सुप्रसिद्ध फ़्रांसिसी भविष्यवक्ता नोस्ट्राडेमस ने कहा था कि युगसंधि की अवधि में एक नयी अध्यात्मिक चेतना का उदय होगा और सतयुग का श्रीगणेश होगा। महर्षि अरविंद ने सुपरचेतना युक्त विभूतियों की बात की है। विचारों के सामूहिक प्रयास को ही प्रज्ञावतार का अवतरण कहा है। स्वामी विवेकानंद, इजरायल के प्रोफेसर हरार और अमेरिका की जीन डिक्सन जैसे अनेकों भविष्यवक्ताओं ने गुरुदेव के युगसंधि,युग निर्माण,युग परिवर्तन में विचार क्रांति का समर्थन किया है। विचार क्रांति के लिए गुरुदेव के साहित्य को समझना, समझकर अपने जीवन में उतारने के इलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। इस कृत्य के लिए जिसने भी समय का सदुपयोग कर लिए समझो उसका जीवन ही तर गया।
प्रस्तुत ज्ञानप्रसाद लेख मानवी प्रज्ञा शक्ति का विश्लेषण करते हुए बता रहा है कि साधारण से दिखने वाले व्यक्ति भविष्य को कैसे देख लेते हैं। वैज्ञानिक आधार न होने के कारण तार्किक प्रवृति वाले लोग भविष्वाणिओं को कहाँ मान पाँएगें लेकिन विशाल उपलब्ध डाटा के लिए प्रमाण की ज़रुरत कहाँ रह जाती है।
इतिहास बताता है कि दिव्य चेतना ने “मानवी प्रज्ञा” के माध्यम से ही हर कल्पना, हर अप्रत्याशित घटनाक्रम को मूर्त रूप देने का कार्य किया है। राजनीतिज्ञ, समाज सुधारक, चिन्तक, प्रकृति के रहस्यों की खोज करने वाले तथ्यान्वेषी (Investigator), लेखक, कवि, संगीतकारों को भी भावी कार्यों सम्बन्धी प्रेरणा मानवी प्रज्ञा के आधार पर मिलती रही है। यहाँ तक कि असम्भव को सम्भव कर दिखाने वाली प्रकृति प्रेरणा भी अचेतन में ही जन्मी है।
इन सभी विभूतियों को “अन्तर्प्रज्ञा” ने ही भविष्यवाणी का बोध कराया होगा,इनकी विकसित चेतना ही भविष्य को पढ़ पाने में समर्थ रही होगी। इनकी अन्त:प्रेरणा, विकसित चेतना पर दृष्टि डालें तो दोनों ही प्रकार के भविष्य कथन हमारे सामने हैं। एक तो ऐसे भविष्यवक्ता हैं जो इक्कीसवीं सदी के पूर्वार्ध (2050 तक का समय) को खतरों- संकटों से घिरा बताते हैं और दूसरे वे जिन्होंने भविष्य के सम्बन्ध में उज्ज्वल सम्भावनाएँ प्रकट की गई हैं। इन्हीं का कहना है कि यदि मानवी प्रयास उलट दिये जाएँ, मनुष्य अपनी दिशा बदल ले,गलती सुधार ले तो सम्भावित विपत्तियों के बादल छँट सकते हैं। घटा कितनी ही काली एवं डरावनी क्यों न हो, तेज आँधी उसे कहीं से कहीं पहुँचा देती है,काली घटा भयावहता को निरस्त कर देती है।
यही बात मानवी पुरुषार्थ के बारे में भी लागू होती है। वह ठान ले तो नियति को बदल सकता है।
गुरुदेव ने आज से 36 वर्ष पूर्व 1990 में क्रांतिधर्मी साहित्य में लिख दिया था कि प्रस्तुत बेला जिससे विश्व मानवता गुज़र रही है,परिवर्तन की बेला है, इसे “सामूहिक विकसित चेतना” नाम दिया जा सकता है। इसी बिगड़ी स्थिति को देखते हुए सुनियोजित विधि व्यवस्था बनाने के लिए प्राणवान प्रतिभाओं को निबाहने की ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है। अवतार इसी प्रवाह का नाम है। अवतार का अर्थ ही किसी प्रतिभाशाली आत्मा का अवतरण है। वर्तमान समय में उसी महाकाल की प्रबल प्रेरणाएँ युग परिवर्तन के निमित्त नई परिस्थितियाँ विनिर्मित करती देखी जा रही हैं। आवश्यकता इसी बात की है कि हम सबको समय को पहचानकर,अपने प्रयास भी इसी निमित्त झोंक देने चाहिए। भगवान् श्रेय देने को उतावले हैं, श्रेय को पाने व अवतार प्रक्रिया का सहयोगी बनने का ठीक यही समय है, समयदान का यही उपयुक्त अवसर है,जो व्यक्ति समयदान की कंजूसी बरतेंगे उनका पछताना सुनिश्चित है। ग्वाल बालों को,रीछ वानरों को,गिलहरी को कहाँ मालूम था कि जिनके काम में वोह हाथ बटा रहे हैं वोह तो साक्षात् भगवान ही हैं। ज्ञानप्रसाद लेखों द्वारा परम गुरुदेव की शक्ति को जानने/पहचानने का कार्य किया जा रहा है।
गुरुदेव समेत,विश्वभर के भविष्यवक्ताओं के बारे में कहा जा सकता है कि उनकी दिव्य दृष्टि में ऐसी समर्था है, जिसके सहारे रहस्यमय अदृश्य जगत में भी झाँका जा सकता है और उस पर पड़े पर्दे को उघाड़ा जा सकता है। यद्यपि उन सभी को योगी/ऋषि तो नहीं कहा जा सकता लेकिन अपने दिव्य दर्शन की विशिष्टता के कारण ही तो वे मनीषी हैं,उनमें से कुछ एक के नाम निम्नलिखित हैं:
-फ्रांस के प्रख्यात चिकित्सक नोस्ट्राडेमस
-काउंट लुईसन, जो कीरो के नाम से भी विख्यात हैं
-सुप्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक शोपन हावर
-इंग्लैंड की मदर श्रिपटन
-अमेरिका की परामनोविज्ञानी श्रीमती जीन डिक्सन
-इजरायल के प्रोफेसर हरार
-महर्षि अरविन्द
-स्वामी विवेकानन्द
-इस्लाम धर्म के ख्याति प्राप्त विद्वान सैयद कुत्ब
यह नाम उन कुछ एक मनीषियों/विभूतियों के हैं, जिन्होंने अपने दिव्य चक्षुओं के आधार पर जो देखा और कहा,वह प्राय: शत-प्रतिशत सच साबित होता चला गया।
फ़्रांसिसी भविष्यवक्ता नोस्ट्राडेमस के नाम से भला कौन अपरिचित है। दिव्य द्रष्टा भविष्यवक्ताओं में सबसे प्रमुख नोस्ट्राडेमस का जीवन केवल 56 वर्ष का ही था। इस छोटे से जीवन में ही उनके द्वारा की गयी 400 भविष्यवाणियों का संकलन सेंचुरीज नामक पुस्तक में कई खण्डों में प्रकाशित हुआ है। नैपोलियन और हिटलर के जन्म से पूर्व ही उन्होंने लिख दिया था कि इटली और फ्रांस की सीमा पर स्थित एक सामान्य परिवार में जन्मा बालक एक दिन दुनिया का सबसे बड़ा तानाशाह तो बन बैठेगा लेकिन जीवन के अंतिम दिनों में उसे बर्लिन के एक बंकर में कैदी का जीवन व्यतीत करते हुए मृत्यु का वरण करना होगा। जापान में हुए बम प्रहार और उससे उत्पन्न विभीषिका एवं नर संहार का वर्णन भी उन्होंने अपनी अन्तर्दृष्टि के आधार पर कर दिया था, जिसका साक्षी द्वितीय विश्व युद्ध है।
इसके अतिरिक्त उनकी भविष्यवाणियों में 20वीं शताब्दी के अन्तिम दो दशकों (1980-2000) में बुद्धिवाद का चरमोर्त्कष पर पहुँचना, वैज्ञानिक क्षेत्र में आविष्कार, प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने में दिव्य प्रकोपों के बादलों का गहराना एवं एशिया से मानव जाति के उज्ज्वल भविष्य के निर्धारण हेतु एक प्रचण्ड शक्ति का प्रादुर्भाव होना शामिल हैं। नोस्ट्राडेमस ने लिखा है कि बुद्धिवाद की पराकाष्ठा पर पहुँचने के बाद भक्तिवाद की, श्रद्धा सम्वर्धन की, एक बड़ी शान्ति की लहर आएगी और युग परिवर्तन होकर ही रहेगा।
नोस्ट्राडेमस की पुस्तक सैंचुरीज का विश्व भर के 50 से अधिक विद्वानों ने गहराई से अध्ययन किया है। इन अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि उसमें जो कुछ भी लिखा है, वह सब या तो घटित हो चुका है यां आने वाले निकट भविष्य में घटित होने वाला है। उनके अनुसार युगसंधि की अवधि में एक नई आध्यात्मिक चेतना का उदय होगा जो अनुशासनों, मान्यताओं एवं वैज्ञानिक निर्धारणों को इक्क्ठा करते हुए, संहार की सम्भावनाओं को निरस्त करेगा और नये युग का श्रीगणेश होगा, जिसे उन्होंने “Age of Truth” अर्थात सतयुग का नाम दिया।
नोस्ट्राडेमस ने अपनी भविष्यवाणिओं में भारतवर्ष के बारे में कहा है कि यह देश सांस्कृतिक दृष्टि से सम्पन्न है, तीन ओर से सागर से घिरे, धर्म प्रधान, सबसे पुरातन संस्कृति वाले एक महाद्वीप से वह विचारधारा उठेगी जो विश्व को विनाश के मार्ग से हटाकर विकास के पथ पर ले जाएगी। सभी मनीषी इन भविष्यवाणियों में भारतवर्ष के एक विश्वनेता के रूप में उभरने की झलक देखते हैं और कहते हैं कि आने वाले समय की विचारक्रान्ति ही नवयुग की आधारशिला रखेगी।
महर्षि अरविन्द समेत सभी प्रॉफेटस, भविष्यवेत्ताओं, दिव्य दृष्टि सम्पन्न मनीषियों का मत है कि वर्ष 2000 के आगमन से पूर्व जो प्रलयंकर हलचलें दिखाई पड़ेंगी, इनसे किसी को निराश नहीं होना चाहिए। महर्षि अरविन्द का कहना है कि जब भी कभी उच्छृंखलता अपनी सीमा लाँघ जाती है तो आत्मबल सम्पन्न व्यक्तियों में सुपरचेतन (Super conscious mind) सत्ता अवतरित होती है।
इस सामूहिक चेतना का नाम ही अवतार प्रक्रिया है। अब महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया व्यक्ति के रूप में नहीं, विचारशक्ति के रूप में अवतरित होगी एवं इसे ही निष्कलंक प्रज्ञावतार कहा जाएगा।
1897 में स्वामी विवेकानन्द ने मद्रास में ‘‘भारत का भविष्य’’ शीर्षक से भाषण में भविष्यवाणी की थी कि जन-जन तक व्यावहारिक अध्यात्म के सूत्रों को पहुँचाने के लिए मन्दिरों को जनजाग्रति केन्द्रों के रूप में विकसित होते देखा जा सकेगा। आने वाला युग एकता का, समता का होगा। इस आध्यात्मिक साम्यवाद को कार्य रूप में परिणत करने मेें अनेक नवयुवकों की महती भूमिका होगी। वे ही संस्कृति के उद्धारक-रक्षक बनेंगे और नवयुग की कल्पना को साकार रूप में कर के दिखाएँगे। इसी ऐतिहासिक भाषण में स्वामी जी ने कहा था कि अगले दिनों एक मसीहा आयेगा जब ज्ञान के देवता का रथ सड़कों पर निकलेगा और एक निर्माण योजना सड़कों पर निकलेगी। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के प्लेटफार्म से यह संदेश कई बार प्रसारित हो चुका है। आज 2026 में अनेकों ज्ञानरथ भौतिक सड़कों पर दौड़ रहे हैं लेकिन मनुष्य के मस्तिष्क की सड़क पर दौड़ रहा “ऑनलाइन ज्ञानरथ” भी यथासंभव गुरुनिर्देशों का पालन किए जा रहा है।
इजरायल के एक धर्मनिष्ठ यहूदी परिवार में जन्में प्रोफेसर हरार द्वारा की गई भविष्यवाणियाँ प्राय: यथासमय सच सिद्ध होती रही हैं। भावी परिवर्तनों के बारे में वह कहा करते थे कि ‘‘मुझे स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि भारतवर्ष एक विराट शक्ति के रूप में उभरेगा। वहाँ एक संस्थान धर्मतंत्र को माध्यम बनाकर विचारक्रान्ति का विश्वव्यापी वातावरण बनाएगा। वर्ष 2000 तक समस्त छोटी-बड़ी शक्तियाँ मिलकर एकाकार हो जाएँगी। तब न भाषा का बन्धन रहेगा और न साम्प्रदायिकता एवं क्षेत्रीय विभाजन की संकीर्णता का। सब मिलजुलकर रहेंगे और मिल बाँटकर खाएँगे।
जीन डिक्सन 14 वर्ष की किशोर आयु से ही भविष्यवाणिओं के लिए बहुचर्चित रही हैं। 1945 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रेंकलिन रूजवेल्ट की मृत्यु की घोषणा, 1953 में स्टालिन की मृत्यु, 1961 में हेमशील्ड की एक हवाई दुर्घटना में मारे जाने की घोषणा एवं 1963 में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन ऍफ़ कैनेडी की हत्या की घोषणा उन्होंने वर्षों पूर्व कर दी थी।
बीसवीं शताब्दी के अन्तिम 12 वर्षों के बारे में उनकी भविष्यवाणी रही है कि अमेरिका गृह युद्ध के साथ मध्यपूर्व के युद्ध में उलझ जाएगा। यूरोपीय सभ्यता भोगवाद एवं युद्ध की नीति छोड़कर अन्तत: भारतीय संस्कृति के जीवन मूल्यों को अपनाने के लिए बाध्य होगी। संसार भर के उच्चकोटि के प्रतिभाशाली वैज्ञानिक एक मंच पर एकत्र होकर विश्व मानवता के लिए नये-नये आविष्कार करेंगे। ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत-प्रचुर मात्रा में खोज लिए जाएँगे। शिक्षा के क्षेत्र में ओवरआल परिवर्तन हो जाएगा और बच्चों को प्राचीन गुरुकुलों की तरह संस्कार शालाओं (गुरुदेव की बाल संस्कार शालाएं?) में सुसंस्कारिता की शिक्षा मिलने लगेगी। वे कहती हैं कि तब मानव का मस्तिष्कीय विकास एवं अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकास इस सीमा तक हो जाएगा कि वे विचार कम्युनिकेशन से ही एक दूसरे से सम्पर्क किया करेंगे और विश्व एक सूत्र में आबद्ध हो जाएगा (Global village?)
इक्कीसवीं सदी को जीन डिक्सन ने उज्ज्वल सम्भावनाओं से भरापूरा बताया है। वे बताती हैं कि ‘‘नीति और अनीति’’ का संघर्ष तो चलता रहेगा लेकिन अंत में नीति की, सत्प्रवृत्तियों की ही विजय होगी। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में अद्भुत उन्नति होगी। इंटरनेशनल यात्राएं तीव्र गति से चलने वाले यानों द्वारा सम्पन्न हुआ करेंगी (Space tourism?)।
अपनी प्रसिद्ध कृति ‘‘My life and Prophecies’’ के आठवें अध्याय में जीन डिक्सन लिखतीं हैं कि ‘‘इक्कीसवीं सदी नारी प्रधान होगी।” विश्व शान्ति स्थापना की दिशा में भारत की भूमिका का उन्होंने विशेष उल्लेख किया है और कहा है कि अपने आध्यात्मिक मूल्यों एवं वैचारिक क्रान्ति के माध्यम से वह समस्त विश्व में समतावादी शासन का सूत्रपात करेगा।
अगले लेख तक के लिए मध्यांतर।
जय गुरुदेव
