हर माह के अंतिम शनिवार को प्रकाशित होने वाले इस विशेष सेगमेंट का सभी साथिओं को इंतज़ार होता है,कोई न कोई साथी कमेंट करके इस भावना को प्रकट कर ही देता है।कल हमारी बड़ी बहिन जी आद रेणु श्रीवास्तव जी ने इस प्रकार की भावना व्यक्त की थी।
हमारी एक और आद बहिन सुमनलता जी ने परिवार में सक्रियता दर्शाते हुए हमारे कन्धों पर एक नई ज़िम्मेदारी डाली थी जिसके अंतर्गत यह विशेष कंटेंट प्रस्तुत किया गया है। बहिन जी के सुझाव और साथिओं के समर्थन से ही इस स्पेशल सेगमेंट का जन्म हुआ था। बहिन सुमनलता जी का ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं।
आज के सेगमेंट को दो अलग-अलग भागों में स्टडी करना उचित रहेगा।
पहले सेगमेंट में स्वाध्याय को तप, एक अद्भुत साधना के विशेषण से सुशोभित करते हुए ज्ञानप्रसाद लेखों को पढ़ने की प्रेरणा दी गयी है। हमारे साथी पूछ सकते हैं कि बार-बार एक ही बात कहने से क्या प्राप्त होगा? इसका वही रिप्लाई है जो पहले भी अनेकों बार दे चुके हैं: हमारा गुरु आज तक हमसे समयदान की मांग कर रहा है तो हम न करें तो कहाँ तक उचित है
दूसरे सेगमेंट में बताने का प्रयास किया गया है कि अखंड ज्योति के “अपनों से अपनी बात” सेगमेंट से हमें इतना लगाव क्यों है। इसे समझने के लिए अपने व्यक्तिगत विद्यार्थी जीवन का उदाहरण देकर और Connective डायग्राम की सहायता ली गयी है। चित्र के बारे में बताना चाहते हैं कि AI को सारी इनफार्मेशन देने के बाद भी वह ठीक से बनाने में असमर्थ रहा, ठीक करने में लगभग 1 घंटा लग गया था। हो सकता है कि साथिओं को बेसिक साइंस से यूरेनियम केमिस्ट्री की यात्रा को समझने में कुछ कठिनाई हो लेकिन इससे बेहतर और कोई कनेक्शन बन ही नहीं पाया, क्षमाप्रार्थी हैं।
आज के इस विशेष सेगमेंट में अंतर्मन में उठ रहे उन भावों को साथिओं के साथ शेयर करने का प्रयास है जिन्होंने हमें “अपनों से अपनी बात” सेक्शन के इतने करीब लाकर खड़ा कर दिया कि अब तो यह सेक्शन हमें प्राणों से भी प्रिय लगने लगा है। इस अटैचमेंट के अनेकों कारण हो सकते हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण तो यही है कि इस सेगमेंट में प्रकाशित हुआ एक एक-शब्द साक्षात् गुरु की वाणी ही लगती है। पढ़ते समय ऐसा अनुभव होता है जैसे गुरुदेव स्वयं ही सामने बैठकर हमारे साथ बात कर रहे हों। प्रतिदिन प्रकाशित होने वाले ज्ञानप्रसाद में भी बिलकुल ऐसी ही अनुभूति होती आयी है। जब हम लिखते हैं:ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा में गुरुचरणों में बैठकर गुरुज्ञान का अमृतपान करें तो साक्षात् ऐसा ही वातावरण बना होता है जैसे कि हम परम पूज्य गुरुदेव के चरणों में नतमस्तक हो रहे हों। लिखते समय,पढ़ते समय एक-एक शब्द की शक्ति ऐसी ह्रदय में उतरती जाती है जैसे कोई High powered एनर्जी ड्रिंक शरीर के एक-एक Cell में जा रहा हो। कुछ दिन पहले “अमृत” शब्द को नकारते हुए कहा था कि अमर होना जीवन-मरण के शाश्वत चक्र का विरोध करना था। उस समय इस प्रकार की चर्चा हो रही थी कि “अमृत” शब्द एक अलंकार की भांति प्रयोग किया जाता है।
शायद ही कोई इस बात से इंकार कर सके कि अच्छी पुस्तकों के स्वाध्याय से, ज्ञानप्रसाद लेखों के अमृतपान से नया जीवन प्रदान होता है। हम तो ऐसे भी कह सकते हैं जब तक ज्ञानप्रसाद का अमृतपान नहीं किया था,हम तो शरीररूपी लाश को ढोए ही जा रहे थे। ज्ञानप्रसाद के अमृत की एक छींठ पड़ते ही कायाकल्प हो गया। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के वोह गिने चुने समर्पित साथी जिनके लिए ज्ञानप्रसाद लेख एक महत्वपूर्ण सम्पति बन चुके हैं, उनके द्वारा विस्तृत कमेंट कायाकल्प का साक्षात् प्रमाण हैं। जब हम “विस्तृत” शब्द का प्रयोग कर रहे हैं तो साथी समझ ही रहे होंगें कि हम लेख से सम्बंधित कंटेंट की बात कर रहे हैं। शब्द संख्या बढ़ाने के लिए पोस्ट हुआ कमेंट साफ दिख जाता है, साथी देर सबेर समझ ही जाते हैं, यही कारण है कि काउंटर कमेंट करना समय की बर्बादी समझी जाती है
जिन गिने चुने समर्पित साथिओं का रिफरेन्स दिया गया है वोह जानते हैं कि स्वाध्याय एक मानसिक साधना है। यह मन को एकाग्र करती है, धैर्य बढ़ाती है और अंतर्मन की यात्रा कराती है। ध्यान (Meditation) की तरह ही, पुस्तकों का गहरा अध्ययन भी विचारों को शुद्ध कर व्यक्तित्व को निखारता है और जीवन को सही दिशा देता है। भारतीय संस्कृति में ‘स्वाध्याय’ को एक “प्रमुख तप” माना गया है। आज के डिजिटल युग में अच्छे साहित्य का ( ज्ञानप्रसाद लेखों का) अमृतपान और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि आज का मनुष्य ज़्यादा बिखरा हुआ है। स्वाध्याय के लिए फ़ोन उठाता है तो फेसबुक की नोटिफिकेशन, इंस्टाग्राम पर शेयर हुई पोता-पोती की वीडियो कहाँ कुछ करने देती है, स्वाध्याय करना एवं उसका महत्व भूल ही जाता है। यही कारण है कि हर कोई “समय जैसी अमूल्य निधि” के अकाल से ग्रस्त है। इस बिखरे हुए मन को पकड़कर, डांट कर बिठाने को, आज के युग का सबसे बड़ा तप, सबसे बड़ी साधना कहा गया है।
साथिओं के इनबॉक्स में पोस्ट हुए ज्ञानप्रसाद लेख डिजिटल युग की मानसिक चंचलता को शांत करने में कितने सहायक हैं, इसका प्रमाण तो पढ़ने के बाद ही मिलेगा क्योंकि पढ़ने का अर्थ शब्दों को देखना नहीं, बल्कि उनके गहरे अर्थों को समझना है। यह बौद्धिक मंथन पाठक के सोचने के दायरे को विस्तृत करता है। सोशल मीडिया के 10-15 सेकंड्स के शार्ट वीडियोस Instant Gratification के माध्यम तो हैं लेकिन स्थिर होकर,नियमित तौर से ज्ञानप्रसाद लेख पढ़ने, कमेंट-काउंटर कमेंट की प्रक्रिया में भागीदार बनना धैर्य साधना सिखाता है
आज के युग का शायद ही कोई प्राणी हो जो तनाव से मुक्ति (Inner Peace) न पाना चाहता हो। Inner peace के लिए स्वाध्याय से बढ़कर और कोई दवा हो ही नहीं सकती क्योंकि आप कुछ समय के लिए बाहरी दुनिया के तनाव और शोरगुल से कटकर एक शांत और आनंददायक आंतरिक दुनिया में प्रवेश करते हैं। कल पोस्ट हुए दिव्य सन्देश में गुरुदेव कह रहे थे कि 6 घंटे की पूजा दिन के बाकी 18 घण्टों के लिए प्रेरणा देते रहते थे।
उपरोक्त सभी तथ्य, ज्ञानप्रसाद लेखों के स्वाध्याय के प्रति हमारे आग्रह पर स्टैम्प लगाते दिखते हैं।
तो साथिओ, ज्ञानप्रसाद नामी जन्मघुंटी की कुछ ही बूंदें पीकर जीवन के बिखराव समेट लो, प्राप्त हुई शक्ति से गुरुकार्य में अपना सहयोग देने का संकल्प लो क्योंकि ज्ञानरथ परिवार में “केवल देने वालों की ही प्रतिष्ठा होती है।” यह परिवार गुरुदेव के “बोओ और काटो” के सिद्धांत पर आगे ही आगे बढ़े जा रहा है।
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अखंड ज्योति पत्रिका के “अपनों से अपनी बात” सेक्शन ने हमें कैसे आकर्षित किया ?
1.जिस प्रकार प्राइमरी क्लास के बच्चे को साइंस की परिभाषा पढ़ाई जाती है हमने भी स्पिरिचुअल साइंस का अध्ययन इसी लेवल से आरम्भ किया ।
2.बड़ी कक्षा में थ्योरी के साथ-साथ साइंस के प्रैक्टिकल कराए जाते हैं , हमने भी अपने शरीर पर, मन पर, आत्मा पर स्पिरिचुअल साइंस के प्रैक्टिकल किए। नीरा जी के साथ पग-पग पर बात होती रहती है कि कैसे हमने ॐ मंत्र जाप करने की प्रैक्टिस की, कैसे इस छोटे से मंत्र ने हमारी आत्मा पर अपने प्रभाव दिखाए, इन प्रभावों को, शरीर में कम्पन आदि को अनुभव करने में 1,2 दिन नहीं बल्कि पूरा एक वर्ष लग गया।
3. जब कॉलेज में पहुंचते हैं तो साइंस की केमिस्ट्री, फिजिक्स, बायोलॉजी आदि विषयों में डिवीजन हो चुकी होती है। ठीक उसी तरह हमने यौगिक साइंस, यज्ञिक साइंस, हिप्नोटिक साइंस, गुरुज्ञान साइंस जैसी Classification का प्रयोग किया । सभी तरह की साइंस पढ़ने के बाद हमारी रुचि केवल केमिस्ट्री में थी, उसी प्रकार स्पिरिचुअल साइंस में हमने “गुरु को जानने- समझने” वाला सब्जेक्ट चुन लिया। ज्ञानप्रसाद लेख, विडियोज, शॉर्ट वीडियो, दैनिक दिव्य संदेश, कॉमेंट/काउंटर कॉमेंट आदि सभी एक ही दिशा की ओर केंद्रित रहे और वह दिशा थी, “गुरु को जानना और समझना !!”
4.यही कुछ हुआ जब हमने MSc लेवल की केमिस्ट्री पढ़ी। दो साल का कोर्स था, पहले साल में फिजिकल, ऑर्गेनिक, Inorganic, तीनों ही पढ़ीं, तीनों के प्रैक्टिकल किए लेकिन फाइनल ईयर में केवल Inorganic केमिस्ट्री ही पढ़ी और हमें डिग्री मिल गई MSc केमिस्ट्री with specialization in inorganic chemistry, यूनिवर्सिटी ने तो डिग्री दे दी लेकिन क्या हम स्पेशलिस्ट बन गए, बिल्कुल नहीं।
किसी विषय को जानना ज्ञान के अथाह सागर में गोते लगाने जैसा होता है। सागर के तल में ही अमूल्य रत्नों का भंडार जमा होता है । उन रत्नों को प्राप्त करने के लिए सागर के गर्भ में जाना होता है।
जितना नीचे जाएंगे उतना ही डूबते जाएंगे । इसके साथ ही एक और सच्चाई है: ज्ञान के सागर में डूबने के बाद जिज्ञासा बढ़ती ही जाती है। MSc करने के बाद वहीं तो नहीं रुक गए।
5. यही स्थिति आध्यात्मिक साइंस में भी आई, गुरु को समझने के लिए जो कुछ भी हाथ में लगा,अपनी समझ, योग्यता, समर्था के अनुसार,उपलब्ध ऑनलाइन स्रोतों से पढ़ते रहे। कभी कभार यज्ञ,कर्मकाण्ड आदि भी करते रहे, ठीक उसी प्रकार जैसे कंप्यूटर साइंस के विद्यार्थियों को Chemistry पढ़ाने के लिए उनके डिपार्टमेंट जाते रहे।
6.गुरु के बारे में रियल जानकारी तो तब प्राप्त होनी शुरु हुई जब हमने PhD (रिसर्च डिग्री) की तरह उस समय के 118 elements में से केवल एक ही (Uranium) पर रिसर्च शुरू कर दी। ठीक उसी प्रकार गुरु द्वारा रचित विशाल साहित्य में से केवल एक ही Element “अखंड ज्योति” पर अपनी अधिकतर स्टडी केंद्रित कर दी। जिस प्रकार PhD करते समय Uranium chemistry में से भी Coordination Chemistry तक ही सीमित किया, उसी प्रकार गुरुज्ञान से भी “अपनों से अपनी बात” हमारा सबसे रोचक विषय बन गया। 1940 के प्रथम अंक से लेकर 2026 के 86 वर्षों के हजारों अंकों में से कितने ही अंकों में इस सेगमेंट को कुरेद रहे हैं, हमें तो इनमें गुरु की आत्मा का वास दिखता है, साक्षात गुरुदेव के दर्शन होते हैं।
अभी भी यहां कब Stop sign दिखा। Post doctoral study के लिए विदेशी यूनिवर्सिटियों में उसी विषय को और कुरेदा तो “अपनों से अपनी बात” के साथ-साथ गुरुदेव द्वारा दिए गए references को भी स्टडी कर रहे हैं।
यदि इसी तरह, एक से एक बारीक से बारीक, बिंदु को समझते-समझते, साथियों के समक्ष लाते हुए, जीवन यात्रा का अंत हो जाए तो इस से बढ़कर सौभाग्य क्या होगा। हमारी माँ के अंतिम दिनों की यात्रा भी कुछ ऐसी ही थी। हम तो 22 वर्ष की आयु से ही उनसे दूर थे, साथ रह रहे हमारे भाइयों ने बताया था कि शरीर छोड़ने समय उनके तकिये के नीचे से अखंड ज्योति की प्रतियां मिली थीं।
इन्हीं शब्दों से आज के इस सेगमेंट का समापन होता है।
जय गुरुदेव
