आज के समय में अधिकतर मनुष्य नकारात्मकता एवं निराशा की बीमारी से ग्रस्त हैं,सभी एक ही धारणा लिए बैठे हैं कि कुछ नहीं हो सकता,सब कुछ ही उल्टा-पुलटा हो चुका है। ऐसी स्थिति में हम किस उज्जवल भविष्य की कामना कर रहे हैं? क्या गुरुदेव अकेले ही सब कुछ कर लेंगें? अपने अंग-अवयवों को श्रेय नहीं दिलाएंगे? हम सबके लिए यह एक दुर्लभ अग्निपरीक्षा का समय है,उसी उलटे हुए को सीधा करने का अवसर है,निराशा को निकाल फेंकने का अवसर है, यह सब कैसे संभव होगा,आज का लेख इसी दिशा की ओर केंद्रित है।
आइए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की आज 17 जुलाई 2026 की गुरुकक्षा का शुभारम्भ करें, गुरुचरणों में समर्पित हो जाएँ, गुरुदेव का शुभ आशीर्वाद प्राप्त करें
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ग्लोबल वार्मिंग,भूकम्प, तूफान, बाढ़, अतिवृष्टि अनावृष्टि, कलह, विद्रोह, विग्रह, अपराध, भयावह रोग, महामारियाँ जैसे त्रास इस तेजी से बढ़ रहे हैं कि इन पर नियंत्रण पा सकना कैसे सम्भव होगा,यह किसी को समझ नहीं आता।
“क्या करें और क्या न करें”, “कुछ नहीं सूझ रहा” की स्थिति में पहुँचा हुआ हतप्रभ व्यक्ति दिनोंदिन अधिक निराश ही होता जा रहा है। मनुष्य की निराशा और भी बढ़ जाती है जब प्रगति के नाम पर किए जा रहे सभी प्रयास खोखले लगते हों,उज्जवल भविष्य की सम्भावना पर से विश्वास क्रमश: उठता जाता है।
ऐसी स्थिति में हम जैसे साधारण से मनुष्यों के लिए,ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के लिए साहस और पराक्रम का पाठ पढ़ना और समझ पाना कितना कठिन होता है,सहज ही अनुभव किया जा सकता है। ऐसी विकट स्थिति में मूक दर्शक बने,हाथ पर हाथ धरे तो कुछ भी नहीं बनेगा। कुछ पुण्य कमाने का,पुरषार्थ दिखाने का यही स्वर्ण अवसर है।
गुरुदेव हमें कह रहे हैं कि हमारी अग्नि परीक्षा का यही अवसर है। हमें घबराने के बजाये आँधी-तूफानों के बीच भी आशा का दीप जलाए रखना है । सृजन प्रयोजनों के लिए साथियों का सहयोग न जुटा पाने के बावजूद भी सुधार सम्भावना के लिए अकेले ही साहस संजोए रखना है। ऐसी ही उलटी हुई स्थिति के लिए गुरुदेव ने “उलटे को उलटकर सीधा कर देने का सिद्धांत” सुझाया है। गुरुदेव ऐसी ही स्थिति के लिए मार्गदर्शन देते हुए कह रहे हैं:
अपना कार्य करते हुए अडिग बने रहें, गतिशीलता में कमी न आने दें। ऐसे ही व्यक्तियों को महामानव/देवदूत कहा जाता है जो यदाकदा ही प्रकट होते हैं। इन देवदूतों की संख्या भी इतनी कम रहती है कि हर जगह फैली निराशा को हटाने में उन प्रतिभाओं का जितना योगदान मिल सकना चाहिए उतना मिल नहीं पाता।
“क्रांतिधर्मी साहित्य” पुस्तक-माला के अंतर्गत 36 वर्ष पूर्व पूज्य गुरुदेव ने निम्नलिखित पंक्तियाँ लिखीं एवं 23 पुस्तकों में समाहित ज्ञान को, अपने द्वारा प्रकाशित अब तक के साहित्य का मक्खन कहा। इसी मक्खन को फिर से मथकर Further refine करके, ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार प्रयास कर रहा है:
आज जनसाधारण का मानस ऐसे दलदल में फँसा हुआ है कि उसका निराश होना स्वाभाविक है। होना तो यह चाहिए था कि अनौचित्य (Improper) के स्थान पर औचित्य (Proper) को प्रतिष्ठित करने के लिए साहसिक पुरुषार्थ जगता लेकिन लोकमानस में घटियापन भर जाने से उस स्तर का उच्चस्तरीय उत्साह भी तो नहीं उभर रहा है। अवांछनीयता को उलट देने वाले ईसा, बुद्ध, गाँधी, लेनिन जैसी प्रतिभाएँ भी उभर नहीं रही हैं। इन परिस्थितियों में साधारण मनुष्य का निराशाग्रस्त होना स्वाभाविक है।
आज 2026 में जब यह लेख लिखा जा रहा है,36 वर्षों में साधारण मनुष्य की स्थिति कैसी हुई है,किसी से भी छिपी नहीं है।
तो फिर ऐसी स्थिति में हमें क्या करना है? हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना है?
सबसे पहले तो यह समझ लेना है कि निराशा कोई हल्के दर्जे की बीमारी नहीं है। निराशा जहाँ भी जड़ जमाती है वहीँ उस घुन की तरह, जो मजबूत शहतीर को भी खोखला करता जाता है, मनुष्य को भी खा जाती है। निराशा अपने साथ हार जैसी मान्यता संजोए रहती है, खीझ और थकान भी उसके साथ जुड़ती हैं। निराशा से उत्पन्न हुई स्ट्रेस की स्थिति से दबा हुआ मनुष्य स्वयं तो टूटता ही है अपने साथ वाले अनेकों को भी तोड़ता है। तभी तो कहा जाता है कि नेगेटिव प्रवृति वालों से दूर ही रहना चाहिए। मनुष्य की कार्यक्षमता और जीवनी शक्ति का अपहरण होता है। तनाव बढ़ने से बैचनी,भय की स्थिति बनी रहती है और ऐसे रचनात्मक उपाय नहीं दिख पड़ते जिनका सहारा लेकर पानी के तेज बहाव में डूबती नाव को पार लगाया जा सके। स्ट्रेस के कारण निराश व्यक्ति जीत की सम्भावना को नकारता रहता है, नेगेटिविटी में वह जीती हुई बाज़ी भी हार जाता है। निराशा न किसी गिरे हुए को ऊँचा उठने देती है और न ही प्रगति की किसी योजना को क्रियान्वित होने देती है। निराशा की ऊपरी स्टेज को घातक भी कहा गया है।
तो ऐसी स्थिति में हम जैसा साधारण मनुष्य क्या करे, निराशावादी (Pessimists ) से आशावादी(Optimists ) कैसे बने?
इस छोटे से परिवार का तो एक ही स्लोगन है:ज़िंदगी ज़िंदादिली का नाम है,मुर्दादिल क्या खाक जिया करते हैं।
इसलिए आवश्यकता है कि निराशा को छोटी बात न मानकर उसके निराकरण का हर क्षेत्र में प्रयत्न करते रहा जाए, इसी में सब प्रकार की भलाई है। यदि उत्साह और साहस बने रहेंगें तभी तो प्रगति प्रयोजनों को कार्यान्वित कर सकना सम्भव हो पाएगा।
“इक्क्सवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य” की रचना केवल ज़ोर-ज़ोर से नारे लगाने से,पीले कपडे पहनने से, झंडा उठाकर भीड़ इक्क्ठी करने से नहीं होगी। साथिओं के सहयोग की अवश्य ही ज़रुरत है क्योंकि “साथी हाथ बढ़ाना” के शाश्वत सिद्धांत को भी तो ध्यान में रखना है, जहाँ भी निराशा का माहौल है,उसके निराकरण का हर सम्भव उपाय करना है, हम सब स्वयं ही, गुरुदेव के अंग-अवयव हैं, हम ही उनके Torch bearers हैं, हमने ही उनकी लाल मशाल को थामा हुआ है। निराशा का निराकरण तभी सम्भव होगा जब उज्ज्वल भविष्य की आशा-भरी कल्पनाएँ करते रहने का आधार खड़ा किया जाता रहेगा।
निराशा की ऐसी स्थिति में अपने समेत,जन-जन की विचार-शक्ति को समर्थ चिन्तन और पुरुषार्थ के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाओं पर ध्यान देने और उन्हें समर्थ बनाने के लिए उत्साहपूर्ण सहारा देना चाहिए, उसके लिए आवश्यक पृष्ठभूमि तैयार करनी चाहिए। इस सम्बन्ध में जन-जन को विश्वास दिलाने के लिए एक समर्थ व्यापक प्रयास को समुचित विस्तार देना चाहिए।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि एक निराश मार्गदर्शक के लिए सार्थक मार्गदर्शन प्रदान करना बहुत ही कठिन है लेकिन “The show must go on” ऐसी ही परिस्थितिओं के लिए बने हैं। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के प्रत्येक साथी की यही अग्निपरीक्षा है,बीज स्वयं गल कर ही पौधा बनता है,उसी से विशाल वृक्ष बनता है। गुरुदेव ने तो स्वयं कहा है कि आपका तार एक ऐसे ट्रांसफार्मर से जुड़ा हुआ है जिसने सारे विश्व को प्रकाश प्रदान करने का संकल्प लिया हुआ है। गुरुदेव स्वयं ही शक्ति भी प्रदान करेंगें लेकिन हमारी इच्छा भी तो होनी चाहिए।
इतिहास साक्षी है,समय-समय पर ऐसी विकट परिस्थितियों में ही मूर्धन्यजनों ने पाञ्चजन्य उद्घोष किये, निराशा को आशा में,उपेक्षा को पुरुषार्थ में बदल दिया,उन्हीं के प्रयत्नों से जनमानस पर छाई हुई निराशा का निवारण हुआ है।
नए आधारों को लेकर सृजनात्मक साहस को उत्तेजना देना युग मनीषियों का ही काम है। विचारशील स्तर के हर व्यक्ति का सहयोग देना बहुत ही लाभदायक होता है।
इतिहास ऐसे अनेकों उदाहरणों से भरा पड़ा है। हनुमान जी के नेतृत्व में रीछ-वानरों का समुदाय समुद्र-सेतु बाँधने और लंकादमन की विजयश्री का विश्वास लेकर इस प्रकार उमगा कि उसने खतरनाक दानवों को भी चकित और परास्त कर दिया। गोवर्धन पर्वत उठा सकने का विश्वास मानस की गहराई तक जमा लेने के उपरान्त ही ग्वाल-बाल योगीराज कृष्ण के असम्भव लगने वाले प्रयास को परिपूर्ण करने में जुट गए। एक उँगली के इशारे पर ग्वाल-बालों द्वारा लाठियों के सहारे गोवर्धन पर्वत उठाए जाने की कथा आज भी हर किसी को प्रेरणा देती है, उसे ऐतिहासिक विश्वस्त घटना के रूप में ही मान्यता मिल गई है।
भगवान् बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन में तत्कालीन जनसमुदाय को उज्ज्वल भविष्य का एकमात्र आधार बताया गया है। जिन लोगों ने उसे समझा वे लाखों की संख्या में भिक्षु-भिक्षुणियों के रूप में जीवनदानी बन कर साथ हो लिए और न केवल भारत, एशिया बल्कि समूचे संसार में उस समय की चलती हवा को उलट कर सीधा कर देने में सफलता प्राप्त कर गए। गाँधी जी का सत्याग्रह तो अभी कल-परसों की घटना है। आन्दोलनों के दिनों में एक निश्चित माहौल बन गया था कि “स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और उसे लेकर रहेंगे”। इस विश्वास के आधार पर ही असंख्यों ने गोली,जेल और आज़ादी के लिए बढ़-चढ़कर आहुति दे दी।
अर्जुन का मन हारा हुआ था, वह निराश होकर युद्ध न लड़ने के लिए अनेकों तर्क प्रस्तुत कर रहा था। भगवान् ने सभी तर्क सुनने के बाद एक ही रामबाण का प्रयोग किया। उन्होंने कहा:
“कौरवों को तो मैंने पहले ही मार रखा है, तू तो केवल निमित्त मात्र बनने की भूमिका निभा और विजयश्री का वरण कर।”
अर्जुन को भगवान् के वचनों पर पूर्ण विश्वास था, वह सभी उलझनों का परित्याग करके, मोह-मुक्त होकर तत्काल ही युद्ध में प्रवृत्त हो गया।
सम्प्रदायों के जन्मदाता भी अपने प्रतिपादनों पर अनुयायियों का सुदृढ़ विश्वास जमाने के उपरान्त ही असंख्यों का असाधारण सहयोग एकत्रित करने में समर्थ हुए थे। अध्यात्म मार्ग के मूर्धन्य पुरुष अपने पवित्र चरित्र और कष्टसाध्य तप-साधना की अग्निपरीक्षा में उत्तीर्ण होकर ही इस स्थिति में पहुँचे थे कि उनके प्रतिपादनों को आप्त-वचन मानते हुए शिरोधार्य किया जा सके।
आज ध्वंस को सृजन में बदलने के लिए अनौचित्य को औचित्य का अंकुश स्वीकार कराने के लिए इसी प्रकार का जनमानस विनिर्मित करना पड़ेगा, जो भय, आतंक, अशुभ और विनाश की मानसिकता से उभारे और आवश्यक परिवर्तन कर सकने की शक्ति पर सबका विश्वास जमा सके। साथ ही भविष्य की सम्भावना के सम्बन्ध में असमंजस को छोड़कर इस विश्वास को पूरी तरह हृदयंगम कराए कि औचित्य-अनौचित्य पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
अब ऐसा समय आ गया है। इस विश्वास का आधार तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरणों की शृंखला ढूँढ़-ढूँढ़कर नियोजित कर किया जा सकता है। साथ ही यदि उसमें ईश्वर की इच्छा, महाकाल की प्रेरणा एवं सुनिश्चित सम्भावना बताने वाली उच्चस्तरीय मान्यता का पुट लग सके तो इसे सोने के साथ सुगन्ध मिलने जैसे सुयोग की उपमा दी जा सकेगी।
इस सन्दर्भ में इक्कीसवीं सदी के अधिक सुखी-समुन्नत होने की किंवदन्ती को सुनिश्चित सम्भावना का स्थान मिल सके तो इसका परिणाम इस रूप में सामने आकर रहेगा कि जो अवांछनीयताएँ इन दिनों चल रही हैं उनके उलट जाने और सुखद सम्भावनाओं का पुण्य प्रभात उदय होने की बात लोगों के मन में जमती चली जाएँगी। उसकी परिणति यह होकर ही रहेगी कि लोग अनुचित को छोड़ने और उचित को अपनाने में बुद्धिमत्ता समझें और समय रहते श्रेय-सम्भावनाओं के भागीदार होने में अपनी अग्रगामी भूमिका निभाते हुए अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करने के लिए अधिक तत्परता के साथ कटिबद्ध होने पर अपने को गौरवान्वित अनुभव करने लगें।
“नेगेटिविटी आउट,पाजिटिविटी इन” के प्रैक्टिकल सन्देश के साथ आज के ज्ञानप्रसाद लेख का समापन होता है,अगला लेख सप्तमवार को प्रस्तुत होगा।
धन्यवाद् जय गुरुदेव
