वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परम पूज्य गुरुदेव की साधना के 100 वर्ष को समर्पित एक दिव्य लेख श्रृंखला का 11वां लेख-अमृत,पारस,कामधेनु और कल्पवृक्ष की लॉजिकल चर्चा 

“यज्ञ पिता-गायत्री माता” पुस्तक, गुरुदेव  द्वारा पंडित लीलापत शर्मा जी के जिज्ञासा भरे प्रश्नों के उत्तरों का समावेश है। हमारा सौभाग्य है कि

पिछले कुछ दिनों से हम इस पुस्तक के ज्ञान को समझने का प्रयास कर रहे हैं, ऑनलाइन सोर्सेज,साथिओं से प्राप्त हुए ज्ञान से, पुस्तक के एक-एक शब्द को समझने का प्रयास किया जा रहा है। ज्ञानप्रसाद लेख कोई साधारण लेख नहीं हैं,इन लेखों के पाठक इस तथ्य के साक्षी हैं।

आज के ज्ञानप्रसाद लेख में अमृत,पारस,कामधेनु और कल्पवृक्ष के प्रति   वर्षों पुरानी मूढ़ मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए लॉजिकल चर्चा की गयी है। 

हर बार की तरह आज भी यही निवेदन है कि हमारा प्रयास तभी सफल माना जायेगा जब इस ज्ञान को ठीक से समझा जाए और अंतरात्मा में उतारा जाए। 

तो आइए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा में गुरुचरणों में समर्पित होकर आज के गुरुज्ञान का अमृतपान करें और अपने जीवन को सफल बनाएं। 

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पंडित लीलापत शर्मा जी ने गुरुदेव से प्रश्न  किया कि गायत्री उपासना से अमरत्व की प्राप्ति होती है, गायत्री उपासना अमृतपान  के समान है,पारस नामी पत्थर के साथ छूने जैसी है,मायावी कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर कुछ भी प्राप्त करने जैसी है,कामधेनु नामी गाय का दूध पीकर चमत्कार करने जैसी है?

पंडित जी ने इन रहस्यों को विस्तार से समझाने के लिए,समाज में स्थापित हुई मूढ़ मान्यताओं के निवारण के लिए आग्रह किया।      

गुरुदेव ने कभी भी चमत्कार की बात नहीं की है,उन्होंने सदैव सच्ची श्रद्धा,निष्ठा,समर्पण,आदि की बात की है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से भी गुरुदेव के इसी सन्देश का प्रचार होता आया है। इस मंच पर से यहाँ तक संदेश दे दिया गया है कि गुरुदेव कोई जादुई शक्ति नहीं है, यह आपके अपने स्वयं के कर्म है। समय आपके पास है नहीं और आशा करते हैं कि आप छींक मारें और गुरुदेव आपके जुकाम को भी ठीक कर दें। हमारा गुरु न तो  फ्री है और न ही सस्ते में बिकने वाला है। “समर्पण दिखाओ,चमत्कार अपनेआप हो जायेगा।” 

आदरणीय लीलापत जी के प्रश्नों का उत्तर देते हुए गुरुदेव ने  कहा:

“देखो बेटे ! यह अमृत,पारस,कल्पवृक्ष,कामधेनु गाय जैसी किसी वस्तु या वृक्ष के नाम नहीं हैं। यह सभी अलंकारिक हैं, Ceremonial हैं, Symbolic हैं, साधकों के समझाने के लिए हैं। माता पिता छोटे बच्चे को समझाने  के लिए भांति-भांति के चमत्कारों की बात करते हैं, यह भी वही हैं। यह तो दिव्य विभूतियां हैं जो गायत्री उपासना से हमें प्राप्त होती हैं और हमारे जीवन को स्वर्गीय आनंद से परिपूर्ण कर देती हैं। जब हम एकाग्रचित्त होकर उपासना करते हैं, गायत्री माता से अपना कनेक्शन स्थापित करते हैं तो क्या होता है, सबसे पहले इसे समझने की आवश्यकता है।

उपासना (अर्थात पास बैठने) से हमारा परमेश्वर से संपर्क होता है और संपर्क से “आत्मबल की उपलब्धि” होती है। आग  के पास बैठने से यदि मनुष्य को गर्मी अनुभव न हो तो आग में तो कोई कमी नहीं है, आग तो आग ही है, कमी तो मनुष्य में है। 

आत्मबल बढ़ने से हमारा जीवन सुव्यवस्थित और परिष्कृत होता है जिसके फलस्वरूप प्रखरता, प्रामाणिकता और प्रतिभा की प्राप्ति होती है, जिससे हमें जनसम्मान एवं जनसहयोग मिलता है,पग-पग पर सफलताएं मिलती हैं,यश एवं कीर्ति मिलती है।

यही है गायत्री उपासना का Logical explanation, इसमें रत्तीभर का भी संदेह नहीं है। शनिवार वाले सेगमेंट को देखकर हमारे साथिओं ने स्वयं ही श्रम-श्रद्धा के  साक्षात् उदाहरण पर मोहर लगाई है। “गायत्री मंत्र के विज्ञान पक्ष की सरल चर्चा” को मिले 75000 व्यूज भी इसी श्रद्धा का प्रमाण हैं,यही चमत्कार है।      

श्रद्धापूर्वक की गयी गायत्री उपासना से हम लगातार प्रगति पथ पर अग्रसर होते हुए भौतिक समृद्धियों और आत्मिक विभूतियों को सहज ही प्राप्त करते हुए जीवन लक्ष्य की पूर्णता के निकट बढ़ते जाते हैं। मनुष्य, भौतिक सुख-सुविधाओं का ही तो भूखा है, विपत्ति- बाधाओं का निराकरण हो जाए, यही तो उसकी मांग है। बिना मांगें, निस्वार्थ भाव से, कर्म की थ्योरी का पालन करते हुए उसने कभी भी कोई भी उपासना नहीं की है। कोई बात नहीं,जैसे भी करे, गायत्री उपासना से उसके अनेकों  प्रयोजन पूरे हो जाते हैं। अमृत, जिसे इंग्लिश में Elixir,Nectar,Ambrosia कहते हैं, एक ऐसा ड्रिंक समझा गया है जिसे पीने से अमरत्व प्राप्त होता है, मनुष्य अमर हो जाता है। अमरत्व अर्थात “कभी भी न मरने की स्थिति” को न तो विज्ञान मानता  है और न ही अध्यात्म।  जो आया है उसका इस संसार से जाना निश्चित है। यदि ऐसा न हो तो सृष्टि वहीँ पर Stand still हो जाएगी।    

गुरुदेव कह रहे थे कि अमृत कोई पदार्थ न होकर “चेतना की एक स्थिति ही है।” गायत्री उपासक का अंतःकरण सदा ही आनंद (हम तो कहेंगें परम आनंद) व उल्लास से पुलकित रहता है। हम जीवन-मरण के चक्र में बार-बार फिरते रहते हैं। जिसे इस समय “हम” कह कर सम्बोधन किया जा रहा है वोह कौन है ? क्या हम शरीर को कह रहे हैं? नहीं। तो फिर क्या मन को कह रहे हैं ? नहीं, यह भी नहीं। तो फिर क्या आत्मा को कह रहे हैं ? हां,आत्मा ही तो हमारे शरीर के भीतर परमात्मा का अंश है। आत्मा अजर है, अमर है, इसकी मृत्यु नहीं होती,इसके लिए ही अमरत्व का विशेषण प्रयोग किया जा सकता है। मरता तो केवल  शरीर है, आत्मा शाश्वत है।  एक शरीर के समाप्त होने पर दूसरा शरीर धारण कर लेती है। मनुष्य की कमज़ोरी है कि वोह भ्रमवश शरीर को ही सब कुछ मान लेता है। आत्मा की ओर ध्यान ही नहीं देता। 

यहाँ स्मरण रखने वाली एक और बात है कि जन्म-मृत्यु का कांसेप्ट आत्मा से सम्बंधित है, यही कारण है कि जिन लोगों की आत्मा मर चुकी होती है उनके शरीर भी मरे हुए ही होते हैं। अपने आसपास दृष्टि घुमाकर देखें तो एक तरफ तो 30-40 वर्ष के अनेकों युवक मिल जायेंगें जिनमें सुस्ती, कमज़ोरी, आशक्ति,बुझे हुए चेहरे आदि दिखेंगें  जबकि दूसरी तरफ  85 वर्ष के स्वस्थ, शक्तिशाली, तेजोमय वरिष्ठ दिखेंगें। यह आत्मा का ही चक्र है। जब हम कह रहे हैं कि आत्मा अमर है तो यह तथ्य भी विश्वसनीय है कि ईश्वर अनेकों जन्मों तक अपना कार्य करवाते रहते हैं, परम पूज्य गुरुदेव इसके साक्षात् प्रमाण हैं।     

गुरुदेव कह रहे हैं कि जब हमें ज्ञान हो जाता है कि हम शरीर नहीं आत्मा हैं तो इसे ही चेतना का जागरण कहा जा सकता है। वैज्ञानिकों को समझ लेना चाहिए यही अमरत्व है, उपासना की उपलब्धि है। गायत्री उपासना से हमें यही प्रेरणा, दिशा एवं सुविधा प्राप्त होती है।

पंडित जी ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि गायत्री को कामधेनु भी कहते हैं। कामधेनु गाय का दूध भी अमृत समान माना गया है, इससे भी अमरत्व प्राप्त होता है?  गुरुदेव इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि गायत्री उपासना से दुर्भावनाएं हमारे ऊपर हावी नहीं हो पातीं। कहा जाता है कि देवता लोग कामधेनु गाय का दूध पीते हैं। यह अलंकारिक वर्णन है। 

कामधेनु का बहुत ही सटीक Explanation देते हुए गुरुदेव कहते हैं :  

हम अपने अंदर देवताओं जैसी चेतना जाग्रत कर लें तो हम भी देवता बन सकते हैं। अमरत्व और देवत्व (देवताओं जैसा) एक ही बात है । देवताओं को मनुष्य की अपेक्षा अधिक समर्थ, संपन्न और संतुष्ट माना गया है। हमेशा देने की आकांक्षा रखना,देते रहना देवताओं का धर्म है। जब गायत्री माता की कृपा से हमारे भीतर “यह आत्मज्ञान जागृत” हो जाता है तो देवत्व की,अमरत्व की सहज ही उपलब्धि हो जाती है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से हमेशा “देने” के सन्देश का ही आग्रह होता रहता है। जो साथी अपना समय,श्रम,विवेक,बुद्धि का दान देकर सहयोग कर रहे हैं, अपनेआप को देवता कह कर गर्व अनुभव करें तो कोई गलत बात नहीं है। 

पंडित जी ने अपनी अगली जिज्ञासा वयक्त करते हुए पूछा कि गुरुदेव फिर तो पारस पत्थर भी कहीं नहीं होता होगा? गुरुदेव ज़ोर से हँसे  और बोले:

क्या सोना बनाने का धंधा करने की इच्छा है। यदि ऐसा है तो फिर निराशा ही हाथ लगेगी। आज तक तो कहीं पारस पत्थर के अस्तित्व का पता ही नहीं चला है। बच्चों को बहलाने के लिए कुछ काल्पनिक कहानियों में इसका वर्णन अवश्य आता है। तुम खोज सको तो खोज लेना। कहा जाता है कि पारस के छू लेने से लोहे जैसी काली-कलूटी, कुरूप और सस्ती धातु सोने के समान सुंदर, बहुमूल्य और चमकदार बन जाती है।”

गायत्री उपासना से हमें पारस की प्राप्ति होती है,इसका अर्थ यह है कि हमें पारस पत्थर की,सोना बनाने वाली शक्ति प्राप्त हो जाती है। हम घटिया से,काले कलूटे व्यक्तित्व से परिष्कृत होकर सोने जैसे ऐसे चमकदार बन जाते हैं कि हमारी विश्व्यापी प्रशंसा होती है। इतना ही नहीं, गायत्री उपासना से परिष्कृत हुआ व्यक्ति अपने संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति को आध्यात्मिक दृष्टि से सुंदर,बहुमूल्य व चमकदार बनाता जाता है।

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से इसके साक्षात् परिणाम दिखते  ही जा रहे हैं। 

हमारा पुरुषार्थ ही वह पारस है जो संकल्प, साहस, उल्लास, आशा, उमंग आदि की अंतःक्षमताओं के रूप में विकसित होता है और  आलस्य, प्रमाद, आत्महीनता व असंयम को नष्ट करता है। पारस का महत्व इसीलिए है कि वह लोहे की तुच्छता को सोने की महानता में, चमक में बदल देता है। पुरुषार्थ जगने पर अंधेरे में भटका हुआ वर्तमान समय  उज्जवल भविष्य में परिणित होता हुआ दृष्टिगोचर होता है। 

गुरुदेव ने पूछा:तो बेटे ! तुम्हें कौन सा पारस चाहिए? सोना बनाने वाला यां पुरषार्थ वाला?

पंडित जी ने उत्तर दिया: 

गुरुदेव, पुरुषार्थ वाला पारस ही सर्वोत्तम है। यह तो हमारे लोक परलोक दोनों को स्वर्णिम आभा से आलोकित कर सकता है।

गुरुदेव मुस्कराए और आगे बोले:

बेटे ! यही बात कल्पवृक्ष के संबंध में भी अप्लाई होती है। पौराणिक कथाओं में वर्णन है कि स्वर्ग में एक कल्पवृक्ष है जिसके नीचे बैठकर जो भी कामना की जाए वह पूरी हो जाती है,जो भी माँगा जाए मिल जाता है। स्वर्ग में होता होगा,धरती पर तो ऐसा कुछ भी नहीं दिखता। मनुष्य की कामनाओं की कोई सीमा थोड़े है, उसने अपनी कामनाओं को इतना अधिक विस्तार दे दिया है कि यदि सचमुच का कल्पवृक्ष होता तो वह भी उन्हें पूरा न कर पाता। बेटे, कल्पवृक्ष “परिष्कृत व्यक्तित्व” का ही अलंकारिक रूप है। माँ गायत्री का उपासक कभी भी इतना छोटा चिंतन नहीं करता। उसे चाहिए ही क्या? जीवन की आवश्यकताएं तो बहुत ही थोड़ी हैं। मनुष्य का पेट, हाथ-पैर, मस्तिष्क आदि सब मिला दिए जाएँ तो बहुत थोड़े से  श्रम से सभी शारीरिक आवश्यकताएं सहज ही पूरी हो सकती हैं। उसकी सबसे बड़ी मूर्खता है कि वह अनावश्यक,असीमित  कामनाओं के बोझ को अपने ऊपर लादे रहता है और उनकी पूर्ति के लिए उचित,अनुचित हर साधन अपनाता है। औसत भारतीय के स्तर की आवश्यकताएं ही यदि पर्याप्त समझी जाएं तो ज़रा भी कठिनाई नहीं होगी लेकिन  निरर्थक कामनाओं को बढ़ाते जाना और उनको तुरत-फुरत पूरी करने के लिए आकुल व्याकुल रहना, केवल विपत्तियों को आमंत्रण देना ही है। सोमवार को शिवलिंग पर जल चढ़ाना, मंगलवार को हनुमान जी के आगे नाक रगड़ना, बुधवार को किसी अन्य देवता से भीख मांगना, बच्चे को IIT में एडमिशन दिलाना, बेटी को अमेरिका भेजना आदि मांगों का एक फैशन बन चुका है। देवी देवताओं के आगे नाक रगड़ने से कुछ भी होने वाला नहीं है। इस मंच से केवल एक ही सन्देश प्रसारित किया जाता रहा है और रहेगा: God helps those who help themselves, सही नीयत, सही श्रद्धा, सही पुरुषार्थ से किया गया कार्य ही कल्पवृक्ष के समान है, ऐसे भक्तों के लिए भगवान खुद दौड़ें आते हैं क्योंकि Work is worship,संकल्पित कार्य ही सबसे बड़ी पूजा है। देव बुद्धि के देवता लोग अपने को इस जंजाल से बचाकर रखते हैं। वे अपने “परिष्कृत व्यक्तित्व” रूपी कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर अत्यंत आवश्यक और सीमित कामनाएं ही करते हैं जो स्वतः ही पूरी हो जाती हैं,उन्हें मांगना नहीं पड़ता क्योंकि भगवान भी जानते हैं कि उनका राजकुमार कोई भिखारी नहीं है। इसी का नाम निष्काम भक्ति है, काम-वासना रहित भक्ति। पिता से कभी भी कुछ मांगने की कहाँ कुछ भी आवश्यकता होती है।

माँ गायत्री की कृपा से प्रेरित हुई सद्बुद्धि से यह निष्काम भाव जाग्रत होता है। यही कल्पवृक्ष है। 

गायत्री की उपासना से मनुष्य को अमृत,पारस,कल्पवृक्ष,कामधेनु रुपी ऐसी विभूतियां प्राप्त होती हैं जिनसे वह निश्चिंत रहता है, निर्द्वद्व विचरता है और शांतिपूर्ण जीवनयापन करता है।

अवश्य ही हम सब ऐसा सुखमय जीवनयापन करना चाहते हैं, बिल्कुल शंकारहित हैं न, बिलकुल सच्ची बात, यह सब कर्तव्यनिष्ठ होकर प्राप्त हो सकता है। 

जय गुरुदेव   


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