सद्बुद्धि की देवी, माँ गायत्री की उपासना साधक को सन्मार्ग की ओर चलने को प्रेरित करती है, यह एक शाश्वत सत्य है। आज का ज्ञानप्रसाद इतना प्रैक्टिकल है कि इसे समझने में ज़रा भी कठिनाई नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह तो घर-घर की कहानी है,मनुष्य-मनुष्य की कहानी है।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर प्रसारित होने वाले कंटेंट की विशेषता है कि ज्ञान की गंगोत्री होने के कारण अंधकारमय वातावरण में से उज्जवल भविष्य को निकाल ही लेता है ।
गुरुदेव कह रहे हैं कि मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है, किन्तु फल प्राप्त करने के लिए सृष्टि के नियमों ने उसे बांध रखा है। अन्य जीवधारी सृष्टा के नियमों को समझते हुए उसी अनुसार आचरण करते रहते हैं लेकिन मनुष्य है जो बुद्धि एवं विवेक होने के बावजूद,इंस्टेंट लाभ प्राप्त करने के लिए,अदूरदर्शिता अपनाता है और भूल जाता है कि प्रकृति का अनादर करने पर अगले दिनों कैसे-कैसे दुष्परिणामों को भुगतने के लिए बाधित होना पड़ेगा। यह वह भूल (भूल क्या अपराध है !!) है जिसके कारण मनुष्य गलतियाँ करता है जिसके कारण उसे अनेकों उलझनों,समस्याओं, विपत्तियों का सामना भी अन्य जीवधारिओं की तुलना में अधिक करना पड़ता है।
कोई समय था जब मनुष्य अपने को “स्रष्टा का युवराज” होने के नाते गौरव एवं सम्मान अनुभव करता था,अपने चिन्तन और कर्तृत्व को ऐसा बनाए रखता था कि सुव्यवस्था बने और किसी को किसी प्रकार की प्रतिकूलताओं का सामना न करना पड़े लेकिन आज के समय में उसके स्वार्थ ने इसी हरी-भरी दुनिया का जो हाल किया हुआ है भला हम में से किस से छिपा हुआ है।
इस संसार में इतने साधन मौजूद हैं कि यदि उनका मिल-बाँटकर उपयोग किया जाय तो किसी को किसी प्रकार के संकटों का सामना करना ही न पड़े। प्राचीनकाल में इसी प्रकार की सद्बुद्धि को अपनाया जाता रहा है। कोई कदम उठाने से पहले यह सोच लिया जाता था कि उसकी आज,कल एवं परसों क्या परिणति हो सकती है। केवल औचित्य को ही अपनाये रहने से वह सुयोग बना रह सकता है जिसे पिछले दिनों सतयुग के नाम से जाना जाता था। सन्मार्ग का राजपथ छोड़कर उतावले लोग लम्बी छलांग लगाते हैं और कँटीली झाड़ियों में भटकते हैं। पतंग ऊंची उड़ान तो भर लेती है लेकिन उसकी डोर किसी ओर के हाथ में होती है, जब चाहे काट कर जमीन पे गिरा दे। इसके उलट वही वृक्ष सीना तानकर खड़ा होता है जिसकी जड़ें जमीन से जुड़ी होती हैं।
जब आपस में स्वार्थ टकराते हैं और अनेकानेक समस्याएँ पैदा होती हैं।
दूरगामी परिणामों पर विचार न करके जिन्हें इंस्टेंट प्रॉफिट ही सब कुछ लगता है, वे चिड़ियों-मछलियों की तरह जाल में फँसते जाते हैं, चासनी पर आँखें बन्द करके टूट पड़ने वाली मक्खी की तरह पंख फँसाकर बेमौत मरते हैं। दुर्बुद्धि का यही कुचक्र जब असाधारण गति से तीव्र हो जाता है तब उलझने भी ऐसी ही खड़ी होती हैं कि जन-जन को विपत्तियों के दलदल से उबरने नहीं देती।
Newton’s third law of motion शाश्वत है जिसके अनुसार क्रिया की प्रतिक्रिया (Action-reaction) न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। कई बार प्रतिक्रिया होने में थोड़ा विलम्ब हो जाता है तो लोगों में सन्देह उत्पन्न हो जाता है कि जो किया है,ज़रूरी नहीं कि उसका परिणाम Instantly ही मिल जाए। कई बार बुरे कार्य करने वाले भी उन पाप-दण्डों से बचे रहते हैं, कई बार अच्छे कर्म करने पर भी उनके सत्परिणाम नहीं दिख पड़ते।
इससे सोचा जाता है कि सृष्टि में कोई नियमित कर्मफल व्यवस्था है ही नहीं, यहाँ ऐसा ही अन्धकार चलता है।
ऐसी प्रवृति लेकर मनुष्य अपनी मनमर्ज़ी करता है, नास्तिक स्तर का अविश्वास अपनाकर जो भी सूझता है उसे करता जाता है और बेसिक सिद्धांत तक भूल जाता है कि बीज से वृक्ष बनना तो निश्चित है, उसमें देर लग सकती है। जो बोएगा वही काटेगा। सोने का अंडा देने वाली कहानी से भला कौन परिचित है। दूध से दही बनाने में भी कुछ निश्चित समय तो लगता ही है लेकिन आजकल तो इंस्टेंट का युग है। इंटरनेट पर भांति-भांति के दावों से (10 मिनट में दही जमाएं) अनेकों वीडियो अपलोड हुई दिखती हैं जो वर्षों पुराने, दादी माँ के नुस्खों को नकारती दिखती हैं।
चाहे सृष्टा के संविधान की बात करें यां Newton के विज्ञान की दोनों एक ही सन्देश देते हैं
“असंयम बरतने वाले अपने अनाचार का दण्ड तो अवश्य ही भुगतते हैं, समय कम/अधिक हो सकता है।”
नशेबाज का स्वास्थ्य बिगड़ता है,जीवनकाल घटता जाता है,यह तो शाश्वत सत्य है लेकिन नशेबाजी से होने वाली हानि इंस्टेंट कहाँ दिख पड़ती है? यदि झूठ बोलते ही मुँह में छाले पड़ जाते, चोरी करते ही हाथ में लकवा मार जाता, चरित्रहीन नपुंसक हो जाते तो किसी को अनर्थ करने का साहस ही न होता।
लेकिन भगवान ने ऐसा बिल्कुल नहीं किया,उन्होंने मनुष्य की समझदारी को जाँचने-परखने के लिए कदाचित इतना चांस दिया है कि वह उचित-अनुचित का निर्णय कर सकने वाली अपनी विवेक बुद्धि को जागृत करे। उसका सही उपयोग करके लॉजिक अपनाए और सही मार्ग पर चले। जो कोई भी ईश्वर की इस परीक्षा में अनुत्तीर्ण होता है ,उसे दण्ड तो अवश्य ही मिलता है जिसके कारण पश्चाताप के साथ ही अदूरदर्शिता अपनाने की आदत पड़ जाने से, पग-पग पर भूल करने और ठोकरें खाने की दुर्गति भी सहन करनी पड़ती है। इसके विपरीत जो व्यक्ति सोच-समझ कर, फूँक फूंक कर कदम रखते हैं और परिणामों को ध्यान में रखते हुए अपनी गतिविधियों को सुनियोजित करते हैं वे जीवन सम्पदा का सदुपयोग करके स्वयं धन्य होते हैं एवं Role मॉडल बन अनेकों का भला भी करते हैं।
मनुष्य को ईश्वर ने जो अनेकानेक विशेषताएँ-विभूतियाँ प्रदान की हैं उनमें से एक यह भी है कि वह क्रिया की प्रतिक्रिया का अनुमान लगा सके और अनिष्टों से बचते हुए सुख-शान्ति का जीवन जी सके।
आज के युग में स्नेह-सद्भाव सहकार-सदाचार की कमी पड़ने से मनुष्य का व्यवहार ऐसा विचित्र हो गया है जिसमें शोषण ही प्रधान दिखाई पड़ता है। सहयोग होता तो है लेकिन व्यक्तिगत स्वार्थ साधने के लिए,अपना मतलब निकालने के लिए। यह स्थिति ऐसी होती है जिसमें दूसरों के कष्ट-संकट और अहित की ओर ध्यान जाता ही नहीं, मात्र अपना ही लाभ सूझता है। अनाचार-अत्याचार शोषण, अपहरण, उत्पीड़न के मूल में यही वृत्ति काम करती है। नि:संकोच जघन्य कृत्य करने वाले वे ही होते है जिन्हें दूसरे के प्रति कोई सहानुभूति नहीं होती। अपने तनिक से लाभ के लिए वे दूसरों पर पहाड़ जितना संकट उड़ेल सकते हैं।
मानव धर्म के प्रतिपादकों ने ऐसी स्वार्थी प्रवृति की भरपूर निन्दा की है और ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ वाली भाव सम्वेदना को ही प्रोत्साहित किया है । ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ का अर्थ है कि जो व्यवहार हमें अपने लिए पसन्द नहीं, वह दूसरों के साथ कभी नहीं करना चाहिए। सबमें अपनी ही आत्मा को देखने का तात्पर्य है दूसरों के दु:खों को अपना दु:ख और दूसरों के सुख को अपना सुख माना जाय। मानवीय स्तर की भावसम्वेदनाओं का उद्गम इसी मान्यता के साथ जुड़ा हुआ है। यदि इस सिद्धांत को हृदयंगम कर लिया जाय तो अनाचार सम्भव न होगा, सेवा-सहायता के लिए मन मचलेगा, दु:ख बाँट लेने और सुख बाँट देने की उदारता बनी रहेगी।
अपनत्व को सिकोड़ लेना नीचता है और उसे व्यापक बनाकर चलना महानता:
महामानव,विश्वशांति की बात करते हैं,वसुदैव कुटुंबकम का,पुण्य-परमार्थ की बात सोचते हैं, योजना बनाते और गतिविधि अपनाते रहते हैं, यही आत्म-विकास है। ऐसी दशा में जिस प्रकार अपने लिए सुख-साधन मिटाने की इच्छा होती है, उसी प्रकार यह भी सूझता है कि दूसरों को सुखी रहते देखकर अपना मन भी हुलसे, दूसरों के दु:ख में हिस्सा बँटाने के लिए, सेवा-सहायता हेतु दौड़ पड़ने की आतुरता उमगे। यदि इस मानवीय मर्यादा का परिपालन होने लगे, तो कोई किसी के साथ अनीति बरतने की कल्पना ही मन में न उठने दे।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से बार-बार प्रसारित होने वाले मानवीय मूल्य इसी प्रवृति का प्रचार करते हैं।
जिस प्रकार दृष्टि-दोष होने पर मात्र नजदीक की वस्तु ही दिख पड़ती है और दूर पर रखी हुई वस्तुओं को पहचान सकना कठिन हो जाता है, उसी प्रकार अदूरदर्शी तुरन्त लाभ को ही सब कुछ मानते हुए उसे किसी भी कीमत पर पूरा करने के लिए जुट जाते हैं। इसके बाद इसकी परिणति क्या हो सकती है, इसका अनुमान तक अदूरदर्शी लोग लगा नहीं पाते,आँखें रहते हुए भी यह अन्धे जैसी स्थिति है। अविवेक के कारण स्वभाव में अनेकानेक अवाँछनीयताएँ सम्मिलित हो जाती हैं, दुर्व्यसनों की आदत पड़ जाती है, आलस्य-प्रमाद छल-प्रपंच अतिवाद-अहंकार लिप्सा-तृष्णा जैसे अनेक अनौचित्य बिना बुलाए ही साथ हो जाते हैं। प्रामाणिकता चली जाने पर न तो प्रखरता शेष रहती है और न प्रतिभा ही व्यक्तित्व के साथ जुड़ी रह जाती है। चोरों-लुटेरों का मानस सदा भयभीत बना रहता है, अनिष्ट की आशंकाएँ बनी रहती हैं और सन्देह करते, सन्देहास्पद स्थिति में बने रहते ही समय गुजरता है। ऐसे मनुष्य के पास प्रतिशोध,घृणा-तिरस्कार रूपी रिएक्शन वापिस लौटते हैं, संसार के दर्पण में अपनी ही छाया घाटिया दिख पड़ती है।
कुछ देर के लिए किसी को मूर्ख बनाया जा सकता है लेकिन सबको सदा के लिए गफलत में रखा जा सके, यह सम्भव नहीं होता । अपने द्वारा किए गए दुर्व्यवहार किन्हीं अन्यों के द्वारा अपने ऊपर प्रतिक्रिया बनकर टूटते हैं, जिसने औरों को ठगा वह किन्हीं अन्यों के द्वारा ठगा जाए, ऐसे घटनाक्रम आए दिन घटित होते देखे जाते हैं। असंयम बरतने वाले तत्काल न सही कल-परसों उसकी दु:खदाई प्रतिक्रिया से दण्डित हुए बिना नहीं रहते।
मनुष्य-मनुष्य के बीच छाया हुआ अविश्वास,असहयोग, अनाचार,चित्र-विचित्र प्रकार के उद्वेग,असन्तोष और दुर्व्यवहार उत्पन्न करते देखा जाता है। इस स्थिति के फलस्वरूप धनी-निर्धन शिक्षित-अशिक्षित सभी को अपने-अपने ढंग की कठिनाइयाँ त्रास देती दिख पड़ती हैं। अधिकांश लोगों को श्मशान के भूत-पलीतों की तरह जलते-जलाते, डरते-डराते उद्विग्न और असन्तुष्ट स्थिति में देखा जाता है। जिन पड़ोसियों को कभी अपना सबसे बड़ा सहायक, हितैषी, संरक्षक समझा जाता रहा था,आज वर्षों साथ रहने के बाद भी विश्वास नहीं है, इसी स्थिति ने तो Security cameras का अविष्कार किया। विश्व में कहीं से भी आप अपने फोन पर 24 घंटे घर की मॉनिटरिंग कर सकते है। अविश्वास और असुरक्षा का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है, क्या यही है विकास?
मनुष्य के पास सुविधा-साधनों का बाहुल्य तो अवश्य है लेकिन क्या उससे आत्मिक शांति मिलती है? बाहर वालों के लिए सुखी-सम्पन्न दिखना,शान शौकत दिखाना एक बात है,समृद्धि की डींगें मारना एक बात है,आंतरिक प्रसन्नता दूसरी बात है। अपने फकीर जैसे गुरु (परम पूज्य गुरुदेव,पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी) को पढ़ते-पढ़ते बनावटी समृद्धि को तुच्छ समझना सत्य लगना शुरू हो जाता है। पदार्थवाद की बात आते ही गुरुदेव के अनेकों संस्मरण कान खींचने जैसे लगते हैं।
आज इसी स्थिति में जनसाधारण को फँसा देखा जा सकता है। प्रगति के नाम पर सुविधा-साधनों की अभिवृद्धि होते हुए भी चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में निकृष्टता भर जाने के कारण जो कुछ चल रहा है वह ऐसा है जिसे निर्धनों, अशिक्षितों और पिछड़े स्तर के समझे जाने वालों की तुलना में भी अधिक हेय समझा जा सकता है।
ऐसी स्थिति को भले ही प्रगति कहा जाता हो,समाज हमें चाहे पिछड़ा हुआ ही समझता रहता हो लेकिन सही अर्थों में इसे दुर्गति न कहें तो और क्या कहें?
तथाकथित प्रगतिशील,जमानेसाज व्यक्ति से बात करके मूल्यांकन हो ही जाएगा कि वह अंदर से कितना सुखी है। मृगतृष्णा की आग,दूसरों को गिराकर आगे निकलने की दौड़,पदार्थवाद की अंधी भूख ने उसे इतना अंधा और बहरा बना दिया है कि हमारी आदर्शवादी बातें सुनते ही वोह यां तो कोई और बात करना शुरू हो जाता है,हमारी बात टाल देता है,अनसुना कर देता है यां फोन निकाल बैठता है। यही है दुर्बुद्धि।
सद्बुद्धि की देवी मां गायत्री उसे सन्मार्ग की ओर जाने को प्रेरित करे।
आज के लेख का यही संदेश है।
