ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से “क्रांतिधर्मी साहित्य” के दिव्य कंटेंट का अध्ययन करना,उसे समझना,सरल करना और फिर अपने साथिओ के समक्ष प्रस्तुत करना एक चुनौती भरा साहस है। परम पूज्य गुरुदेव हाथ पकड़कर इस साहस की पूर्ति करा रहे हैं,ऐसा हमें पूर्ण विश्वास है। आज इस प्रयास का दूसरा ज्ञानप्रसाद लेख प्रस्तुत किया गया है जिसमें नियति के अदृश्य कण्ट्रोल का बार-बार प्रकाट्य होता दिख रहा है। मनुष्य की बुद्धिमता एवं अज्ञानता तो विश्व को बारूद के ढेर पर लेकर बैठी हुई है लेकिन विधाता इस विनाश को होने देंगें क्या? उन्होंने ने तो 21वीं सदी को उज्जवल की गंगोत्री कह दिया है, साथिओं विश्वास रखें चारों तरफ नकारात्मक शक्तियों का अवश्य ही बोलबाला है लेकिन गायत्री परिवार एवं अनेकों अन्य प्रयासों से सकारात्मक प्रयास भी कम नहीं हो रहे। कृपया चश्मे का रंग बदल लीजिये सब कुछ बदला हुआ ही दिखेगा।
इसी सकारात्मक सन्देश के साथ,ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा में,गुरुचरणों में समर्पित होकर गुरुज्ञान के अमृतपान में सभी साथिओं का स्वागत है।
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समस्त विश्व के आधे प्रतिभाशाली लोग युद्ध उद्देश्यों के निमित्त किये जाने वाले उद्योगों में प्रकारान्तर से लगे हैं। पूँजी और इमारतें भी इसी प्रयोजन के लिए घिरी हुई हैं। अनेकों के चिन्तन और कौशल भी इसी का ताना-बाना बुनने में उलझे रहते हैं। इस समूचे तंत्र का उपयोग यदि युद्ध में ही हुआ तो समझना चाहिए कि परमाणु हथियार धरती का महाविनाश करके रख देंगे। तब यहाँ जीवन नाम की कोई वस्तु शेष नहीं रहेगी। यदि युद्ध न भी होता है, तो दूसरी तरह का नया संकट खड़ा होगा। जो उत्पादन हो चुका है, उसका क्या किया जाए? जन-शक्ति,धन-शक्ति और साधन-शक्ति इस प्रयोजन में लगी है, उसे उलट कर नये क्रम में लगाने की विकट समस्या को असम्भव से सम्भव कैसे बनाया जाए?।
ऐसी तथाकथित प्रगतियों के पीछे मनुष्य का उल्टा चिन्तन, संकीर्ण स्वार्थ,अनाचारी स्वभाव ही है। इन सबसे मिलकर मानव का प्रेत-पिशाच बनना स्वाभाविक है।
इस सबका समापन किस प्रकार बन पड़ेगा? इन्हीं परिस्थितियों में रहते, अगले दिनों क्या कुछ बन पड़ेगा? इस चिन्ता से हर विचारशील,संवेदनशील व्यक्ति का किंकर्तव्यविमूढ़ होना स्वाभाविक है।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के अधिकतर साथी संवेदनशील हैं, वर्तमान स्थिति को देखते हुए चिंताग्रस्त होना स्वाभाविक है, कैसे होगी विचारों की क्रांति? कैसे होगा धरती पर स्वर्ग का अवतरण? कैसे होगा मनुष्य में देवत्व का उदय
अपने बच्चों को इस तरह निरुत्साहित देख कर हमारे गुरुदेव बता रहे हैं कि यदि मनुष्य की प्रतिभा का सदुपयोग बन पड़े, तो परिवर्तन सम्भव है।
मनुष्य जिन अनन्त शक्तियों का भण्डार है, उनका बहुत ही थोड़ा सा अंश खर्च हो पाता है। शेष शक्ति प्रसुप्त मूर्छित स्थिति में पड़ी रहती है। इस मूर्छित शक्ति को जगाने का कार्य ही विचारक्रांति के अंतर्गत आता है। विशेषकर शक्ति से भरी युवा पीढ़ी के विचारों में परिवर्तन आ जाए,उसका सदुपयोग हो जाए तो क्या नहीं हो सकता। जब मनुष्य का उत्साह उभरता है,तत्परता, लगन, स्फूर्ति और गहराई तक उतरने की ललक, अपने जादुई चमत्कार दिखाने लगती है, व्यक्ति कहीं से कहीं जा पहुँचता है और साधारण परिस्थितियों में भी ऐसा कुछ कर दिखाने लगता है, जिनसे आश्चर्यचकित हुआ जा सके।
इसी तरह के चमत्कार इस ज्ञानरथ परिवार में आये दिन देखने को मिल रहे हैं। ज्ञानप्रसाद लेखों के प्रति साथिओं की निष्ठा एवं कमैंट्स के माध्यम से उनके अंतर्मन की आवाज़ सच में चमत्कारिक हैं।
आये दिन आत्मशक्ति एवं आत्मपरिष्कार के उदाहरण मिलते रहते हैं। शक्ति जहाँ भी प्रयोग होती है,परिणाम दिखाए बिना नहीं रहती। भौतिक प्रगति की दिशा में मनुष्य का रुझान जुड़ा,अन्वेषण चले तो उसने प्रत्यक्षवाद के पुराने ढाँचे को एक नवीन फिलोसॉफी के रूप में गढ़कर तैयार कर दिया। नई शक्ति एवं स्फूर्ति के साथ जब नवीनता उभरती है, तो उसका परिणाम भी असाधारण होता है। प्रगति के नाम पर बढ़ा-चढ़ा भौतिकवाद और प्रत्यक्षवाद संसार के सामने आया और उसने जन-जन को प्रभावित किया। तरह-तरह के आविष्कारों ने सुविधा-साधनों के अम्बार जमा कर लिए। बुद्धिमत्ता के नाम पर इतनी अधिक जानकारियाँ एकत्रित कर ली गईं, जो मनुष्य को अहंकारी बनाने के लिए पर्याप्त थीं।
रिसर्च एवं खोजों को कभी भी किसी ने नकारा नहीं है लेकिन देखने की बात यह है कि रिसर्च से प्राप्त होने वाले उत्पादों का सदुपयोग हो रहा है यां दुरुपयोग। सदुपयोग और दुरूपयोग का चयन कौन करेगा? स्वाभाविक है मनुष्य !!!! लेकिन यदि मनुष्य की प्रवृति विनाशकारी ही है तो उसे बारूद के ढेर पर ही बैठना पड़ेगा -यही है हमारे गुरुदेव का विचारक्रांति अभियान। इसी अभियान के अंतर्गत विचारों का परिष्कार हो रहा है।
गुरुदेव हमें सावधान करते हुए बता रहे हैं कि जब भी स्वार्थपरता और अदूरदर्शिता का समन्वय होता है तो एक ही बात सूझ पड़ती है कि जो कुछ जितना जल्दी बटोरा जा सके बटोर लिया जाए, इसके लिए चाहे कितने ही उलटे काम क्यों न करने पड़ें। उतावले, बचकाने व्यक्ति यही करते हैं। वे उपलब्धियों को धैर्यपूर्वक सत्प्रयोजनों में खर्च कर सकने की स्थिति में ही नहीं होते। “सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी” वाला उदाहरण ऐसे लोगों के लिए दिया जा सकता है।
साधनों के सदुपयोग से अपना और दूसरों का हित साधन किया जा सकता है लेकिन जब उसी का दुरुपयोग होने लगता है, तो एक माचिस की तीली से सारा गाँव जल जाने जैसा अनर्थ उत्पन्न होता है।
प्रगतिशील शताब्दियों में पाया तो बहुत कुछ है लेकिन दूरदर्शिता के अभाव में उसका सदुपयोग न बन पड़ा और उपयोग ऐसा हुआ, जिससे आज हर दिशा में संकटों के घटाटोप गहरा रहे हैं। शासकों और धनाढ्यों के हित को प्राथमिकता न मिली होती, तो वैज्ञानिक उपलब्धियों ने जन-साधारण का स्तर कहीं से कहीं पहुँचा दिया होता। परिणाम यह होता कि हर कहीं खुशहाली होती। कोई बेकार न रहा होता और किसी को यह कहने का अवसर न मिला होता कि निजी व्यक्तित्व के विकास एवं समाज के बहुमुखी उत्कर्ष में योगदान करने का अवसर नहीं मिला लेकिन दुरुपयोग तो दुरुपयोग है, उसके कारण अमृत भी विष बन जाता है। बड़े शहर बसाने और बढ़ाने में लगी हुई बुद्धिमत्ता यदि अपनी योजनाओं को ग्रामोन्मुखी बना देने की दिशा में मुड़ गई होतीं तो अब तक सर्वत्र छोटे-छोटे स्वावलम्बी और फलते-फूलते कस्बे ही दिखाई पड़ते। न शहरों को घिचपिच, गन्दगी तथा विकृतियों का भार वहन करना पड़ता और न गाँवों से प्रतिभा पलायन होते जाने के कारण, उन्हें गई गुजरी स्थिति में रहने के लिए बाधित होना पड़ता। हमारे पाठकों को स्मरण होगा कि उत्तराखंड के Ghost villages (Zero population villages) की बात इसी मंच पर हुई थी।
युद्धों को निजी या सार्वजनिक क्षेत्रों में समान रूप से अपराध घोषित किया जाता। छोटी पंचायतों की तरह अन्तर्राष्ट्रीय पंचायतें (United nations आदि) भी विवादों को सुलझाया करतीं। आयुध सीमित मात्रा में पुलिस या अन्तर्राष्ट्रीय पंचायतों के पास ही रहते, तो युद्ध सामग्री बनाने में विशाल धनशक्ति और जनशक्ति लगाने के लिए वैसा कुछ न बन पड़ता, जैसा कि वर्षों से हो रहा है। यह जनशक्ति और धनशक्ति यदि शिक्षा सम्वर्धन, उद्योगों के संचालन, वृक्षारोपण आदि उपयोगी कामों में लगी होती, तो युद्ध के निमित्त लगी हुई शक्ति को सृजन कार्य में नियोजित करके इतना कुछ प्राप्त कर लिया गया होता, जो अद्भुत और असाधारण होता।
शिक्षा का प्रयोजन अफसर या क्लर्क बनना न रहा होता और उसे जनजीवन तथा समाज व्यवस्था के व्यावहारिक पक्षों के समाधान में प्रयुक्त किया गया होता, तो सभी शिक्षित, सभ्य, सुसंस्कृत होते और अपनी समर्थता का ऐसा उपयोग करते, जिससे सर्वत्र विकास और उल्लास बिखरा-बिखरा फिरता। हर शिक्षित को दो अशिक्षितों को साक्षर बनाने के उपरान्त ही यदि किसी बड़ी नियुक्ति के योग्य होने का प्रमाण पत्र मिलता, तो अब तक अशिक्षा की समस्या का समाधान हो गया होता। उद्योगों का प्रशिक्षण भी विद्यालयों के साथ अनिवार्यतः जुड़ा होता तो बेकारी,गरीबी की कहीं किसी को शिकायत न पड़ती
समाधान इस प्रकार भी सम्भव था
बुद्धि के धनी भी एक प्रकार के वैज्ञानिक हैं। शासन और समाज के विभिन्न तंत्र उन्हीं के संकेतों तथा दबाव से चलते हैं। यदि सामाजिक कुरीतियों और वैयक्तिक अनाचारों के विरुद्ध ऐसी बाड़ बनाई गई होती, जो उनके लिए अवसर ही न छोड़ती, तो जो शक्ति बर्बादी में लगी हुई है, उसे सत्प्रयोजनों में नियोजित देखा जाता। अपराधों का, अनाचारों का कहीं दृश्य भी देखने को न मिलता। इन शताब्दियों में हुई बौद्धिक और वैज्ञानिक प्रगति को हर कोई सराहता और उसके सदुपयोग से धरती का कण-कण धन्य हो गया होता।
सभी जानते हैं कि ऊपर चढ़ना धीमी गति से ही सम्भव हो पाता है। इसके उल्ट यदि पतन के गर्त में गिरना हो तो क्षणों में बहुत नीचे पहुँचा जा सकता है। चारों और खोखली ठाट-बाट की चकाचौंध से मनुष्य बेतरह से खोखला हो गया है। ऐसे लोगों की देखादेखी जिनके पास अल्प साधन हैं उन्हें भी अमीर बनने की चिंता खाती रहती है । कैसी विडंबना है कि सब कुछ होते हुए भी, किसी को चैन नहीं, कोई सन्तुष्ट नहीं दिखता। इसका मुख्य कारण आंतरिक असंतुष्टि है। भौतिकता कहाँ किसी की अंतरात्मा को सुख दे पाई है। मानसिक दरिद्रता के रहते, विस्तृत वैभव, बेचैनी बढ़ाने का निमित्त कारण रहता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य अधिकतर निराश ही रहता है। समय आने पर यह निराशा मनुष्य की मानसिकता ही बन जाती है जो अपनेआप में ही बहुत बड़ा संकट है। ऐसी स्थिति में मनोबल टूटता है जो उत्साह में बहुत बड़ा स्पीड ब्रेकर बनता है।
यहाँ एक बात समझने वाली है कि सृजन के लिए प्रयास कभी भी बंद नहीं हुए। उज्जवल भविष्य के लिए वर्तमान सुधार के अनेकों प्रयास सदैव ही किये जाते रहे, प्रयासों में शिथिलता भले ही हो लेकिन उनका अभाव कभी भी न रहा।
गुरुदेव का उत्साहवर्धक सन्देश कि यदि मनुष्य का हौसला बुलन्द हो, तो प्रतिकूलताएँ होते हुए भी ऐसा कुछ किया जा सकता है, जिसे देखकर आश्चर्य होता रह सके। जब कई व्यक्ति मिलकर एक साथ वजन धकेलते हैं, तो उनकी संयुक्त शक्ति व मुँह से निकली हेईशा जैसी जादू भरी हुँकार बड़े-बड़े कीर्तिमान स्थापित करने में सक्षम होती है।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री सर विंस्टन चर्चिल ने द्वितीय विश्व युद्ध के दिनों में, हारते हुए ब्रिटेन वासियों का मनोबल बढ़ाने के लिए एक नारा दिया था ‘‘विक्ट्री’’ अर्थात जीतना हमें ही है, शत्रु चाहे कितना ही प्रबल क्यों न हो, इस संकेत सूत्र का इतना प्रचार हुआ कि यह सुनिश्चित विश्वास का, विजय का एक प्रतीक बन गया। इस हुँकार ने जादुई परिवर्तन कर दिखाया एवं युद्ध से ग्रसित यूरोप जागकर उठ खड़ा हुआ।
सुनिश्चित है कि लोगों की आस्थाओं को, युग के अनुरूप विचारधारा को स्वीकारने हेतु उचित मोड़ दिया जा सके तो कोई कारण नहीं कि सुखद भविष्य, का उज्ज्वल परिस्थितियों का जन्म सम्भव न हो सके।
यह प्रवाह बदल कर उलटे हुए को उलटकर सीधा बनाने की तरह भागीरथी कार्य है, किन्तु असम्भव नहीं, पूर्णतः सम्भव है।
जय गुरुदेव
