“यज्ञ पिता-गायत्री माता” पुस्तक, गुरुदेव द्वारा पंडित लीलापत शर्मा जी के जिज्ञासा भरे प्रश्नों के उत्तरों का समावेश है। हमारा सौभाग्य है कि
पिछले तीन सप्ताह से हमने इस पुस्तक के ज्ञान को समझने का प्रयास किया, ऑनलाइन सोर्सेज,साथिओं से प्राप्त हुए ज्ञान से, पुस्तक के एक-एक शब्द को समझने का प्रयास किया गया।
16 ज्ञानप्रसाद लेखों की इस अद्भुत श्रृंखला का आज समापन अंक प्रस्तुत किया गया है। आज का लेख इतना प्रैक्टिकल एवं सार्थक है कि बहुत ही सरल प्रश्न, “हमारी गायत्री साधना का फल क्यों नहीं मिल रहा ?” का उत्तर मिल रहा है। गुरुदेव बता रहे हैं कि मंत्र जप तो हो रहा है, उँगलियाँ तो फिर रही हैं, उच्चारण भी पूरी स्पीड से हो रहा है लेकिन मन कहीं शेयर मार्किट के उतार चढ़ाव में भटक रहा है, माँ गायत्री से सौदेबाज़ी हो रही है कि यदि 2 करोड़ का लाभ हो गया तो 2000 रुपए की मिठाई चढ़ाऊंगा, माँ इतनी गरीब है कि वह खुद खरीद कर मिठाई भी नहीं खा सकती? जो सारी सृष्टि को खिलाती है, तू उसे खिलाने चला है !! यह गायत्री साधना नहीं है,कोरी घूसखोरी है।
आज के लेख में ऐसी ही कुछ चर्चा है।
लेख श्रृंखला के समापन के साथ ही आदरणीय बहिन संध्या जी का ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं जिनकी प्रेरणा एवं पुरुषार्थ से इस लेख श्रृंखला की रचना हो पायी।
ज्ञान से भरपूर हमारे समर्पित साथिओं के कमेंटस इस लेख श्रृंखला की रचना के पीछे “एक शक्तिशाली Driving force कवच” प्रदान करते रहे, यही वोह Driving force है जिसने “गायत्री मंत्र के विज्ञान पक्ष” लेख को 72000 साथिओं का समर्थन दिलवाया।
बहिन सुमनलता जी ने शंख से ॐ सम्बन्धी कमेंट किया था जिससे प्रेरित होकर हमने एक बहुत ही संक्षिप्त से लेख की रचना की है जिसे कल प्रस्तुत करने की योजना है।
गुरुकुल की गुरुकक्षा में गुरुचरणों में समर्पित होकर गुरुज्ञान के अमृतपान का सौभाग्यशाली समय हम शिष्यों का पुकार रहा है, आओ चलें गुरुमंदिर की ओर।
*****************
पंडित लीलापत शर्मा जी ने गुरुदेव से पूछा, “पूज्यवर, लाखों व्यक्ति गायत्री मंत्र का जप करते हैं फिर भी सदा कष्ट में ही दिखाई देते हैं। इस मंत्र का कोई प्रत्यक्ष फल तो दिखाई ही नहीं देता। यह मंत्र फलीभूत कैसे होता है ?कृपया विस्तार से समझाएं ।”
गुरुदेव मुस्कराए और बोले:
बेटे, मैं तुमसे इसी प्रश्न की आशा कर रहा था, तुम ठीक कहते हो लाखों करोड़ों व्यक्ति गायत्री मंत्र का जाप करते हैं । 1,3,11,24 माला तक रोज जपते हैं,अधिक भी जपते हैं, अनुष्ठान तक कर लेते हैं लेकिन परिणाम ज़ीरो ही रहता है। ऐसा क्यों होता है ?” बेटे, लोग जानते ही नहीं हैं कि गायत्री मंत्र का जाप कैसे करें। उनके लिए मंत्र जाप केवल दिखावा मात्र ही होता है। बैठे माला फेर रहे हैं, लोग समझते हैं कि बहुत बड़े भक्त हैं लेकिन सच पूछो तो वे जप कर ही नहीं रहे हैं। माला हाथ में चल रही है, होठों से मंत्र की ध्वनि भी आ रही लेकिन मन तो कहीं और घूम रहा है। इस प्रकार प्रभु का स्मरण नहीं होता,गायत्री मंत्र का जप नहीं होता। जब तक एकाग्रचित्त होकर जप नहीं होगा, कुछ भी लाभ नहीं ।
जप के सार्थक परिणाम तभी अनुभव होंगे जब माला, होंठ,जिह्वा, कंठ, चित्त और मन सब एक साथ फिरते हैं। सभी एक ताल से, एक स्वर से, एक तरंग से कार्य करते हैं। ऐसा जप करते ही उसका प्रभाव मन पर पड़ना शुरू हो जाता है। मन सात्विक गुणों से भरजाता है। मन गायत्री मंत्र के आदेशों का, वेदमाता गायत्री के निर्देशों का पालन करने को लालायित हो उठता है।
मां गायत्री का सबसे बड़ा आदेश सद्बुद्धि की प्राप्ति ही है, हम सब इसीलिए तो गायत्री उपासना करते हैं लेकिन मन की चंचलता बाधक बनती ही रहती है।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से न जाने कितने ही लेख “मन की चंचलता एवं इसके निवारण” के लिए प्रकाशित किए जा चुके हैं, हमारे पाठक प्रशिक्षित भी हो चुके हैं, इसलिए फिर से दोहराना अनुचित होगा।
सद्बुद्धि की देवी मां गायत्री की कृपा से,सद्बुद्धि से मन के भागते घोड़ों को लगाम लगा कर वश में किया जा सकता है। मन के वश में होते ही सद्बुद्धि का अभिवर्धन होता है। साधक गायत्री मंत्र के निर्देशों का पालन करने में मन लगाना शुरू करता है और मंत्र भी अपना फल दिखाना शुरू कर देता है,सारे शरीर में एक इलेक्ट्रिक करंट सी,कम्पन सी अनुभव होना शुरू हो जाती है।
मन को वश में करने के लिए बड़ा संघर्ष करना पड़ता है, बहुत बड़े साहस और पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है ।
“हां गुरुदेव ! आप ठीक कह रहे हैं, यदि आपकी आज्ञा हो तो डबरा की एक घटना बताना चाहता हूं।
गुरुदेव की आज्ञा पाकर पंडित जी ने वह घटना सुनाई:
जब हम डबरा मिल में थे तो सुबह घूमने जाते थे। पास ही एक आश्रम था जहां दो सन्यासी रहते थे। एक बार उधर गए तो वहां पर छोटे सन्यासी ही थे। बड़े सन्यासी जी दिखाई नहीं दिए। पूछने पर छोटे ने बताया कि वे कोठरी बंद करके साधना कर रहे हैं। कोठरी के दरवाजे के पास कान लगाकर सुना तो अंदर से आवाज आ रही थी “खा ले, खाता क्यों नहीं।” तीन दिन तक ऐसे ही चलता रहा। चौथे दिन बड़े सन्यासी जी बाहर आए तो हमने पूछा कि यह आप कैसी साधना कर रहे थे?
स्वामीजी हमें उस कोठरी में ले गए, हमने देखा कि चारों ओर तरह-तरह की मिठाइयां रखी थीं,कमरा स्वादिष्ट पकवानों की सुगंध से भरा हुआ था । हमने पूछा कि यह सब क्या है तो उन्होंने बताया कि हम अपने मन को वश में करने की साधना कर रहे थे। मन हर समय मिठाई व चटपटी चीज़ों के पीछे भाग रहा था। मन ने हमें अपना गुलाम बना रखा था। मन को अपना दास बनाने के लिए हमने यह साधना की। चारों ओर मिठाई पकवान रख के बीच में बैठ गए। साथ में एक गिलास में नीम की पत्तियों का रस भी रख लिया । जब भी मन मिठाई खाने को दौड़ता तो हम मुंह में दो घूंट नीम का रस डाल लेते, फिर मन से कहते “खा ले, खाता क्यों नहीं” इसी तरह तीन दिन बीत गए। अब मन पूरी तरह से हमारे बस में है, हमारा गुलाम हो गया है।
पंडित जी की कहानी सुनकर गुरुदेव बोले:
बेटा बिना संघर्ष, साहस और पुरुषार्थ के जीवन में कुछ भी नहीं हो सकता। गायत्री मंत्र से हमें यही शिक्षा मिलती है। ‘भर्गः” हमें बुराइयों से लड़ने की एवं उनसे बचाने की प्रेरणा देती है। समाज में व्याप्त बुराइयों से टक्कर लेना, प्रचलित कुप्रथाओं को तोड़ना ही सही अर्थों में भगवान की आराधना है । जो भी ऐसा कर लेता है समझो उसे गायत्री मंत्र फलीभूत हो रहा है। गायत्री माता के निर्देशों का पालन करने से ही यह मंत्र फलीभूत होता है, केवल जपने से तो कुछ भी नहीं होता ।
भगवान राम ने गुरु वशिष्ट के आश्रम में रहकर गायत्री मंत्र की साधना की, संदीपन ऋषि ने भगवान कृष्ण को इसी मंत्र की साधना कराई। दोनों ने ही इस मंत्र को अपने जीवन में उतार लिया था। हर कार्य उसी के निर्देशों के अनुसार करते थे तभी तो महापुरुष हुए,इसीलिए आज हजारों वर्ष बाद भी उनकी पूजा की जाती है ।
एक बार गांधीजी को दिल्ली के तिबिया कालेज के उद्घाटन समारोह में विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया। वहां अधिकतर मुसलमान ही थे। गांधीजी ने दीप जलाकर उद्घाटन किया और फिर गायत्री मंत्र के सिद्धांतों पर प्रकाश डालना प्रारंभ कर दिया। वहां उपस्थित मुसलमानों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यह तो हिंदुओं का मंत्र है। गांधीजी मेडिकल के छात्रों को स्वास्थ्य संबंधी बातें ही बताएं। इस पर गांधीजी ने कहा कि गायत्री मंत्र केवल हिंदुओं का ही नहीं बल्कि संसार के प्रत्येक व्यक्ति के लिए है। इस मंत्र का चिंतन मनन व ध्यान करने से, इसके आदेशों व निर्देशों का पालन करने से मनुष्य सदा स्वस्थ व सुखी रहता है। यह सद्बुद्धि प्राप्त करने का मंत्र है, सद्बुद्धि अर्थात उत्तम बुद्धि की सभी को ज़रूरत है, मेडिकल के डॉक्टरों को भी।
कहने को तो कुछ अटपटा सा लगता है कि गायत्री मंत्र से व्यक्ति रोगग्रस्त नहीं होता लेकिन यदि इसे गहराई से समझा जाये तो निष्कर्ष यही निकलता है कि सद्बुद्धि होगी तो रोग पास ही नहीं टिकेगा। जो मनुष्य संयम,परहेज़ आदि का पालन करता है,शुद्ध आहार, शुद्ध आचरण का पालन करता है उसके पास बीमारियां कम आती हैं। संयम,कण्ट्रोल आदि से इम्युनिटी बढ़ती है।
आजकल तो हर कोई स्ट्रैस को लेकर रोए जा रहा है, अगर सद्बुद्धि है तो स्ट्रैस के कारण ढूंढने में समय लगाना चाहिए, लेकिन समय का ही तो आभाव है- Look busy do nothing वाला फार्मूला तो बहुत ही प्रचलित है। घर के कामों से लेकर ऑफिस तक, सब कुछ मशीनें कर रही हैं तो भी समय न होना हास्यास्पद नहीं तो और क्या है।
बहुत पुरानी बात नहीं है, इन पंक्तियों को पढ़ रहे वरिष्ठ साथिओं को अपने बाल्यकाल,यौवन के दिन स्मरण हो आये होंगें जब “श्रम देवता” का पूर्ण सम्मान होता था। सभी परिवारजन दिन भर कड़ी मेहनत करते थे,“श्रमदेवता की उपासना” करते थे, Immune system शक्तिशाली होता था।
जो लोग गायत्री मंत्र के निर्देशों का पालन नहीं करते हैं,सविता सूर्य की भांति सदा नियम पूर्वक श्रम नहीं करते, उनमें तेज व प्रकाश उत्पन्न नहीं होता ।
हम सब जानते हैं कि रावण ने कितनी बड़ी उपासना-साधना की, सर्वश्रेष्ठ विद्वान था,अतुलित धनबल, शरीरबल का स्वामी था लेकिन सद्बुद्धि के अभाव में उसका क्या हुआ हम सब जानते हैं।
गुरुदेव की शिक्षा के अनुसार जितना गायत्री मंत्र का जप ज़रूरी है उससे कहीं ऊपर मनुष्य के आचरण का भी योगदान है, तभी कहीं जाकर गायत्री साधना का फल मिल पाता है।
गुरुदेव के विचार क्रांति अभियान की नींव ही सद्बुद्धि पर ही टिकी है। आजकल वैचारिक प्रदूषण (Thought pollution) ने, टेक्नोलॉजी ने, AI ने मनुष्य के मस्तिष्क को Pollute करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है और सबसे बड़ी हास्यास्पद बात तो यह है कि हर कोई बिना वाद विवाद के Accept किए जा रहा है। हर कोई Acceptance mode में है क्योंकि विरोध के लिए संघर्ष चाहिए, साहस चाहिए, हिम्मत चाहिए।
ऐसी गायत्री उपासना किस काम की जो सद्बुद्धि प्रदान करने में असमर्थ रहे, ऐसी उपासना कैसे होगी फलीभूत? वर्षों से माला फेर रहे हैं, वर्षों तक फेरते रहेंगें बिना किसी तर्क के, बिना किसी रिजल्ट्स के !
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के ज्ञानप्रसाद लेखों में मंदिर में मिलने वाले स्वादिष्ट प्रसाद की ही शक्ति समाहित है, तभी तो सोए हुए जाग उठते हैं, उठे हुए भाग पड़ते हैं क्योंकि गुरुकार्य ही सर्वोपरि है।
धन्यवाद् जय गुरुदेव
समापन
