वर्तमान में पनपी हुई यां पनप रही दुष्प्रवृत्तियों का निराकरण होना एवं उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों का संस्थापन एक बहुत ही बड़ा एवं महत्वपूर्ण कार्य है। यह एक दोहरा कार्य है,महान परिवर्तन के लिए जहाँ प्रत्यक्ष पुरुषार्थ की आवश्यकता है,वहीँ उसके साथ अदृश्य संकल्प, साहस और दूरदर्शी कौशल भी जुड़ा रहना बहुत आवश्यक है। “विश्वव्यापी संघर्ष भरे परिवर्तन” जिसे गुरुदेव युग परिवर्तन की संज्ञा दिए हुए हैं, इस समय की सबसे बड़ी चुनौती है। गुरुदेव हम सबको कह रहे हैं कि बिना विलम्ब किये,समय का सदुपयोग करते हुए,राह में आने वाले अवरोधों का सामना करने के लिए तैयार हो जाइए।
समय ने प्रचण्ड गति पकड़ ली है, हम सब देख रहे हैं कि जो कार्य हज़ारों वर्षों में भी नहीं किए जा सके थे, वे अब कुछ ही दशकों में सम्पन्न हुए जा रहे हैं। किसी 100 वर्ष के वरिष्ठ व्यक्ति (दादा जी,नाना जी आदि) के पास बैठ कर आज के युग की चर्चा करें तो उनके लिए वर्तमान युग एक अविश्वसनीय लोक,दिव्य लोक (Divine world) जैसा ही होगा। हाँ वोह बात अलग है कि पुराने लोगों को भूतकाल में जीने का,अपने बाल्यकाल की बातें सुनाने एवं स्मरण करने में बहुत आनंद मिलता है लेकिन जो सच है उसे स्वीकार करना ही बुद्धिमत्ता है। प्रतक्ष्य दिख रही प्रगति को कैसे नकारा जा सकता है,बैलगाड़ी से स्पेस टूरिज्म तक की प्रगति सब को दिख रही है। यह प्रगति, युग परिवर्तन की सामान्य गति में असाधारण गति आने का ही प्रतीक हैै। आने वाले समय में क्या कुछ और होने वाला है इसके बारे में कहना तो कठिन होगा लेकिन एक बात तो सच है, यह प्रवाह और भी अधिक गति पकड़ने वाला है। 22वीं शताब्दी ( 2099 के बाद वाले वर्ष) अवश्य ही “चमत्कार की शताब्दी” होने वाली है।
इस तथ्य को थोड़ा सकारात्मक होकर,Unbiased होकर समझने का प्रयास करें तो साक्षात् दिख जायेगा कि इक्कीसवीं सदी में पतन का प्रवाह रुकेगा और War footing के स्तर पर उज्ज्वल भविष्य की संरचना का कार्य आगे बढ़ेगा।
यह महाकाल की प्रेरणा है, ईश्वर की इच्छा है एवं समय की माँग है। इसे युगधर्म का, भगवान विष्णु के पांचजन्य शंख का उद्घोष भी कह सकते हैं। इसमें प्रचण्ड मानवी पुरुषार्थ उभरेगा लेकिन स्मरण रखा जाए कि इसके पीछे नियन्ता की प्रचण्ड प्रेरणा और सुनिश्चित योजना ही काम कर रही होगी। मनुष्य तो स्वयं नगण्य होते हुए भी उसका अनुगमन करके हनुमान,अंगद,नल-नील और भीम,अर्जुन जैसी भूमिकाएँ निबाहते और सर्वत्र आश्चर्यजनक सफलताएँ उपलब्ध करते दिखाई देंगे। भगवान् कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि कौरव दल का मरण तो नियति ने ही करके रखा हुआ है, राज्य सुख और यश का भागी बनने से कतराता क्यों है? सुयोग का लाभ उठाने में बुद्धिमानी क्यों नहीं देखता?
ऐसी ही प्रचण्ड प्रेरणाएँ असंख्यों को मिलेंगी और वे Intuition के आधार पर ही इतना कुछ करेंगे, जितना करने के लिए किसी को असाधारण प्रलोभन देकर भी उकसाया नहीं जा सकता, उनकी सिक्स्थ सेंस उन्हें स्वयं ही सत्य की ओर चलने के लिए प्रेरित करेगी।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर प्रतिदिन इस दिव्य प्रेरणा का प्रतक्ष्य उदाहरण मिलता जा रहा है। किसी को भी,कभी भी,किसी भी गुरुकार्य के लिए बाध्य नहीं किया जा रहा,सभी स्वयं ही इस पुनीत कार्य के भागीदार बने जा रहे हैं। हर प्रतिभाशाली साथी के मन में, कुछ न कुछ आदर्शवादी पुरुषार्थ प्रकट करने के लिए उठती उमंगों को देखकर उक्त कथन की सच्चाई पर मोहर लगती दिख रही है।
विश्व के कोने-कोने में अपने-अपने ढंग की सृजन उमंगों के साथ-साथ एक अति महत्त्वपूर्ण उभार शांतिकुंज, हरिद्वार के क्षेत्र से भी उभरता देखा जा सकता है। गुरुदेव ने “युगसन्धि महापुश्चरण” की बात करते हुए उसे सामूहिक साधना का “एक अभूतपूर्व” प्रयोग कहा है।
प्राचीनकाल में ऋषिकल्प व्यक्तियों का बाहुल्य था। हर किसी की ललक समाज से कम से कम लेने और अधिक से अधिक देने की रहा करती थी। वह बचत ही परमार्थ- प्रयोजनों में लगकर ऐसा माहौल बना दिया करती थी, जिसका स्मरण अभी भी लोग सतयुगी परम्परा के रूप में किया करते हैं। दैत्य का कोई स्पेशल आकार,शक्ल नहीं होता, वे भी मनुष्यों की ही शक्ल-सूरत के होते हैं,अन्तर केवल इतना ही होता है कि दैत्य दूसरों से,संसार से लूटते-खसोटते अधिक हैं और अपने समय, श्रम, चिन्तन तथा वैभव का न्यूनतम भाग सत्कर्मों में लगाते हैं। यही है वह अन्तर, जिसके कारण देवता पूजे जाते और दैत्य सर्वत्र भर्त्सना के भाजन बनते हैं।
युग परिवर्तन के साधना और प्रयास- प्रक्रिया का नाम “युगसन्धि महापुरश्चरण” रखा गया है। उसका विस्तार भी आश्चर्यजनक गति से हो रहा है। निजी प्रयोजनों के लिए तो पूजा-पाठ के, प्रचार-प्रसार के अनेक आयोजन आए दिन होते रहते हैं लेकिन
“इस साधना का संकल्प एवं लक्ष्य एक ही है: युगपरिवर्तन के लिए उपयुक्त वातावरण एवं परिवर्तन प्रस्तुत करना। जिनकी इस महान् प्रयोजन में तनिक भी रुचि है, वे इस आत्मीय आमन्त्रण का परिचय प्राप्त करते ही दौड़े चले आ रहे हैं और इस महाक्रान्ति के प्रवाह में उत्सुकतापूर्वक सम्मिलित हो रहे हैं।”
गुरुदेव बता रहे हैं कि इस सामूहिक तपश्चर्या साधना से ऐसी ऊर्जा उभरेगी, जो विशालकाय सामूहिक प्रयत्नों से ही उत्पन्न होती देखी जाती है। मानवी श्रम और मनोबल की सामूहिकता के चमत्कारी परिणामों के,अपने-अपने ढंग के अनेक प्रमाण हैं।
जब से शांतिकुंज की स्थापना हुई है इसे “युग चेतना की गंगोत्री” कहा जा रहा है क्योंकि इसका उद्देश्य ही यही था। सूर्य सर्वप्रथम पूर्वांचल से निकलता है और वहाँ से आगे बढ़ते-बढ़ते समस्त संसार को आभा से आच्छादित करता है। गंगोत्री से आरम्भ होने वाला निर्झर अमृतरूपी जल बंगाल पहुँचते-पहुँचते सहस्र धाराओं में विकसित हुआ दिख पड़ता है। इस युग साधना का शुभारम्भ भी शांतिकुंज से होते हुए देश के कोने-कोने और विश्व के हर भाग में व्यापक होते हुए देखा जा रहा है। आदरणीय चिन्मय भैया विश्व के कोने-कोने जाकर गुरुदेव-माताजी की शक्ति से लोगों को अवगत करा रहे हैं,ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार भी गिलहरी की भांति विश्वभर में प्रयासरत है।
आने वाले दिनों में प्रत्यक्ष रूप से सृजनात्मक हलचलों का उभार ठीक उसी आधार पर उभरकर आने की सम्भावना है, जो गोवर्धन उठाने जैसे महान कार्य को लाठियों की सहायता मिल जाने से सम्पन्न हो जाने के समान है।
शांतिकुंज का निर्माण ही इसके लिए उपयुक्त स्थान खोजकर किया गया है। गंगा की गोद, हिमालय की छाया, सप्त ऋषियों की तपोभूमि, दिव्य सान्निध्य, अखण्ड दीप, निरन्तर चलने वाली साधना का नियोजन जैसे संयोग, एक साथ एक स्थान पर अन्यत्र कदाचित ही कहीं देखे जा सकते हैं ।
स्थान और समय का चयन अपने आप में असाधारण महत्त्व रखता है। महाभारत के लिए कुरुक्षेत्र चुना गया था। बीजों के बोने का समय सही रखना अच्छी फसल पाने के लिए आवश्यक है। वर्षा और वसन्त की, असाधारण दृश्य उत्पन्न करने वाली अपनी-अपनी अवधि होती है। वे विशेषताएँ हर समय नहीं देखी जा सकती हैं। सेनीटोरियम उपयुक्त जलवायु वातावरण में ही बनाए जाते हैं। ब्राह्मणत्व की खोज करने हेतु कोणार्क के सूर्य मन्दिर जैसी जगह चुनकर निर्धारित की गई, जहाँ संसार भर के वैज्ञानिक सूर्य ग्रहण का अन्वेषण-परीक्षण करने आया करते हैं।
इसी प्रकार संसार में अनेक स्थान अपनी विशिष्टता के लिए प्रख्यात हैं। हिमालय क्षेत्र को तपस्या के लिए अनादि काल से उपयुक्त स्थान माना जाता रहा है। शांतिकुंज की निर्माण स्थली भी ऐसे ही सूक्ष्म परीक्षणों के उपरान्त चुनी गई है। जो कोई साधक भी यहाँ पर आता है उसे अपनी पात्रता के अनुरूप ही शक्ति, साहस, प्रकाश और प्रेरणा मिलती है जिससे वोह अपने क्षेत्र में जाकर ऐसे-ऐसे कार्य कर दिखाता है कि देखने वाले दांतो तले ऊँगली दबा लेते हैं। इन्हीं आधारों पर शांतिकुंज को चेतना का मुख्य स्रोत बताया गया है एवं उसे युग चेतना की गंगोत्री मान कर उसके विश्व विस्तार की प्रक्रिया किसी अदृश्य प्रेरणा के संकेत पर क्रियान्वित हो रही है।
युगतीर्थ शांतिकुंज के ही सन्दर्भ में कहना अनुचित न होगा जब दिव्य चेतना लोकमंगल के लिए आपातकालीन व्यवस्था बनाती है तो सामान्य क्षमता सम्पन व्यक्तिओं द्वारा भी असाधारण कार्य होते देखे जाते हैं। युग चेतना के अनुरूप संकल्पित प्रयास करने वालों के साथ व्यक्ति-सामर्थ्य की अदृश्य घटाएँ अपनेआप ही जुड़ जाती हैं। गिद्ध-गिलहरी,वानर-रीछ, ग्वाल-बालों आदि के साथ ऐसा ही तो हुआ था। उन सबकी सामर्थ्य तो सामान्य सी थी लेकिन निष्ठाएं इतनी असामान्य थीं कि निष्ठाओं (पात्रता) के आधार पर ही भगवान् ने उन्हें अपना माध्यम बनाकर लोकहित के लिए असाधारण कार्य सम्पन्न करा लिए। शांतिकुंज की पावन भूमि एवं वातावरण को भी कुछ ऐसा ही श्रेय सौभाग्य प्राप्त हुआ है।
आज के लेख का समापन इस दिव्य सन्देश से कर रहे हैं: गुरुदेव द्वारा बने बनाये कार्य में श्रेय लेने के लिए यह अति उत्तम अवसर है,इसे किसी भी कीमत पर मिस करना उचित नहीं होगा।
इन्हीं शब्दों के साथ अगले लेख तक के लिए मध्यांतर।
जय गुरुदेव
