ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से “क्रांतिधर्मी साहित्य” के दिव्य कंटेंट का अध्ययन करना,उसे समझना,सरल करना और फिर अपने साथिओ के समक्ष प्रस्तुत करना एक चुनौती भरा साहस है। परम पूज्य गुरुदेव हाथ पकड़कर इस साहस की पूर्ति करा रहे हैं,ऐसा हमारा पूर्ण विश्वास है। आज इस प्रयास का तीसरा ज्ञानप्रसाद लेख प्रस्तुत किया गया है जो कल वाले लेख का ही एक्सटेंशन है। कल वाले लेख का सन्देश था कि नियति के अदृश्य कण्ट्रोल का बार-बार प्रकाट्य होता दिख रहा है, उलटे को उलट का सीधा करना बहुत ही ज़रूरी है। मनुष्य की बुद्धिमता एवं अज्ञानता तो विश्व को बारूद के ढेर पर लेकर बैठी हुई है लेकिन माँ प्रकृति अपने बच्चों का विनाश कैसे सहन करेगी। पूत कपूत सुने हैं बहुतेरे पर माता नहीं कुमाता।
प्रस्तुत किए जा रहे कंटेंट को गुरुदेव ने मक्खन की संज्ञा दी है इसी कारण इस मंच से साथिओं को विश्वास दिलाया जा रहा है कि भले ही चारों तरफ नकारात्मक शक्तियों का बोलबाला है लेकिन गायत्री परिवार एवं अनेकों अन्य प्रयासों से सकारात्मक प्रयास भी कम नहीं हो रहे। कृपया चश्मे का रंग बदल लीजिये सब कुछ बदला हुआ ही दिखेगा।
इसी सकारात्मक सन्देश के साथ,ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा में,गुरुचरणों में समर्पित होकर गुरुज्ञान के अमृतपान में सभी साथिओं का स्वागत है।
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Newton’s third law of motion के अनुसार क्रिया की प्रतिक्रिया (Action-reaction) होना सुनिश्चित है। घड़ी का पेंडुलम एक सिरे तक पहुँचने के बाद वापस दूसरे सिरे की ओर लौटता ही है। अति करने वालों का पछताना सुनिश्चित है, सही स्थिति प्राप्त करने के लिए उन्हें तरसते देखा गया है । विषैले पदार्थ खा बैठने पर उल्टी-दस्त तो लगते ही हैं, जान जोखिम तक का खतरा भी सामने आ खड़ा होता है। क्रोधी को बदले में प्रतिशोध सहना पड़ता है। दुर्व्यसनी अपनी सेहत, खुशहाली और इज्जत तीनों ही गँवा बैठता है। अपव्ययी लोग तंगी भुगतते देखे गये हैं। कुकर्मी, लोक और परलोक दोनों ही बिगाड़ लेते हैं। इसके विपरीत परिश्रमी, अनुशासित और मनोयोगपूर्वक व्यस्त रहने वाले अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति में दिन-रात सफल होते चले जाते हैं।
जिन दिनों “शक्तियों के सदुपयोग” का प्रचलन था, उन दिनों साधारण साधनों के रहते हुए भी लोग प्रसन्न रहते और सुख-शान्ति भरे वातावरण में जीवन-यापन करते थे। सतयुग वही काल था, जिसकी सराहना करते-करते इतिहासकार अभी भी नहीं थकते हैं। इसके विपरीत यदि मर्यादाओं और वर्जनाओं का परित्याग कर अनाचारी-उद्दण्ड उपक्रम अपनाया जाए, तो ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होना स्वाभाविक है, जिनकी कलियुग के नाम से निंदा की जाती है। यह एक ऐसा समय होता है जब प्रचुर साधन होते हुए भी लोग डरती-डराती, जलती-जलाती जिन्दगी जीते हैं।
इन दिनों ऐसा ही कुछ हो रहा है। विज्ञान ने मनुष्य को अतिशय शक्ति का स्वामी बनाया है। बुद्धि और वैभव ने इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी के माध्यम से जानकारियों के अम्बार जुटा लिए हैं। ऐशो-आराम, भोग-विलास के साधनों की कमी नहीं। साज-सज्जा को देख कर भ्रम होता है कि कहीं हम लोग स्वर्ग में विचरण तो नहीं कर रहे हैं। इतना ही पर्याप्त होता तो सचमुच यही माना जाता कि इन शताब्दियों में असाधारण प्रगति हुई है, लेकिन जब लिफाफे का कलेवर खोल कर देखा जाता है तो दुर्गन्ध भरे विषाणुओं, जीवाणुओं से भरे अंतःकरण के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं।
हर कोई इतना डरा हुआ,बेचैन, अपसेट क्यों है ?
इसका एकमात्र कारण यही है कि जिन 15 (और भी अनेकों) मानवीय मूल्यों का इस मंच से बार-बार प्रचार किया जाता है,स्मरण कराया जाता है, उन्हें आज का अधिकतर मानव भूल चुका है।
भौतिकता कुछ अल्प समय के लिए पेट की भूख तो शांत कर सकती है,आत्मा की भूख को शांत करने के लिए केवल एक ही विकल्प है और वोह है सत्साहित्य,सद्ज्ञान, सत्संग। यह तीनों का Three-in-one,एक ही विकल्प है-प्रतिदिन प्रसारित होने वाला ज्ञानप्रसाद।
विज्ञान और धर्म यदि मिलकर चले होते, तो आज की उपलब्धियाँ व्यक्ति और समाज के सामने सुख-शान्ति के ऐसे आधार खड़े कर देती, जो सतयुग की तुलना में कहीं अधिक बढ़े-चढ़े होते। आज के मानव का दुर्भाग्य है कि उसके पास बुद्धि तो इस स्तर की है उसने दुरूपयोग और सदुपयोग की रेखा को ही मिटा दिया है
तेजी से बदलता अप्रतक्ष्य जगत का प्रवाह
मनुष्य अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए कह तो सकता है कि तुझे पता नहीं कि मैं क्या कुछ कर सकता हूँ लेकिन शायद उसे इस बात का ज्ञान ही नहीं है कि ईश्वर के न्याय से, कर्मफल से ईश्वर स्वयं भी नहीं बच सकता, तू किस खेत की मूली है?
शक्ति के दुरुपयोग का परिणाम गली-मुहल्लों से लेकर अंतराष्ट्रीय स्तर पर देखा जा रहा है। सम्पन्नों और विपन्नों के बीच शीत युद्ध छिड़ा हुआ है। घात-प्रतिघात के कुचक्र में फँस कर मनुष्य ने सन्तोष, उल्लास और सहयोग गँवा दिया है। ऐसे वातावरण में व्यक्तियों का विकृत और समाज का पतन होना स्वाभाविक है।
ऐसी स्थिति में सार्वभौम सन्तुलन कितना संभव है सभी जानते हैं !!! वायु प्रदूषण, अहंकार, अनाचार अपने-अपने ढंग से, अपने द्वारा किये जाने वाले महाविनाशों की चेतावनी दे रहे हैं। वर्तमान ही इतना उलझा हुआ है तो भविष्य क्या होगा? एक समस्या का हल ढूँढ़ते-ढूँढ़ते दस और नई विपन्नताएँ बढ़े-चढ़े रूप में सामने आ खड़ी होती हैं। सहयोग के स्थान पर संघर्ष ही, स्वभाव और प्रचलन का अंग बनता जा रहा है।
ऐसे माहौल में सूक्ष्म वातावरण भी विषाक्त हो चला है लेकिन क्या प्रकृति चुपचाप बैठी,इस विनाश को देखती रहेगी? कदापि नहीं। पूत कपूत सुने बहुतेरे पर माता नहीं कुमाता।
प्रकृति अपने ऊपर किए जा रहे बलात्कार का उपयुक्त दण्ड देने, प्रतिशोध लेने,अपनी संतान को बचाने पर उतारू हो गई है। आए दिन दुर्भिक्ष पड़ता है। बाढ़, भूकम्प, रोग-शोक के ऐसे घटनाक्रम आए दिन घटित होते रहते हैं। माता की तरह पोषण करने वाली प्रकृति अब मरने-मारने पर उतारू हो गई है। अणु-आयुधों, मृत्यु किरणों और विषैले रसायनों के प्रहार चल पड़ने के उपरान्त इस धरती को निस्तब्ध पिण्ड के रूप में बने रहने का अवसर मिलेगा या नहीं, इसमें सन्देह होता है। लगता है कि हर दिशा में उमड़ने वाले विनाश के बादल कहीं महाप्रलय तो करने नहीं जा रहे हैं? यह भी तो हो सकता है कि उन असह्य प्रहारों से यह सुन्दर ग्रह (पृथ्वी) कहीं धूल बनकर अनन्त आकाश में न छितरा जाए और इसके अस्तित्व का कहीं अता-पता भी शेष न रहे।
साधारण अनुभव में पृथ्वी भी स्थिर दिखाई पड़ती है किन्तु लक्षणों का एनालिसिस कर सकने वाले देख रहे हैं कि स्थिति विस्फोटक है और बारूद के ढेर पर बैठा मानव निकट भविष्य में महाविनाश का ग्रास बनने जा रहा है।
लेकिन हमारा टॉपिक तो उज्जवल भविष्य की बात कर रहा है, वोह कैसे सम्भव होगा?
20वीं सदी (1901 से 2000 तक का समय) इन दुर्दशाओं के बीच होगा, इसकी चेतावनी विशेषज्ञों से लेकर भविष्यवक्ता तक समान रूप से देते रहे हैं। विकास के नाम पर कितना विनाश हुआ हम वरिष्ठों ने तो देखा ही है और देख भी रहे हैं। हाइवेज के नाम पर प्राकृतिक सम्पदाओं का सफाया हो रहा है, पृथ्वी के खनिज भण्डारों की समस्या,धन और ऐश्वर्य के लोभी मातृभूमि को छोड़ देश विदेशों की खाक छाँट रहे हैं। इस भागदौड़ में जीवनी शक्ति गँवा बैठने के कारण Immune system कमज़ोर हो रहा है। सद्भाव और सहयोग के अभाव में लोग प्रेत-पिशाच से अधिक कुछ भी नहीं, भले ही उनके पास सज्जा और सम्पदा कितनी अधिक क्यों न हो?
सन्तुलन नियन्ता की व्यवस्था का एक क्रम
लेकिन हम सब पाठकों को एक बात बड़े ही ध्यानपूर्वक समझ लेनी चाहिए कि इस सृष्टि का भी कोई नियन्ता है हुए वह कभी भी असंतुलन नहीं होने देगा। संतुलन प्रकृति की व्यवस्था का शाश्वत नियम है। नियन्ता ने ही तो अपनी समग्र कलाकारिता को बटोर कर इस धरती को, उस पर शासन करने वाले मनुष्य को बनाया है। वह उसका इस प्रकार विनाश होते नहीं देख सकता। बच्चों को एक सीमा तक ही मस्ती करने की छूट दी जाती है। जब भी वे उपयोगी और कीमती चीजें तोड़ने पर उतारू हो जाते हैं, तो उन्हें दुलार करने वाले अभिभावक भी ताड़ना देने पर उतारू हो जाते हैं। भटकने की भी एक सीमा है। समझदारी सावधान करती है कि पीछे लौट चला जाए। उलट कर उलटे राह से पीछे मुड़ जाया जाए, इसी में समझदारी है। अनाचारियों को अति उद्दण्डता से पहले ही जेल में बन्द कर दिया जाता है। कभी-कभी तो उन्हें मृत्यु दण्ड तक देना पड़ता है। शरीर में प्रवेश करने वाली बीमारियों को खदेड़ देने के लिए जीवनी शक्ति एकत्रित होकर सब कुछ करने पर उतारू हो जाती है। वर्तमान अनाचार के सम्बन्ध में भी यही बात है।
नियन्ता ने सामयिक निश्चय लिया है कि विनाश की दिशा में चल रही अन्धी दौड़ को रोक दिया जाए और फिर प्रवाह को सन्तुलित स्तर पर लाया जाए। शासन संचालन जब अयोग्यता प्रदर्शित करता है, तो राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाता है और अयोग्यों के स्थान पर सुयोग्यों के हाथ में सत्ता सौंप दी जाती है,तभी उच्चस्तरीय नियंत्रण चलता है।
अन्धकार की भयानकता और उसके कारण उत्पन्न होने वाली अव्यवस्था से हम सभी परिचित हैं लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखने योग्य है कि सृष्टि व्यवस्था उसे अधिक समय तक सहन नहीं करती। ब्रह्ममुहूर्त आते ही मुर्गा बाँग देता है, उषाकाल का आभास मिलता है, जो अपने आलोक से दसों दिशाएँ भर देता हैं। हलचलों का नया माहौल बनता है, यहाँ तक कि फूल खिलने, पक्षी चहकने, उड़ने-फुदकने लगते हैं।
वर्तमान प्रवाह को चरम विनाश के बिन्दु तक जा पहुँचने से पहले ही स्रष्टा ने उस पर रोक लगाने और परिवर्तन का नया माहौल बनाने का निश्चय किया है। इसका अनुमान सभी सूक्ष्मदर्शी समान रूप से लगाने लगे हैं। नई सोच,नए विचार आरम्भ हो रहे हैं, दृष्टिकोण की दिशा बदल रही है । गतिविधियों के नये निर्धारण की योजनाएँ बन रही हैं। यह परिवर्तन मनुष्यों के मूर्धन्य क्षेत्रों में तो चल ही रहा है लेकिन ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का एक-एक सदस्य भी अपनी भूमिका बड़ी ही गंभीरता से निभा रहा है। व्यापक वातावरण पर नियंत्रण करने वाली अदृश्य शक्तियाँ अपने ढंग से अपने क्षेत्र में ऐसा कुछ चमत्कार दिखाने पर तुल गई हैं, जो अवाँछनीय प्रचलनों को उलटने और उनके स्थान पर नये मूल्यों-कीर्तिमानों की स्थापना कर पाने में सफल हो सके।
समय की गति, मनुष्य की प्रचण्ड पुरुषार्थ परायणता के कारण अत्यधिक तेज हो गई है। जो सृष्टि के आदि से अब तक नहीं बन पड़ा था, वह पिछली थोड़ी सी शताब्दियों में ही आश्चर्यजनक ढंग से बन पड़ा है। भले ही वह अवाँछनीय या बुरा ही क्यों न हो। समय की चाल तेज हो जाने पर घण्टे में तीन मील चलने वाला व्यक्ति वायुयान में चढ़कर उतनी ही देर में कहीं से कहीं जा पहुँचता है। मनुष्य के प्रबल पुरुषार्थ की ऊर्जा से समय-प्रवाह में अतिशय तेजी आई है। उसने जो भी भला बुरा किया है, तेजी से किया है। यह द्रुतगामिता आगे भी जारी रहेगी। सुधारक्रम भी उतनी ही तेजी से होगा। तूफान जिस भी दिशा में मुड़ता है, उसी में अपनी प्रचण्डता का परिचय देता चलता है।
हर बात की एक सीमा होती है, रावण, कंस, हिरण्यकश्यपु, वृत्रासुर आदि भी जिस तेजी से उभरे थे उसी गति से उनका अन्त भी हो गया। पानी में बुलबुले जिस तेज़ी तेजी से उठते हैं और उसी तेज़ी से वे तिरोहित भी हो जाते हैं। फसल पकती है,कटाई के बाद उसी जगह नई उगाई जाती है। जर्जर शरीर मरते और नया जन्म धारण करते हैं। खण्डहरों के स्थान पर नई इमारतें खड़ी होती हैं। इसी क्रम के अनुसार अवाँछनीयताओं का माहौल अब 21वीं शताब्दी में समाप्त होने ही जा रहा है और उसका स्थान सच्चे अर्थों वाली प्रगतिशीलता ग्रहण करेगी। लंका दहन के साथ ही रामराज्य का अवतरण भी जुड़ा हुआ था। वही इस बार भी होने जा रहा है।
सोमवार को अगला ज्ञानप्रसाद लेख प्रस्तुत होगा।
जय गुरुदेव
