“यज्ञ पिता-गायत्री माता” पुस्तक, गुरुदेव द्वारा पंडित लीलापत शर्मा जी के जिज्ञासा भरे प्रश्नों के उत्तरों का समावेश है। हमारा सौभाग्य है कि
पिछले कुछ दिनों से हम इस पुस्तक के ज्ञान को समझने का प्रयास कर रहे हैं, ऑनलाइन सोर्सेज,साथिओं से प्राप्त हुए ज्ञान से, पुस्तक के एक-एक शब्द को समझने का प्रयास किया जा रहा है। ज्ञानप्रसाद लेख कोई साधारण लेख नहीं हैं,इन लेखों के पाठक इस तथ्य के साक्षी हैं।
गायत्री मंत्र की दिव्यता से हर कोई परिचित है। तीन चरणों, 8 Sets और 24 अक्षरों वाला यह मंत्र जिसे सही अर्थों में समझ आ गया समझो उसका कायाकल्प ही हो गया। कल वाले लेख में इस सन्दर्भ में व्यापक चर्चा की गयी थी, फिर से रिपीट करना अनुचित होगा।
आज के ज्ञानप्रसाद लेख में द्वितीय (भर्गो देवस्य धीमहि) एवं तृतीय चरण (धियो यो नः प्रचोदयात) चरण की चर्चा है।
गायत्री मंत्र की महिमा का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है वर्षों से हम इस मंत्र का जाप कर रहे हैं, इसके भावार्थ को भी जानते हैं, अनुष्ठान तक कर चुके हैं लेकिन आज भी ज्ञानप्रसाद लेखों के माध्यम से उस ज्ञान की प्राप्ति हो रही है जिसे पढ़कर अधिकतर पाठकों के दिल से यही निकल रहा है “यह तो हमें पता ही नहीं था।” ऐसी है इस महामंत्र की विशालता।
वर्तमान समय में, जब मनुष्य एक पशु की भांति बर्ताव कर रहा है तो इस मंत्र की आवश्यकता और भी अधिक हो जाती है। ईश्वर से प्रार्थना है कि सभी को सद्बुद्धि प्रदान करें लेकिन हमारी प्रार्थना कहाँ सुनी जाएगी क्योंकि मंत्र का भावार्थ ही ऐसा है कि मनुष्य स्वयं माँ गायत्री से प्रार्थना करे मेरी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।
आइए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा में प्रतीक्षा कर रहे गुरुशिष्यों को आज के ज्ञानामृत का पयपान कराएं।
साथिओं से निवेदन है कि आज के लेख की अंतिम पंक्तियाँ अवश्य ग्रहण करें, तीनों चरणों का सार है।
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गायत्री का द्वितीय चरण “भर्गो देवस्य धीमहि”
गायत्री मंत्र के पहले चरण की तरह, दूसरे चरण में भी तीन शब्द (भर्गो देवस्य धीमहि) और आठ अक्षर (भ,र्गो ,दे,व,स्य,धी,म,हि) हैं। तत सवितुर्वरेण्यं हमें “परमात्मा की सविता शक्ति” का वरण करने का संदेश देता है लेकिन परमपिता परमात्मा के तो और भी अनेक गुण हैं, उनका ध्यान करना भी कोई अनुचित बात नहीं है।
भगवान की उस शक्ति को जो बुराइयों का,अंधकार का नाश करती है भर्गः(तेज़, प्रतिभा) कहते हैं। अक्सर देखा गया है कि अच्छाई की अपेक्षा बुराई का आकर्षण अधिक चमकदार होता है। अतः बुराइयों का आक्रमण भी बड़ी तेज़ी और दृढ़ता से होता है। लोग बुराइयोँ के प्रलोभन में आसानी से फंस जाते हैं। एक बार उनके चंगुल में फंस जाने पर,उस दलदल से निकल पाना बड़ा कठिन होता है।
संसार में दिव्य और आसुरी शक्तियां दोनों ही काम करती रहती हैं। यह देवासुर (देवताओं और असुरों का संग्राम) संग्राम हमारे मन में भी चलता रहता है। मनुष्य में व्याप्त आसुरी प्रवृत्तियों को कुचल पाना केवल परमेश्वर की भर्गः शक्ति से ही संभव हो सकता है। धैर्य और मनोयोगपूर्वक मानसिक संतुलन बनाए रखकर हमें नित्य ही आत्मनिरीक्षण करना चाहिए एवं जो भी दुष्प्रवृत्तियां हों उन्हें बाहर खदेड़ने का प्रयास करना चाहिए।
गायत्री मंत्र में ईश्वर के उस तेजस्वी और श्रेष्ठ अंश को धारण करने के साथ-साथ यह आदेश भी है कि हम ‘भर्ग’ को भी अपने अंदर धारण करें, बुराइयों, पापों, दुर्बलताओं, कुप्रवृत्तियों से सावधान रहें।
“देव” कहते हैं दिव्य को, अलौकिक को, असाधारण को। हमें अपने में देवत्व को धारण करना चाहिए। दिव्य सिद्धांतों को सामने रखकर उनके आधार पर अपने कर्त्तव्य का निर्णय करना चाहिए। जो सत हो, ठीक हो,लोकमंगल के लिए हो,ऐसे कार्य को इतनी पूरी लगन से करना चाहिए कि कोई प्रलोभन, कोई आकर्षण, कोई आपत्ति या भय हमें उस कार्य से विचलित न कर सके। ऐसे सत्यकर्म के लिए भले ही हम अकेले ही क्यों न हों, गुरुकार्य अनवरत,बिना किसी बहानेबाज़ी के चलते ही रहना चाहिए। सत्यकर्म करने वाले को खुद ही पता नहीं होता कि उसका गुरु उसे कैसे-कैसे अनुदानों से लाद रहा है। तभी तो समर्पित शिष्य यही कहता देखा गया है कि “कर तो गुरु रहा है लेकिन श्रेय मुझे दिए जा रहा है।” अभी-अभी पोस्ट हुए 72000 व्यूज वाले लेख में लेखक का तो कुछ भी नहीं है,पुस्तक गुरु की,ज्ञान गुरु का, मार्गदर्शन गुरु का, यहाँ तक की एडिटिंग की लेखनी भी गुरु की, लेखक का रोल केवल एक सेवादार का, डाकिये भर का ही है।
जब सब कुछ गुरु का ही है तो “कोई क्या कहेगा” जैसे प्रश्न सोच-सोच कर दुःखी होने से मिलना तो कुछ भी नहीं है,शक्ति का नाश अवश्य हो जाना है।
गायत्री मंत्र के दूसरे चरण की वर्तमान चर्चा से मनुष्य अपने अंदर देवता बनने की क्षमता जाग्रत कर सकता है। देने वाले को, दान करने वाले को देवता कहते हैं। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के सभी साथी जो अपने समय का,श्रम का, बुद्धि का,ज्ञान का,प्रतिभा का,क्षमता का,नियमितता से दान कर रहे हैं, साथिओं को लाभ देने में सदैव तत्पर रहते हैं, उन्हें देवता न कहें तो और क्या कहें। गायत्री मंत्र का यह चरण सन्देश दे रहा है कि मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी शक्ति व सामर्थ्य को अपनी स्वार्थपूर्ति,वासनाओं की तृप्ति और छल-कपट में न लगाकर परमार्थ के लिए भी अर्पण करें और दूसरों की सेवा में भी लगाएं।
लीलपत जी ने प्रश्न करते हैं कि गुरुदेव,आप तो कहते हैं कि हम देवता बनें लेकिन देवता तो पृथ्वी पर नहीं रहते, वे तो स्वर्ग में रहते हैं और वहां तो मरने के बाद ही जाया जा सकता है।
यह प्रश्न सुनकर गुरुदेव जोर से हंसे और बोले, “जिसे तुम स्वर्ग समझते हो,मरने के बाद तो वहां भी नहीं पहुंच पाएंगें। आजकल लोगों के जिस स्तर के आचरण हैं वह तो जीते जी ही नरक के समान हैं। देवता स्वर्ग में रहते हैं और स्वर्ग पृथ्वी से ऊपर है। स्वर्ग किसी ने देखा है कि नहीं,यह तो चिंतन का विषय है लेकिन श्रेष्ठ विचारों के स्वर्ग (विचारलोक) में अनेकों विचरण करते हैं। यह ऐसे लोग होते हैं जो स्वार्थ और संकीर्णता की तुच्छता से बहुत ऊपर हैं। देवता और राक्षस दोनों ही पृथ्वी पर रहते हैं । यहीं पर स्वर्ग भी है और नरक भी। हम दिव्य बनें, दिव्य तत्वों से, दिव्य सिद्धांतों से और दिव्य विश्वासों से अपने अंत:करण को दिव्यता से ओतप्रोत कर दें तो मनुष्य इसी पृथ्वी पर जीते जी देवता बन सकता है, स्वर्ग के लिए मरने की कोई ज़रुरत ही नहीं है।
यही है गुरुदेव का विचारक्रांति अभियान, Thought revolution
“धीमहि” कहते हैं ध्यान करने को। हम जिस वस्तु का ध्यान करते हैं उसी पर मन जमता है, मन जमने से उस वस्तु पर, उस कार्य के प्रति रुचि उत्पन्न होती है, रुचि उत्पन्न होने से उसे प्राप्त करने की आकांक्षा बढ़ती है, आकांक्षा से प्रयत्न उत्पन्न होता है और वह प्रयत्न ही अंतत: अभीष्ट वस्तु को प्राप्त करा देता है।
“ध्यान बीज है और सफलता उसका फल।”
कोई भी कार्य पहले कल्पना में आता है, फिर उसकी योजना बनती है तब वह क्रिया के रूप में प्रकट होता है। वेदमाता गायत्री ने हमें धीमहि (ध्यान) का निर्देश दिया है। हम परमात्मा की शक्तियों का ध्यान करें। हम ध्यान करें सविता का, भर्ग: का और देवस्य का। इन सब का ध्यान करने से मन में एकाग्रता आती है, चित्त स्थिर होता है और मन के ऊपर नियंत्रण होता है। मन को जिस कार्य में लगा दिया जाता है, शरीर के अंग भी उसी ओर अग्रसर होते हैं, सहयोग देते हैं। हमारे मस्तिष्क में ईश्वरीय,तेजस्वी,श्रेष्ठ,शक्तिशाली,दिव्य विचारों को ही स्थान मिले जिससे हम आत्मकल्याण और परमार्थ के कार्यों में ही लगें।
गायत्री मंत्र का तृतीय चरण “धियो यो नः प्रचोदयात”
अब गायत्री मंत्र के तीसरे एवं अंतिम चरण को देखते हैं। इसके भी तीन शब्द और 8 अक्षर हैं। ‘धी’ का अर्थ है बुद्धि, ज्ञान, सोच और विचार। इन चारों शब्दों का ठीक से विश्लेषण करें तो देखा जाएगा भगवान ने केवल बुद्धि की प्रेरणा नहीं दी है, सद्बुद्धि के लिए कहा है। J. Robert Oppenheimer जिसे Father of Atomic bomb की ख्याति प्राप्त है, उसने अपनी बुद्धि का प्रयोग किया,उच्चस्तरीय वैज्ञानिक की पदवी प्राप्त की लेकिन उसके ज्ञान ने विश्व का जो विनाश किया उसे आज तक भुलाया नहीं जा सकता, हम तो कहेंगें कि कभी भी भुलाया नहीं जा सकेगा। गायत्री मंत्र के तीसरे चरण में, क्या हम भगवान से ऐसे ज्ञान की, ऐसी बुद्धि की प्रार्थना कर रहे हैं, कदापि नहीं।
अरे झूठ,फरेब,चोरी,मक्कारी,जालसाजी,बदमाशी जुएबाजी आदि सिखाने के लिए तो चारों तरफ असंख्य व्यक्ति मौजूद हैं, व्यक्ति क्या Institution(Gambling institute) खुले हुए हैं। इनकी ट्रेनिंग के लिए लिए भगवान से प्रार्थना क्यों करें ? वोह तो स्वयं भी यह सब नहीं जानते,हमें कैसे सिखाएंगे?
मनुष्य की आत्मा को जिस वस्तु की सबसे अधिक आवश्यकता है वह है “सद्बुद्धि” सद्बुद्धि को “धियः” कहते हैं । गायत्री सदबुद्धि की देवी है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हमें सद्बुद्धि दें। केवल मुझे ही नहीं,हमें, हम सबको सद्बुद्धि दें जिससे हम सभी का कल्याण हो । सभी प्रेम व सहयोग की भावना से रहें। इस प्रेरणा से उत्साहित होकर हम अपने अंत:करण का निर्माण करने में जुट जाएं। अपनी कुबुद्धि से लड़कर उसे परास्त करें और उसके स्थान पर सद्बुद्धि की स्थापना का पुरुषार्थ दिखाएं ।
भारतीय संस्कृति कर्मवाद की संस्कृति है,उसमें पुरुषार्थ,प्रयत्न,संघर्ष और श्रम करके अभीष्ट वस्तुएं प्राप्त करने का आदेश है। अथर्ववेद में बड़ा ही सुंदर एक मंत्र “श्रयेण तपसा सृष्टा, नृत्ताय हंसाय च” है इसके लिए निम्नलिखित चर्चा करना आवश्यक है:
कोई पूछे कि ईश्वर ने संसार की रचना क्यों की है, तो उसका उत्तर है कि इस रचना का उद्देश्य है कि मनुष्य श्रम कर सके और धर्म के मार्ग पर चल सके। श्रम और तप के इस मार्ग पर चलते हुए वह नाचे, हंसे और आनंद के सागर में गोते लगाए। लेकिन यह हंसी, यह आनंद केवल सद्बुद्धि से ही संभव है। यही कारण है कि गायत्री मंत्र में हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा दें ।
गुरुदेव ने पंडित लीलापत जी के साथ हो रही चर्चा का समापन निम्नलिखित शब्दों में किया:
बेटे, गायत्री महामंत्र का यही भावार्थ है। यह मंत्र अपने आप में पूर्ण धर्मशास्त्र है। इसके अर्थ का गंभीरता से विचार करने पर तीन तथ्य प्रकट होते हैं,(1) पहला, ईश्वर के दिव्य गुणों का चिंतन, (2) दूसरा, ईश्वर के उन गुणों को अपने अंदर धारण करना और (3)तीसरा, सद्बुद्धि की प्रेरणा के लिए प्रार्थना करना। मानव जीवन के लिए सद्बुद्धि अत्यंत महत्वपूर्ण है। सद्बुद्धि से, सात्विक बुद्धि से हमारे मस्तिष्क में घुसे हुए कुविचारों,कुसंस्कारों,नीच वासनाओं तथा दुर्भावनाओं का नाश होता है। सतोगुणी ऋतंभरा बुद्धि से, विवेक से, सद्ज्ञान से जीवन में स्वर्गीय आनंद की प्राप्ति होती है।
जय गुरुदेव, सभी साथिओं का धन्यवाद्
