“यज्ञ पिता-गायत्री माता” पुस्तक, गुरुदेव द्वारा पंडित लीलापत शर्मा जी के जिज्ञासा भरे प्रश्नों के उत्तरों का समावेश है। हमारा सौभाग्य है कि
पिछले कुछ दिनों से हम इस पुस्तक के ज्ञान को समझने का प्रयास कर रहे हैं, ऑनलाइन सोर्सेज,साथिओं से प्राप्त हुए ज्ञान से, पुस्तक के एक-एक शब्द को समझने का प्रयास किया जा रहा है। ज्ञानप्रसाद लेख कोई साधारण लेख नहीं हैं,इन लेखों के पाठक इस तथ्य के साक्षी हैं।
गायत्री मंत्र की दिव्यता से हर कोई परिचित है। तीन चरणों, 8 Sets और 24 अक्षरों वाला यह मंत्र जिसे सही अर्थों में समझ आ गया समझो उसका कायाकल्प ही हो गया।
आज के ज्ञानप्रसाद लेख में पहले चरण “तत्सवितुर्वरेण्यं” की चर्चा है।
आइए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा में प्रतीक्षा कर रहे गुरुशिष्यों को आज के ज्ञानामृत का पयपान कराएं
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गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों को आठ-आठ अक्षरों के तीन चरणों (Sets ) में विभाजित किया गया है। इन तीन चरणों को ‘त्रिपदा गायत्री’ भी कहा जाता है।
आठ-आठ के तीन सेट निम्नलिखित हैं:
1.पहला चरण (8 अक्षर): तत् स वि तु र व रे ण्यं (Tat Sa Vi Tur Va Re Nyaṃ)
2.दूसरा चरण (8 अक्षर): भ र्गो दे व स्य धी म हि (Bhar Go De Vas Ya Dhee Ma Hi)
3.तीसरा चरण (8 अक्षर): धियो यो नः प्र चो द यात् (Dhi Yo Yo Nah Pra Cho Da Yāt)
मुख्य मंत्र इन 24 अक्षरों से ही बनता है। इसके आगे लगा “ॐ” और “भूर्भुवः स्वः” महामंत्र के आरंभिक बीज मंत्र और व्याहृतियाँ हैं।
1-तत, 2-स, 3-वि, 4-तु, 5-व, 6-रे, 7-णि, 8-यम ,9-भृ,10-गों, 11-दे, 12-व, 13-स्य, 14-धी, 15-म, 16-हि, 17-धि, 18-यो, 19-यो, 20-न: 21-प्र, 22-चो, 23-द, 24-यात
आइए प्रथम चरण पर चर्चा करें:
तत्सवितुर्वरेण्यं (तत्,सवितुः और वरेण्यं):
गुरुदेव ने बताया ” त्रिपदा गायत्री के इस चरण में तीन शब्द हैं:
इसका सीधा सा अर्थ है “उस” सविता का वरण करो। यह “उस” कौन है ?, ‘सविता’ क्या है और उनका वरण कैसे करें ?
यह चरण “तत” शब्द से प्रारंभ होता है। इसमें ईश्वर की ओर संकेत किया गया है जिससे परब्रह्म परमात्मा की सर्व-व्यापकता को ध्यान में रखकर बुराइयों से बचने का निर्देश है।
यह बिल्कुल ऐसा ही है जैसे पुलिस के सामने अपराधियों को दुष्कर्म करने का साहस नहीं होता। पुलिस हर जगह तो होती नहीं है लेकिन स्पीड कैमरे तो जगह-जगह लगे पड़े हैं, आपने स्पीडिंग की नहीं कि आप कैमरे में कैद हो गए और जुर्माने की टिकट आपके घर आ गयी। स्पीडिंग टिकट का जुर्माना तो हो गया लेकिन ईश्वर के सर्वव्यापी होने के बावजूद मनुष्य दुष्कर्म किये जा रहा है, कहे जा रहा है कि कोई हमें कहाँ देख रहा है? लेकिन ईश्वर का कैमरा तो बहुत ही शक्तिशाली है,बड़े ही High pixel का है, बहुत ही HD पिक्चर लेता है। दूर जाने की ज़रुरत ही नहीं है, भगवान तो मनुष्य के सबसे करीब,उसके ह्रदय में ही विराजमान हैं, वहीँ से गलत काम न करने की वार्निंग आ जाती है। ऐसा कहने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती कि भगवान् हमें कहाँ देख रहे हैं।
गायत्री मन्त्र के प्रथम चरण में कहा गया है तत (उस) परमात्मा का सदा ध्यान रखो। वह हर समय तुम्हारे चारों ओर विद्यमान है, तुम्हारे प्रत्येक कर्म को देख रहा है।
बॉलीवुड मूवी “सन्यासी” का लोकप्रिय गीत “कर्म किए जा फल की इच्छा मत कर ऐ इंसान,जैसा कर्म करेगा वैसा फल देंगें भगवान” हमारे अनेकों पाठकों ने सुना होगा, गुनगुनाया होगा। कर्मफल से कोई बच नहीं सकेगा, यहाँ तक कि भगवान् भी कर्मफल के सिद्धांत से बच नहीं सकते।
भारतीय पौराणिक कथाओं में इसके कई दृष्टांत मिलते हैं। त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने बाली को छिपकर बाण मारा था। कर्म के सिद्धांत के अनुसार, उन्हें भी अपने इस कर्म का फल भुगतना पड़ा। द्वापर युग में योगेश्वर श्रीकृष्ण के चरणों में जरा नामक शिकारी का बाण लगा और उनकी मृत्यु हो गयी। राजा दशरथ द्वारा अनजाने में श्रवण कुमार का वध हुआ, इस कर्म के कारण राजा दशरथ को अपने पुत्र वियोग का असहनीय दुःख भोगना पड़ा,उनकी मृत्यु हो गयी
कर्मफल का सिद्धांत ऐसा क्यों है ?
कर्मफल के सिद्धांत से ईश्वर तक बंधे हुए हैं। ईश्वर इस सृष्टि के निर्माता और संचालक हैं, यदि वे ही अपने बनाए नियमों (कर्मफल) को बदलने लगें, तो पूरी व्यवस्था डगमगा जाएगी। इसलिए,मनुष्य के साथ-साथ खुद ईश्वर भी जब साकार रूप (अवतार) में इस धरती पर आते हैं, तो वे कर्मों के नियमों का पालन करते हैं। इसका उद्देश्य मनुष्य को यह सिखाना है कि कर्म से ऊपर कोई भी नहीं है।
मुक्ति का मार्ग:
कर्मफल से बचने का अर्थ यह नहीं है कि कोई कर्म ही न करे। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार निष्काम भाव (बिना फल की इच्छा के) से कर्म करके और ईश्वर को सब कुछ समर्पित करके ही जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति (मोक्ष) पाई जा सकती है। दुर्लभ मनुष्य जन्म, सत्यकर्म करके पुण्य कमाने का एक स्वर्ण अवसर है
इसीलिए आवश्यक है कि तत(उस) परमेश्वर का सदा स्मरण किया जाए। ईश्वर के असंख्य गुण हैं,अनेकों नाम हैं। गायत्री मंत्र के अनुसार ईश्वर का एक नाम सविता भी है। आत्मिक तेज, बौद्धिक तेज, आर्थिक तेज, शारीरिक तेज इन सब तेजों से संपन्न बनने से ही मनुष्य का जीवन तेजोमय बनता है। ईश्वर की (सविता भगवान की) इस तेज शक्ति को धारण करके हम जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जाज्वल्यमान नक्षत्र के समान चमकते रहें, यही भाव इस चरण में समाहित है। सविता सूर्य को कहते हैं क्योंकि उसमें भी तेज और प्रकाश के गुण हैं। स्थूल रूप में सूर्य परमात्मा की तेज व प्रकाश की अदृश्य शक्ति को हमारे सामने प्रकट करता है। गायत्री मंत्र के प्रथम चरण में सविता सूर्य को वरण करने का सन्देश है।
वरेण्यं का क्या अर्थ है ?
वरेण्यं से तात्पर्य है जो सबसे श्रेष्ठ है, वरण करने योग्य हो, अपनाने योग्य हो। संसार में असंख्य तत्व हैं जो मनुष्य के लिए उपयोगी भी हैं और अनुपयोगी भी। मनुष्य को सन्देश है कि वह अपनी बुद्धि/विवेक से निर्णय करे और उपयोगी को ही अपनाए। जो लोकमंगल के लिए उपयुक्त हो, जो श्रेष्ठ है उसे ही वरण करे। धर्म,कर्तव्य,अध्यात्म, सत, चित,आनंद,सत्य,शिव,सुंदर की ओर जो तत्व हमें अग्रसर करते हैं वे ही धारण करने योग्य हैं। श्रेष्ठता को अपने अंदर धारण करने से, श्रेष्ठता की ओर अभिमुख होने से हमारी ईश्वर प्रदत्त श्रेष्ठता जाग पड़ती है । बाग में असंख्य फूलों की सुगंध बिखरी होती है लेकिन मक्खी को तो केवल गंदगी ही पसंद है। वह बदबूदार गंदी चीजों की ओर ही आकर्षित होती है। दूसरी तरफ मधुमक्खी है जो ढूंढ-ढूंढ कर सुगंधित फूलों का रस एकत्रित करती है, उपवन से श्रेष्ठतम वस्तु को ही ग्रहण करती है । तत्सवितुर्वरेण्यं में वेदमाता गायत्री हमें श्रेष्ठ धारण करने का ही आदेश देती है। इसी से हम अपने जीवन को सुख से, आनंद से परिपूर्ण कर सकते हैं।
पंडित जी ने जिज्ञासा प्रकट की कि गुरुदेव यह सब कैसे किया जा सकता है ?
गुरुदेव ने कहा:सबसे पहले मन को काबू में करना होता है। स्वयं को मोहमाया से बचाना होता है। स्वार्थ से ऊपर उठ कर लोकमंगल के कार्यों को प्राथमिकता देनी होती है। ऐसा करने से ही हमारी प्रज्ञा बुद्धि जाग्रत होती है, सत और असत में भेद करने की, पहचानने की क्षमता विकसित होती है। निर्मल,स्वच्छ मन में ही परमेश्वर के श्रेष्ठ गुणों को अपनाने में सुगमता होती है, सफलता मिलती है और स्वर्गीय आनंद की प्राप्ति भी होती है।
प्रबल इच्छा शक्ति:
मोह माया,लोभ,स्वार्थ आदि से छुटकारा पाना तो बड़ा ही कठिन है लेकिन यह जितना कठिन है उतना सरल भी है। केवल अपनी इच्छाशक्ति को प्रबल बनाना होता है। हम जैसा सोचते हैं वैसा बन जाते हैं, जो इच्छा करते हैं वही कर लेते हैं। सिनेमा देखने की इच्छा होती है, क्रिकेट मैच देखने की इच्छा होती है,गप्पबाज़ी में, चुगली में तो मज़ा ही बहुत आता है। सबके लिए समय भी मिल जाता है, एक ज्ञानप्रसाद लेखों के अध्ययन के लिए ही समय का आभाव है।
हिमालय की चोटी पर, एवरेस्ट पर चढ़ने की इच्छा हो तो प्रयास करने पर वह भी हो सकता है। चांद तक भी पहुंच सकते हैं। इच्छा जगते ही इन सब कामों के लिए उठ खड़े होते हैं। किसी भी कार्य को करने के लिए सबसे पहले विचार बनता है, फिर प्रयास होता है। असफलता भी मिलेगी, फिर प्रयास होगा, फिर असफलता मिलेगी, पुनः अधिक जोर से प्रयास होगा और अंततः सफलता हमारे चरण चूमेगी ।
यह सब प्रबल इच्छाशक्ति से,आत्मबल के जाग्रण से ही संभव होता है । द्वितीय विश्वयुद्ध की एक घटना है। एक सैनिक अधिकारी तीन सैनिकों के साथ युद्ध क्षेत्र में सेना की जीप से जा रहा था। शत्रु सेना की ओर से गोलियों की बौछार हो रही थी। अचानक एक बड़े पत्थर से टकराकर जीप उलट गई। पहिए ऊपर हो गए। जीप मजबूत लोहे की चादरों से बनी थी अतः अंदर बैठे लोगों को विशेष चोट नहीं आई लेकिन अब क्या हो। वहां से निकल सकने का कोई साधन नहीं और हर क्षण मौत का खतरा। जीप के अंदर एक अधिकारी और तीन सैनिक ही थे। बचने का केवल एक ही मार्ग था कि चारों मिलकर जीप को सीधा करें और भाग चलें लेकिन इतनी भारी जीप जिसे 10-15 जवान भी मिलकर नहीं उठा सकते, उसे चार व्यक्ति कैसे उठाकर सीधा करें। उन चारों ने भगवान का ध्यान करके जोर लगाया। उनका आत्मबल जाग्रत हुआ और उनकी भुजाओं में इतनी शक्ति आई कि उन्होंने जीप को सीधा कर लिया तथा सकुशल अपने कैम्प तक पहुंच गए।
कैम्प में जाकर उन्होंने जब यह घटना सुनाई तो किसी को विश्वास ही नहीं हुआ। कप्तान ने कहा कि चारों मिलकर जीप का एक पहिया ही उठाकर दिखा दें। जब उन्होंने बहुत प्रयास किया तो वे जीप के एक पहिए को मुश्किल से दो अंगुल ही उठा सके।
गुरुदेव ने लीलापत जी को यह बताते हुए आज के ज्ञान का समापन किया कि बेटे! प्रबल इच्छाशक्ति/आत्मबल का कमाल ऐसा होता है। ऐसा होते ही कुछ भी असंभव नहीं रहता,कहीं भी कोई कठिनाई नहीं रहती।
गायत्री मंत्र के प्रथम चरण “तत्सवितुर्वरेण्यं” में यही ज्ञान छिपा है।
जय गुरुदेव
कल दूसरे और तीसरे चरणों की बात होगी।
