वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

क्या आत्मज्ञानी हमेशा सुखी होते हैं ?

100 वर्षीय पुरातन “अखंड दीप” पर आधारित लेख  श्रृंखला का पंचम एवं अंतिम लेख 

फरवरी 1971 के जिस लेख पर वर्तमान लेख श्रृंखला आधारित है उसका शीर्षक “अपनों से अपनी बात, हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य  अनुभूतियाँ” है। शीर्षक स्वयं ही बता रहा है कि गुरुदेव के  जिस जीवन को हम सब देख रहे हैं उसके पीछे छिपी अदृश्य  अनुभूतियाँ क्या हैं ? 

वर्तमान लेख श्रृंखला में हम देख रहे हैं कि अखंड दीप के दूधिया प्रकाश ने गुरुदेव के अंतःकरण को कैसे निर्मल एवं शुद्ध किया।  

आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः, जिसका अर्थ है कि जो मनुष्य सभी प्राणियों को अपने समान (अपनी आत्मा के समान) समझता है, वही सच्चा ज्ञानी या पंडित है।  इस श्लोक पर गुरुदेव ने इतना विश्वास किया, इसके भाव का  पालन किया कि  अपने बारे में सब कुछ ही भूल गए, भूल ही गए कि उनकी अपनी भी कुछ व्यक्तिगत ज़रूरतें हैं। 

साथिओं ने गुरुदेव की निम्नलिखित पंक्तियाँ तो अवश्य ही देखी होंगीं, आज के लेख का यही सार है:

हमारी कितनी रातें सिसकती बीती है,कितनी बार हम बालकों की तरह बिलख-बिलख कर, फूट-फूट कर रोये इसे कोई कहाँ जानता है। लोग हमें संत, सिद्ध, ज्ञानी मानते हैं, कोई लेखक,विद्वान,वक्ता,नेता समझते हैं लेकिन  किसने हमारा अन्तःकरण खोल कर पढ़ा समझा है। कोई उसे देख सका होता तो उसे मानवीय व्यथा-वेदना की अनुभूतियों से करुण कराह से हाहाकार करती एक उद्विग्न आत्मा भर इस हड्डियों के ढाँचे में बैठी बिलखती ही दिखाई पड़ती।   

आइए शांतिपाठ के साथ ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल से प्रवाहित हो रही ज्ञानगंगा की  एक-एक बूँद  का अमृतपान करें, दुर्लभ मनुष्य जीवन को सार्थक करें: 

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति: पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥ 

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गुरुदेव बता रहे हैं: 

सर्वत्र फैला दुःख, दारिद्रय, शोक, संताप किस प्रकार समस्त मानव प्राणियों को कितना कष्ट दे  रहा है, पतन और पाप के गर्त में लोग किस तेजी से गिरते मरते चले जा रहे हैं यह दयनीय दृश्य देखे, सुने तो हमारी अन्तरात्मा रोने लगी।

यह प्रश्न निरन्तर मन में उठते रहे लेकिन  उत्तर कुछ न मिला। इस संसार में बुद्धिमत्ता,चतुरता, समझ कुछ भी तो कम नहीं है। एक से एक बढ़कर एक चतुर,चालाक एवं कला-कौशल प्रस्तुत करते मनुष्य दिखाई देते हैं जो  एक से  बढ़कर एक चातुर्य चमत्कार का परिचय देते हैं। लेकिन ऐसे चतुर लोग  इतना क्यों नहीं समझ पाते कि दुष्टता और निकृष्टता का पल्ला थाम कर वोह जिसे प्राप्त करने  की आशा करते हैं वही मृगतृष्णा बनकर रह जायेगा, उनके हाथ  केवल पतन और संताप ही लगेगा।  

हमारी समझदारी ने मात्र इतना सा ही निर्देश दिया मानवीय बुद्धिमता में एक और कड़ी जुड़नी चाहिए। “मानवीय गौरव” के लिए ईमान को साबित और विकसित किए रखना मानवीय गौरव के अनुरूप है, प्रगति के लिए आवश्यक है। यदि ऐसा मानवीय गौरव स्थापित किया जा सकता तो संसार की स्थिति कुछ और  ही होती। ऐसी स्थिति आते ही सभी लोग सुख-शान्ति का जीवन जी रहे होते। किसी को किसी पर अविश्वास, सन्देह न करना पड़ता और कोई किसी के द्वारा ठगा, सताया नहीं जाता। ऐसा होने पर इस संसार में किसी को भी  दुःख, दारिद्रय आदि का कोई अता पता भी न मिलता, हर जगह सुख-शान्ति की सुरभि फैली हुई अनुभव होती।

इतनी छोटी सी बात “पाप का फल दुःख और पुण्य का फल सुख होता है”, को मानने के लिये तैयार क्यों नहीं होता। इतिहास और अनुभव स्वयं इस तथ्य के साक्षी हैं कि अनीति अपनाने से, स्वार्थ संकीर्णता में बंधे रहने से मनुष्य को पतन और संताप ही हाथ लगा है। अर्पण किए बिना, निर्मल हुए बिना किसी ने भी कभी शाँति पाई है क्या?  किसी भी मनुष्य को आदर्शवादी रीति-नीति अपनाए बिना  सम्मान और उत्कर्ष की सिद्धि नहीं मिली है। कुटिलता सात पर्दे भेद कर भी अपनी पोल स्वयं ही खोलती रहती है। मनुष्य पग-पग पर यह सब देख रहा है लेकिन  फिर भी न जाने क्यों यही सोचता रहता है कि संसार की आंखों में धूल झोंक कर, अपनी धूर्तता को छिपाये ही रखेगा। उसके कृत्यों की भनक किसी को नहीं लगेगी और वह सदा लुक छिपकर आँख मिचौली  का खेल खेलता रहेगा।  ऐसा  सोचने वाले लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि हजारों आंखों से देखने वाला, हजारों कानों से सुनने वाला और हजारों पकड़ से पकड़ने वाला विश्वात्मा किसी की भी धूर्तता पर पर्दा नहीं पड़ा रहने देता। वस्तुस्थिति स्वयं प्रकट होकर ही रहती है, दुष्टता छत पर चढ़कर अपनी कलई आप ही खोलती है। 

यदि लोग इस  सनातन सत्य और पुरातन तथ्य को समझ सके होते कि अशुभ का अवलंबन करने पर दुर्गति होती है, उसे अनुभव कर सके होते तो सन्मार्ग का राजपथ छोड़कर काँटों के मार्ग पर क्यों भटकते ? क्यों रोते बिलखते इस सुरदुर्लभ मानव जीवन को सड़ी हुई लाश की तरह ढोते, घसीटते- घसीटते जीवन का अंत कर देते ?

दुर्बुद्धि का ऐसा  जाल-जंजाल बिखरा पड़ा है, उससे इतने  निरीह प्राणी चीत्कार करते हुए फंसे जकड़े पड़े हैं कि  यह  दयनीय दुर्दशा लोगों के लिए मर्मान्तक पीड़ा का कारण बन गई है । 

गुरुदेव के लिए “आत्मवत् सर्वभूतेषु की साधना” का पालन करते हुए  विश्व मानव की यह पीड़ा अपनी ही पीड़ा बन गयी। उन्हें ऐसा लग रहा था  मानो कोई अपने ही हाथ पाँव को ऐंठ, मरोड़ रहा हो। 

गीता का ज्ञान जहाँ तक पढ़ने/सुनने से सम्बन्धित रहे वहाँ तक तो ठीक है  लेकिन  जब वह अनुभूति की भूमिका में उतरे और अन्तःकरण में प्रवेश प्राप्त करे तो स्थिति दूसरी हो जाती है। जिस प्रकार अपने अंग अवयवों का कष्ट मनुष्य को व्यथित/बेचैन करता है, अपने स्त्री, पुत्रों की पीड़ा मनुष्य का चित्त विचलित करती है, ठीक वैसे ही आत्म-विस्तार की दिशा में आगे बढ़ चलने पर प्रतीत होता है कि विश्वव्यापी दुःख अपना ही दुःख है और व्यथित पीड़ितों की वेदना अपने को ही नोचती/फटकारती है।

गुरुदेव कहते हैं कि पीड़ित मानवता की,विश्वात्मा की, व्यक्ति और समाज की व्यथा/वेदना हमारे  भीतर उठने लगी और बेचैन करने लगी। आँख, दाढ़ और पेट के दर्द से बेचैन मनुष्य व्याकुल फिरता है कि किसी प्रकार,किसी उपाय से इस कष्ट से छुटकारा पाया जाय ? क्या किया जाय ? कहाँ जाया जाय ? इस प्रकार की हलचल मन में उठती है एवं प्रयास किया जाता है कि निवारण के लिए जो कुछ भी संभव हो  उसे करने के लिए क्षण भर का विलम्ब न किया जाए । 

गुरुदेव का मन भी ठीक ऐसे ही बना रहा। दुर्घटना में हाथ पैर टूटे बच्चे को अस्पताल ले दौड़ने की आतुरता में माँ अपने बुखार जुकाम को भूल जाती है और बच्चे को संकट से बचाने के लिए बेचैन हो उठती है। गुरुवर कह रहे  हैं कि  अपनी मनोदशा लगभग ऐसी ही चली आती है। अपने सुख साधन जुटाने की फुरसत किसे है ? विलासिता की सामग्री जहर सी लगती है, विनोद और आराम के साधन जुटाने की बात कभी सामने आई तो आत्मग्लानि से उस नीचता को धिक्कारा जो मरणासन्न रोगियों के प्राण बचा सकने में समर्थ पानी के एक गिलास को अपने पैर धोने की विडम्बना में बखेरने के लिए ललचाती है। भूख से तड़प कर प्राण त्यागने की स्थिति में पड़े हुए बालकों के मुख में जाने वाला ग्रास छीनकर माता कैसे अपना भरा पेट भरे ? दर्द से कराहते बालक से  मुँह मोड़कर पिता कैसे ताश शतरंज का साज सजाये ? ऐसा कोई निष्ठुर ही कर सकता है। 

“आत्मवत् सर्वभूतेषु” की सम्वेदना जैसे ही प्रखर हुई निष्ठुरता उसी में गल जल कर नष्ट हो गई। ह्रदय में केवल करुणा ही शेष रह गई। वही अब तक जीवन के इस अन्तिम अध्याय तक यथावत् बनी हुई है। उसमें रत्ती भर भी कमी नहीं हुई बल्कि  दिन-दिन बढ़ोतरी ही होती गई।

अपने लिए ऐसा आत्मज्ञान अभी तक दुर्लभ ही बना हुआ है। ऐसा आत्मज्ञान कभी मिल भी सकेगा या नहीं इसमें पूरा-पूरा संदेह है। जब तक इस जगत में व्यथा वेदना का अस्तित्व बना रहेगा, जब तक प्राणियों को क्लेश और कष्ट की आग में जलना पड़ेगा, तब तक हमें चैन से बैठने की इच्छा न होगी। 

हमारी कितनी रातें सिसकती बीती है,कितनी बार हम बालकों की तरह बिलख-बिलख कर, फूट-फूट कर रोये इसे कोई कहाँ जानता है। लोग हमें संत, सिद्ध, ज्ञानी मानते हैं, कोई लेखक,विद्वान,वक्ता,नेता समझते हैं पर किसने हमारा अन्तःकरण खोल कर पढ़ा समझा है। कोई उसे देख सका होता तो उसे मानवीय व्यथा वेदना की अनुभूतियों से करुण कराह से हाहाकार करती एक उद्विग्न आत्मा भर इस हड्डियों के ढाँचे में बैठी बिलखती ही दिखाई पड़ती। कहाँ “कथित आत्म ज्ञान” और कहाँ हमारी करुण कराहों से भरी अन्तरात्मा। दोनों में कोई तालमेल नहीं। सो जब कभी सोचा यही सोचा कि अभी वह ज्ञान (आत्मज्ञान) हमसे बहुत दूर है। शायद वह कभी मिले ही नहीं क्योंकि इस दर्द में ही जब भगवान् की झाँकी होती है, पीड़ितों के आँसू पोंछने में ही जब कुछ चैन अनुभव होता है तो उस निष्क्रिय मोक्ष के लिए प्रयास करने को कभी मन चलेगा ऐसा लगता नहीं, जिसकी इच्छा ही नहीं वह मिला भी किसे है ?

जब भी प्रार्थना का समय आया, भगवान से यही निवेदन किया कि हमें चैन नहीं, वह करुणा चाहिए जो पीड़ितों की व्यथा को अपनी व्यथा समझने की अनुभूति करा सके, हमें समृद्धि नहीं वह शक्ति चाहिए जो पीड़ितों की आंखों के आँसू पोंछ सकने की सार्थकता सिद्ध कर सके। बस इतना ही अनुदान भगवान से माँगा और हमें लगा कि द्रौपदी को वस्त्र देकर लज्जा बचाने वाले भगवान हमें करुणा की अनन्त संवेदनाओं से ओतप्रोत करते चले आ रहे हैं। यह सोचने की कभी फुरसत ही नहीं मिली कि हमारा स्वयं का क्या कष्ट है, हमें कौन सी चीज़ की आभाव है। कभी ध्यान ही नहीं आया कि हमें भी कोई सुख साधन चाहिए।  हमारे रोम रोम में केवल पीड़ित मानवता की व्यथा वेदना ही समाई रही और यही सोचते रहे कि “अपने विश्वव्यापी कलेवर परिवार” को सुखी बनाने के लिए क्या किया जा सकता है। 

संसार से जो पाया उसका एक-एक कण हमने उसी प्रयोजन के लिए खर्च किया जिससे शोक संताप की व्यापकता हटाने और संतोष की साँस ले सकने की स्थिति उत्पन्न करने में थोड़ा भी  योगदान मिल सके।

हमारी उपासना और साधना साथ-साथ मिल कर चली है। परमात्मा को हमने इसलिए पुकारा कि वह प्रकाश बनकर आत्मा में प्रवेश करे और तुच्छता को महानता में बदल दे। उसकी शरण में इसलिए पहुँचे कि उस महत्ता में अपनी क्षुद्रता विलीन हो जाये। वरदान केवल यह माँगा कि हमें वह सहृदयता और विशालता मिले जिसके अनुसार “अपने में सब को और सब को अपने में” अनुभव किया जा सकना संभव हो सके। 24 महा गुरुचरणों का जप, ध्यान, तप, संयम सब इसी परिधि के इर्द-गिर्द घूमते रहे हैं।

गुरु के दास का नमन 

जय गुरुदेव 


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