ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से परम पूज्य गुरुदेव द्वारा रचित “क्रांतिधर्मी साहित्य” पर आधारित लेख श्रृंखला लिखने का साहस करना ही अपनेआप में एक चुनौतीपूर्ण कदम है। इस परिवार की नियमित,समर्पित एवं सबकी प्रिय बेटी आदरणीय संजना कुमारी द्वारा इस प्रयास के लिए इच्छा व्यक्त करना ही गुरुदेव के प्रति श्रद्धा एवं समर्पण का प्राकट्य है। परिवार के सभी सदस्यों से करबद्ध प्रार्थना एवं निवेदन है कि इस चुनौतीपूर्ण प्रयास में नियमित होकर पूर्ण श्रद्धा से सहयोग करें ताकि इस विषय पर आधारित लेख विश्व के कोने-कोने में पंहुच कर गुरुदेव से सम्पर्क स्थापित करने में सहायक हो पाएं । ज्ञानप्रसाद लेखों का नियमितता से अध्ययन करना ही अपनेआप में बड़ी साधना है और जब इस अध्ययन से प्राप्त हुआ ज्ञान, कमैंट्स और काउंटर कमैंट्स के माध्यम से जन-जन तक पंहुचता है तो साथिओं का श्रमदान और समयदान इसे उच्चकोटि की तप-साधना बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ता।
उपरोक्त पंक्तियों में साहस बटोरने की बात की गयी है !!!! ऐसा इसलिए कहा गया है “क्रांतिधर्मी साहित्य” के अंतर्गत इतना कुछ ऑनलाइन/ऑफलाइन उपलब्ध है कि एक बार तो हम चक्कर ही खा गए थे कि कहाँ से शुभारम्भ किया जाए। जनवरी 2023 में भी प्रयास किया था लेकिन केवल एक पुस्तक “परिवर्तन के महान क्षण” का एक ही चैप्टर पढ़कर, एक लेख लिखकर बंद कर दिया था। साथिओं द्वारा दिए गए अलंकार, चिन्मय जी द्वारा हमारे बारे में बोले गए शब्द (आद नीरा जी का कमेंट) जहाँ शक्ति प्रदान कर रहे हैं, वहीँ बहुत कुछ आशा भी कर रहे हैं।
1990 में महाप्रयाण से पूर्व 1988 और 1990 के बीच रचा गया यह ज्ञान का यह विशाल सागर अपनेआप में ही साक्षात् अमृत है,हमारा परम सौभाग्य है कि इस पुरषार्थ में हम भागीदार बन रहे हैं।
कितने दिन तो हमें यह ही सुनिश्चित करने में लग गए कि “क्रांतिधर्मी साहित्य” के अंतर्गत 20 पुस्तकें हैं, 22 पुस्तकें हैं यां 24 पुस्तकें हैं। अभी तक प्राप्त जानकारी एवं रिसर्च से यही निष्कर्ष निकलता है कि इस पुस्तकमाला में 23 पुस्तकें हैं जिनकी पूरी सूची हमने इस लेख के साथ संलग्न की है। लगभग सभी पुस्तकें टेक्स्ट कॉपी,स्कैन कॉपी और हार्ड कॉपी में उपलब्ध हैं। अमेज़न और गूगल बुक्स पर भी उपलब्ध हैं। एक दो Websites (Geocities) तो ऐसी हैं जिन्होंने पूरी की पूरी 23 पुस्तकें न केवल टेक्स्ट फॉर्म में अपलोड की हैं बल्कि ऑडियो फॉर्म में भी उपलब्ध कराई हैं।अनेकों लोगों ने जब जी चाहा वीडियोस भी बनाईं लेकिन कम्पलीट कोई भी नहीं है, शायद संभव ही नहीं है। शताब्दी वर्ष के अगले 6 महीने में हम कितना कर पायेंगें, गुरुदेव हम सबसे कितना करवा पायेंगें यह समय ही बता पायेगा,विधि के विधान को तो कोई भी नहीं जानता।
23 पुस्तकें,हर पुस्तक के लगभग 30 से 60 पृष्ठ, 10 से 20 चैप्टर, इतने विशाल कंटेंट को समझना, ज्ञानप्रसाद लेखों में इस दृष्टि से,सरलता से समाहित करना कि साथिओं को बिना किसी कठिनाई के समझ आ जाए,आशा करना कि सभी साथी ज्ञानप्रसाद लेखों के एक-एक शब्द का अमृतपान करें,उन्हें समझें और समझकर ही कमेंट करें क्योंकि उन्हीं के कमैंट्स पर काउंटर कमेंट की प्रक्रिया आधारित होती है। जैसे गुरुदेव कहते हैं कि बेटे ! क्रान्तिधर्मी साहित्य मेरे अब तक के सभी साहित्य का मक्खन है। मेरे अब तक का साहित्य (3200 पुस्तकें एवं अन्य साहित्य) पढ़ पाओ या न पढ़ पाओ, इसे जरूर पढ़ना। इन्हें समझे बिना मिशन को न तो तुम समझ सकते हो, न ही किसी को समझा सकते हो’’, उसी भावना में हम और भी सरलता से कहते हैं कि आप 1800-2000 शब्दों का लेख पढ़ पाओ यां न पढ़ पाओ, साथिओं के कमेंट ही पढ़ लो तो बहुत कुछ प्राप्त हो जायेगा। पिछले कुछ दिनों से हमने गुरुज्ञान को और भी सरल बनाने का एक और प्रयास शुरू किया है, “ लेख से ही सम्बंधित मात्र 200-300 शब्दों का दैनिक दिव्य सन्देश।” समयाभाव की समस्या तो वर्षों से चलती आ रही है लेकिन यह अभाव उनके लिए है जिनकी रूचि ज्ञानप्रसाद लेखों से अधिक किन्हीं अन्य कार्यों में है, उनके लिए ज्ञानप्रसाद लेख, गुरु के साहित्य से अधिक महत्वपूर्ण और बहुत कुछ है।
चाहे जो कुछ भी ऑनलाइन उपलब्ध हो, हमारा फोकस बृजेश वर्मा जी की वेबसाइट geocities पर ही रहेगा, उन्होंने इतना कुछ उस वेबसाइट पर उपलब्ध कराया है कि हम नतमस्तक हुए बिना नहीं रह सकते।सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अभी तक यह वेबसाइट पूरी तरह Up and running है, कल का पता नहीं। इसीलिए हम अपने साथिओं के सहयोग से अपनी वेबसाइट पर “अखंड ज्योति” और “युग निर्माण योजना” उपलब्ध करना Priority समझते हैं। जब कोई कंटेंट डाउनलोड होकर शेयर होता है तो लिंक आदि की कोई समस्या नहीं रहती। जो साथी “अखंड ज्योति” और “युग निर्माण योजना” में सहायता दे रहे हैं, उनका ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं।
प्रयास तो यही रहेगा कि लेखमाला की प्रथम पुस्तक “इक्क्सवीं सदी बनाम उज्जवल भविष्य भाग 1” से शुभारम्भ करके धीरे-धीरे पूरे संयम से, गुरुशक्ति की सहायता से, ज्ञान के अथाह सागर में एक-एक करके चलते जाएँ, जो भी अमूल्य रत्न हाथ लगें उन्हें परिवार के समक्ष सम्मानपूर्वक प्रस्तुत करें।
उपरोक्त पुस्तक के प्रथम पृष्ठ के प्रथम चैप्टर के शीर्षक को समझने के लिए एडिशनल रिसर्च करनी पड़ी ,गूगल भाई साहिब सहायक रहे। शीर्षक था “किंकर्तव्य विमूढ़ता जैसी परिस्थितियाँ”,रिसर्च करने पर जो मिला उसे निम्नलिखित शब्दों में प्रस्तुत किया जा रहा है: किंकर्तव्यविमूढ़ता का अर्थ उस परिस्थिति से है जब व्यक्ति भारी असमंजस या दुविधा में फंस जाता है। उसे यह समझ नहीं आता कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। यह एक ऐसी “मानसिक अवस्था” है जहाँ व्यक्ति निर्णय लेने में असमर्थ हो जाता है। इस शब्द की सर्जरी करने से पता चलता है कि किम् का अर्थ है क्या, कर्तव्य का अर्थ है करने योग्य कार्य या जिम्मेदारी और विमूढ़ का अर्थ है भ्रमित होना, हैरान होना या अवाक् हो जाना।
ऐसी परिस्थितियों की प्रमुख पहचान निम्नलिखित होती है:
- असमंजस की स्थिति: एक साथ कई विकल्प होने या कोई भी रास्ता स्पष्ट न होने पर उत्पन्न हुआ भ्रम।
- निर्णय लेने में असमर्थता: अत्यधिक घबराहट या उलझन के कारण सही-गलत का चुनाव न कर पाना।
किंकर्तव्यविमूढ़ता के उदाहरण
- ऐतिहासिक/पौराणिक उदाहरण: महाभारत के युद्ध के आरंभ में अर्जुन का अपने सगे-संबंधियों को देखकर घबरा जाना और यह न समझ पाना कि धर्म के अनुसार उन्हें क्या करना चाहिए, किंकर्तव्यविमूढ़ता का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
- दैनिक जीवन: अचानक कोई बड़ा संकट (जैसे नौकरी छूटना, किसी प्रियजन के साथ कोई अप्रिय घटना) आने पर व्यक्ति का स्तब्ध या घबरा जाना।
तो साथिओ स्थिति एवं परिणामों की चर्चा कल होगी, आज यहीं पर समापन होता है
