“इक्क्सवीं सदी बनाम उज्जवल भविष्य-भाग 1” पुस्तक के 60 पन्नें, लगभग 16000 शब्द,24 चैप्टर्स में समाहित ज्ञान को समझने के लिए गुरुदेव ने न केवल ऊँगली पकड़ कर पग-पग पर मार्गदर्शन प्रदान किया बल्कि जहाँ-वहां बिखरे अनेकों अमूल्य रत्न भी हमारी झोली में डाल दिए। सभी संगृहीत ज्ञानपुष्पों को यथासंभव, अपनी बुद्धि एवं योग्यता के अनुसार 9 विस्तृत ज्ञानप्रसाद लेखों में प्रकाशित कर अपनेआप को जितना सौभाग्यशाली अनुभव कर रहे हैं उसके लिए कोई शब्द है ही नहीं,केवल गुरुचरणों में दंडवत नमन ही कर सकते हैं।
ज्ञान के इस प्रसार में कमैंट्स-काउंटर कमैंट्स की प्रक्रिया से उठी दिव्य खुशबु ने विश्व में कितनी और कैसी सुगंध का प्रसार किया उसे केवल वही अनुभव कर सकते हैं जिन्होंने हमारे फकीर/दरवेश गुरु पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के चरणों में Surrender-आत्मसमर्पण किया हुआ है। बार-बार लिखते आ रहे हैं कि कुछ गिने-चुने/मुट्ठी भर साथिओं के विस्तृत कमैंट्स साक्षात् उनकी अंतर्वाणी ही व्यक्त कर रहे होते हैं, ऐसा लगता है कि साथिओं ने अपना दिल ही चीरकर रख दिया हो।
इस एक और प्रयोग की सफलता के लिए, सहयोग दे रहे सभी साथिओं का ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं, उनके सहयोग के बिना कहाँ संभव हो पाना था ?
आदरणीय ब्रजेश वर्मा जी द्वारा स्थापित geocities नाम की वेबसाइट में संगृहीत अथाह ज्ञान का सहारा न होता तो शायद ही हम यह दिव्य कार्य सम्पन्न कर पाते। भाई साहिब के चरणों में शीश नवाकर ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं। ब्रजेश भाई साहिब के बारे में जानने का बहुत प्रयत्न किया लेकिन कुछ भी प्राप्त न हुआ। बहुत से उच्चकोटि के साधक गुप्त योगदान देना चाहते हैं, हो सकता है भाई साहिब उसी केटेगरी के हों, जो भी हो, जितना कंटेंट उन्होंने अपनी वेबसाइट पर संग्रहित किया हुआ है वोह बिलकुल ही विश्वसनीय नहीं है।
वर्षों पहले इस वेबसाइट को अपनी लाइब्रेरी में सेव किए बैठे थे,सैंकड़ों बार आकर्षक लेखों को पढ़ चुके थे,लिखने की इच्छा भी होती रही लेकिन जो कार्य जब होना होता है,तभी होता है जब ईश्वरीय कृपा बरसती है। इस बार तो ईश्वरीय कृपा हमारी सबकी प्रिय बेटी संजना का सुझाव ही था। बेटी का भी धन्यवाद् किये बिना हमें कहाँ चैन मिलेगा?
हमारे साथी ज्ञानरथ परिवार की कार्यप्रणाली से भलीभांति परिचित हैं। प्रत्येक लेख श्रृंखला के समापन एवं नई श्रृंखला के शुभारम्भ के बीच Wrap up और आगे की रणनीति का सेगमेंट अपना स्थान लिए बैठा होता है।
9 लेखों की दिव्य लेख श्रृंखला के लिए जब भी “इक्क्सवीं सदी बनाम उज्जवल भविष्य-भाग 1” पुस्तक को खोला,परम पूज्य गुरुदेव द्वारा 1984 की सूक्ष्मीकरण साधना से पहले स्वयं वितरित किया गया पत्रक (Pamphlet) सामने प्रकट होता रहा। पत्रक का शीर्षक “अपने अंग अवयवों से” इतना आकर्षक और Eye-catching था कि जिज्ञासु मन ने न जाने क्या कुछ रिसर्च करवा डाला। जिज्ञासु मन,प्रेरक प्रवृति, प्रोत्साहिक उत्सुकता से प्रतीक्षा न हो पायी। गुरु निर्देश ने “गुरुदेव के अंग अवयव कौन हैं”,दो दिन पहले ही दिव्य सन्देश तो लिखवा ही लिया एवं “आगे की फिर देखी जाएगी” कह कर अनेकों निर्देश दे दिए। मेरे गुरु के सहयोग की सीमा यहीं कहाँ रुकने वाली थी,इसी शीर्षक वाली 43 पन्नों की वोह दुर्लभ पुस्तक भी पकड़ा दी और उस पुस्तक का एक-एक शब्द भी पढ़ने का निर्देश दे दिया। पढ़ने का निर्देश ही क्या,इसी विषय पर एक ज्ञानप्रसाद लेख भी लिखवा डाला। वाह रे मेरे मालिक। ब्रह्मवर्चस द्वारा 2015 में पुनः प्रकाशित 43 पन्नों की पुस्तक में परम पूज्य गुरुदेव द्वारा पत्रक में दिए गए 12 बिंदुओं पर बड़ी ही संक्षिप्त चर्चा सी की हुई है। पत्रक और पुस्तक दोनों को साथ-साथ रख कर अध्ययन करने पर यही सन्देश मिला कि पत्रक में दिए गए सभी पॉइंट्स क्लियर हैं लेकिन पुस्तक को पढ़ लेने में कोई हर्ज़ नहीं है। यही कारण है यहाँ हम उस पुस्तक का विचारक्रांति लिंक अटैच कर रहे हैं।
https://vicharkrantibooks.org/Book_page/ViewPDF/624
तो साथिओं पिछले शनिवार में हमारी सक्रियता न होने का कारण यही व्यस्तता थी। “क्रांतिधर्मी साहित्य” पुस्तकमाला की 23 पुस्तकें, “इक्क्सवीं सदी उज्जवल भविष्य-भाग 1” पुस्तक के 24 चैप्टर एवं “अपने अंग अवयवों से” पुस्तक के 43 पन्नों ने ऐसा कंफ्यूज किया हुआ था कि गुरुवर का निर्देश एवं मार्गदर्शन ही इस कन्फूज़न से निकाल सकता था।
फिर क्या था !!!! बिना बताए ही गुरुवर को पता चल गया कि उनका बच्चा दुविधा में है, निर्णय लेने में असमर्थ है तो उन्होंने पहले केवल एक ही अंक का “अपने अंग अवयवों से” पत्रक का ज्ञानप्रसाद लिखने का निर्देश दिया एवं उसके बाद यानि कल से “इक्क्सवीं सदी उज्जवल भविष्य-भाग 2” का स्वाध्याय एवं उस पर आधारित लेख श्रृंखला लिखने को कहा। गुरु आज्ञा सो आज्ञा,पूर्ण समर्पण से पालन करना ही धर्म है।
आइए इसी विस्तृत बैकग्राउंड के साथ आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ करें।
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अपने अंग अवयवों से:
परम पूज्य गुरुदेव द्वारा सूक्ष्मीकरण में जाने से पहले, मार्च 1984 में लोकसेवी कार्यकर्ता,समयदानी, समर्पित शिष्यों को दिया गया महत्त्वपूर्ण निर्देश।
यह पत्रक स्वयं परमपूज्य गुरुदेव ने सभी को वितरित करते हुए इसे प्रतिदिन पढ़ने और जीवन में उतारने का आग्रह किया था।
आइए सबसे पहले यह जान लें कि गुरुदेव अंग अवयव किनको कह रहे हैं।
हर कोई व्यक्ति जो गुरुदेव के विराट ज्ञानशरीर से जुड़ा है वोह अंग अवयव है। कार्यकर्त्ता स्तर का हर व्यक्ति,अखण्ड ज्योति का पाठक, मिशन की सभी योजनाओं से किन्हीं न किन्हीं रूपों में जुड़ा एक साधारण व्यक्ति, पुस्तक मेलों से लेकर प्रदर्शनी तक हर स्तर पर जिसे गुरुदेव के व्यक्तित्व व कर्त्तत्व ने प्रभावित किया, जो भी गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, गायत्री तपोभूमि मथुरा, अखण्ड ज्योति संस्थान, युगतीर्थ आँवलखेड़ा,भारत एवं विदेश के अपने हज़ारों प्रज्ञा संस्थानों को देखकर उनकी योजना से किसी न किसी रूप में अभिभूत है, वह व्यक्ति उनका अंग अवयव है। शरीर में अँगुली, नख, शिरायें, मांसपेशियाँ होती हैं, सब मिलकर शरीर बनता है। परम पूज्य गुरुदेव जन-जन को अपने विराट शरीर का एक घटक मानते हैं। हर दीक्षित, शुभेच्छु, प्रबुद्ध वर्ग का व्यक्ति भी उनका अंग अवयव है।
इस पैम्फलेट में गुरुदेव कह रहे हैं:
1.यह मनोभाव हमारी तीन उँगलियाँ मिलकर लिख रही हैं लेकिन किसी को यह नहीं समझना चाहिए कि जो योजना बन रही है और कार्यान्वित हो रही है, उसे कलम, कागज या उँगलियाँ ही पूरा करेंगी। करने की जिम्मेदारी आप लोगों की, हमारे नैष्ठिक कार्यकर्ताओं की है।
2.इस विशालकाय योजना के लिए प्रेरणा ऊपर वाले ने दी है। कोई दिव्य सत्ता बता या लिखा रही है। मस्तिष्क और हृदय का हर कण एवं जर्रा लिख रहा है। लिख ही नहीं रहा है,बल्कि इसे पूरा कराने का ताना-बाना भी बुन रहा है। योजना की पूर्ति में न जाने कितनों का, कितने प्रकार का मनोयोग और श्रम, समय, साधन आदि का कितना भाग होगा। मात्र लिखने वाली उँगलियाँ न रहें या कागज, कलम चुक जायें, तो भी कार्य रुकेगा नहीं; क्योंकि रक्त का प्रत्येक कण और मस्तिष्क का प्रत्येक अणु उसके पीछे काम कर रहा है। इतना ही नहीं, वह दैवी सत्ता भी सतत सक्रिय है, जो आँखों से न तो देखी जा सकती है और न दिखाई जा सकती है।
3.योजना बड़ी है। उतनी ही बड़ी, जितना कि बड़ा उसका नाम है, “युग परिवर्तन”। इसके लिए अनेक वरिष्ठों का महान् योगदान लगना है। उसका श्रेय संयोगवश किसी को भी क्यों न मिले।
प्रस्तुत योजना को कई बार पढ़ें। इस दृष्टि से कि उसमें सबसे बड़ा योगदान उन्हीं का होगा, जो इन दिनों हमारे कलेवर के अंग-अवयव बनकर रह रहे हैं। आप सबकी समन्वित शक्ति का नाम ही वह व्यक्ति है, जो इन पंक्तियों को लिख रहा है।
4.कार्य कैसे पूरा होगा? इतने साधन कहाँ से आएँगे? इसकी चिन्ता आप न करें। जिसने करने के लिए कहा है, वही उसके साधन भी जुटायेगा। आप तो सिर्फ एक बात सोचें कि अधिकाधिक श्रम व समर्पण करने में एक दूसरे में कौन अग्रणी रहा?
5. साधन, योग्यता, शिक्षा आदि समझाने के लिए हनुमान् जी का नाम दिए देते हैं। हनुमान जी का भूतकाल भगोड़े सुग्रीव की नौकरी करने में बीता था लेकिन जब महती शक्ति के साथ सच्चे मन और पूर्ण समर्पण के साथ लग गए, तो लंका दहन, समुद्र छलांगने और पर्वत उखाड़ने का, राम, लक्ष्मण को कन्धे पर बिठाये फिरने का श्रेय उन्हें ही मिला। आप लोगों में से प्रत्येक से एक ही आशा और अपेक्षा है कि कोई भी परिजन हनुमान् जी से कम स्तर का न हो। अपने कर्तृत्व में कोई भी अभिन्न सहचर पीछे न रहे।
6.काम क्या करना पड़ेगा? यह निर्देश और परामर्श आप लोगों को समय-समय पर मिलता रहेगा। काम बदलते भी रहेंगे और बनते-बिगड़ते भी रहेंगे। आप लोग तो सिर्फ एक बात स्मरण रखें कि जिस समर्पण भाव को लेकर घर से चले थे, पहले लेकर आए थे, हमसे जुड़े थे, उसमें दिनोंदिन बढ़ोत्तरी होती रहे। कहीं राई-रत्ती भी कमी न पड़ने पाये।
7.कार्य की विशालता को समझें। लक्ष्य तक निशाना न पहुँचे, तो भी वह उस स्थान तक अवश्य पहुँचेगा, जिसे अद्भुत, अनुपम, असाधारण और ऐतिहासिक कहा जा सके। इसके लिए बड़े साधन चाहिए, सो ठीक है। उसका भार दिव्य सत्ता पर छोड़ें। आप तो इतना ही करें कि आपके श्रम, समय, गुण-कर्म, स्वभाव में कहीं भी कोई त्रुटि न रहे। विश्राम की बात न सोचें, अहर्निश एक ही बात मन में रहे कि हम इस प्रस्तुतीकरण में पूर्णरूपेण खपकर कितना योगदान दे सकते हैं। कितना आगे रह सकते हैं, कितना भार उठा सकते हैं। स्वयं को अधिकाधिक विनम्र, दूसरों को बड़ा मानें। स्वयंसेवक बनने में गौरव अनुभव करें। इसी में आपका बड़प्पन है।
8.अपनी थकान और सुविधा की बात न सोचें। जो कर गुजरें, उसका अहंकार न करें बल्कि इतना ही सोचें कि हमारा चिन्तन, मनोयोग एवं श्रम कितनी अधिक ऊँची भूमिका निभा सका, कितनी बड़ी छलाँग लगा सका। “यही आपकी अग्नि परीक्षा है।” इसी में आपके गौरव और समर्पण की सार्थकता है। अपने साथियों की श्रद्धा व क्षमता घटने न दें। उसे दिन दूनी-रात चौगुनी करते रहें।
9.स्मरण रखें कि मिशन का काम अगले दिनों बहुत बढ़ेगा। अब से कई गुना अधिक। इसके लिए आपकी तत्परता ऐसी होनी चाहिए, जिसे ऊँचे से ऊँचे दर्जे की कहा जा सके।
10.आपका अन्तराल जिसका लेखा-जोखा लेते हुए अपने को कृत-कृत्य अनुभव करे और हम फूले न समाएँ ऐसा हो ही नहीं सकता और प्रेरक सत्ता आपको इतना घनिष्ठ बनाए, जितना कि राम पंचायत में छठे हनुमान् भी घुस पड़े थे।
11.कहने का सारांश इतना ही है, आप नित्य अपनी अन्तरात्मा से पूछें कि जो हम कर सकते थे, उसमें कहीं राई-रत्ती त्रुटि तो नहीं रही। आलस्य-प्रमाद को कहीं चुपके से आपके क्रिया-कलापों में घुस पड़ने का अवसर तो नहीं मिल गया। अनुशासन में व्यतिरेक तो नहीं हुआ। अपने कृत्यों को दूसरे से अधिक समझने की अहंता कहीं छद्म रूप में आप पर सवार तो नहीं हो गयी?
12.यह विराट् योजना पूरी होकर रहेगी। देखना इतना भर है कि इस अग्नि परीक्षा की वेला में आपका शरीर, मन और व्यवहार कहीं गड़बड़ाया तो नहीं। ऊँचे काम सदा ऊँचे व्यक्तित्व करते हैं। कोई लम्बाई से ऊँचा नहीं होता, श्रम, मनोयोग, त्याग और निरहंकारिता ही किसी को ऊँचा बनाती है। अगला कार्यक्रम ऊँचा है। आपकी ऊँचाई उससे कम न पड़ने पाए, यह एक ही आशा, अपेक्षा और विश्वास आप लोगों पर रखकर कदम बढ़ रहे हैं। आप में से कोई इस विषम वेला में पिछड़ने न पाए, जिसके लिए बाद में पश्चात्ताप करना पड़े।
पं०श्रीराम शर्मा आचार्य, मार्च 1984

