वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

आदरणीय चिन्मय जी से मिलना बिलकुल अविश्वसनीय,आश्चर्यजनक किन्तु सत्य रहा 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का एक-एक साथी जानता है कि हर महीने के अंतिम शनिवार को छोड़ कर बाकि के सभी शनिवारों को इस मंच से स्पेशल सेगमेंट प्रस्तुत किये जाते हैं जिसमें पूरे का पूरा योगदान इस परिवार के समर्पित साथिओं का ही होता है, कोई अपने घर में हो रहे यज्ञ की बात करता है, कोई क्षेत्र में नशामुक्ति की बात करता है,कोई अपनी बाल संस्कार की बात करता है, सभी प्रकार की गतिविधियों के साथ-साथ परिवार को और अधिक सक्रीय बनाने के लिए,सोशल मीडिया साइट्स पर साथिओं को आ रही कठिनाइओं को यथासम्भव समझने एवं उन कठिनाईओं के समाधान का भी प्रयास किया जाता है। ओवरआल प्रयास यही रहता है कि यह परिवार दिन दुगनी रात चौगनी प्रगति करते हुए, गुरुकार्य में अपना योगदान  देकर मानसिक शांति प्राप्त करे। व्यक्ति खुश तो परिवार खुश,परिवार खुश तो समाज खुश, समाज खुश तो देश खुश, देश खुश तो विश्व खुश, इसी खुशहाली, इसी विचार क्रांति की तो हमारे गुरु ने बार-बार बात की है। 

जहाँ हम परिवार की बात कर रहे हैं तो परिवार के दुःख सुख से भी अटूट बंधन से जुड़े हुए हैं। 

संसार है इक  नैया, सुख दुःख दो किनारे हैं के शब्दों को सार्थक कर रहा आदरणीय चंद्रेश जी का परिवार जहाँ उनके बहनोई आद शील कुमार सिंह जी का मात्र 55 वर्ष  की आयु में दुःखद निधन हुआ है। RIP(?),दिवंगत आत्मा को शांति मिले,गुरुदेव अपने चरणों में स्थान दें आदि दुःखद संदेशों का प्रचलन है लेकिन इस परिवार के मंच से दिया जाने वाला सन्देश यही कह रहा है कि जाने वाले  का जो दुःख सगे सम्बन्धिओं को होता है उससे बढ़कर अन्य किसी को नहीं हो सकता। किसी के घर की चिराग बुझ जाता है तो किसी के बच्चे अनाथ हो जाते हैं, किसी की पत्नी विधवा हो जाती है, कोई पिता पुत्रहीन हो जाता है, जितना आत्मिक सम्बन्ध उतना ही दारुण दुःख। लेकिन एक शाश्वत सत्य जिसे कोई नकार नहीं सकता,वोह है :जो आया है उसका जाना निश्चित है, यह तो मात्र एक पड़ाव है। परिवार की ओर  से श्रद्धांजलि प्रदान की जा रही है। 

आइए परिवार के इस स्पेशल सेगमेंट को आगे बढ़ाएं। 

उपरोक्त पंक्तियों में लिखा गया है कि यह सेगमेंट साथिओं के लिए रिज़र्व किया हुआ है, हमारे लिए अंतिम शनिवार रिज़र्व है लेकिन उस प्रथा में थोड़ा बदलाव लाने के लिए साथिओं से क्षमाप्रार्थी हैं क्योंकि आज हम कुछ अपनी ही व्यक्तिगत बात कर रहे हैं। आप पूछेंगें कि आज तो दूसरा शनिवार है, परिवार के साथिओं का दिन,तो इसका उत्तर यही दे रहे हैं कि हम भी तो परिवार के ही साथी हैं। पूर्णतया व्यक्तिगत बातों का,गपशप आदि का तो यहाँ पर समर्थन नहीं होता लेकिन कुछ ऐसी व्यक्तिगत बातें जिनका गुरुदेव से सीधा सम्बन्ध हो करने में कोई मनाही नहीं है। 

उसी Permission के साथ आज हम एक ऐसी अविश्वसनीय, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य घटना का विवरण दे रहे हैं जो आदरणीय चिन्मय जी के नार्थ अमेरिका के तूफानी दौरे से सम्बंधित है, हमारे साथ, स्वयं के साथ सम्बंधित है। इस विवरण में  एक-एक, छोटी से छोटी घटना की चर्चा की गयी है, आशा करते हैं साथी हमें क्षमा करेंगें। 

आइये चिन्मय जी के साथ कनाडा की यात्रा का आँखों देखे  हाल का आनंद उठाएं। शांतिकुंज के आद अल्पेश पटेल  जी द्वारा समाचार मिलता है कि चिन्मय जी मोंट्रियल नगर में हैं। इस तरह अचानक से समाचार मिलना हमारे लिए हैरानगी का विषय था क्योंकि चिन्मय जी के प्रोग्राम तो महीनों पहले प्लैन हो जाते हैं। हमसे तो रुका नहीं गया हमने फट से उन्हें एक लाइन का मैसेज किया कि आप कनाडा में हैं तो हमारे पास आने का क्या प्रोग्राम है? उनका कुछ ही मिनटों में रिप्लाई आता है: भाई साहिब मैं कल मोंट्रियल आया था और कल टोरंटो आ रहा हूँ। बस फिर क्या था हमने उनसे मिलने के लिए War footing पर कार्य शुरू कर दिया। मधु भाई साहिब, राकेश भाई साहिब एवं अन्य सभी साथिओं को मैसेज भेज किये  कि चिन्मय जी के प्रोग्राम की जानकारी दें। 

यहाँ  पर एक जानकारी वर्णन करने योग्य है कि हमें इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली ? ऐसा इसलिए था कि राकेश जी और मधु भाई हमें जानकारी देते थे लेकिन अब उन दोनों ने यह कार्य युवा साथिओं को सौंप दिया था,इन्होने हमारा नाम Mailing लिस्ट में शामिल ही नहीं किया था। 

खैर जो भी हो, राकेश जी का शार्ट मैसेज आया: भाई साहिब आज में कुछ मीटिंग्स में बिजी हूँ, आपको बाद में लिखता हूँ। लेकिन हमें कहाँ चैन था, हमारे लिए इंतज़ार करना कितना कष्टदायक था, हम ही जानते हैं। यह हमारी प्रकृति और प्रवृति है,क्या करें इस पर हमारा कोई भी कण्ट्रोल नहीं है, क्षमाप्राथी है। 

हमने चिन्मय जी को फिर मैसेज कर दिया कि टोरंटो में कहाँ आ रहे हैं, क्या प्रोग्राम है और जगहों के क्या एड्रेस हैं। चिन्मय जी का एक फिर से रिप्लाई आता है: भाई साहिब अलग-अलग ग्रुप, अलग-अलग स्थानों  पर संक्षिप्त से आयोजन कर रहे हैं, मुझे कुछ अधिक जानकारी नहीं है। 

हमारे ह्रदय में चिन्मय जी को  मिलने की तृष्णा इस स्तर की थी कि हम हर सम्भव प्रयास कर रहे थे। अपने से ही बात भी करे जा रहे थे कि अगर गुरु ने चाहा तो कोई रोक नहीं पायेगा और हुआ भी कुछ ऐसा ही। शाम को  राकेश जी ने फ्री होकर 3 लिंक भेजे, फ़ोन करके  क्षमा याचना भी की, कहा कि चिन्मय जी केवल एक दिन के लिए ही टोरंटो एरिया में हैं इसलिए आपको जहाँ भी सुविधा लगे आप जा जाइये, आपका स्वागत है। 

हमारी प्रवृति है कि ज्ञानप्रसाद लेखों की तरह सभी कार्य Well in advance होने चाहिए, तभी बिना भगदड़ मचाये मज़ा आता है। 

राकेश जी की जानकारिओं के आधार पर सोमवार सुबह 10 बजे Waterdown town में मनीष जी के घर चिन्मय जी के दर्शन करने की योजना बनी। हमारे घर से लगभग 100 किलोमीटर दूर, एक घंटे की ड्राइव थी। सोमवार को सुबह साढ़े आठ बजे हमारी Aquafit class होती है, उसे भी रात 12 बजे से पहले कैंसिल करना था नहीं तो फाइन हो जाता है। सोमवार के ज्ञानप्रसाद लेख को लिखने के लिए भी समय बचाना था। रात को कुछ घंटे सोना भी ज़रूरी था, सुबह गाड़ी भी तो चलानी थी और वोह भी हाईवे पर। 

ऐसा लग  रहा था कि गुरुवर स्वयं ही सब कुछ किये जा रहे हैं। विश्वास ही नहीं हो रहा था कि सभी संयोग कैसे बने जा रहे हैं। मेरे गुरु ने सोचा की बेटे को शांतिकुंज आये 7 वर्ष हो गए हैं तो क्यों न मैं खुद ही चिन्मय जी के रूप में दर्शन दे दूँ।  बिलकुल ऐसा ही हुआ, और वह भी एक बार नहीं दो-दो बार। 

आशा कर रहे हैं कि आँखों देखा हाल रोचक है। 

सोमवार की सुबह 9 बजे घर से निकल गए थे और पूरे 10 बजे हम मनीष जी के घर पंहुच गए थे। उनकी बेसमेंट में कोई 50 के  लगभग परिजन बैठे होंगें। चिन्मय जी कुर्सी पर विराजमान थे.ओमकार जी अपनी मण्डली के साथ भूमि  पर आसन जमाये बैठे थे। 

ऐसे आयोजनों में हमारा एक उद्देश्य यह भी होता है: चिन्मय जी के दिव्य भाषणों और ओंकार जी के क्रांतिकारी प्रज्ञागीतों की रिकॉर्डिंग। 

ओंकार जी ने शांतिवन को बेस बनाकर “शांतिकुंज गुरुकुल है पावन” प्रज्ञागीत गाकर न केवल  हम सबको कृतार्थ किया बल्कि शुरू में ही हमारे  बारे में सभी को परिचित कराया। हमने गीत रिकॉर्ड किया और ऊपर टॉयलेट के लिए गए, टॉयलेट से निकल रहे थे तो चिन्मय जी के साथ मात्र 5 मिंट ही बात हुई। हमारे परिवार का, नीरा जी के बारे में पूछा, हमने भी उनका कुशल मंगल पूछा। नीचे आकर उन्होंने अपना संक्षिप्त सा उद्बोधन सुनाया और वहीँ से हम सबको छोड़कर वोह आगे के लिए रवाना हो गए। किसी  के साथ कोई भी बात न हुई। 

हम वहां से 11 बजे चल कर 12 बजे घर पंहुचे और ज्ञानप्रसाद लिखने में व्यस्त हो गए। 

तो साथिओं हुई न बिलकुल अविश्वसनीय, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य ?

उससे भी आश्चर्यजनक वैंकुवर वाला मिलन था, भगवन कैसे-कैसे संयोग बना देते हैं, विश्वास और भी अटल हो जाता है। 

गुरुवार 4 जून सुबह 9 बजे हमारी वैंकुवर के लिए फ्लाइट थी। 7 बजे एयरपोर्ट पंहुचना था। घर से हम दिव्य सन्देश, ज्ञानप्रसाद लेख आदि को ऑफलाइन करके ले चले थे कि  प्लेन में इंटरनेट तो होगा नहीं  और वैंकुवर पंहुचने के कुछ समय बाद ही ज्ञानप्रसाद पोस्ट होना था। 

वर्षों से वैंकुवर आ रहे हैं लेकिन पहली बार हुआ कि Porter Airlines जिसमें हमने  पहली बार यात्रा की, फ्री Wifi उपलब्ध था। फिर क्या था,पता नहीं हमें कैसे ख्याल आ गया, हमने 9:00 बजे  चिन्मय जी को मैसेज किया कि आप Coast to Coast कनाडा की यात्रा कर रहे  हैं तो क्या वैंकुवर आने का भी कोई प्रोग्राम है ? एक घंटे के अंदर ही चिन्मय जी का रिप्लाई आ गया कि हमारा कल शाम का  प्रोग्राम वैंकूवर में ही है। हमने फिर से Stupid प्रश्न किया कि Venue वगैरा की जानकारी मिल जाती तो बहुत अच्छा होता ,Stupid इसलिए कि उन्हें कहाँ  पता होता है कि क्या क्या कुछ प्लॉन किया हुआ है। लेकिन फिर भी उन्होंने मयूर से संपर्क करने का रिप्लाई कर दिया। 

अब तो फ़ोन ही होने थे,वैंकूवर तो बड़ी बार आये थे लेकिन यहाँ के गायत्री परिवार की कोई जानकारी नहीं थी। फ्लाइट में सारी रिसर्च पूरी कर ली और Deplane होते ही लक्ष्मी नारायण मंदिर को फ़ोन करने का पहला काम किया। मंदिर तो बहुत थे लेकिन लक्ष्मी नारायण का ही ख्याल कैसे आया? (हुआ न एक और संयोग?) मंदिर वालों ने यह कह कर कि आरती हो रही है, फ़ोन काट दिया। कुछ समय बाद, गायत्री प्रोग्राम के बारे में जानने के लिए  दूसरी बार फिर से फ़ोन किया, कुछ रूखा सा रिप्लाई मिला और फ़ोन बंद कर दिया। थोड़ी देर बाद तीसरी बार फिर से फ़ोन किया,जानकारी मिली कि शाम 5:30 से 7:30 बजे प्रोग्राम तो है लेकिन क्या है हमें कोई जानकारी नहीं है। हम अनमने मन से प्रयास करते रहे, बेटे को बताते रहे कि शाम को जाना तो है लेकिन पूरी इनफार्मेशन लेने का प्रयास कर रहे हैं। चौथी बार फिर से फ़ोन किया तो मंदिर वालों ने दो फ़ोन नंबर नोट कराए।यह नंबर गायत्री परिवार वैंकूवर के मयूर पटेल और रोहन शर्मा के थे। यहाँ पर गायत्री परिवार अभी बहुत ही Initial स्टेज में है। पांचवीं बार मयूर भाई साहिब को फ़ोन किया तो वोह ड्राइव कर रहे थे। थोड़ी सी बात हुई,बाद में फ़ोन करने को कहा। थोड़ी देर बाद छठी बार फिर से फ़ोन किया, मयूर भाई साहिब अभी भी ड्राइव कर रहे थे लेकिन उन्होंने Flyer भेज दिया जिस पर सारी  जानकारी थी।

बस अब क्या था, अब तो हमें जैसे अमूल्य रत्नों की कोई खान मिल गयी हो।

आगे जो भी कुछ हुआ आप पूर्वप्रकाशित क्लिप्स में देख चुके हैं। 

समापन करने से पहले साथिओं के साथ निम्नलिखित पल शेयर किये बिना रह नहीं पा रहे हैं: 

-मंदिर में प्रवेश करते ही ओंकार जी का प्रज्ञागीत शुरू ही हुआ था लेकिन दूर से ही चिन्मय जी और ओंकार जी ने जैसे अभिनन्दन किया उसे जीवन भर याद रखेंगें।

-समाप्ति पर चिन्मय जी द्वारा गर्मजोशी से, ज़ोर से आलिंगन करना हमारे लिए सदैव अविस्मरणीय रहेगा। 

-अपने इलाके में तो हमें कुछ एक लोग जानते हैं लेकिन यहाँ पर, बिलकुल अनजान, कोई जान पहचान नहीं, सबके आगे खड़े होकर कैसे सारी वीडियोग्राफी कर ली गुरुदेव ही जानते हैं। 

तो साथिओं यह सब कैसे संभव हो पाया, किसने किया इसे सभी जानते हैं, कुछ भी कहने की ज़रुरत नहीं है।  

गुरु के चरणों में नमन है।      


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