“इक्क्सवीं सदी बनाम उज्जवल भविष्य-भाग 1” पर आधारित वर्तमान लेख श्रृंखला का आज समापन लेख प्रस्तुत किया गया है। लेख छोटा अवश्य है,लेख के कंटेंट से कहीं अधिक जानकरी अनेकों को होगी क्योंकि यह जानकारी 36 वर्ष पूर्व की है। आज के लेख का मुख्य सन्देश गुरुदेव द्वारा स्थापित किया गया प्रमाणिक तंत्र है जिसे समझना बहुत ही ज़रूरी है।
लेख का शुभारम्भ करने से पहले साथिओं से एक बार करबद्ध क्षमाप्रार्थी हैं कि शनिवार वाले स्पेशल सेगमेंट में व्यस्तता के कारण अधिक भागीदारी न कर पाए। सप्ताह भर प्रतीक्षा के बाद आने वाला यह एक ऐसा Interactive सेगमेंट होता है जो परिवार की भावना व्यक्त करता है।
क्षमाप्रार्थी के साथ ही उन साथिओं का धन्यवाद् करते हैं जिन्होंने हमारी निम्नलिखित पंक्तिओं का एक एक शब्द न केवल ध्यान से पढ़ा बल्कि अपनी भावनाएं भी चरितार्थ कीं:
“आने वाले ज्ञानप्रसाद लेखों के लिए स्वाध्याय,उनसे सम्बंधित रिसर्च ने इतना व्यस्त किया हुआ है कि आज इससे अधिक लिखने में असमर्थ हैं।”
शायद हमारी व्यक्त करने की अयोग्यता के कारण ही यह भी सन्देश प्रकट हुआ कि व्यस्तता किसी पारिवारिक ज़िम्मेदारी के कारण थी। ऐसा तो नहीं था, Work is worship, काम ही पूजा है के सिद्धांत का तो वर्षों से पालन कर रहे हैं तो अब यह आदत ही बन चुकी है। पारिवारिक ज़िम्मेदारी के लिए काम के साथ तो तब भी Compromise नहीं किया था जब फुल-टाइम नौकरी करते थे, अब तो गुरुचरणों में 24 घंटो का समर्पण है।
आइए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की आज की गुरुकक्षा में गुरुचरणों में समर्पित होकर गुरुज्ञान का अमृतपान करें एवं अपना कायाकल्प करें।
यदि हम किसी को शिक्षित करना चाहते हैं तो शिक्षक की Eligibility सबसे बड़ी शर्त तो होती ही है लेकिन शिक्षक का व्यक्तित्व उससे भी बड़ी शर्त होती है। इन दोनों शर्तों की पूर्ति होने के बाद शिक्षा ग्रहण करने के लिए उचित वातावरण की भी उतनी ही आवश्यकता होती है। परम पूज्य गुरुदेव ने शांतिकुंज की स्थापना,न केवल इन बेसिक शर्तों की पूर्ति करने के लिए की बल्कि “एक ऐसे प्रमाणिक तंत्र का विकास” भी किया जिस पर आज इतने वर्षों बाद भी कोई ऊँगली उठाने में असमर्थ है। यह एक ऐसा प्रामाणिक तंत्र साबित हुआ है जिसके बारे में हमारा स्वयं का Coin किया हुआ सिद्धांत (Tried,tested and certified-TTC),साक्षात् खुद-ब-खुद दिखाई देता है।
शांतिकुंज से दीक्षित/शिक्षित हुए, अलग-अलग सत्रों में भागीदारी करने वाले साधक स्वयं ही उपरोक्त तथ्यों की Certification करते हुए दिखते हैं। हम अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कह सकते हैं कि शिक्षा/दीक्षा की बात तो बाद में आती है,गुरुदेव द्वारा स्थापित किया गया वातावरण पहली बार के आगंतुक को भी ऐसे प्रभावित करता है जो सच में अविश्वसनीय,आश्चर्यजनक किन्तु शत प्रतिशत सत्य है। पहली बार एक सिख भाई साहिब को जब समाधि स्थल पर देखा तो जानने की जिज्ञासा हुई और पूछ ही बैठे कि आपको कैसा अनुभव हो रहा है। उन्होंने जब Vibrations अनुभव होने की बात की तो हमने अपने ह्रदय में कहा था, “भाई साहिब ऐसे ही फेंक रहे हैं, कुछ नहीं है यहाँ पर !!!” हमारी ऐसी धारणा होना स्वाभाविक थी क्योंकि हम बिना टेस्ट किये कहाँ मानने वाले हैं, विज्ञान और प्रतक्ष्यदर्शन तो हमारी रग-रग में घुसा हुआ था। वर्षों के अनुभव एवं स्वयं TTC करने के बाद आज ऐसी स्थिति बन गयी है कि लेखन के समय साक्षात् गुरुदेव दिखते हैं, वही लिखवाते दिखते हैं।
है न बिल्कुल ही अविश्वसनीय एवं आश्चर्यजनक, किन्तु क्या करें, है शत प्रतिशत सत्य।
शांतिकुंज में स्थाई रूप से जीवनदान कर रहे अधिकांश परिवारजन ऊँची नौकरियाँ छोड़कर सूत्र संचालक (हमारे गुरुदेव) को उदाहरण मानकर, मात्र युग सृजन शिल्पी सम्बन्धी सेवा कार्यों के लिए समर्पित भाव से आए हैं। शरीर निर्वाह के ब्राह्मणोचित साधन लेकर गुज़ारा चलाते हैं और उत्साहपूर्वक इतने घंटे इतना काम करते हैं कि विश्वास करना भी कठिन सा लगता है । इन जीवनदानिओं में कई ऐसे भी हैं, जो बैंक में जमा अपनी पूँजी से ही अपनी सारी व्यवस्था चला लेते हैं एवं आश्रम से कुछ भी नहीं लेते।
यह अपने आप में एक अनोखा व विरला उदाहरण है।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से प्रसारित हुए अनेकों लेखों में परम पूज्य गुरुदेव के Selection process की चर्चा की गयी है। कर्मठ और भावनाशील कार्यकर्ताओं की तो हर जगह कमी रही है लेकिन गुरुदेव को वोह अनायास ही मिलते चले आए एवं आ रहे हैं। यह बात ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के सम्बन्ध में अनेकों बार कही जा चुकी है।
यहाँ यह बताना प्रासंगिक है कि शांतिकुंज में जीवनदान करने वाले लोग कोई ऐसे-वैसे व्यक्ति नहीं हैं कि उनके लिए अन्य कोई विकल्प नहीं था, वोह रिटायर हो चुके थे और परिवार में उनकी संभाल करने वाला कोई नहीं था। M.D., M.Tech.,MBBS,M.Sc,Ph.D जैसी उच्च स्तर की डिग्रियां लिए अनेकों कार्यकर्ता स्वेच्छा से घर-परिवार छोड़कर गुरुदेव को समर्पित हुए हैं। जीवनदान करने से पहले इन लोगों ने शांतिकुंज के संचालकों का व्यक्तित्व निकट से हर कसौटी पर परख कर देखा, उनका मन यही हुआ है कि ऐसे वातावरण में रहकर, ऐसी कार्यशैली अपना कर अपने को धन्य बनाना चाहिए। इन कार्यकर्ताओं द्वारा विनिर्मित वातावरण का ही प्रभाव है कि शिविरार्थी अपने जीवनक्रम में कायाकल्प जैसी स्थिति लेकर वापस लौटते हैं।
हमारे समेत,ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के अनेकों साथी इन तथ्यों के साक्षी हैं।
प्रतिभा, प्रखरता और प्रामाणिकता की कसौटी पर कसा हुआ, पुरोधाओं-समर्पित प्रतिभाओं का यह परिवार ही इस संस्था का मेरुदण्ड है।
36 वर्ष पूर्व जब गुरुदेव ने “क्रांतिधर्मी साहित्य” की रचना की थी उस समय जो बातें निर्धारित की थीं,आज 2026 में जब यह पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं तो कितनी बदल चुकी हैं,हर कोई भलीभांति जानता है लेकिन हम उसी समय की चर्चा को बेस बना कर, बिना किसी तोड़-मरोड़ के यह पंक्तियाँ लिख रहे हैं।
गाँव-गाँव नवयुग का अलख जगाने की आवश्यकता को समझते हुए चार संगीतज्ञ एवं एक वक्ता, इस प्रकार पाँच-पाँच की मण्डलियाँ निरन्तर कार्यक्षेत्र में घूमती रहती थीं। इनके लिए गाड़ियों की व्यवस्था है। वर्ष भर में 1500 के लगभग सम्मेलन हो जाते हैं, जिनमें दीपयज्ञ मुख्य हैं। इनके लिए स्थाई भवनों के रूप में प्रज्ञा संस्थान विनिर्मित हैं, जो पूरे भारत में हजारों से भी अधिक हैं तथा अन्यान्य स्थानों पर सक्रिय कार्यकर्ताओं की शाखाएँ हैं।
आयोजनों में सम्मिलित होने की एक ही दक्षिणा है कि एक दुष्प्रवृत्ति को छोड़ा और एक सत्प्रवृत्ति को अपनाया जाए। इस क्रम में हजारों-लाखों लोगों ने अपनी बुराइयाँ छोड़ी व अच्छाइयाँ ग्रहण की हैं।
मिशन से प्रभावित लोग न्यूनतम एक घण्टा समय, पचास पैसा अंशदान प्रतिदिन देते रहते हैं। इन्हें स्थानीय परिवार में सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए अंशदान देते रहने का व्रत लेना पड़ता है। कितने ही लोग आधा समय परिवार एवं आधा समय समाज सेवा के लिए लगाते हैं। इस श्रेणी के वानप्रस्थ भी मिशन ने बड़ी संख्या में बनाए हैं। इनमें महिला जाग्रति का उद्घोष करने वाली महिलाओं की संख्या 50% से अधिक ही है। आशा की गई है कि यह प्रचलन समाज के हर क्षेत्र को अवैतनिक (Honorary-बिना वेतन वाले) अनुभवी कार्यकर्ता बड़ी संख्या में प्रदान करेगा।
किसी समय भारत के मनीषी-लोकसेवी सारे विश्व को मार्गदर्शन देने में सक्षम थे। इतनी बड़ी संख्या में लोकसेवी, वानप्रस्थ परम्परा के अन्तर्गत ही उपजते विकसित होते थे। अपने उत्तरदायित्व सीमित रखकर अथवा उनसे निवृत्त होकर पूरे समय या सीमित समय के लिए वे लोकमंगल साधना हेतु निकल पड़ते थे। देवमानव गढ़ने वाली यह परम्परा पुनः जाग्रत की जानी चाहिए।
शांतिकुंज में आर्थिक स्वावलम्बन के लिए कुटीर उद्योगों के प्रशिक्षण की विशेष व्यवस्था बनाई गई है। इसके द्वारा महिलाएँ अतिरिक्त आजीविका से पूरे परिवार को इतना सहारा देने का प्रयत्न करती हैं कि घर का एक व्यक्ति निरन्तर समाज निर्माण के कार्यों में लगा रहे। ऊपर की पंक्तियों में संक्षेप में उन सम्भावनाओं की व्याख्या की गई है जिन्होंने अनेकों को प्रेरणा दी है।
सन्त विनोबा कहते थे कि किसी संस्था को तभी तक जीवित रहना चाहिए, जब तक जनता उसके कार्यों का मूल्यांकन करके समुचित सहयोग प्रदान करे। यदि सहयोग बन्द हो जाए, तो समझना चाहिए कि वहाँ लोकसेवियों की भावना व श्रमशीलता में कहीं त्रुटि आ रही है। तब अच्छा है कि उस तंत्र को बन्द कर दिया जाए।
शांतिकुंज ने अपनेआप को इसी कसौटी पर कसे जाने के लिए आरम्भ से प्रस्तुत रखा है। यहाँ की गतिविधियों का मूल्यांकन करने के उपरान्त यदि समझा जाय कि उनका ऐसी संस्था के लिए कुछ देना उचित है, तो बिना माँगे ही स्वेच्छापूर्वक कुछ देना चाहिए। इसी आधार पर शांतिकुंज की अब तक प्रगति हुई है और यदि उसे आगे बढ़ना है, तो उसका आधार भी यही होगा।
वर्तमान लेखों में “एक छोटे मॉडल शांतिकुंज” का उल्लेख इसलिए किया गया कि हर क्षेत्र की प्रतिभाएँ अपने लिए कार्य सोचें और युग सृजन की अभीष्ट आवश्यकताओं को पूरा करें, नवसृजन की आधारशिला रखने हेतु महत्त्वपूर्ण कदम उठाएँ।
