वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

ध्वंस और  सृजन, सन्धिवेला की दो अनिवार्य प्रक्रियाएँ हैं

सृष्टि का शाश्वत नियम है कि विनाश और विकास का चोली दामन का साथ है।नए भवन के निर्माण के लिए पुरानी जर्जर इमारत को गिरना ही पड़ता है। परम पूज्य गुरुदेव द्वारा रचित “क्रांतिधर्मी साहित्य” पर आधारित लेख श्रृंखला का चौथा ज्ञानप्रसाद लेख प्रस्तुत है। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा में,गुरुचरणों में समर्पित होकर, गुरुज्ञान का अमृतपान करने के लिए आपका स्वागत है।   

मनुष्य की प्रवृति है उसे उन्हीं बातों पर विश्वास होता है जो उसकी आँखों के समक्ष घटित हो रहा है। उसकी दृष्टि की तो इतनी ही सीमा है कि वह Naked eye से कुछ ही दूरी तक देख सकता है। दूरबीन की सहायता से कुछ और दूर तक देख सकता है एवं कुछ शक्तिशाली उपकरणों से और भी दूर तक देख सकता है। 

लेकिन विज्ञान एवं अध्यात्म कहता है कि सभी दृश्यमान घटनाओं का आरम्भ अदृश्य जगत से ही होता है। हर क्षण साँस द्वारा ली जा रही ऑक्सीजन  जीवित रहने के लिए कितनी आवश्यक है हम सब जानते हैं, हवा की आवश्यकता तो अन्न-जल से भी अधिक है। यह जीवनी शक्ति आकाश में “अदृश्य रूप” में विद्यमान है। यही जीवनी शक्ति (ऑक्सीजन एवं अन्य गैसें ) ऋतु परिवर्तन, प्राणियों और क्रिया-कलापों को असाधारण रूप से प्रभावित करती है। मनुष्यों की भली-बुरी क्रियाएँ, सकारात्मक/नकारात्मक गतिविधियां,अदृश्य जगत के वातावरण को प्रभावित करती हैं और फिर वहाँ से वे उसी अनुसार परिस्थितियाँ बनकर उतरती हैं। नकारात्मकता और सकारात्मकता ही ब्रह्माण्ड से दुःख और सुख बन कर एक प्रतिफल के रूप में प्रतीक बनकर उतरते हैं। यही कारण है कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से बार-बार नकारात्मकता को ध्वंस करने  का सन्देश प्रसारित किया जाता है। हम स्वयं,व्यक्तिगत तौर पर चाहे कितने ही सुखी क्यों न हों, कितने ही संस्कारवादी,आदर्शवादी क्यों न हों लेकिन ग्लोब के किसी भी भाग में पनप रही, प्रसारित हो रही नेगेटिविटी हमें भी प्रभावित करती है क्योंकि आज विश्व एक ग्लोबल विलेज की संज्ञा प्राप्त कर चुका है। जिस रेंज की हम बात कर रहे हैं उसे फील करना, देखना सम्भव हो सकता है लेकिन दृश्य जगत की इन गतिविधियों से अदृश्य जगत के तूफानी प्रवाह भी परिस्थितियों को पूरी तरह से प्रभावित कर रहे हैं। 

पाठक समझ सकते हैं कि इन परिस्थितिओं के समाधान के उपाय प्रत्यक्ष लेवल  पर तो होने ही चाहिए लेकिन साथ ही यह भी आवश्यकता है कि अध्यात्म उपचार (सूक्ष्म क्षेत्र के पुरुषार्थ) भी किये जाएँ। स्वाधीनता संग्राम के दिनों में महर्षि अरविन्द, महर्षि रमण, रामकृष्ण परमहंस, हमारे परम पूज्य गुरुदेव ने साधना करते हुए ऐसे ही सूक्ष्म उपचार किये थे। 

पक्षी दोनों पंखों के सहारे ही उड़ता है। विपत्तियों से जूझने और प्रगति के क्षेत्र में ऊँची उड़ाने उड़ने के लिए न केवल विकास के पक्षधर प्रयासों को क्रियान्वित किया जाना चाहिए बल्कि ऐसा भी कुछ होना चाहिए जिसमें देवताओं की संयुक्त शक्ति से दुर्गा का अवतरण हुआ था।

सृष्टि के आदि काल से अब तक कई ऐसे अवसर उपस्थित हुए हैं, जिनमें विनाश की विभीषिकाओं को देखते हुए ऐसा लगता था जैसे महाविनाश होकर ही रहेगा लेकिन इससे पहले  ही ऐसी व्यवस्था बनी, ऐसे साधन उभरे, जिसने गहराते घटाटोप का अन्त कर दिया। वृत्रासुर, रावण, कंस, दुर्योधन आदि असुरों का आतंक अपने समय में चरमावस्था तक पहुँचा,लेकिन  उस समय भी कुछ ऐसा होता चला गया कि जो प्रलयंकारी विनाशकारी दिखता था वही आतंक अपनी ही मौत मर गया। देवासुर संग्राम के विभिन्न कथानक भी इसी श्रृंखला में आते हैं। यदि इतिहास पर दृष्टि डाली जाए तो हर युग में, हर काल में “परिवर्तन की प्रक्रिया” गतिशील रही है। अभी कुछ ही दशकों पूर्व की बात है, एक समय था, जब सर्वत्र राजतंत्र का बोलबाला था। जब तक राजा को जनता का समर्थन मिला, तब तक उसका अस्तित्व बना रहा लेकिन  जब जनता ने राजतंत्र की हानियों को समझा, तो प्रजातंत्र का आधार खड़ा होते भी देर न लगी। विश्व भर में सरकारें परिवर्तन होती ही रहती  हैं क्योंकि हर कोई क्रिया परिवर्तनशील है। कभी नारी जाति प्रतिबन्धित थी, उसे पर्दे में  रहने और पति की मृत्यु के उपरान्त शव के साथ जला दिये जाने की व्यथा भुगतनी पड़ती थी लेकिन अब ऐसी बात नहीं रही। ऐसे ही दास-प्रथा, जमींदारी, बाल-विवाह, नर-बलि,छुआछूत, जातिवाद की कितनी ही कुप्रथाएँ पिछली एक-दो शताब्दियों में प्रचलन में थीं, समय के प्रवाह ने उन सभी उलटी हुई प्रथाओं को उलट कर सीधा कर दिया। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के साथिओं से सदैव संकल्प की माँग की जाती रही है कि ज्ञानप्रसाद लेखों से प्राप्त होने वाले प्रकाश से स्वयं को, परिवार को, समाज को आलोकित करें। सही अर्थों में यही है विचार क्रांति अभियान। ऐसा न करने की स्थिति में सभी प्रयास एक औपचारिकता, एक फॉर्मेलिटी ही बन कर रह जायेंगें,झंडा उठाकर “हम बदलेंगे, युग बदलेगा” तोते की रटी रटाई गंगाराम ही रह जाएगी।

टेक्नोलॉजी एवं बुद्धिवाद के कारण आने वाले दिनों में समाज में और भी परिवर्तन अवश्य न केवल आयेंगें बल्कि और स्पीड में आयेंगें। पाठक स्वयं ही अनुभव कर सकते हैं ,देख सकते  हैं कि पिछले समय की तुलना में आजकल हो रहे परिवर्तन कितने समय में सम्पन्न हो रहे हैं, इंस्टेंट का समय जो ठहरा। अगर कॉफ़ी इंस्टेंट है तो परिवर्तन क्यों पीछे रह जाए। पुरातन काल में  जिन कार्यों के पूरे होने और व्यापक बनने में सहस्त्राब्दियाँ लगती थीं, अब वही कार्य  दशाब्दियों में पूरे हो जाते हैं। ईसाई धर्म जिस गति से संसार में छाया वह सर्वविदित है। यही बात साम्यवादी (Communist) विचारधारा के साथ भी देखी जा सकती है जिसने 100 वर्ष के अन्दर ही विश्व के अनेकों लोगों को अपने में समाहित कर लिया। 

यह सब समय की रफ्तार में “परिवर्तन के प्रमाण” हैं जो सूचित करते हैं कि लम्बे परिवर्तन चक्र अब छोटे में सिमट-सिकुड़ रहे हैं।

500 वर्ष पूर्व का यदि कोई व्यक्ति आज की इन बदली परिस्थितियों को देखे, तो उसे यही लगेगा कि वह किसी नई जगह,नई नगरी में पहुँच गया है जहाँ मनुष्य को तथाकथित ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त हो गई हैं। विद्युत से लेकर, टैलीकम्युनिकेशन, कम्प्यूटर आदि ने धरती पर चमत्कारी परिवर्तन कर दिखाए हैं। ऐसा लगता है “मानवी बुद्धिमत्ता (Human intelligence)” अपनी पराकाष्ठा (Climax)  तक पहुँच चुकी है, जहाँ शॉर्प बुद्धि एवं तीव्र स्पीड के सहारे कुछ भी किया जा सकता है। यह भी सही है कि यह गतिशीलता आने वाले समय में घटेगी नहीं बल्कि और भी तेज़ी से बढ़ेगी और कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं रह पाएगा। विज्ञान और बुद्धि दोनों ही परिवर्तन के  प्रभाव क्षेत्र में आ जाएँगे। 

जिन पंक्तियों को  पाठक इस समय पढ़ रहे हैं उन्हें हमारे गुरुदेव ने 1988-1990 के मात्र दो वर्ष के समय में रचे गए क्रन्तिधर्मी साहित्य के अंतर्गत लिखा था। पिछले 36 (1990 से 2026 तक जब यह लेख लिखा जा रहा है) वर्षों में क्या-क्या परिवर्तन हुए हैं, किसी से भी छिपे नहीं हैं।  

परम पूज्य गुरुदेव ने लिखा था कि रीति-रिवाजों और गतिविधियों में न सिर्फ क्रान्तिकारी परिवर्तन होंगे बल्कि उसी क्रान्तिकारी ढंग से वे अपनाए भी जाएँगे। इस महान परिवर्तन का आधार इन्हीं दिनों खड़ा हो रहा है। इसे परोक्ष दृष्टि से मनीषीगण देख भी रहे हैं व पूर्वानुमान के आधार पर उस सम्भावना की अभिव्यक्ति भी कर रहे हैं।

पिछले दिनों कितने ही भविष्यवक्ताओं, अदृश्यदर्शियों, धर्म-ग्रन्थों की भविष्यवाणियाँ-चेतावनियाँ सामने आती रही हैं। इन सब ने आने वाले समय को संकटों व नवयुग की सम्भावनाओं से परिपूर्ण बताया है। 

ईसाई धर्म में ‘‘सेवन टाइम्स’’, इस्लाम धर्म में ‘‘हिजरी’’ की चौदहवीं सदी इन सब की संगति प्राय: 20वीं  सदी के समापन काल के साथ बैठती है। वर्तमान में प्रकृति प्रकोपों के रूप में घटित होने वाली विभीषिकाओं की संगति भी ईश्वरीय दण्ड प्रक्रिया के साथ कुछ सीमा तक बैठ जाती है। अस्तु, 20वीं  और 21वीं  सदी के सन्धिकाल में विपत्ति भरा वातावरण दिख पड़े तो इसे अप्रत्याशित (Unexpected) नहीं समझना चाहिए। ऐसे में सृजन सम्भावनाएँ भी साथ-साथ गतिशील होती दिखें, तो उन्हेें भी धोखा  न मानकर यह समझना चाहिए कि “ध्वंस और  सृजन, सन्धिवेला की दो अनिवार्य प्रक्रियाएँ हैं”, जो साथ-साथ चलती हैं।

20वीं और 21वीं सदी के संधिकाल में 1990 से 2000 के 10 वर्ष और 2000 से 2010 के 10 वर्ष शामिल हैं। इस प्रकार संधिकाल में  टोटल 20 वर्ष बनते हैं। यह मानव इतिहास का सबसे परिवर्तनकारी दौर था। इस समय इंटरनेट क्रांति, वैश्वीकरण और सोवियत संघ के विघटन ने वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और प्रौद्योगिकी की दिशा हमेशा के लिए बदल दी।

इन 20 वर्षों में हुए सभी दृश्य एवं अदृश्य परिवर्तनों को देख पाना शायद मानवीय आँख के लिए संभव न हो लेकिन कुछ एक जिन्हें हम में से बहुतों ने देखा है, निम्नलिखित लिस्ट किये गए हैं:

  • सोवियत संघ का विघटन (1991): शीत युद्ध की समाप्ति और 15 नए देशों के उदय के साथ दुनिया एकध्रुवीय (अमेरिका के नेतृत्व वाली Unipolar world) व्यवस्था में बदल गई।
  • इंटरनेट और वर्ल्ड वाइड वेब (www) का उदय (1990-1991): टिम बर्नर्स-ली द्वारा www  की शुरुआत ने सूचना क्रांति का सूत्रपात किया, जिसने वैश्विक संचार और अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से डिजिटल कर दिया।
  • वैश्वीकरण (Globalization) की शुरुआत: व्यापार बाधाएं कम हुईं, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विस्तार हुआ और दुनिया एक “वैश्विक गाँव (Global village)” में तब्दील होने लगी।
  • 9/11 आतंकी हमले (2001): अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमलों ने वैश्विक सुरक्षा नीतियों, अंतरराष्ट्रीय यात्रा नियमों और आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध की नींव रखी।
  • यूरो मुद्रा की शुरुआत (1999-2002): यूरोपीय देशों ने अपनी साझा मुद्रा Euro € को अपनाकर आर्थिक एकीकरण का एक ऐतिहासिक कदम उठाया।
  • मानव जीनोम परियोजना (1990-2003): चिकित्सा और विज्ञान के क्षेत्र में मानव डीएनए के अनुक्रमण (sequencing) की इस महात्वाकांक्षी परियोजना ने आधुनिक बायोटेक (Modern biotechnology की नींव रखी।
  • य2के (Y2K) बग समस्या (1999-2000): कंप्यूटर प्रोग्रामिंग की एक बड़ी तकनीकी चुनौती जब उत्तरी अमेरिका में सब कुछ कुछ समय के लिए सब कुछ ठप्प हो गया था। हमें स्मरण आता है कि हमारे पास किसी ने अमेरिका से किसी मीटिंग के लिए आना था, संचार व्यवस्था ठप्प होने के कारण हम तो उनके आने की आशा छोड़ चुके थे लेकिन जब वोह हमारी बिल्डिंग के 14वें फ्लोर पर सीढ़ियों से चढ़कर (एलीवेटर बंद था) आ गए थे हमें बड़ी हैरानी हुई थी। इस समस्या को  दुनिया भर के इंजीनियरों ने मिलकर समय रहते सुलझाया और वैश्विक तकनीकी पतन को रोका।

यह घटनाएं वर्ष 2000 के आरम्भ की कुछ एक घटनाएं ही  हैं, उसके बाद के वर्षों में ( 2026 तक) क्या कुछ घटित हुआ,उसका भी व्यौरा दिया जा सकता है लेकिन इस वृतांत का यहीं पर समापन करना उचित रहेगा। 

जय गुरुदेव  


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