हो रहा है,किसी से छिपा नहीं है।
आइए अपने गुरु पर सार्थक विश्वास करते हुए आज के ज्ञानप्रसाद लेख का अमृतपान करें।
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अक्सर कहा जाता है कि बुझता हुआ दीपक पूरी लौ से उठता है। रात्रि के अन्तिम चरण में अन्धेरा सबसे अधिक गहरा होता है। हारता जुआरी दुगना दुस्साहस दिखाता है। “मरता क्या न करता” वाली उक्ति ऐसे ही समय पर चरितार्थ होती है। इन दिनों भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। नीति और अनीति के बीच घमासान युद्ध हो रहा है। कोहराम और धक्काशाही, गुंडागर्दी का ऐसा माहौल है, जिसमें सूझ ही नहीं पड़ता कि आखिर हो क्या रहा है। साधारण व्यक्ति, जो केवल दो वक्त को रोटी के जुगाड़ में दिन-रात एक किये हुए है उसे सूझ ही नहीं रहा कि उसका भविष्य क्या है। इस आँख मिचौनी में, धूप-छाँव में किसी को कुछ पता नहीं चल रहा है कि क्या हो रहा है। कौन जीत रहा है,कौन हार रहा है किसी को कुछ नहीं मालूम है।
ऐसे अनिश्चितता के जंजाल में केवल वही दिव्य आत्माएं, जो अदृश्य को देखने की प्रतिभा लिए हुए हैं, वे सुनिश्चित आधारों के सहारे विश्वास कर रही हैं कि “जीतेगा तो सृजन ही”। विजय सत्य की ही होनी है। उज्ज्वल भविष्य का दिनमान उदय होकर ही रहना है और आँखों को धोखे में डालने वाला अन्धकार,अज्ञान सुुनिश्चित रूप से मिटना है।
महाक्रान्ति के वर्तमान दौर में क्या हो रहा है, क्या होने जा रहा है, क्या बन रहा है, क्या बिगड़ रहा है, इसका ठीक तरह सही स्वरूप देख पाना सर्वसाधारण के लिए सम्भव नहीं। दो पहलवान जब अखाड़े में उतरते हैं तो दर्शकों को कहाँ जानकारी होती है कि कौन हार रहा है और कौन जीतने जा रहा है लेकिन यह असमंजस अधिक समय तक नहीं रहता। वास्तविकता सामने आकर ही रहती है।
वर्तमान में बिगाड़ होता अधिक दिख रहा है क्योंकि मनुष्य की प्रवृति ही ऐसी है। सुधार की गति धीमी प्रतीत होती है लेकिन फिर भी प्रवाह की गति को देखते हुए कहा जा सकता है कि कोई भी पीछे नहीं हट रहा है, सभी आगे ही आगे बढे जा रहे हैं। जो हिम्मत हार कर बैठ गए हैं, केवल बातें बनाने में अमूल्य समय का नाश किये जा रहे हैं उनका कुछ नहीं किया जा सकता।
अनौचित्य का समापन और औचित्य का अभिवर्धन ही निष्कर्ष का सार संक्षेप है।
भविष्य का एकदम सुनिश्चित निर्धारण तो नहीं हो सकता क्योंकि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। वह उसे बना भी सकता है बिगाड़ भी। बदलती हुई परिस्थितियाँ भी पासा पलट सकती हैं। इतने पर भी अनुमान और आँकलन यदि सही हों तो सम्भावना की पूर्व जानकारी का अधिकतर पता चल जाता है। इसी आधार पर संसार की अनेक योजनाएँ बनती और गतिविधियाँ चलती हैं। यदि भावी अनुमान के सम्बन्ध में स्थिति सर्वथा अनिश्चित रहे, तो किसी महत्त्वपूर्ण विषय पर कुछ सोच सकना सम्भव न हो सकेगा।
यह महाक्रान्ति की बेला है, युग परिवर्तन की बेला है अशुभ की दिशा से शुभ की ओर प्रयाण चल रहा है, प्रवाह बह रहा है। तूफान की दिशा और गति को देखते हुए अनुमान लगाया जा सकता है कि वस्तुओं को किस दिशा में धकेला और बढ़ाया जाता है। नदी के प्रवाह में गिरे हुए झंखाड़ बहाव की दिशा में ही दौड़ते चले जाते हैं। तूफानों की जो दिशा होती है उसी में तिनके पत्ते और धूलिकण उड़ते चले जाते हैं। महाक्रान्ति सदा सृजन और सन्तुलन के लिए ही उभरती हैं। पतन और पराभव की विडम्बनाएँ तो कुसंस्कारी वातावरण आए दिन रचता ही रहता है। पेड़ पर लगा हुआ फल नीचे की ओर गिरता है। पानी भी ढलान की ओर बहकर निचाई की ओर चलता जाता है किन्तु असन्तुलन को सन्तुलन में बदलने के लिए जब महाक्रान्तियाँ उभरती हैं तो उसका प्रभाव परिणाम ऊपर उठने के रूप में ही होता है। उस उभार को देखते हुए, यह विश्वास किया जा सकता है कि भविष्य उज्ज्वल है।
आइए ज़रा दृष्टि दौड़ाएं और देखें कि विश्व में क्या कुछ घटित हुआ है और क्या परिणाम मिले हैं:
विश्व इतिहास में कितनी ही ऐसी महाक्रान्तियाँ हुई हैं जो चिरकाल तक स्मरण की जाती रहेंगी और लोकमानस को महत्त्वपूर्ण तथ्यों से अवगत कराती रहेंगी। छिटपुट उलट-पुलट तो सामयिक स्तर पर हर क्षेत्रीय समस्या के समाधान हेतु होती ही रहती है लेकिन विश्लेषण और विवेचन उन्हीं का होता है जिनमें व्यापक के साथ-साथ प्रवाह परिवर्तन भी जुड़ा होता है, “ऐसी घटनाएँ ही महाक्रान्तियाँ कहलाती हैं।”
पौराणिक-काल का समुद्र-मन्थन, गंगावतरण, परशुराम द्वारा कुपथगामियों से सत्ता छीनना आदि ऐसी महान घटनाओं को प्रमुख माना जाता है जिन्होंने कालचक्र के परिवर्तन की, युग परिवर्तन की भूमिका निभाई। ग्रीस, रोम आदि के लोककथाओं में भी ऐसे ही मिलते-जुलते अलंकारिक वर्णन हैं। यदि वे सब सही हैं तो यह मानने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए कि महाक्रान्तियों का सिलसिला चिरपुरातन है।
इतिहास काल में भी कुछ बड़े शक्तिशाली परिवर्तन हुए हैं, जिनमें रामायण प्रसंग, महाभारत आयोजन और बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन प्रमुख हैं। लंका काण्ड के उपरान्त रामराज्य के साथ सतयुग की वापसी सम्भव हुई। महाभारत काल के उपरान्त विशाल भारत, महान भारत बनाने का लक्ष्य पूरा हुआ। बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन से उस समय की वोह विचारक्रान्ति सम्पन्न हुई, जिसकी चिंगारिओं ने अगणित क्षेत्रों के अगणित प्रसंगों को ऊर्जा और आभा से भर दिया, वह दावानल अनेक मंचों, धर्म सम्प्रदायों, सन्तों, समाज सुधारकों और शहीदों के रूप में पिछली शताब्दी तक अपनी परम्परा को विभिन्न रूपों में कायम रखे रहा। प्रजातंत्र और कम्युनिज्म की सशक्त नई विचारणा इस प्रकार उभरी कि उसने लगभग समूची विश्व वसुधा को आन्दोलित करके रख दिया।
पिछली क्रान्तियों से सिद्ध होता है कि बुद्धिमत्ता जब भी आदर्शवादी ऊर्जा से अनुप्राणित हुई उसने अपने साथ चलने के लिए अनेकों सहचरों को अपनी ओर ऐसा आकर्षित किया कि अनेकों उनके साथ चलने के लिए प्रेरित होते गए। ऐसी स्थिति में वोह अविश्वसनीय एवं आश्चर्यजनक कार्य होते जाते हैं जिनका आम जनता के गले उतरना असंभव सा प्रतीत होता है। यही कारण है कि ऐसे कार्यों को “दैवी अनुग्रह” की संज्ञा दी जाती है। पुरातन-कालों की ऐसी अविश्वसनीय घटनाओं को सम्पन्न कराने वाली महाविभूतिओं को अवतार की संज्ञा देकर सन्तोष कर लिया जाता है। असम्भव को सम्भव कर दिखाने वाले महापराक्रमों को बुद्धिमत्ता की प्रखरता के साथ-साथ जनसहयोग की जितनी आवश्यकता होती है, इसे साधारण व्यक्ति कहाँ मानता है,कहाँ स्वीकार करता है।
परम पूज्य गुरुदेव द्वारा सम्पन्न कराये गए अनेकों आश्चर्यजनक एवं अविश्वसनीय किंतु सत्य घटनाओं पर कितने लोग विश्वास करते हैं,यह भी एक गहन चर्चा का विषय है। आधुनिक युग में तो किसी भी तथ्य पर विश्वास करना कितना कठिन है,सभी जानते हैं। जानकारी हो न हो,पता हो न हो, मात्र जीभ चला कर “यह तो AI Generated है” कहना बहुत ही आसान है और जनता है कि उसी एक कमेंट के पीछे लगकर सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनने की दौड़ में तथ्यों को क्या से क्या बना रहे हैं सभी जानते हैं, इसके बारे में कुछ भी कहना अनुचित ही होगा क्योंकि सब कुछ सामने ही तो दिख ही रहा है।
विश्व में घटित हुए सभी महान परिवर्तनों को युगान्तरीय या युग परिवर्तनकारी भी कहा जाता रहा है। वर्तमान समय भी उसी स्तर के ऐसे ही “प्रचण्ड प्रवाह के अवतरण का समय” है, जिसे पिछले समस्त परिवर्तनों की संयुक्त शक्ति का समीकरण कहा जा सकता है। पिछले परिवर्तनों में कितना समय लगता रहा है इसके सम्बन्ध में सही विवरण तो उपलब्ध नहीं है लेकिन वर्तमान महाक्रान्ति का स्वरूप समग्र रूप से परिलक्षित होने में प्राय: 100 वर्ष का समय महत्त्वपूर्ण होगा। यों तो उसका शुभारम्भ अब से काफी पहले से भी चल रहा है और पूरी तरह चरितार्थ होने के बाद भी कुछ समय चलता रहेगा।
आज के समय का महापरिवर्तन ‘‘युगान्तर’’ के नाम से जाना जा सकता है। युग परिवर्तन की प्रस्तुत प्रक्रिया का एक ज्वलन्त पक्ष तब देखने में आया जब प्राय: 2000 वर्षों से चले आ रहे आक्रमणों-अनाचारों से छुटकारा मिला। भारत माँ पर लगातार आक्रमण होते रहे हैं। यहाँ का वैभव बुरी तरह लुटता रहा है। विपन्नता ने इतना पराक्रम भी शेष नहीं रहने दिया था कि आक्रान्ताओं को उल्टे पैरों लौटाया जा सके, फिर भी महाक्रान्ति ने अपना स्वरूप और शक्ति को प्रकट किया। दो विश्व युद्धों ने अहंकारियों की कमर तोड़ दी और दिखा दिया कि विनाश पर उतारू होने वाली कोई भी शक्ति नफे में नहीं रह सकती। भारत में लम्बे समय से चली आ रही राजनैतिक पराधीनता का जुआ देखते-देखते उतार फेंका गया। दावानल इतने तक ही नहीं रुका, अफ्रीका महाद्वीप के अधिकांश देश साधारण से प्रयत्नों के सहारे Colonialism से स्वतंत्र हो गए। इसके अतिरिक्त छोटे-छोटे द्वीपों तक ने राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर ली, इस प्रकार Colonialism समाप्त हो गया।
इसी बीच सामाजिक क्रान्ति विश्व के किसी विशेष क्षेत्र तक सीमित नहीं रही बल्कि उसने समस्त विश्व को प्रभावित किया। दास-दासियों की लूट-खसोट और खरीद-फरोख्त ( दास प्रथा) बन्द हुई, इतने पुराने प्रचलन को इतनी तेजी से उखाड़ना सम्भव हुआ मानों किसी बड़े तूफान ने सब कुछ उलट-पलट कर रख दिया हो। राजतंत्र का विश्व भर में बोलबाला था, सामन्तों की सर्वथा तूती बोलती थी, अमीर और जमींदार की ही सर्वत्र तूती बोलती थी। वे न जाने किस हवा के झोंके के साथ टूटी पतंग की तरह उड़ गए। स्त्री और शूद्र के रूप में तीन चौथाई जनता किसी प्रकार अपने मालिकों के अनुग्रह पर निर्भर रहकर जीवनयापन भर के साधन बिना सम्मान के स्वीकार कर लेने पर भी कामचलाऊ मात्रा में उपलब्ध कर पाती थी।
वैसी स्थिति अब नहीं रहीं; रोज़ाना ‘‘नर और नारी एक समान’’ ‘‘जाति वंश सब एक समान’’ का उद्घोष गूँज रहा है। विश्व के अधिकांश भागों में समानता के इस सिद्धांत को स्वीकार कर लिया गया है। व्यवहार में उतारने में कुछ समय तो लग रहा है, कठिनाई भी पड़ रही है लेकिन देर-सबेर में यह समस्या भी सुलझ जाएगी, यह परिवर्तन भी इसी 20वीं सदी में हुए हैं जबकि इन्हें जड़ें जमाने में हजारों वर्ष लग गए थे।
आज के ज्ञानप्रसाद लेख का समापन गुरुदेव के शक्तिशाली सन्देश से करते हैं :
हम सब शान्ति और प्रगति के लक्ष्य की दिशा में चल रहे हैं और उसे प्राप्त करके ही रहेंगे।
