वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

क्या हम विनाश की ओर बढ़ रहे हैं ?

क्रांतिधर्मी साहित्य की 23 रचनाओं की पुस्तकमाला की दूसरी दिव्य पुस्तक इक्क्सवीं सदी बनाम उज्जवल भविष्य भाग 2 का प्रथम ज्ञानप्रसाद लेख प्रस्तुत है। 

आज के लेख को Compile करते हुए जिन अलग-अलग स्रोतों की सहायता ली गयी है उन्हें भी संक्षेप में यथास्थान शामिल किया गया है। 

आइए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की आज की गुरुकक्षा का,गुरुचरणों में समर्पित होकर,पूर्ण श्रद्धा से  शुभारम्भ करें। 

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इन दिनों जिधर भी दृष्टि डालें, चर्चा परिस्थितियों की विपन्नता पर होती सुनी जाती है। कुछ तो मानवी स्वभाव ही ऐसा है कि वह आशंकाओं, विभीषिकाओं को बढ़-चढ़कर कहने में सहज रुचि रखता है। कुछ सही अर्थों में वास्तविकता है भी , जो मानव जाति का भविष्य निराशा एवं अन्धकार से भरा दिखाती है। 

इसमें कोई सन्देह नहीं कि मनुष्य ने विज्ञान के क्षेत्र में असाधारण प्रगति कर दिखाई है। 20वीं  सदी के ही विगत दो दशकों (1980-2000) में इतनी तेजी से परिवर्तन आए हैं कि दुनियाँ की काया पलट हो गई सी लगती है। सुख साधन तो अवश्य ही बढ़े हैं, साथ ही तनाव-उद्विग्नता, मानसिक संक्षोभ-विक्षोभों में भी बढ़ोत्तरी हुई है। व्यक्ति अन्दर से अशान्त है। ऐसा लगता है कि भौतिक सुख की मृगतृष्णा में वह इतना भटक गया है कि उसे उचित-अनुचित, उपयोगी-अनुपयोगी का कुछ ज्ञान ही नहीं रहा। वह न तो सोचने योग्य सोचता है और  न ही करने योग्य करता  है। परिणाम स्वरूप संकटों के घटाटोप चुनौती बनकर उसके समक्ष आ खड़े हुए हैं। हर व्यक्ति इतनी तेजी से आए परिवर्तन एवं मानव मात्र के, विश्व मानवता के भविष्य के प्रति चिन्तित है। 

प्रसिद्ध अमरीकी चिन्तक एवं भविष्य विज्ञानी (Futurist) Alvin Toffler  अपनी 1970 में प्रकाशित हुई पुस्तक “Future shock”  में लिखते हैं कि ‘‘यह एक तरह से अच्छा है कि गलती मनुष्य ने ही की, आपत्तियों को उसी ने आमंत्रण दिया एवं वही इसका समाधान ढूँढ़ने पर भी अब उतारू हो रहा है।’’

‘‘Time Magazine ’’ जैसा प्रतिष्ठित अन्तर्राष्ट्रीय प्रकाशन  प्रतिवर्ष किसी विशिष्ट व्यक्ति को “Man of the year” चुनती है। वर्ष 1988 के लिए इस  पत्रिका ने किसी को “Man of the year” न चुनकर, पृथ्वी को ‘‘Planet of the year” घोषित किया है। इस घोषणा में  पृथ्वी को “Endangered earth” अर्थात् प्रदूषण के कारण संकटों से घिरी हुई दर्शाया गया है । यह घोषणा इस दिशा में मनीषियों के चिन्तन प्रवाह के गतिशील होने का आभास देती है। 

ऐसी स्थिति में हर विचारशील व्यक्ति ने विश्व भर में अपने-अपने स्तर पर सोचा, अब की परिस्थितियों का विवेचन किया एवं भावी सम्भावनाओं पर अपना मत व्यक्त किया है। यह भी कहा है कि अभी भी देर नहीं हुई, यदि मनुष्य अपने चिन्तन की धारा को सही दिशा में मोड़ दे, तो वह निकट आ रहे डरावने खतरों के घटाटोपों को टाल सकता है।

संसार भर के मनीषी, Futurist,मूर्धन्यगण कहते हैं कि यद्यपि यह बेला संकटों से भरी है, सारा विश्व विनाश के मुहाने पर  खड़ा दिख रहा  है, फिर भी  यह तय है कि अंत में  दुर्बुद्धि पर सद्बुद्धि की ही विजय होगी एवं पृथ्वी पर सतयुगी व्यवस्था आएगी। 

मनीषीगण विशेष रूप से आशान्वित हैं एवं कहते हैं कि मनुष्य को 20वीं शताब्दी के अंत  एवं 21वीं  के शुभारम्भ वाले 12  वर्षों में, जिसे युगसन्धि की बेला कहकर पुकारा गया है, अपना पराक्रम-पुरुषार्थ श्रेष्ठता की दिशा में नियोजित रखना चाहिए, शेष कार्य ब्राह्मी चेतना, दैवी विधि-व्यवस्था, महाकाल की प्रत्यावर्तन प्रक्रिया मनुष्य से स्वयं ही करवा  लेगी।

मनीषियों-दिव्यदर्शियों का मत है कि परिवर्तन प्रक्रिया चल तो बहुत दिनों से रही थी लेकिन  उसकी आरम्भिक मन्दगति को गति देने  का अवसर युगसंधि के 12 वर्षों में ही मिला है। 1989 से 2000 के 12 युगसंधि वर्षों की क्या विशेषता थी, इस विषय पर इसी मंच से एक विस्तृत लेख लिखा जा चुका है, उसे फिर से दोहराना अनुचित होगा,हाँ उस लेख का लिंक देना ही ठीक रहेगा:

12 वर्ष की इस अवधि को परस्पर विरोधी गतिविधियों से भरा देखा जा रहा  है। एक ओर दुष्प्रवृत्तियों की कष्टकारी दण्ड व्यवस्था अपनी चरम सीमा पर देखी जा सकती है तो दूसरी ओर नूतन अभिनव सृजन के आधार भी खड़े होते देखे जा रहे हैं। इससे मन को असमंजस तो हो सकता है लेकिन  युगसन्धि इसी को तो कहते हैं, जिसमें एक स्थिति जाती है, दूसरी आती है। दोनों प्रक्रियाएँ एक-दूसरे की पूरक होती हैं। पतझड़ के साथ-साथ वसन्त की हरीतिमा अपने आगमन का परिचय देने लगती है। चारों ओर उल्लास उमंग भरा वातावरण छा जाता है। जराजीर्ण काया को त्यागते समय जीव काे दु:ख तो हो सकता है लेकिन नए जन्म का आनन्द इसके बिना लिया भी तो नहीं जा सकता। नश्तर चलाते समय सर्जन निर्दयता से फोड़े की चीर-फाड़ करते हैं लेकिन मवाद निकलने के बाद कष्ट मुक्ति का आनन्द भी तो अपनी जगह है।

पाठकों को स्मरण होगा कि उपरोक्त लेख को समझने के लिए हमने युगसाहित्य यूट्यूब चैनल पर प्रकाशित एक वीडियो भी अटैच की थी ,उसी वीडियो का लिंक फिर से यहाँ दे रहे हैं जिसमें नक्षत्रों की स्थिति भी आने वाले उज्जवल भविष्य को और संकेत कर रही है, हालाँकि इस वीडियो को समझना थोड़ा कठिन है लेकिन जितना भी समझ आ जाए लाभदायक ही रहेगा : 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार की भांति युगसाहित्य चैनल वालों ने भी परम पूज्य गुरुदेव को समझने का संकल्प लिया हुआ है 

वर्तमान स्थिति भयावह तो है ही,वास्तविक भी है, लेकिन केवल त्राहि-त्राहि करके नेगेटिविटी फैला कर क्या होगा ? प्रत्येक व्यक्ति को इस यूनिवर्स को सुंदर बनाने में अपना योगदान देना चाहिए। इस सन्दर्भ में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सूझ-बूझ एवं विश्व शान्ति की बात सोची जानी चाहिए क्योंकि यह समस्या विश्व मानवता की है, समूचे संसार की है। साहित्यकार, कलाकार, मनीषी, चिन्तकों को बढ़कर आगे आना चाहिए। कुछ प्रयास हुए भी हैं लेकिन इस विषम वेला में जितना कुछ किया जाना चाहिए था, उस दृष्टि से  वर्तमान पुरुषार्थ बहुत ही छोटा नजर आता है। 

जिसके साथ भी बात करो,हर कोई भविष्य का अशुभ चित्रण ही करता दिखता है, आँख उठाकर देखें तो घर-परिवार में,समाज में, मीडिया में एक ही सन्देश प्रसारित किया जा रहा है “नेगेटिव और केवल नेगेटिव विचार।” 

नेगेटिविटी की ऐसी दशा में हताश होना स्वाभाविक है। निराश मन:स्थिति अपने आप में एक इतनी बड़ी विपदा है, अभिशाप है। ऐसी स्थिति के  रहते व्यक्ति समर्थ होते हुए भी उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए कुछ कर पाने में स्वयं को असमर्थ पाता है। उत्साह-उल्लास में कमी पड़ती है तथा मनोबल गिरता है।

ऐसी स्थिति में गुरुदेव का निम्नलिखित एकमात्र सन्देश ही हम सबका साथी है: 

दूरदर्शियों, भविष्य द्रष्टाओं, अध्यात्म वेत्ताओं एवं पूर्वानुमान लगाने में सक्षम वैज्ञानिकों को इन दिनों चारों ओर “एक व्यापक परिवर्तन की लहर” दिखाई दे रही है। सभी इस तथ्य पर एक मत हैं कि यह समय यद्यपि कष्टकर हो सकता है लेकिन  शीघ्र ही उज्ज्वल भविष्य की रचनात्मक प्रवृत्तियाँ बढ़ती जा सकेंगी।

भविष्य कथन (Future forecast) विज्ञान सम्मत है या नहीं, इस पर कभी विवाद रहा होगा लेकिन अब स्वयं मानव विज्ञानी, भौतिकविद यह कहने लगे हैं कि भविष्य कैसा होगा इसको काफी पूर्व जाना जा सकता है। चन्द्रमा पर अपना कदम रखने वाले अग्रणी अन्तरिक्ष विज्ञानी ‘नासा’ के सुविख्यात डॉक्टर एडगर मिचैल (1971) का कहना है कि भविष्य कथन को विज्ञान की कसौटी पर कसना अब सम्भव है। यह कह पाना भी सम्भव है कि आने वाला समय कैसा होगा।  वे रचनात्मक दिशा मेें सोचते हुए कहते हैं कि भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल है, क्योंकि आधुनिकता की दौड़ से हताश मानव जाति पूरी गम्भीरता से उन प्रयोजनों में जुट रही है जो नवयुग के अरुणोदय का संकेत देते हैं। एक इंटरव्यू में “The man who saw the future” नामक एक कृति, जिस पर वीडियो फिल्म भी बन चुकी है, में  उन्होंने कहा है कि What we contemplate today becomes our future, and the coming years will usher in a new era,a fact that can be foreseen by observing current events

अर्थात् जैसा हम आज सोचते-करते हैं वही हमारा भविष्य बन जाता है। आने वाले वर्ष नवयुग के अरुणोदय काल के होंगे, यह सुनिश्चित है। यह आज के सृजन प्रयासों को देखकर कहा जा सकता है।

ज्योतिषियों के भविष्य ज्ञान पर किसी को सन्देह हो सकता है लेकिन  संसार में समय-समय पर ऐसे सूक्ष्मदर्शी अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न भविष्य द्रष्टा जन्मे हैं जिन्होंने  आने वाले वर्षों से लेकर सदियों तक के बारे में जो कुछ कहा, वह सच होकर रहा। अब जो उनके कथन प्रकाश में आए हैं वे 21वीं  सदी के उज्ज्वल होने की सम्भावना ही दर्शाते हैं। इनमें वैज्ञानिक, चिकित्सक, गुह्यविज्ञानी (Oculist-तांत्रिक),रहस्य विज्ञान (Mystic science) के मनीषी एवं अध्यात्म के एक्सपर्ट सभी शामिल हैं । इतना ही नहीं, ऐसे सामान्य व्यक्ति भी इनमें शामिल हैं जो Intuition के बेसिस पर भविष्य के गर्भ में झाँक कर भविष्य कथन कर  पाने में समर्थ थे और उनका कहना  सत्य निकला। ऐसे कुछ संस्थान-संगठन भी हैं जो विश्व स्तर भविष्य विज्ञान नामक विधा पर ही चिन्तन करते हैं एवं आँकड़ों, तथ्यों, घट रही घटनाओं, प्रचलनों आदि के सहारे अपना अनुमान लगाते हैं। विज्ञान के क्षेत्र में इनके कथन बड़े प्रामाणिक माने जाते हैं, ये सभी एक ही अभिमत व्यक्त करते हैं कि मनुष्य अपनी चाल निश्चित ही बदलेगा।

शांतिकुंज  हरिद्वार ने भी इस विषय पर गहरा चिन्तन व शोध कार्य कर यही निष्कर्ष निकाला है। विषद अध्ययन, परिस्थितियों के आँकलन पर तो यह अनुमान आधारित है ही, संचालक-संस्थापक (हमारे गुरुदेव) को भी Intuition होती रही है कि भविष्य उज्ज्वल ही होगा, विपन्नताओं के बादल छटेंगे एवं शीघ्र ही नवयुग का अरुणोदय होगा। गुरुदेव  का साहित्य हम सबको यही आश्वासन दे रहा है कि इक्कीसवीं सदी नूतन उज्ज्वल सम्भावनाएँ लेकर आ रही है। आवश्यकता है उस स्वर्णिम प्रभात की अगवानी के लिए विश्व भर के आशावादी मनीषी, प्रतिभा सम्पन्न सृजनशिल्पी एकजुट हों एवं नेगेटिविटी छोड़ कर विचार क्रांति से अन्यान्यों का मनोबल बढ़ायें।

जय गुरुदेव, अगले लेख तक मध्यांतर 


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