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विचारक्रान्ति का एक छोटा मॉडल है शांतिकुंज 

लगन, श्रद्धा और प्रामाणिकता के साथ यदि उच्चस्तरीय उद्देश्यों के लिए इन दिनों कोई सामान्य स्तर का तंत्र भी खड़ा हो,तो उसे असाधारण सफलता मिलेगी। गुरुदेव ने इसी सूत्र को अपनाया और विचार क्रांति के एक छोटे मॉडल के रूप में शांतिकुंज की रचना कर डाली। इस तथ्य को अंगीकार करने वाली अनेक प्रतिभाएँ समग्र उत्साह के साथ नवनिर्माण के क्षेत्र में उमंग-भरी मन:स्थिति में कदम बढ़ा सकती हैं और अपने संकल्पों में दिव्य अनुदानों को जुड़ा हुआ अनुभव कर सकती हैं। 

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अर्जुन के रथ के सारथी स्वयं भगवान थे एवं जो कुछ भी अर्जुन कर पाए भगवान की दिव्य शक्ति से ही हो पाया था। शांतिकुंज के सूत्र संचालक,हमारे गुरुदेव ने भी परोक्ष सत्ता के प्रतिनिधि बन कर जो कुछ प्राप्त किया हम सब जानते हैं। अब हम सबको भी इसी राह पर चलते हुए, अपने गुरु के प्रतिनिधि बन कर यथासम्भव,जितना बन पाए उतना तो प्रयास करना ही चाहिए। गुरुदेव ने सारा फॉर्मेट तैयार करके हमें दे दिया है, यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है कि हमें समझ न आए कि क्या करना है। जो जितना एवं जैसा कर सकता है वही पर्याप्त होगा।  

भव्य भवन बनाने से पहले,उन भवनों के नक़्शे और मॉडल बनाए जाते हैं। बड़े-बड़े बाँध, बड़ी परियोजनाएँ अट्टालिकाएँ पहले आर्किटेक्ट की दृष्टि से मॉडल रूप में ही विनिर्मित किए जाते हैं, उसके बाद ही उन्हें विभिन्न चरणों में साकार रूप दिया जाता है। 

“21वीं  सदी के उपयुक्त उज्ज्वल भविष्य” संरचना के स्वरूप अनुसार, गुरुदेव ने शांतिकुंज को एक छोटे से मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया है। हम सब जानते हैं कि 55 वर्ष पूर्व जिस शांतिकुंज की रचना हुईं थी आज कहाँ पंहुच चुका है। विचार क्रांति की ज्वाला ने जिस प्रकार सारे विश्व में, घर-घर में गुरुदेव-माताजी को स्थापित किया है इसे क्रान्तिकुंज कहें तो गलत न होगा। 

इस लेख के अंतर्गत दिया गया मॉडल हम सबके लिए एक Torch-bearer का कार्य करेगा, ऐसा हमारा अटल विश्वास है।  

इस मॉडल में उस समय केवल तीन निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण प्रयासों को ही जोड़ा गया था, बाद में ऐसा विस्तार हुआ कि क्या लिखें,क्या छोड़ें समझ पाना असम्भव सा दिखता है: 

1. युग चेतना को जनमानस के अन्तराल तक पहुँचाने वाली महाप्रज्ञा की पक्षधर लेखनी। 

2. जन मानस को झकझोरने और उल्टे को सीधा करने में समर्थ परिमार्जित वाणी। 

3.अपनी प्रतिभा, प्रखरता और प्रामाणिकता को पग-पग पर खरा सिद्ध करते रहने में समर्थ पुरोधाओं-अग्रदूतों का परिवार ।

युग क्रान्तियों में सदा यही तीनों अपनी समर्थ भूमिका निभाते रहे हैं। अनीति अनाचार को आदर्शवादी प्रवाह में परिवर्तन कर सकने वाले महान कायाकल्प इन्हीं तीन अमोघ शक्तियों द्वारा सम्पन्न होते रहे हैं।

इस पर सहज ही विश्वास नहीं होता। इसका मुख्य कारण है कि इन दिनों “आदर्शवादिता” मात्र कहने की चीज रह गई है। इसीलिए यह उपाय सोचा गया है कि इतने महान प्रयोजन की पूर्ति एवं विशाल आयोजन के लिए एक विश्वस्त, परिचय देने वाला मॉडल खड़ा किया जाए ताकि लोग समझ सकें कि विचार क्रांति,युग परिवर्तन आदि प्रोग्राम कैसे सफल किये जा सकते हैं।  

गुरुदेव बताते हैं कि चारों ओर दृष्टि दौड़ाने पर पता चलता है कि जनसाधारण में प्रचलनों का अनुकरण करने की एक विशिष्ट प्रवृति है।एक दूसरे की देखादेखी से  बुद्धिमान लोग उपयोगी न होने पर भी Try करने की भावना से आगे आना शुरू कर लेते हैं। इस प्रक्रिया में एक ही समस्या आड़े आती है कि नये दिखने  वाले प्रचलन अत्यन्त आवश्यक होने पर भी गले नहीं उतरते। कड़वी औषधि रोग नाशक होने पर भी उसे सेवन करते ही मुँह बिचकता है। जब तक कड़वी दवाई के लाभ न बताए जाएंगें, रोगी नकारता ही रहेगा।  

विचार क्रांति में पुरानी लीक से हट कर नया उपयोगी मार्ग अपनाने के लिए कहा जाता है क्योंकि उल्ट हो चुके विचारों को ही तो सीधा करना है, उन्हें ही तो सीधे मार्ग पर लाना है। 

गुरुदेव ने इस सन्दर्भ में लेखनी, वाणी, प्रशिक्षण समारोह-आयोजन आदि का फार्मूला अपनाया और ऐसे लोगों पर भरोसा किया जिनकी प्रामाणिकता और प्रखरता पर उँगली न उठती हो। इन सभी सरंजामों को जुटाने पर ही,एक पैकेज की भांति प्रयोग करके ही विचार-क्रान्ति अभियान स्पीड पकड़ सकता है भले ही वह प्रयोग समाल स्केल का ही क्यों न हों। 

युग क्रान्ति के लिए अनिवार्य है कि भ्रान्तियों, मूढ़ मान्यताओं  के हर पक्ष पर प्रहार करने वाले प्रतिपादन प्रस्तुत किये जाएँ, और उनके स्थान पर जो विवेकयुक्त स्थापनाएँ की जानी हैं, उसके लिए तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरणों के साथ भाव सम्वेदनाओं को स्पष्ट करने वाली शैली में प्रभावशाली लेखन किया जाए। इस लोकोपयोगी साहित्य को प्रकाशित करना और जन-जन तक पहुँचाने के लिए उसे सस्ता भी रखना आवश्यक है। साथ ही हर शिक्षित को वह साहित्य आग्रह पूर्वक पढ़ाया जाए, ऐसा तंत्र भी विकसित करना आवश्यक है।

साधन रहित परिस्थितियों में बड़ा सरंजाम जुट नहीं सकता। याचना करने, अर्थ संग्रह करने की अपेक्षा सूत्र संचालकों द्वारा यह उचित समझा गया कि उपयोगिता को अपने बलबूते पर लोकप्रिय बनने देने का अवसर दिया जाए। इससे प्रस्तुतिकरण के स्तर की सहज समीक्षा भी हो जाएगी।

गुरुदेव बता रहे हैं कि इसी प्रयोजन के लिए हिन्दी “अखण्ड ज्योति पत्रिका”  प्रकाशित की गई। यह मासिक पत्रिका मात्र एक पुस्तक न होकर हमारे चिन्तन का नवनीत (ताज़ा मक्खन) था, जिसकी प्रेरणा सतत हमें दुर्गम हिमालय से,अपने गुरु से  मिलती रही। आरम्भ में इसकी 500 प्रतियाँ छापी गई। स्वयं सेवक स्तर पर घर-घर जाकर बाँटने का क्रम बनाया गया। थोड़ी ही देर में 500 गुना अधिक, अर्थात् ढाई लाख से अधिक की संख्या में छपने लगी । बढ़ते-बढ़ते वर्ष 1989 के अप्रैल माह तक उसकी ग्राहक संख्या तीन लाख आ पहुँची। अध्यात्म तत्त्वदर्शन का विज्ञान सम्मत प्रतिपादन, विज्ञान को नई दिशा देने वाले समन्वयात्मक तथ्य परक लेखों का संकलन, मनुष्य में छिपी अनन्त सम्भावनाएँ व उनके विकास के विधि-उपचारों के सम्बन्ध में इस पत्रिका का लेखन-सम्पादन हरिद्वार से,और  प्रकाशन मथुरा से होता रहा। इस पत्रिका को  जिसने भी पढ़ा है, उसे न केवल लेखन शैली ने प्रभावित किया बल्कि गूढ़ समयानुकूल प्रतिपादनों ने नई प्रेरणा भी दी है।

इसी प्रेरणा ने, इन पक्तियों के नगण्य से, लेखक को इस पत्रिका के इतने करीब लाकर रख दिया कि अब यह अमूल्य रत्न लेखक के “प्राण” का विशेषण लिए हुई है। परम पूज्य गुरुदेव के करकमलों द्वारा रचा गया “अपनों से अपनी बात” सेक्शन तो गुरुदेव से साथ सीधा संपर्क स्थापित करता गया इस संपर्क ने न जाने क्या कुछ लिखवा डाला।

‘‘युग निर्माण योजना’’ नाम से आरम्भ की गई दूसरी ऐसी पत्रिका थी जिसकी विषय वस्तु, अखण्ड ज्योति से अलग थी। यह पत्रिका परिवार एवं सामाजिक निर्माण की दिशा में जनसाधारण का मार्गदर्शन करने लगी। देखते-देखते यह पत्रिका भी 70000 तक छपने लगी। गुजराती, मराठी, उड़िया तमिल, तेलगू भाषा के संस्करण बड़ी संख्या में पाठकों के समक्ष पहुँच रहे हैं। इनमें गुजराती पत्रिका “युगशक्ति” नाम से डेढ़ लाख से भी अधिक की संख्या में प्रकाशित हो रही है, गुरुमुखी, बँगला एवं अंग्रेजी संस्करण प्रकाशित हुए लेकिन उनकी व्यवस्था ठीक तरह न बन पाने के कारण उन्हें पुस्तकाकार रूप में समय-समय पर प्रकाशित किये जाने की व्यवस्था बना ली गई। 

बिना किसी विज्ञापन के, बिना किसी अर्थ याचना किये, मात्र अपनी उपयोगिता और पाठकों की सहयोगी सद्भावना के सहारे यह ग्राहक संख्या आज 2026 में कितनी बड़ी छलांग लगा चुकी है सभी साथी जानते हैं। 

आज डिजिटल युग में तो इन पत्रिकाओं को पढ़ाने का कार्य और भी सरल हो चुका है। अधिकतर प्रकाशन ऑनलाइन उपलब्ध है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार ने भी साथियों के निस्वार्थ पुरुषार्थ से जून 2026 (इन पंक्तियों के लिखते समय) तक के अंक अपनी वेबसाइट पर न केवल अपलोड किए हैं बल्कि समय-समय पर चेक भी किये हैं  कि सभी लिंक ठीक से काम कर रहे हैं।

यह एक साक्षात उदाहरण है कि यदि बड़ी प्रतिभाएँ, बड़े क्षेत्र में कार्य करें, तो विचार क्रान्ति की प्रथम आवश्यकता की पूर्ति हो सकना किसी भी प्रकार से  असम्भव नहीं रह सकती। जब एक व्यक्ति अपने निस्वार्थ समर्पण से इतना कुछ कर सकता है तो ऐसे ही अनेकों साधकों की श्रम-साधना कितने विशाल परिवार को प्रभावित कर सकने वाली सफलता प्रस्तुत कर सकेगी, इसका अनुमान लगा सकना किसी के लिए भी कठिन नहीं होना चाहिए।

नो प्रॉफिट नो लॉस के सिद्धांत से गुरुदेव का समस्त प्रकाशन, भारत की गरीब जनता को देखकर ही लिखा गया है। ग्रामीण निर्धन जनता गुरुदेव के साहित्य की सबसे बड़ी पाठक रही है। अमीरों के पास न तो समय है और न ही ऐसे साहित्य में रुचि, उनकी Priorities कुछ और ही हैं। 

प्रचार की दिशा में, ग्रामीण जनता ने गुरुदेव के परिश्रम का सम्मान किया। जिसने भी पढ़ा उसने दूसरों को पढ़ाया और उन्हें खरीदने के लिए प्रेरित किया। 

झोला पुस्तकालय कन्धों पर लादे, परिवारजन अपने परिचय क्षेत्र में निकलते रहे, दूसरों को पुस्तकें पढ़ने देने और वापस लेने जाते रहे हैं। कोई उत्साह दिखाता है, तो बेच भी देते हैं। यह कार्य विशुद्ध सेवा भावना से होता है। इसलिए कमीशन की उलझन खड़ी नहीं होने पाती। 

समय बदलने के साथ मोबाइल ज्ञानरथ, ऑनलाइन ज्ञानरथ जैसे अनेकों साधन जन्म लेते रहे, यथासंभव गुरु साहित्य के प्रचार में अनवरत प्रयास करते रहे। 

हमारे गुरु ने स्वयं देखा है कि पत्रिकाएँ और पुस्तकें कितना क्रान्तिकारी कार्य कर सकती हैं। इन पुस्तकों के माध्यम से, एक व्यापक परिवार  के लोगों को बड़े प्रयास अपनाने की प्रेरणा देकर, विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों के लिए विचार संशोधन  के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण प्रस्तुतियाँ की जा सकती है। इस प्रकार व्यापक परिवर्तन का आधार बन सकता है।

प्रकाशन के साथ ही, वाणी भी भटके हुओं को राह दिखाने में समर्थ है। सत्संग, प्रवचन-गोष्ठी सभाएँ, विचार-विनिमय सत्र, समारोह आदि इसी के अन्तर्गत आते हैं। शांतिकुंज  में  पिछले लम्बे समय से भांति-भांति के स्त्रों का आयोजन होता आ रहा है जिनमें अब तक करोड़ों व्यक्ति भाग ले चुके हैं। सुगम संगीत, सुगम वाद्ययंत्र, कथा प्रवचन, स्लाइड, प्रोजेक्टर, वीडियो आदि के माध्यम से आदर्शवादी प्रचलनों की, दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन, स्टीकर आन्दोलन, दीपयज्ञों के माध्यम से बिना खर्च के बड़े और प्रभावी समारोह स्तर की विधि व्यवस्था इन्हीं सत्रों में सिखाई जा रही है। शांतिकुंज में प्रतिभागी सत्रार्थियों के निवास, भोजन, शिक्षण, आवश्यक उपकरण आदि की समुचित व्यवस्था निशुल्क है। अपने अभ्यास व प्रशिक्षण के आधार पर ये प्रचारक जहाँ भी जाते हैं, वहाँ भीड़ एकत्रित कर, लोकरंजन से लोकमंगल, जन-जागरण का प्रयोजन पूरा करते हैं। जो प्रतिपादन गले उतारना है, उसे सुगम संगीत के माध्यम से प्रस्तुत करते रहते हैं व हजारों की संख्या में जनता इन आदर्शवादी प्रकरणों को सुनने आती है। स्थाई स्तर पर हर वर्ष हजारों प्रचारक इस सत्र पद्धति के अन्तर्गत विनिर्मित हो जाते हैं।

इन्हीं शब्दों के साथ वर्तमान श्रृंखला  का सोमवार तक मध्यांतर होता है। 

जय गुरुदेव 


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