वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परम पूज्य गुरुदेव की साधना के 100 वर्ष को समर्पित एक दिव्य लेख श्रृंखला का 8वां लेख-गायत्री मंत्र के पहले चार शब्दों (ॐ,भूः,भुवः, स्वः) की अति सरल व्याख्या। 

“यज्ञ पिता-गायत्री माता”, गुरुदेव  द्वारा पंडित लीलापत शर्मा जी के जिज्ञासा भरे प्रश्नों के उत्तरों का समावेश है। हमारा सौभाग्य है कि आदरणीय संध्या बहिन जी की पहल से इस पुस्तक के  एक-एक शब्द को समझने की प्रेरणा मिली, बहिन जी का धन्यवाद् करते हैं। 

आज के ज्ञानप्रसाद लेख में गायत्री मंत्र के प्रथम चार शब्द जिनसे मंत्र का शुभारम्भ होता है, पर यथासंभव सरल चर्चा प्रस्तुत की गयी है। आज के लेख में दी गयी जानकारी के आधार पर हमें अपना मूल्यांकन करने का अवसर मिल रहा है, स्वयं से पूछने का अवसर मिल रहा है कि मंत्रोचारण के समय शरीर में कुछ इलेक्ट्रिक करंट दौड़ती हुई अनुभव होती है? क्या कभी स्वयं से पूछा है, “अरे यह तो समाप्त हो गया, अभी-अभी तो उस परमसत्ता से तार जोड़ा था, क्या परमानंद की अनुभूति हुई है? इस प्रश्न तो सरलता से समझने के लिए सुख और आनंद के  अंतर् पर चर्चा की गयी है। 

आने वाले लेखों में गायत्री मंत्र के अन्य शब्दों की भी इसी तरह की सरल, Easy to understand व्याख्या करने की योजना है। 

आइए गुरुकुल की गुरुकक्षा में, हम सब गुरुशिष्य, गुरुचरणों में नमन करें और गुरुज्ञान का अमृतपान करते हुए दुर्लभ मनुष्य जीवन को सार्थक करें। 

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गायत्री मंत्र का शुभारंभ ॐ से होता है।ओंकार (ॐ) को ब्रह्म कहते हैं, प्रणव भी कहते हैं। यह परमात्मा का स्वयंसिद्ध नाम है। ओंकार को अपनाने से ब्रह्मतत्व की मात्रा बढ़ती है, एक ऐसा तत्व जिसके  फलस्वरूप गुण,कर्म, स्वभाव में सात्विक भावों की प्रधानता रहती है। मनुष्य स्वर्ग,मोक्ष,अमरता,सिद्धि,आत्मदर्शन,शिवत्व की ओर बढ़ता है। ईश्वर के इस स्वयंसिद्ध नाम (ॐ) को ग्रहण करके मनुष्य ईश्वर की ओर ही चल पड़ता है। रस्सी को पकड़कर चढ़ने वाला वहीं पहुंच जाता है जहां रस्सी बंधी हो। ऊँचे वृक्ष के साथ चिपकी बेल वृक्ष के Highest point तक पंहुच जाती है  

प्रणव अर्थात ॐ की श्रेष्ठता को ध्यान में रखते हुए ही आचार्यों ने समस्त श्रेष्ठ कर्मों में ओंकार को ही प्राथमिकता दी है। इसीलिए इसे प्रत्येक मंत्र से पहले उच्चारण करने का विधान है। 

ओंकार एक प्रकार का सेतु है, पुल है जिस पर से होकर ही किसी मंत्र को पार किया जा सकता है, उसके भावों को समझा जा सकता है ।

गायत्री मंत्र में सबसे पहले  ॐ को इसीलिए नियोजित किया गया है ताकि गायत्री मंत्र की शक्ति को ॐ के  पुल पर चढ़कर पार किया जा सके। ॐ जिन अर्थों का बोधक है उन अर्थों की,गुणों की,आदर्शों की ज्योति साधक के मन को प्रकाशित कर देती है जिसके फलस्वरूप आध्यात्मिक साधना का मार्ग सुलभ हो जाता है ।

ॐ का उच्चारण करने से मनुष्य ऐसी “स्वर तरंगों के गुंजन” का अनुभव करता है जिनकी तुलना मंदिर की घंटी से की जा सकती है। ॐ जपने से घंटी जैसी Echo का अनुभव देखा गया है। इस Echo से साधक के सभी स्नायु तंतुओं (Ligaments, Tendons) में एक इलेक्ट्रिक करंट कौंध जाती है और मन एकाग्र हो जाता है। मन इतना एकाग्र हो जाता है कि मुँह से सहसा ही निकल आता है, “अरे यह तो खत्म हो गया।” इस स्थिति की तुलना ऐसे मनुष्य से की जा सकती है जो मंत्र जाप तो कर रहा है लेकिन बीच-बीच में अनेकों बार घड़ी को देख रहा है, देख रहा है कितनी माला बाकी रह गयी है। दोनों साधकों में बेसिक अंतर् यही है कि एक ने तो सूक्ष्म तार से अपने अंतर्मन को ईश्वर के ट्रांसफॉर्मर से जोड़ लिया है,उसने स्वयं को खाली करके,अंतर्मन में ईश्वर को विराजमान कर लिया है जबकि दूसरा केवल कर्मकांड ही कर रहा है,उसने तो तार को घर के Main electric board के साथ भी नहीं जोड़ा, बल्ब में प्रकाश कैसे आएगा। 

इन पंक्तियों के नगण्य लेखक की पहले साधक जैसी व्यक्तिगत स्थिति है लेकिन अद्भुत विद्युत तरंगों को अनुभव करने में,कनेक्शन स्थापित करने में लगभग 2 वर्ष का समय लग गया था। विज्ञान की शिक्षा होने के कारण, किये गए भांति-भांति के प्रयोग बहुत ही सहायक रहे थे।    

गायत्री मंत्र में पाया गया “शब्द विज्ञान,स्वर शास्त्र का अनोखा संगम” अन्य किसी मंत्र में नहीं है। ॐ का उच्चारण करते समय यह अनुभव करना चाहिए कि हमारे हृदय की तरंगें परमपिता परमेश्वर से जुड़ रही हैं, ईश्वर के साथ कनेक्शन बन रहा है और इन तरंगों के माध्यम से ईश्वर के अनेकों अनुदान वरदान हम तक पहुंच रहे हैं ।

गायत्री मंत्र में ॐ के बाद तीन व्याहृतियां (भूः भुवः स्वः) आती हैं। इन तीनों व्याहृतियों में ब्रह्मा,विष्णु,महेश की शक्तियों का समावेश है। आइए इन तीन व्याहृतियों को थोड़ा और समझें।  

यह मूल अस्तित्व, उत्पादक शक्ति या परम चेतना (ब्रह्म) का प्रतीक है। यह जीवन का आधार और सर्वोच्च सत्ता है।

यह वह शक्ति है जो दुःख का नाश करती है और प्राणों का संचार करती है। इसे चेतना की पोषक, नियामक शक्ति या प्रकृति के रूप में जाना जाता है।

यह आनंद स्वरूप, व्यापक चेतना या जीव है। यह ब्रह्मांड के कण-कण में समाहित व्यक्तिगत आत्मा को दर्शाता है। 

संक्षेप में, यह त्रिमूर्ति (ब्रह्म, प्रकृति और जीव) का सूचक है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड के संचालन, पोषण और अस्तित्व का आधार है। 

इस विषय पर डिटेल्ड जानकारी के लिए गुरुदेव की रचना “गायत्री मंत्र का तत्वज्ञान (Philosophy of Gayatri mantra)” सहायक हो सकती है लेकिन हम जैसों के लिए (नर्सरी के स्टूडेंट्स) जितना बताया जा रहा है, काफी है। इतना भी समझ आ जाए तो बहुत होगा 

अग्नि, वायु, सूर्य आदि देवताओं का प्रतिनिधित्व भी यही व्याहृतियां करती हैं। इन तीनों लोकों का भी इनमें संकेत है। इन्हीं व्याहृतियों में परमेश्वर के गुणों की प्रशंसा  भी की गई है। 

क्या परमेश्वर इस प्रशंसा के भूखे हैं? क्या उन्हें चाटुकारिता करने वाले चमचों की आवश्यकता है? नहीं, नहीं, भगवान को कुछ नहीं चाहिए। भगवान की प्रशंसा/स्तुति हम इसलिए करते हैं कि उनके गुणों में से कुछ गुण हमारे अंदर भी आ जाएं। ईश्वर को “प्राण का आधार” कहने का लाभ तभी होगा जब हम स्वयं भी किसी के प्राण-आधार बनें। यदि किसी को प्राण दे नहीं सकते तो कम से कम किसी के प्राण लें तो नहीं। लेकिन मनुष्य क्या किये जा रहा है ? अपनी जिह्वा के स्वाद के लिए न जाने कितने पशु-पक्षियों की रोज़ हत्या हो रही है।

दुःख और सुख होते क्या हैं ? यह एक दृष्टिकोण है, Approach है, Perspective है, Outlook है। मनुष्य अगर अपना दृष्टिकोण बदल दे  तो बहुत से दुःख स्वतः ही सुख में बदल जाएंगे। इंद्रियों की संतुष्टि होना सुख है और अतृप्ति होना दुःख है। सुख और दुःख दोनों ही देवभाषा संस्कृत के शब्द हैं। ‘सु’ अर्थात अच्छा और ‘दु’ अर्थात बुरा-सौभाग्य, दुर्भाग्य

सुख का अर्थ है अच्छी इंद्रियां और दुःख का अर्थ है बुरी इंद्रियां।अच्छी इंद्रियां कौनसी होती हैं ? जो अपने बस में हों और खराब वे जो मनुष्य को अपने बस में करके नचाती फिरती हैं। मोह, माया लोभ के चक्कर में मनुष्य न जाने कितने दुःख उठाता है। जीभ का स्वाद तो उसे प्रत्यक्ष नरक में ही ढकेलता रहता है। न जाने क्या-क्या ऊटपटांग खाने के लिए खिंचता रहता है। भरे पेट पर भी यदि कहीं हलुवा, मिठाई, चाट पकौड़ी दिख गई तो लार टपकाने लगता है। यदि केवल स्वाद इंद्रियों को ही बस में कर ले तो न किसी डाक्टर की जरूरत पड़े,न वैद्य की।

आनंद देने वाला परमात्मा है। वही सत्-चित्-आनंद है, सच्चिदानंद है । परमात्मा केवल सुख ही नहीं आनंद भी देता है। सुख और आनंद दोनों भिन्न हैं। सुख क्षणिक होता है, कुछ समय तक ही रहता है फिर समाप्त हो जाता है, भौतिक होता है। यदि ऐसा नहीं है तो मनुष्य “और अधिक,और अधिक” की मृगतृष्णा में जीवन का नाश क्यों किए जा रहा है।

आनंद आंतरिक सुख है जो अनंत होता है। आनंद परमात्मा ही दे सकता है। हलवाई की दुकान पर जाकर पोस्टकार्ड लिफाफे मांगो तो वह कहां से देगा। इसी प्रकार डाकखाने में जाकर मिठाई मांगो तो कैसे मिल सकेगी। संसार में सारी भौतिक संपदाएं मिल सकती हैं,उनसे कुछ देर के लिए सुख भी मिल सकता है लेकिन आनंद तो तभी मिलेगा जब सच्चे मन से गायत्री मंत्र की आज्ञाओं का पालन करेंगे, गुरुदेव की बात सुनेंगे, ज्ञानप्रसाद लेखों में समाहित ज्ञान का अमृतपान करेंगे।

गायत्री मंत्र हमें शिक्षा देता है कि ब्रह्म, प्रकृति और जीव के आपसी संबंधों को समझते हुए अपना दृष्टिकोण और कार्यक्रम तय करना चाहिए। यज्ञ करते समय अग्नि, वायु और जल की उपासना का अर्थ तेजस्विता, गतिशीलता और शांतिप्रियता है। इन्हें अपने जीवन में अपनाकर परिवार एवं समाज में सुख-समृद्धि का वातावरण बनाना चाहिए । संसार में जो कुछ भी है उसका सदुपयोग करना चाहिए लेकिन किसी भी प्रकार का मोह नहीं करना चाहिए। 

रामायण, महाभारत, गीता सभी में अनेकों उदाहरण भरे हैं। राम के बनवास को ही देखो। उनके राज्याभिषेक की घोषणा हो चुकी थी। सारे नगर में हर्षोल्लास का वातावरण है,सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। राम भी इस दायित्व के लिए मानसिक रूप से तैयार थे,सौभाग्य की घड़ी की बाट जोह रहे हैं। तभी वज्रपात होता है। उन्हें 14 वर्ष के बनवास का आदेश मिलता है। यह क्या हो गया। राम का क्या दोष था, कोई भी तो नहीं,फिर ऐसा निष्ठुर आदेश क्यों दिया गया। भगवान राम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। किसी प्रकार की मोहमाया नहीं, कोई आसक्ति नहीं,पिता की आज्ञा है,पालन तो करना ही होगा,तुरंत राह बदल दी गई। जो पग राज सिंहासन की ओर बढ़ रहे थे वही वन की ओर मुड़ गए। 

आज का जमाना होता तो क्या यह संभव था? साफ कह देते कि पिताश्री आप सठिया गए हैं। आप ही वन को जाएं और साथ में अपनी केकैयी को भी ले जाएं। वर्तमान काल में ऐसा हो भी चुका है। औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां को आगरा के किले में कैद कर दिया था। यह भी बाप को बनवास भेजने के ही समान है ।

मर्यादा पुरषोत्तम राम, माता सीता का चरित्र, लक्ष्मण, उर्मिला और भरत,हनुमान,शबरी,जटायु सभी आदर्शवादिता के,तेजस्विता के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान हैं। 

इनसे हमें यह प्रेरणा लेनी चाहिए कि सांसारिक पदार्थों में अपने को भुला न दें बल्कि शाश्वत शक्ति से आत्मा का संबंध स्थापित करें, Main switch से तार जोड़ लें,जीवन का बल्ब प्रकाशमय हो जायेगा। भूः भुवः स्वः से जो अनेक संकेत मिलते हैं उनका सार सत्य, प्रेम और  न्याय है। इन्हें अपने जीवन में अपनाने का सतत प्रयास करें,तभी दुःखों का नाश होगा और सुखों की, आनंद की वर्षा होगी।

जय गुरुदेव, धन्यवाद् 

कल तक के लिए मध्यांतर 


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