कल प्रस्तुत हुए ज्ञानप्रसाद लेख के अमृतपान के बाद कुछ कमेंट इतने विस्तृत थे कि लेखकों के प्रति हम नतमस्तक हुए बिना नहीं रह सकते। हमारी सबकी प्रिय बेटी संजना,समर्पित साथी चंद्रेश जी,नीरा जी,कोकिला जी, सुमनलता जी,रेणु श्रीवास्तव जी,संध्या जी,सुजाता जी और विदुषी जी ने इतने विस्तृत और ज्ञानवर्धक कमेंट किये कि हम किसी को भी रिप्लाई करने में असमर्थ रहे, सभी की सराहना में केवल इतना ही लिख पा रहे हैं कि एक-एक शब्द बड़े ही ध्यान, चिंतन और परिश्रम के साथ सोच-समझ कर लिखा गया है, एक-एक शब्द ज्ञान से ओतप्रोत है, बहुत बहुत धन्यवाद्।
कल पोस्ट हुए ज्ञानप्रसाद लेख से सम्बंधित एक और बात करना आवश्यक समझ रहे हैं। इस लेख के साथ अटैच की गयी लगभग 21 मिंट की वीडियो में युगपरिवर्तन से सम्बंधित जो चर्चा की गयी है हमारे तो सिर के ऊपर से ही निकल गयी थी, बार-बार देखने पर भी जितना समझ आया उससे यही सन्देश मिला कि अप्रैल 1998 की अखंड ज्योति (जिस पर यह वीडियो आधरित है) के एक एक लेख को ध्यानपूर्वक पढ़ा जाए, समझा जाए और समझने के बाद ही साथिओं के समक्ष एक विशेष लेख श्रृंखला प्रस्तुत की जाए ताकि युगपरिवर्तन के तथ्यों को समझा जाए। “इक्क्सवीं सदी बनाम उज्जवल भविष्य” को समझने के लिए युगपरिवर्तन को समझना बहुत आवश्यक है। अभी के लिए अखंड ज्योति के फ़रवरी 1998 अंक में प्रकाशित एक छोटे से लेख को समझकर काम चला लिया जाए, ऐसा हमारा विश्वास है। आज का ज्ञानप्रसाद लेख, अखंड ज्योति के इसी अंक पर आधरित है।
तो आइए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा में, गुरुचरणों में समर्पित होकर,आज के दिव्य गुरुज्ञान का अमृतपान करें,अपने गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करें।
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अखंड ज्योति का फ़रवरी 1998 का अंक “युगपरिवर्तन विशेषांक” था। इस अंक में युगपरिवर्तन से सम्बंधित अनेकों लेख प्रस्तुत हुए लेकिन जिस लेख ने हमें आकर्षित किया उसका शीर्षक था, “युगपरिवर्तन का क्या अर्थ है ?” यह एक ऐसा बेसिक प्रश्न है जिसे समझना बहुत ही महत्वपूर्ण है। जब हम युगपरिवर्तन की बात करते हैं तो क्या हमारा तात्पर्य त्रेता, द्वापर, सतयुग, कलयुग जैसे युगों से है? इन युगों की तो आयु ही लाखों वर्ष है। इस गणना के अनुसार,युगपरिवर्तन, युगनिर्माण जैसे शब्द बेमाने प्रतीत होते हैं? अगर लाखों वर्ष के बाद नया युग आना है तो युगनिर्माण के हमारे सारे प्रयास बेमाने से दिखते हैं। परम पूज्य गुरुदेव द्वारा दिया गया युगसंधि से सम्बंधित ज्ञान कुछ एक वर्षों की ही बात करता है।
इस गुत्थी को सुलझाने के लिए ही आज का लेख “क्रांतिधर्मी साहित्य” से प्राप्त हुए बेसिक ज्ञान को अखंड ज्योति के “युगपरिवर्तन अंक” के साथ जोड़कर बहुत ही संक्षिप्त शब्दों में प्रस्तुत किया गया है। परम पूज्य गुरुदेव के अनुसार “युगपरिवर्तन की परिभाषा” समझने का प्रयास किया गया है। युगपरिवर्तन का अर्थ है-आमूल चूल परिवर्तन(Complete overhaul), गुरुदेव कहते हैं कि जब छोटे-मोटे सुधारों और सामान्य परिवर्तनों से बात न बन पाए तो पूरे युग का ही बदलाव जरूरी हो जाता है। पिछले दिनों छुट-पुट सुधारों का सिलसिला काफी देर चलता रहा है। साम्यवादी (Communism) आन्दोलन ने अपने शुरुआती दौर में यह घोषणा बहुत जोरों से की थी कि संसार की समस्त कठिनाइयों को हम मिटा देंगे। उनका कहना था कि सारी परेशानियों की जड़ “धन की कमी” है। गरीब अपनी दो वक्त की रोटी के लिए ही दिन-रात कोल्हू के बैल की भांति काम करता रहेगा तो युगनिर्माण की बात कब करेगा? कम्युनिस्टों की धारणा थी कि “धन बढ़ेगा तो सारी कठिनाइयाँ भी अपनेआप ही समाप्त हो जाएँगी।” प्रगति के लिए आवश्यक है कि विकास के नए मार्ग निकाले जाएँ, उत्पादन बढ़े, नौकरी के नए एवं अतिरिक्त साधन प्राप्त हों लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जितना ध्यान उत्पादन और विकास पर दिया जाना चाहिए था, उतना दिया नहीं गया और धनवानों को ही गरीबी का कारण ठहराकर दो वर्गों ( अमीर-गरीब) में वर्गसंघर्ष (Class struggle) खड़ा कर दिया गया। इस वर्गसंघर्ष ने दुनिया में जो मार-काट मचाई, खून-खराबियाँ, अशान्ति फैलाई, वह जगविदित है, किसी से छिपी नहीं है।
पूँजीवादी (Capitalist) क्षेत्रों में भी दुनिया की परेशानियों-कठिनाइयों के निवारण के लिए प्रयत्न कम नहीं किए गए। वैज्ञानिकों ने इस निमित्त न केवल अनेकानेक आविष्कार किए, बल्कि वैभव और समृद्धि के लिए ढेरों नए आधार विनिर्मित किए। इसमें सफलता भी कम नहीं मिली। पूर्वजों की तुलना में आजकल की पीढ़ी कहीं अधिक समृद्ध है। सुविधा-साधनों की दृष्टि से देखा जाए तो आज की पीढ़ी के लोग इतने सौभाग्यशाली है, जितने सृष्टि के आरम्भ से लेकर इस शताब्दी के मध्यकाल में कभी नहीं रहे। यह बात अलग है कि इन सुविधा साधनों के संचय की ललक और उपभोग की लिप्सा की वजह से गरीबी अभी तक दूर नहीं हुई। यदि आज का मनुष्य संयम-पूर्वक, जितनी उसकी बेसिक ज़रुरत है, के सिद्धांत का पालन करे तो अथाह सम्पति,धन-दौलत का स्वामी है। हमारे गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी तो औसत भारतीय की बात करते हैं।
बढ़ते हुए मनोरोग (Psychiatric disorder ) और अपराध (Crime) यह बताते हैं कि बढ़ा हुआ वैभव भी व्यक्ति को सुखी और समुन्नत बनाने में कुछ अधिक कारगर सिद्ध नहीं हो पा रहा है। हाँ, इस वैभव को दिनोंदिन बढ़ाने में प्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन एवं पारिवारिक स्नेह, सौजन्य, सहयोग, सौहार्द घटते-घटते समाप्ति के बिन्दू तक जा पहुँचा है। एक बाड़े में रहने वाली भेड़ों की भांति कुटुंबों में अनेकों व्यक्ति रहते तो है,सभी एक-दूसरे पर प्यार और सहयोग उड़ेलने के स्थान पर अपनी-अपनी गोटी बिठाने में लगे रहते हैं। अभी कुछ ही वर्ष पहले Joint family system, जिसमें तीन पीढ़ियां एक साथ रहती थीं, लगभग ओझल हुआ ही दिखता है। परिवार-संस्था का टूटना-बिखरना इस शताब्दी की सबसे बड़ी त्रासदी बन गयी है। पति-पत्नी का रिश्ता एक प्राण दो देह माना जाता रहा है, किन्तु लगता है कि ऐसे सभी आदर्श समाप्त हो गए हैं; यह रिश्ते भी अब केवल गिफ्ट और गुलदस्ते देने तक ही सीमित रह गए हैं। पति-पत्नी सम्बन्ध यौनलिप्सा का ही आधार बन कर रह गया है, जिसकी वजह से दोनों एक-दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं। पति -पत्नी बेबी,बाबू के इसी प्रसंग में By chance, बच्चे भी पैदा हो जाते हैं। बच्चों के प्रति जो प्रकृति प्रदत्त माया-मोह होता है उसी सूत्र से भी पति-पत्नी किसी प्रकार बँधे (कुछ हद तक) ही रहते हैं। यदि यौन-आकर्षण और बच्चों का मोह हटा लिया जाय तो सहज सौजन्य से प्रेरित भाव-भरा दाम्पत्य जीवन कदाचित ही कहीं दृष्टिगोचर होता होगा। आज की पीढ़ी को शायद ही जानकारी हो कि “गृहस्थ जीवन का भावनात्मक आनन्द उच्चस्तरीय” होता है, इसकी अनुभूति ही नहीं, कल्पना भी वर्तमान युग के लोगों के हाथ से छिनती जा रही है।
परिवार की इस दुर्दशा की तरह, समाज का भी यही हाल है। समाज व्यवस्था का ढाँचा देखने से तो एक प्रकार के कागज से बने विशालकाय पुतले की तरह खड़ा है, लेकिन उसके भीतर खोखलेपन के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं है । संबंधियों के बीच किस प्रकार बुनने–उधेड़ने की दुरभिसन्धियाँ चलती है, उसे विवाह-शादियों में होने वाले लेन-देन को देखकर भली प्रकार समझा जा सकता है। भ्रष्टाचार,नशेबाजी, फैशनपरस्ती, विलासिता,धूर्तता, उच्छृंखलता जैसे प्रचलन आज के समाज की सभ्यता के अंग बन चुके हैं और सबसे बड़ी बात तो यह है कि हर कोई इसे accept भी करे जा रहा है। मार्किट में जो भी फैशन आता है, वोह आपके मन को भाता है कि नहीं, आपके शरीर पर सूट करता है कि नहीं इसकी कोई चिंता नहीं, केवल इसी की चिंता है कि समाज के साथ चलना है। समाज की चिंता करते-करते आज का मानव “समाज-रहित” हो चुका है लेकिन उसे समझ नहीं आ रही क्योंकि उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी है।
कहने को तो वर्तमान समय को “बुद्धिवाद का युग” कहा जाता है लेकिन अन्धविश्वासों और कुरीतियों को जितने उत्साह से इन दिनों अपनाया जा रहा है, उतना शायद पिछले दिनों के उस समय में भी न रहा हो, जिसे हम अनगढ़, आदिमकाल कहते हैं। ढोंगी, बाजीगरी, जादूटोनों ने आध्यात्म को जिस तरह ग्रस लिया है, उसे देखते हुए लगता है विवेक के अरुणोदय को लाने के लिए एक और भगीरथ तप जैसे प्रचंड पुरुषार्थ की आवश्यकता हैं।
सामूहिक जीवन में शासनतन्त्र की प्रधानता है, पर अब तो सरकारें आया राम, गया राम हो गयी हैं। राजनैतिक अस्थिरता के इस युग में शासन प्रमुख का सारा समय अपनी ही स्थिरता और कुशल की चिन्ता करते बीतता है, वह राष्ट्र की चिन्ता कब करे? जहाँ सरकारें स्थिर हैं भी, तो वे अपने संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति के लिए दूसरे देशों के प्रति जो रवैया अपनाती हैं, उससे शोषण, आधिपत्य, विग्रह और युद्ध का कुचक्र ही गतिशील होता है।
इन दिनों एक समस्या सुलझाते-सुलझाते दस नयी समस्याएं खड़ी होती हैं। वर्तमान की विभीषिकाओं को परास्त करना इतना आसान नहीं है। एक गज जोड़ने के साथ-साथ दस गज टूटने का क्रम चल रहा है।
ऐसी दशा में समाधान एक ही है ‘युगपरिवर्तन’। प्रकृति, परिवेश, परिस्थितियां, प्रवृत्तियाँ, सामाजिक गतिविधियाँ, राजनैतिक संरचना, वैज्ञानिक एवं आर्थिक सोच को एक साथ, समूचे रूप से पूरी तरह बदल डालने का महाउपक्रम। हालाँकि यह कार्य सरल नहीं है और न ही मानवीय पुरुषार्थ से सम्भव, परन्तु जब मनुष्य का बाहुबल थक जाता है और पतन एवं विनाश की आशंका बलवती हो जाती है, तो “प्रवाह उलटने का कार्य दैवीचेतना स्वयं करती है” और एक बार फिर से मानव की अन्तः प्रकृति, बाह्य परिस्थितियों, सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक संरचनाओं के अनुसार स्वयं को तैयार करते है। परम पूज्य गुरुदेव ऐसे ही उल्टे हुए लोगों को उल्ट कर सीधा करने का दावा करते हैं।ऐसे लोग ठीक दिशा में ही जा रहे थे लेकिन तथाकथित विकास ने उन्हें विनाश की ओर धकेल दिया।
ऐसी स्थिति में प्रकृति अपना कार्य करती है, वोह मूकदर्शक तो बनी नहीं रह सकती। बच्चा जब तक ठीक से खेलता रहता है, मां प्रसन्न होकर सुख अनुभव करती है लेकिन जब बच्चा खतरे की ओर बढ़ता हुआ दिखता है तो भाग कर उसे सावधान करती है। अब सावधान होने का ही समय है। समूची सृष्टि के साथ युगपरिवर्तन का मोहक राग छिड़ा हुआ है जिसके हर स्वर, लय एवं ताल में उज्ज्वल भविष्य की गूँज को स्वयं में, प्रकृति एवं परिवेश में, जीवन के प्रत्येक कण में तीव्र से तीव्रतर होते हुए अनुभव किया जा सकता है। यही गूँज आज चारों ओर हर कहीं ध्वनित है- युगपरिवर्तन ही इस युग की नियति है, मानव का प्रारब्ध है।संलग्न वीडियो को एक बार फिर से देखने से बहुत कुछ जाना जा सकता है: https://youtu.be/w4gwNWDY1xs?si=6JSP842VFpc6KQzD
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से बार-बार एक ही संदेश प्रसारित किया जा रहा है:
यदि आप गुरु की सच्ची, आज्ञाकारी संतान हैं तो उनकी विश्वव्यापी युगनिर्माण योजना में सहकारिता दिखानी है,उनका आशीर्वाद प्राप्त करना है, ऐसा सौभाग्य रोज़-रोज़ प्राप्त नहीं होता। आपको केवल समयदान करके गुरु का साहित्य पढ़ना है, समझना है और कॉमेंट करके बताना है कि क्या समझ आया है। अपना ज्ञान अनेकों में वितरित करना है।
जय गुरुदेव
