वर्तमान समय को “प्रज्ञा युग” अर्थात विवेक और बुद्धि का युग कहा गया है। जिस स्तर की लॉजिकल थिंकिंग आज के समय में हो रही है, शायद ही किसी अन्य युगों में हुई होगी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कलयुग,सतयुग आदि की अवधि लाखों वर्ष बताई गयी है,इन पर आज का मानव कहाँ विश्वास करेगा? लॉजिकल थिंकिंग के आधार पर आज का मानव तो कलयुग,सतयुग,द्वापर,त्रेता आदि को निम्नलिखित शब्दों में परिभाषित करता है। यह मनुष्य की व्यक्तिगत भीतरी दशा,अनुभव, एवं चॉइस पर निर्भर करता है कि उसने अपने लिए कौनसा युग चुनना है, कई बार तो सब कुछ होते हुए भी मनुष्य,अपने कृत्यों के कारण स्वर्ग को नर्क बना देता है:
-यदि मनुष्य अपनेआप एकाग्र होकर,स्वयं से प्रसन्न है और सत्य के प्रति जागरूक है तो उसके लिए यही सतयुग है।
-यदि मनुष्य कर्तव्य के प्रति निष्ठावान है, सुख और दुःख दोनो की अनुभूति करता है, तो उसके लिए यही द्वापरयुग है।
-यदि मनुष्य पर कर्म का प्रभाव अधिक है और मनभाव में थोड़ा संकोच है,उसके निश्चय में किसी का प्रभाव है तो उसके लिए यही त्रेतायुग है। -यदि मनुष्य को चारों तरफ दुःख, दुष्टता, लालच, भय और आक्रोश का अनुभव होता है, घर बाहिर कलह-कलह मची हुई है, सारा दिन कलपुर्ज़ों (फ़ोन,कंप्यूटर जैसे औज़ारों में) घुसा हुआ है तो यह मनुष्य कलयुग में ही वास कर रहा है।
युग की परिभाषा:
युग का अर्थ ज़माना (कालखंड) होता है जिस युग की जो विशेषताएँ-प्रमुखताएँ होती हैं, उन्हें युग शब्द के साथ जोड़कर उस कालखंड को सम्बोधित करने का सामान्य प्रचलन है जैसे कि ऋषियुग, सामन्त युग, जनयुग,कलयुग,सतयुग आदि इसी सन्दर्भ में वर्तमान समय को विज्ञानयुग, यांत्रिकी युग इत्यादि कहा गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार युग करोड़ों वर्षों का होता है। इस आधार पर मानवी सभ्यता की शुरुआत के खरबों वर्ष बीत चुके हैं और वर्तमान कलियुग की समाप्ति में अभी लाखों वर्ष की देरी है लेकिन उपलब्ध रिकार्डों के आधार पर Anthropologists और इतिहासकारों का कहना है कि मानवी विकास अधिकतम 19 लाख वर्ष पुराना है, इसकी पुष्टि भी आधुनिक तकनीकों द्वारा की जा सकती है।
बार-बार कहा जा रहा है कि कलयुग की अवधि 4,32 000 है और इसका अभी पहला ही चरण यानि 1,08000 वर्ष पूरे हुए हैं,3,24 000 वर्ष अभी बाकी हैं। क्या हमें तीन लाख चौबीस हज़ार वर्ष तक कलयुग में ही रहना पड़ेगा ? इसका उत्तर प्राप्त करने के लिए अनेकों तरह की धारणाएं उपलब्ध हैं। एक धारणा के अनुसार तो इस तथ्य को बिलकुल ही मिथ्या कहा गया है,गलत कहा गया है। कहीं-कहीं पर तो लाखों वर्षों की “युग अवधि” को घटाकर 12000 वर्ष बताया गया है। इन सभी तथ्यों के पीछे विज्ञान, अध्यात्म एवं सौर मंडल में ग्रहों की स्थितिओं के प्रमाण मिलते हैं जिन्हें नकारना लगभग असंभव ही है।
वर्तमान चर्चा में यदि नीचे दिए गए लिंक की वीडियो भी देख ली जाए
तो समझने बहुत सहायता मिल सकती है। इस वीडियो में दी गई जानकारी अखंड ज्योति के अप्रैल 1998 के अंक पर आधारित है। इस अंक में युगपरिवर्तन से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध है। जानकारी को समझ पाना तो अवश्य ही कठिन है लेकिन जितना भी समझ आ जाए प्रयास अवश्य करना चाहिए।
परम पूज्य गुरुदेव की युग निर्माण योजना के अनुसार बार-बार कहा जा रहा है कि समय बदलने जा रहा है/समय बदल चुका है। लाखों वर्षों वाली धारणा को तो नकारा ही जा चुका है तो आधुनिक धारणा के अनुसार, सारे प्रमाणित तथ्यों पर आधारित, कलियुग की समाप्ति और सतयुग की शुरुआत वर्ष 1989 से 2000 तक के 12 वर्ष सन्धिकाल के रूप में होनी चाहिए। इसमें मानवी पुरुषार्थ-युक्त विकास और विनाश की, दोनों प्रक्रियाएँ अपने-अपने ढंग से हर क्षेत्र में सम्पन्न होनी चाहिए। 12 वर्ष का समय “व्यावहारिक युग” भी कहलाता है। युगसन्धि-काल को यदि इतना मानकर चला जाए, तो इसमें कोई अत्युक्ति जैसी बात नहीं होगी।
12 वर्ष के Magic number को विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखा जाये तो निम्नलिखित तथ्य सामने आते दिखते हैं :
-12 वर्ष की आयु मानव जीवन से लेकर आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं तक में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह शारीरिक, मानसिक और सामाजिक बदलावों की शुरुआत का प्रतीक है, जहाँ से बच्चों में किशोरावस्था की नींव पड़ती है।
-मानसिक और शारीरिक बदलाव (Pre-teens):
12 वर्ष की आयु वह उम्र है जब बच्चे बचपन से किशोरावस्था (Teens- Thirteen) की ओर कदम बढ़ाते हैं । इस समय उनके शरीर और मस्तिष्क में तेजी से हार्मोनल बदलाव होते हैं और उनकी दुनिया का दायरा काफी बढ़ जाता है।
-सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताएं:
यहूदियों की परंपरा में 12 वर्ष की आयु को ‘बार मिट्ज्वा’ (Bar Mitzvah) कहा जाता है, जो यह दर्शाता है कि बच्चा अब बड़ा हो गया है और उसे युवा वयस्क (युवा) के रूप में जिम्मेदारी और धर्म का पालन करना है। हिंदू धर्म में 12 वर्ष की आयु को सीखने और संस्कार ग्रहण करने के लिए आदर्श माना जाता है, जिसके बाद गुरुकुल या शिक्षा के अगले चरण आरंभ होते थे।
आध्यात्मिक धारणा:
हिंदू ज्योतिष और खगोल शास्त्र में बृहस्पति (Jupiter) का चक्र 12 वर्षों का होता है। माना जाता है कि हर 12 वर्ष में ग्रहों की स्थिति व्यक्ति के जीवन और भाग्य में कोई न कोई नया परिवर्तन लाती है।
धार्मिक आयोजन:
बारह वर्षों का अंतराल भारत के सबसे बड़े धार्मिक उत्सवों में से एक ‘पूर्ण कुंभ मेले’ (Purna Kumbh Mela) के लिए बहुत प्रसिद्ध है।
हर 12 वर्ष के अन्तराल में एक नया परिवर्तन आता है, चाहे वह मनुष्य हो, वृक्ष वनस्पति अथवा विश्व ब्रह्माण्ड, सभी में यह परिवर्तन परिलक्षित होता है। मनुष्य शरीर की प्राय: सभी कोशिकाएँ हर 12 वर्ष में स्वयं को बदल लेती हैं। चूँकि यह प्रक्रिया पूर्णतया आन्तरिक होती हैं, अतः स्थूल दृष्टि को इसकी प्रतीति नहीं हो पाती, किन्तु है यह पूर्णतया विज्ञान सम्मत।
काल गणना में भी 12 के अंक का विशेष महत्त्व है। समस्त आकाश सहित सौरमण्डल को 12 राशियों, 12 खण्डों में बांटा गया है। पंचांग और ज्योतिष का ग्रह गणित इसी पर आधारित है। इसी का अध्ययन कर ज्योतिर्विद यह पता लगाते हैं कि आगामी समय के स्वभाव और क्रिया-कलाप कैसे होने वाले हैं। पाण्डवों के 12 वर्ष के वनवास की बात सर्वविदित है। तपश्चर्या और प्रायश्चित परिमार्जन के बहुमूल्य प्रयोग भी 12 वर्ष की अवधि की महत्ता और विशिष्टता को ही दर्शाते हैं। इस आधार पर यदि 1989 से 2000 तक के 12 वर्षों को उथल-पुथल भरा सन्धिकाल माना गया है, तो इसमें कोई हैरानगी वाली बात नहीं होनी चाहिए ।
अन्तरिक्ष विज्ञानियों के मतानुसार सौर कलंकों (Sunspots) के रूप में बनने-बिगड़ने, घटने-मिटने वाले धब्बों की मध्यवर्ती अवधि 12 वर्षों की होती है। वे कहते हैं कि 12वें वर्ष सूर्य में भयंकर विस्फोट होता है, जिसके कारण विद्युत चुम्बकीय तूफान में तीव्रता आ जाती है। इसका प्रभाव पृथ्वी के प्रत्येक जड़-चेतन में अपने-अपने ढंग से दृष्टिगत होता है। नदियों-समुद्रों में उफान आने लगते हैं, वृक्ष-वनस्पतियों की आन्तरिक सरंचना बदल जाती है। जनसमुदाय की मन: स्थिति में व्यापक असन्तोष दिखाई पड़ने लगता है।
खगोल विज्ञानियों (Astronomy scientists) का कहना है कि पिछले 250 वर्षों में इतने तीव्रतम सौर कलंक कभी नहीं देखे गए, जितने 1989-90 की अवधि में देखे गए। वाशिंगटन पोस्ट में छपे एक समाचार का हवाला देते हुए, हिन्दुस्तान टाइम्स के 29 अगस्त 1988 के अंकों में कहा गया है कि सौर कलंकों की इस प्रक्रिया में इतनी प्रचण्ड ऊर्जा नि:सृत होगी, जो मौसम असन्तुलन से लेकर मानसिक विक्षोभ तक की व्यापक भूमिका सम्पन्न करेगी। इस दृष्टि से अब इन अगले वर्षों के असाधारण घटनाक्रमों से भरा-पूरा होने की आशा की जानी चाहिए।
अन्त:स्फुरणा (Intuition बनाम भविष्य बोध (Future forecast)
“प्रचण्ड विचार प्रवाह के प्रतीक” हैं वोह अद्भुत मानव
मनुष्य के अन्तराल में अनेकों रहस्यमयी शक्तियों का वास है। बहुत बार देखा गया है कि अंतर्ज्ञान,अन्तःस्फुरणा (Intuition), Sixth sense, Gut feeling, छठी इंद्री के रूप में मिलने वाली जानकारी इतनी महत्वपूर्ण होती है कि इस शक्ति को नकारना नहीं चाहिए। ऐसी शक्ति का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण न दिखते हुए भी इसमें उतनी ही सच्चाई है, जितनी दिन के आरम्भ और अन्त में, क्रमश: सूर्य के उदयाचल से निकलने और अस्ताचल में छिपने में है।
मनुष्य द्वारा अग्नि का आविष्कार इसी अन्त:स्फुरणा की देन थी। मनुष्य को Intuition हुई उसने रगड़ का प्रयोग किया और अग्नि खोज ली। सूत कातना और उससे कपड़े बनाना भी अन्त:स्फुरणा द्वारा ही हुआ होगा। भाषा, लिपि, उच्चारण की असाधारण एवं अभूतपूर्व समझी जाने वाली अगणित शाखाओं, खोजों आविष्कारों का श्रीगणेश Intuition के आधार पर ही सम्भव हुआ होगा। एक बार सुयोग/संयोग बन जाने के बाद तो उस खोज में सुधार-परिवर्तन कर सकना सम्भव हो जाता है लेकिन जहाँ कोई प्रत्यक्ष आधार ही न हो, वहाँ इस प्रकार की अनायास सूझ को, व्यक्ति अथवा शक्ति की रहस्यमयी उपलब्धि ही माना जा सकता है।
धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि यह सब मन की शक्ति से सम्पन्न व्यक्ति के माध्यम से ईश्वरीय वाणी का प्राकट्य है। इस प्रक्रिया में चाहे वे पैगम्बर हों, देवदूत हों अथवा अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न मनीषी, उन्हें व्यक्ति न मानकर एक “प्रचण्ड विचार प्रवाह का प्रतीक” माना गया व उनके माध्यम से भविष्य में क्या कुछ सम्पन्न होने वाला है, इसकी अभिव्यक्ति की गई। हर धर्म, समुदाय में ऐसे इल्हाम रहस्यमयी अन्त:स्फुरणा के रूप में देख समझे जा सकते हैं।
भविष्य-ज्ञान प्रोफेसी, पूर्वाभास इसी श्रेणी में सम्मिलित माने जाते हैं। उसके कथित रूप में घटित होने पर मान लिया जाता है कि निराधार नहीं है। उसके पीछे कोई न कोई सुनिश्चित आधार अवश्य होना चाहिए। भविष्य कथन का यह आधार चाहे जिस भी विद्या पर अवलम्बित हो, उसे आश्चर्यजनक अद्भुत या दैवी ही समझा जाता रहा है लेकिन अब वैज्ञानिक भी इस बात को स्वीकारने लगे हैं कि वर्तमान के अध्ययन द्वारा भविष्य के बारे में बहुत कुछ बताया जा रहा है। इस सम्बन्ध में भविष्य विज्ञान (फ्यूचरालॉजी) की एक पृथक शाखा का भी विकास हो चुका है। इसे भविष्यवाणी तंत्र का एक अंग माना जाए, तो कोई अत्युक्ति न होगी।
इसी सन्दर्भ में विश्व के मूर्धन्य लेखकों की कई पुस्तकें: एच जी. वेल्स की ‘शेप ऑफ दि थिंग्स टु कम’ ‘टाइम मशीन’ पिछले दिनों ही प्रकाशित हुई हैं। उन्हें देखते हुए ऐसा लगता है कि जैसे उन्होंने स्वयं भविष्य की झाँकी की हो और बाद में उसे ही पुस्तकाकार रूप दे दिया हो।
फ्यूचरालॉजी या भविष्य विज्ञान अब एक पूर्णतः विज्ञान सम्मत विधा मानी जाने लगी है। पूर्व में कभी वायरलैस, माइक्रोचिप्स, रोबोट, कम्प्यूटर, अन्तरिक्ष में तैराकी व अन्यान्य ग्रहों पर यान भेजे जाने की सम्भावनाओं को काल्पनिक ही माना गया था लेकिन समय गुजरने के साथ ही यह सब होता चला गया। जिन-जिन विद्वानों ने कम्प्यूटर के आँकड़ों को आधार बनाकर भविष्य के सम्बन्ध में लिखा है, वे यही कहते हैं कि आज का चिन्तन, निर्धारण भविष्य में सही निकले, तो कोई आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए।
इसका कारण बताते हुए मनीषी कहते हैं कि प्रवाह सदा एक सा नहीं रहता। उसमें समय-समय पर उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। हवा कभी तूफान बनती है, तो कभी बवण्डर-चक्रवात का रूप धारण कर लेती है। इन्हीं सम्भावनाओं को दृष्टिगत रखते हुए अनेकों लेखकों ने ‘कमिंग आफ दि गोल्ड एज’ ‘दि टर्निंग प्वाइंट’ और ‘फ्यूचर शॉक’ में इक्कीसवीं सदी के आरम्भ को व्यापक परिवर्तनों का काल और अपने आने वाले समय में सुख-समृद्धि होने की सम्भावना प्रकट की है।
इन सब सन्दर्भों, कथनों, तथ्यों का उद्देश्य मात्र इतना है कि लोगों में यह विश्वास पैदा किये जा सके कि आगे आने वाला समय भयावह त्रासदी भरा नहीं है, सुखद है। इक्कीसवीं सदी वैसी नहीं होगी, जैसी वर्तमान संकट भरी परिस्थितियों को देखकर अंदाज लगाया जाता है। इस आशावाद का मूल आधार है, मानवी विभूति अन्त:स्फुरणा, पूर्वानुमान लगा पाने की दिव्य सामर्थ्य जिसे कोई भी मनुष्य अपने अन्दर जगा सकता है।
आज जो भी कुछ भविष्य के सम्बन्ध में उज्ज्वल सम्भावनाएँ व्यक्त करते हुए कहा जा रहा है, उसकी जड़ें भी वहीं विद्यमान हैं। परोक्ष जगत में चल रही हलचलें व व्यापक स्तर पर किये जा रहे प्रयास-पुरुषार्थ जो प्रत्यक्ष भले ही दृष्टिगोचर न हों, उनकी परिणति निश्चित ही सुखद होगी। वर्तमान युग को प्रज्ञा युग अर्थात विवेक और बुद्धि का युग भी कहा जा रहा है यही कारण है कि जितनी लॉजिकल थिंकिंग की बात आजकल हो रही है शायद ही कभी पहले हुई हो। इसलिए सभी पाठकों को गुरुदेव के उद्घोष 21वीं उज्जवल बनाम उज्जवल भविष्य पर विश्वास करना चाहिए,अपनेआप पर विश्वास करना चाहिए।
जय गुरुदेव