शांतिकुंज के गेट नंबर 1 पर बड़े-बड़े शब्दों में अंकित किया हुआ है “इक्क्सवीं शताब्दी उज्जवल भविष्य की गंगोत्री”, इसे देख कर कोई भी पूछ सकता है कि क्या युग परिवर्तन हो गया है? हम किस उज्जवल भविष्य की गंगोत्री की बात कर रहे हैं ?
कल प्रकाशित किये गए लेख में “किंकर्तव्यविमूढ़ता” को समझने का प्रयास किया गया था। यह एक ऐसी परिस्थिति होती है जब व्यक्ति भारी असमंजस या दुविधा में फंस जाता है, उसे यह समझ नहीं आता कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। यह एक ऐसी “मानसिक अवस्था” है जहाँ व्यक्ति निर्णय लेने में असमर्थ हो जाता है।
तो क्या आज का मानव ऐसी ही परिस्थिति में जी रहा है ? बात तो उज्जवल भविष्य की हो रही है, इसी विषय पर चर्चा कर रहा है आज का यह ज्ञानप्रसाद लेख।
भांति-भांति के लेख,अनेकों लिंक्स को पढ़कर,समझकर इस लेख को तैयार किया गया है ताकि किसी को भी समझने में कोई कठिनाई न अनुभव हो। हमारा प्रयास कितना उपयोगी हुआ, हमारे साथी ही बता सकते हैं, उचित रहेगा उन्हीं पर छोड़ दें और हम ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा का शुभारम्भ करें।
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विज्ञान और बुद्धिवाद (Science and Rationalism) 20वीं सदी की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ हैं। Rationalism का अर्थ है किसी तथ्य को Rational होकर, ठीक से लॉजिकल होकर,समझना,विश्लेषण करना, न कि सभी कह रहे हैं, इसलिए सत्य है, विश्वसनीय है। कोई ज़रूरी नहीं कि 1000 लोग किसी गलत बात में अपना समर्थन रजिस्टर करा रहे हैं तो वोह ठीक हो। अकसर देखा गया है कि लोग कहते हैं हमने क्या लेना है? जो सब लोग कह रहे हैं ठीक ही होगा, यह तो भेड़चाल हुई न,भेड़ बकरी की तरह जब हम बिना सोचे समझे करते जाते हैं तो यह भीड़ इक्क्ठी करने जैसी ही बात है। बहुत से लोग अकेले रह जाने के डर से Rationalism का समर्थन नहीं करते।
इसी Rational thinking के कारण ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न उठते हैं। कितना ठीक है, कितना गलत है यह तो हम सब जानते हैं लेकिन अंधविश्वास और Rational thinking, दोनों में से कोई भी परफेक्ट नहीं है। अंधविश्वास से सारा जीवन गायत्री मंत्र जाप करने से किसको फल मिला है सभी परिचित हैं लेकिन समझकर कोई भी कार्य करने में क्या बुराई है।
लेकिन यहाँ समस्या और है।
हम सब देख रहे हैं कि विज्ञान और बुद्धिवाद ने हमें कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया है, इन दोनों के मिलने से कैसे-कैसे सुविधा-साधनों के नये द्वार खुले हैं। इस विकास ने जहाँ चीज़ों और तथ्यों को समझने में सहायता की है, लोगों की बुद्धि का विकास किया है, साथ ही दुरुपयोग का क्रम भी विकसित हुआ है। दोनों युग चमत्कारों ( विज्ञान और बुद्धिवाद) ने लाभ के स्थान पर नई हानियाँ, समस्याएँ और विपत्तियाँ उत्पन्न कर दीं हैं। विज्ञान और तकनीक की सहायता से बढ़िया से बढ़िया उत्पादन हुए हैं/ हो रहे हैं लेकिन जिस स्पीड से उत्पादन हो रहे हैं,उन्हें खपाने के लिये मार्किट भी तो चाहिए। विकास की इसी दिशा ने “आर्थिक उपनिवेशवाद ( Financial Colonialism)” को जन्म दिया।
आगे बढ़ने से पहले “आर्थिक उपनिवेशवाद ( Financial Colonialism)” समझना होगा।
क्या है Financial colonialism?
शक्तिशाली देश किसी अन्य क्षेत्र या देश पर राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से नियंत्रण स्थापित करता है। इसका मुख्य उद्देश्य उस क्षेत्र के संसाधनों का उपयोग करके अपने स्वयं के देश को अधिक शक्तिशाली और अमीर बनाना होता है। भारत इस थ्योरी के कष्ट को सदिओं तक झेलता रहा, ब्रिटिश राज के इतिहास को शायद ही कोई कभी भूल पायेगा। शक्तिशाली देश दूसरे देशों पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए उनके घरों में घुस गए, उन्होंने लोगों को युद्ध के लिए उकसाया ताकि उनमें अतिरिक्त उत्पादनों को झोंका-खपाया जा सके। कुशल कारीगरी ने स्थान तो पाया लेकिन गृह उद्योगों के सहारे जीवनयापन करने वाली जनता की रोटी छिन गई। काम के अभाव में बड़ी संख्या में लोग बेकार-बेरोजगार हो गए। परिस्थितियाँ गरीबी की रेखा से दिनोंदिन नीचे गिरती रही लेकिन अमीरों की अमीरी बढ़ती ही गयी। Industrialisation, पूंजीवाद एवं विकास ने जहाँ आज के मनुष्य की सुख सुविधा के लिए वोह सब कुछ प्रदान किया जिसकी उसे ज़रुरत भी नहीं थी,वहीँ उससे जो छीन लिया वह भी कोई कम न था। यह तो बहुत ही घटिया स्तर की सौदेबाज़ी हुई न? है तो सही लेकिन चल रही है और चलती रहेगी
इस विषय पर इतना विशाल साहित्य लिखा जा चुका है कि कोई भी इंटरनेट में सर्च करके स्वयं को शिक्षित कर सकता है।
हमारे लेख का उद्देश्य यह देखना है कि 21वीं सदी यदि उज्जवल भविष्य को दस्तक दे रही है तो यह कैसे सम्भव हो रहा है/हो पायेगा। शांतिकुंज के गेट नंबर 1 की तरफ मुंह करके खड़े हो जाएँ तो बड़े-बड़े शब्दों में लिखा दिखेगा “इक्क्सवीं सदी उज्जवल भविष्य की गंगोत्री” परम पूज्य गुरुदेव द्वारा दिया गया यह उद्घोष 21वीं सदी के पहले 26 वर्षों (2026) में कितना सार्थक हुआ है,उज्जवल भविष्य की गंगोत्री ने इन 26 वर्षों में कितनों ने धरती पर स्वर्ग का अवतरण होते देखा है?
यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर आज की पीढ़ी, Rational thinking के लोग, आज के Genz, बुद्धिवादी, प्रतक्ष्यवादी ढूंढ रहे हैं,हमसे मांग रहे हैं और उन्हें समझाने का हमारा कर्तव्य है। यह लोग तो तब तक नहीं मानेगें, विश्वास करेंगें जब तक स्वयं अनुभव न कर लें, स्वयं न देख लें, प्रतक्ष्यवादी जो ठहरे!!!
अखंड ज्योति के फ़रवरी और अप्रैल 1998 अंकों में युग परिवर्तन को लेकर अनेकों लेख प्रकाशित हुए,कभी समय आने पर इनका भी अध्ययन करना अनुचित नहीं होगा लेकिन इस समय के लिए दिए गए यूट्यूब लिंक से भी बहुत अच्छी जानकारी मिल रही है। https://youtu.be/w4gwNWDY1xs?si=IEHQ7VX2q2dVctxj
विज्ञान, उद्योगीकरण और विकासशील होना कोई गलत बात नहीं है, विश्व स्तर पर Compete करना भी कोई बुरी बात नहीं है, आज के युग में तो इसके बगैर गुज़ारा ही नहीं है, तो फिर क्या किया जाए?
एक बार फिर से कल वाले लेख की स्थिति आ गयी है, किंकर्तव्य विमूढ़ता की स्थिति जिसका अर्थ है असमंजस की स्थिति, एक साथ कई विकल्प होने या कोई भी रास्ता स्पष्ट न होने पर उत्पन्न हुआ भ्रम,
निर्णय लेने में असमर्थता,अत्यधिक घबराहट या उलझन के कारण सही-गलत का चुनाव न कर पाना।
साथिओ घबराने की कोई ज़रुरत नहीं है, हमारा गुरु हमारे साथ है, हम उनकी नाव में सवार हैं लेकिन उनकी शर्तों से हम सब भलीभांति परिचित हैं, उन शर्तों को भी पालन हमने ही करना है। अभी भी 75 वर्ष बाकी हैं
चलो आगे चलते हैं।
विज्ञान की अपनी समस्या है, उसकी तो फिलॉसॉफी ही प्रत्यक्षवाद से बंधी हुई है। उसने ऐसी मान्यता विकसित की है कि जो कुछ सामने है, उसी को सब कुछ माना जाए। इसका निष्कर्ष आज के प्रत्यक्ष लाभ को प्रधानता देता है। अप्रतक्ष्य का अंकुश अस्वीकार कर देने पर ईश्वर और उसके साथ जुड़े हुए संयम, सदाचार और पुण्य-परमार्थ के लिए कोई भी स्थान नहीं रह जाता। सदिओं पुरानी मर्यादाओं और वर्जनाओं को अन्धविश्वास कह कर, उनसे पीछा छुड़ाने पर इसलिए जोर दिया गया है कि इससे व्यक्ति की “निजी सुविधाओं” में कमी आती है। सुविधाओं का ही तो सारा चक्र है, समयदान करने में, श्रमदान करने में सुविधा का हनन होता है, तो कोई क्यों असुविधा सहन करे। वर्तमान समय मॉडर्न सिद्धान्त यही कहता है कि जिस प्रकार भी, जितना भी लाभ उठाया जा सके, उठाना चाहिए, उसमें पुरातन मूढ़ मान्यताओं को कोई स्थान नहीं देना चाहिए,आड़े नहीं आने देना चाहिए। इसी मान्यता ने पशु-पक्षियों के वध को स्वाभाविक प्रक्रिया बनाकर असंख्यों गुना बढ़ा दिया है। अन्य प्राणियों के प्रति निष्ठुरता बरतने के उपरान्त हैवानियत का जो बाँध टूटता है, वह मनुष्यों के साथ भी निष्ठुरता बरतने को बड़ी बात नहीं मनाता। फ्रिज में मानव शरीर के टुकड़े मिलने इसी पशुता का ही प्रमाण है। यही पशुता अलग अलग लोगों के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित करने को भी सही माने जा रही है।
विज्ञान और बुद्धिवाद की नई धाराएँ खोजने के लिए और उनके आधार पर तात्कालिक लाभ (Instant gain) के जादू-चमत्कार प्रस्तुत करने वाली आधुनिकता, नीति और सदाचार का एक सिरे से दूसरे सिरे तक जड़ से खात्मा करती, मनुष्य को स्वेच्छाचारी, मनमानी करने के लिए बनाती जा रही है।
गुरुदेव बता रहे हैं कि इन शताब्दियों में मनुष्य ने जो पाया है, उसकी तुलना में खोया कहीं अधिक है। सुविधाएँ तो नि:सन्देह बढ़ी हैं लेकिन उसके बदले में “जीवनी शक्ति” से लेकर शालीनता तक का क्षरण, अपहरण बुरी तरह हुआ है। मनुष्य ऐसी स्थिति में रह रहा है, जिसे उन भूत पलीतों के सदृश्य कह सकते हैं, जो मरघट जैसी नीरवता के बीच रहते और डरती-डराती जिन्दगी जीते हैं। व्यक्ति जितना अधिक समृद्ध है उतना अधिक ही डरा हुआ है, सिक्योरिटी गार्ड,सिक्योरिटी कैमरा, बेस्ट से बेस्ट सिक्योरिटी कैमरे, क्या यही है समृद्धि? क्या इस डर के वातावरण के लिए ही मनुष्य दिन रात, कार्य कर रहा है, किसी के पास भी बात करने तक का समय नहीं है। समृद्धि बटोरने के लिए इन दिनों हर कोई बेचैन है, किन्तु इसके लिए योग्यता, प्रामाणिकता और पुरुषार्थ परायणता सम्पन्न बनने की आवश्यकता पड़ती है लेकिन लोग मुफ्त में घर बैठे जल्दी-जल्दी अनाप-शनाप पाना चाहते हैं। इसके लिए अनाचार के अतिरिक्त और कोई दूसरा मार्ग शेष नहीं रह जाता। इन दिनों प्रगति के नाम पर सम्पन्न बनने की ललक ही आकाश चूमने लगी है। उसी का परिणाम है कि तृष्णा भी आकाश चूमने लगी है। ऐसी मानसिकता की परिणति एक ही होती है, मनुष्य अनेकानेक दुर्गुणों से ग्रस्त होता जाता है। पारस्परिक विश्वास और स्नेह सद्भाव खो बैठने पर व्यक्ति हँसती-हँसाती सद्भाव और सहयोग की जिन्दगी जी सकेगा, इसमें सन्देह ही बना रहेगा।
अस्त-व्यस्तता और अनगढ़ता ने उभर कर, प्रगतिशील उपलब्धियों पर कब्जा कर लिया लगता है अथवा अभिनव उपलब्धियों के नाम पर उभरे हुए अति उत्साह ने, अहंकार बनकर शाश्वत मूल्यों का तिरस्कार कर दिया है। दोनों में से जो कोई भी कारण हो, है सर्वथा चिन्ताजनक।
जय गुरुदेव
